अफगानी जिहादियों का भयंकर संहार कर 700 साल बाद 'लाहौर' में 'भगवा' गाड़ने वाले हिन्दू मराठा शेर 'पेशवा रघुनाथ राव', खौफ इतना भयंकर की बिना लड़े ही वापस 'काबुल' भागा डरपोक 'तैमूर शाह'

अफगानी जिहादियों का भयंकर संहार कर 700 साल बाद ‘लाहौर’ में ‘भगवा’ गाड़ने वाले हिन्दू मराठा शेर ‘पेशवा रघुनाथ राव’, खौफ इतना भयंकर की बिना लड़े ही वापस ‘काबुल’ भागा डरपोक ‘तैमूर शाह’

आज मैं आपको इतिहास के उस पन्ने पर ले जा रहा हूँ, जिसे पढ़कर आपके शरीर का रोम-रोम फड़क उठेगा। आज बात होगी उस खूंखार हिन्दू योद्धा की, जिसके नाम से अफगानिस्तान के सुल्तानों की नींद उड़ जाती थी।

मैं बात कर रहा हूँ महान मराठा शेर ‘पेशवा रघुनाथ राव’ की, जिन्हें इतिहास प्यार और खौफ से ‘राघोबा दादा’ के नाम से भी जानता है।

जब भी रघुनाथ राव का नाम आता है, तो ज़रा ये याद कर लेना की वो किसके बेटे थे! दोस्तों, वो उस महान ‘पेशवा बाजीराव प्रथम’ के बेटे थे, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में एक भी युद्ध नहीं हारा था।

बाजीराव प्रथम वो अजेय शूरवीर थे जिन्होंने मुगलों की हस्ती मिटा कर पूरे हिंदुस्तान में ‘हिन्दू पद पादशाही’ (हिन्दू साम्राज्य) का सपना बुना था। और उसी अपराजेय शेर का खून रघुनाथ राव की रगों में उबाल मार रहा था।

18वीं सदी का वो दौर था जब मुगलों की ताकत बिल्कुल खत्म हो चुकी थी। दिल्ली का तख्त बस नाम का रह गया था। मुगलों के अंदर इतना भी दम नहीं बचा था की वो अपने ही लाल किले की हिफाजत कर सकें।

ऐसे में मराठा साम्राज्य ही पूरे भारत की एकमात्र ऐसी महाशक्ति था जो सनातन धर्म की रक्षा के लिए चट्टान की तरह खड़ा था।

रघुनाथ राव ने अपने पिता बाजीराव के उसी अधूरे सपने को पूरा करने की कसम खाई थी।

उन्होंने संकल्प लिया था की इन विदेशी आक्रमणकारियों और जिहादियों को सिर्फ दिल्ली से बाहर नहीं निकालना है, बल्कि इन्हें काटते हुए सीधे इनके घर (अफगानिस्तान) तक छोड़कर आना है।

राघोबा दादा वो इंसान नहीं थे जो महलों में बैठकर नीतियां बनाते हों; वो एक खूंखार सेनापति थे, जिनकी तलवार जब म्यान से निकलती थी तो वो सिर्फ दुश्मनों का खून पीकर ही वापस लौटती थी।

अहमद शाह अब्दाली ने जब मथुरा और वृंदावन में मचाया खूनखराबा, तब पुणे से उठा मराठा साम्राज्य का वो भयंकर तूफान

कहानी में सबसे बड़ा उबाल आता है साल 1757 की शुरुआत में। अफगानिस्तान का खूंखार लुटेरा अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) भारत पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ा।

मुगलों की तो इतनी भी औकात नहीं थी की वो उस अफगानी पठान को रोक सकें, उलटा उन्होंने दिल्ली के दरवाज़े उसके लिए खोल दिए।

दिल्ली को जी-भर कर लूटने के बाद अब्दाली के जिहादी दरिंदों ने वो काम किया जो हर इस्लामी आक्रांता करता आया था-हिन्दुओं का कत्लेआम!

अब्दाली की फौज सीधे मथुरा, वृंदावन और गोकुल की तरफ मुड़ गई। हमारे उन पवित्र तीर्थ स्थानों पर जो भयंकर खून-खराबा हुआ, वो इतिहास के सबसे काले पन्नों में दर्ज़ है।

मंदिरों को बेरहमी से तोड़ा गया, हज़ारों बेगुनाह हिन्दुओं, साधु-संतों और औरतों का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। यमुना नदी का पानी हिन्दुओं के खून से लाल हो गया था।

अब्दाली ने तो बाकायदा अपने सैनिकों को इनाम देने की घोषणा की थी की जो जितने हिन्दुओं के कटे हुए सिर लाएगा, उसे उतना ही पैसा मिलेगा।

जब ये दिल दहला देने वाली खबर सैकड़ों मील दूर बैठे मराठों की राजधानी पुणे पहुँची, तो पूरे मराठा साम्राज्य का खून खौल उठा! पेशवा नानासाहेब (बालाजी बाजीराव) का गुस्सा सातवें आसमान पर था।

उन्होंने तुरंत अपने सबसे खतरनाक और आक्रामक सेनापति, यानी अपने छोटे भाई रघुनाथ राव को बुलाया।

आदेश एकदम साफ़ था- “जाओ और इन अफगानों को उनकी औकात दिखाओ! एक भी जिहादी ज़िंदा नहीं बचना चाहिए।”

रघुनाथ राव के साथ मल्हार राव होल्कर जैसे धुरंधर और अनुभवी सेनापति भी अपनी फौज लेकर निकल पड़े। पुणे से मराठा फौज की जो सुनामी उठी, उसकी धमक से पूरे उत्तर भारत की ज़मीन कांपने लगी।

मराठा घुड़सवारों के घोड़ों की टापें जब उत्तर की तरफ बढ़ीं, तो ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात यमराज अब्दाली और उसके पठानों की जान लेने आ रहे हों।

दिल्ली पर रघुनाथ राव का कब्ज़ा और मुगलों के सीने पर पैर रखकर अफगानी जिहादियों का किया गया सबसे खौफनाक संहार

अब्दाली को जब भनक लगी की मराठा फौज पुणे से निकल चुकी है, तो वो डरपोक लूटा हुआ सारा माल लेकर वापस अफगानिस्तान भाग गया!

लेकिन वो दिल्ली में अपने एक खूंखार और कट्टरपंथी पिट्ठू ‘नजीब-उद-दौला’ को बिठा गया था। नजीब एक रोहिल्ला (अफगानी) जिहादी था, जिसे अब्दाली ने मीर बख्शी (मुगल सेना का प्रमुख) बना दिया था, ताकि वो दिल्ली पर अफगानों का कब्ज़ा बनाए रख सके।

अगस्त 1757… ये वो महीना था जब रघुनाथ राव की मराठा फौज दिल्ली के दरवाज़े पर साक्षात मौत बनकर खड़ी हो गई।

नजीब-उद-दौला और उसकी रोहिल्ला फौज ने मराठों को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन जब मराठा तलवारें चलती थीं ना भाई, तो सामने अच्छे-अच्छों का गुरूर खाक में मिल जाता था।

रघुनाथ राव ने दिल्ली पर वो भयंकर प्रहार किया की रोहिल्ला जिहादी जानवरों की तरह काटे गए। मराठों ने मुगलों और पठानों के इस घमंड को उनके ही लाल किले में कुचल कर रख दिया।

नजीब-उद-दौला जो कल तक खुद को दिल्ली का शहंशाह समझ रहा था, उसे मराठों ने घुटनों के बल ला खड़ा किया। उसे बंदी बना लिया गया और वो अपनी जान की भीख मांगने लगा।

रघुनाथ राव तो उसी वक़्त उस जिहादी का सिर धड़ से अलग कर देना चाहते थे, लेकिन बाद में कुछ राजनीतिक कारणों से उसे छोड़ दिया गया (जो बाद में मराठों की बहुत बड़ी भूल भी साबित हुई)।

लेकिन उस दिन दिल्ली का नज़ारा देखने लायक था यार! मुगलों के सीने पर पैर रखकर मराठों ने लाल किले पर अपना दबदबा कायम कर लिया।

मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय महज़ एक कठपुतली बनकर रह गया था, जो सिर्फ मराठों के रहमो-करम पर ही अपनी सांसें ले पा रहा था। मुगलों का कोई वजूद नहीं बचा था, असली सत्ता और असली पावर अब सिर्फ भगवा झंडे के हाथ में थी।

दिल्ली को फतह करने के बाद मराठा सेना आराम से बैठ सकती थी, लेकिन रघुनाथ राव की भूख अभी शांत नहीं हुई थी।

अब्दाली ने मथुरा में जो हिन्दुओं का खून बहाया था, उसका पूरा हिसाब अभी बाकी था।

राघोबा दादा ने दिल्ली में भगवा फहराने के बाद अपनी तलवार का रुख उस तरफ मोड़ दिया, जहाँ जाने की हिम्मत आज तक किसी भारतीय शासक ने नहीं की थी- सीधे पंजाब और अफगानिस्तान की तरफ!

पंजाब की तरफ बड़ी भगवा सुनामी और सरहिंद में अफगानी फौज को जानवरों की तरह काटकर पेशवा रघुनाथ राव ने लिया भीषण इंतकाम

दिल्ली फतह करने के बाद मराठे आराम से लाल किले में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ा सकते थे। लेकिन रघुनाथ राव का टारगेट सिर्फ दिल्ली नहीं था भाई!

उनका टारगेट था अब्दाली के उस पूरे साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना जो पंजाब में पनप रहा था। अब्दाली ने मथुरा में जो खून बहाया था, उसका एक-एक कतरा राघोबा दादा को याद था।

मार्च 1758… रघुनाथ राव ने अपनी विशाल मराठा फौज का रुख पंजाब की तरफ मोड़ दिया। अब्दाली का एक बहुत ही खूंखार कमांडर, अब्दुल समद खान, सरहिंद (Sirhind) में अपनी भारी-भरकम अफगानी फौज लेकर बैठा था।

उसे लगा की वो मराठों को यहीं रोक लेगा। लेकिन उसे क्या पता था की वो इंसानों से नहीं, साक्षात यमदूतों से पंगा लेने जा रहा है!

जैसे ही मराठा फौज ने सरहिंद पर धावा बोला, आसमान में ‘हर हर महादेव’ के नारों से ऐसी गूंज उठी की अफगानों के हौसले पस्त हो गए।

यहाँ मराठों को पंजाब के वीर सिखों का भी पूरा साथ मिला, जो पहले से ही इन जिहादियों के जुल्मों से उबल रहे थे।

मराठा और सिखों की संयुक्त फौज ने सरहिंद में पठानों का वो भयंकर कत्लेआम किया की पूरी धरती उनके खून से लाल हो गई।

अब्दुल समद खान की फौज को जानवरों की तरह काटा गया। जो पठान कल तक मासूम हिन्दुओं पर अत्याचार कर रहे थे, आज वो अपनी जान की भीख मांगते हुए जंगलों में भाग रहे थे।

मराठों ने सरहिंद को पूरी तरह से अफगानों से आज़ाद करा लिया और अब्दुल समद खान को बंदी बना लिया गया।

सरहिंद की ये जीत कोई मामूली जीत नहीं थी यार! इसने पंजाब के दरवाज़े मराठों के लिए पूरी तरह से खोल दिए थे। अब राघोबा दादा की तलवारें सीधे लाहौर की तरफ तनी हुई थीं।

700 साल की गुलामी का अंत और लाहौर में लहराया भगवा झंडा, खौफ से अपनी जान बचाकर काबुल भागा अब्दाली का बेटा तैमूर शाह

अब कहानी का वो हिस्सा आता है जिसे पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। अब्दाली ने पंजाब और लाहौर पर राज करने के लिए अपने सगे बेटे ‘तैमूर शाह दुर्रानी’ और अपने सबसे क्रूर सेनापति ‘जहाँ खान’ को गद्दी पर बिठाया था।

जब तैमूर शाह को खबर लगी की रघुनाथ राव की मराठा सुनामी सरहिंद को रौंदते हुए सीधा लाहौर की तरफ आ रही है, तो इस जिहादी सुल्तान की पैंट गीली हो गई!

जिस अब्दाली के नाम से उत्तर भारत कांपता था, उसका सगा बेटा इतना बड़ा कायर निकला की उसने मराठों के सामने तलवार उठाने की हिम्मत तक नहीं की!

अप्रैल 1758… मराठों के लाहौर पहुँचने से पहले ही, तैमूर शाह दुर्रानी और जहाँ खान ने अपना बोरिया-बिस्तर, औरतों और खजाने को समेटा और रातों-रात लाहौर छोड़कर अफगानिस्तान की तरफ दुम दबाकर भाग खड़े हुए।

सोचो यार, मराठों का खौफ कितना भयंकर रहा होगा की बिना एक भी तीर चलाए अब्दाली का बेटा अपना पूरा राज्य छोड़कर भाग गया!

20 अप्रैल 1758 को पेशवा रघुनाथ राव ने पूरे शाही लावलश्कर के साथ लाहौर में एंट्री ली। और ये कोई मामूली दिन नहीं था।

ये भारतीय इतिहास का वो ऐतिहासिक और सुनहरा दिन था, जिसका इंतज़ार करते-करते हमारी कई पीढ़ियां मिट गई थीं।

11वीं सदी में जब महमूद गजनवी ने पंजाब पर कब्ज़ा किया था, तब से लेकर अब तक (लगभग 700 सालों में), लाहौर की धरती पर किसी विदेशी जिहादी का ही झंडा लहरा रहा था।

लेकिन 700 सालों के उस लंबे और काले इतिहास को चीरते हुए, रघुनाथ राव ने लाहौर के किले पर अपना पवित्र ‘भगवा’ झंडा गाड़ दिया!

7 सदियों बाद लाहौर में ‘हर हर महादेव’ का जयघोष गूंजा था। वो पल कैसा रहा होगा, आप बस उसकी कल्पना कीजिए! हमारे हिन्दू शूरवीरों ने साबित कर दिया था की सनातन धर्म कभी मिट नहीं सकता।

अटक से लेकर पेशावर तक गाड़ दिया मराठों ने अपना झंडा और सिंधु नदी का पानी पीकर पेशवा रघुनाथ राव ने रचा इतिहास

लाहौर जीतने के बाद राघोबा दादा की भूख अभी भी शांत नहीं हुई थी। अगर कोई आम सेनापति होता, तो वो लाहौर की गद्दी पर बैठकर जश्न मनाता और वापस पुणे लौट जाता।

लेकिन रघुनाथ राव का मकसद सिर्फ ज़मीन जीतना नहीं था, बल्कि अफगानी पठानों के दिलों में एक ऐसा खौफ पैदा करना था की वो सदियों तक हिंदुस्तान की तरफ आँख उठाने की जुर्रत न कर सकें।

उन्होंने अपनी सेना को सीधा आदेश दिया- “इन जिहादियों को यहीं मत छोड़ो, इन्हें इनके घर तक खदेड़ कर आओ!”

अब मराठा सेना के घोड़े पंजाब से आगे बढ़ते हुए सीधे उत्तर-पश्चिम फ्रंटियर (North-West Frontier) की तरफ दौड़ने लगे। ये वो इलाका था जिसे सदियों से भारत का ‘प्रवेश द्वार’ कहा जाता था।

इतिहास गवाह है की महमूद गजनवी से लेकर बाबर और अब्दाली तक, जितने भी विदेशी आक्रांता और लुटेरे आए, वो सब खैबर दर्रे (Khyber Pass) को पार करके ही भारत में घुसते थे।

लेकिन 1758 में इतिहास ने खुद को पलट दिया था! अब कोई विदेशी भारत में नहीं घुस रहा था, बल्कि भारत के हिन्दू शूरवीर उसी खैबर दर्रे की तरफ तलवारें ताने बढ़ रहे थे।

मराठा सेना ने सबसे पहले ‘अटक’ (Attock) के किले पर धावा बोला। अटक वो जगह है जहाँ से सिंधु नदी (Indus River) बहती है।

उस ज़माने में सिंधु नदी को पार करना एक बहुत बड़ा भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक बैरियर माना जाता था। लेकिन रघुनाथ राव के नेतृत्व में सेना ने सिंधु नदी को भी पार कर लिया।

कहते हैं की उस दिन जब मराठा घोड़ों ने अपनी प्यास बुझाने के लिए सिंधु नदी का पानी पिया, तो वो सिर्फ पानी नहीं पी रहे थे, बल्कि वो सदियों की गुलामी के कलंक को धो रहे थे।

अटक को फतह करने के बाद मराठों की आंधी रुकी नहीं। वो सीधे अफगानिस्तान के बॉर्डर पर स्थित ‘पेशावर’ पहुँच गए! जी हाँ, वही पेशावर जो अफगानों का गढ़ हुआ करता था।

पेशावर में घुसकर मराठों ने जहाँ खान और उसके अफगानी पठानों को कुत्ते की तरह पीटा। जिहादियों में ऐसी भगदड़ मची की वो पेशावर का किला छोड़कर सीधे खैबर दर्रे की पहाड़ियों में जाकर छिप गए।

पेशावर के किले पर शान से मराठों का भगवा झंडा लहराने लगा। ज़रा सोचिए उस मंज़र को! जो अफगानी जिहादी कल तक भारत में आकर लूट-पाट करते थे, आज उनके अपने ही घर (पेशावर) में मराठे घुस चुके थे और उनकी बोटियां काट रहे थे।

खौफ इतना भयंकर था की अफगानिस्तान के अंदर बैठे अब्दाली को लगने लगा की मराठे अब कहीं सीधा काबुल पर ही हमला न कर दें!

रघुनाथ राव का ये पूरा सैन्य अभियान हमारी सनातन सभ्यता की एक बहुत बड़ी और निर्णायक जीत थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस ‘हिन्दवी स्वराज्य’ का सपना देखा था, महान पेशवा बाजीराव ने जिस सपने को अपने खून-पसीने से सींचा था, उसी सपने को रघुनाथ राव ने भारत की सरहदों के पार ले जाकर सच कर दिखाया था।

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