गीता प्रेस बंद होने वाला है…
यह संदेश जब-जब व्हाट्सएप पर आता है, तो लाखों भक्तों के मन में एक हल्की बेचैनी उठती है। किसी को लगता है कि सस्ता और शुद्ध ज्ञान का यह स्रोत अब खत्म हो जाएगा। कोई सोचता है कि शायद आर्थिक संकट ने घेर लिया है। कुछ लोग तुरंत दान भेजने की कोशिश भी करने लगते हैं।
सच बिल्कुल उलटा है।
कोविड के कठिन दिनों में जब कई बड़े प्रकाशन घर संकट में थे, गीता प्रेस की बिक्री सत्तर करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच गई। राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद रामचरितमानस की माँग इतनी बढ़ी कि मशीनें दिन-रात चलीं और फिर भी ऑर्डर पूरे नहीं हो पाए।
सरकार ने जब गांधी शांति पुरस्कार दिया और उसके साथ एक करोड़ रुपये का चेक आया, तो संस्थान ने सम्मान तो स्वीकार किया लेकिन पैसे ठुकरा दिए। हाल ही में उसने पहली बार त्रिभाषी भगवद्गीता निकाली, जो नई पीढ़ी के लिए बनी है।
यह कहानी किसी संकट की नहीं है। यह कहानी उस संस्था की है जिसने सौ साल से अधिक समय तक चुपचाप काम किया और कभी नहीं थका।

वह झूठ जो बार-बार लौट आता है
दो हजार पंद्रह की बात है। गीता प्रेस में मजदूरों की हड़ताल चल रही थी। वेतन वृद्धि और कुछ सेवा शर्तों को लेकर प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच मतभेद थे। कुछ दिनों तक छपाई की मशीनें रुकी रहीं। इतना ही काफी था।
सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर एक संदेश तेजी से फैलने लगा। संदेश साफ था गीता प्रेस आर्थिक संकट में फंस गया है। संस्थान बंद होने वाला है। दान भेजो, नहीं तो यह ऐतिहासिक संस्था खत्म हो जाएगी।
लोगों ने सच माना। कई भक्तों ने तुरंत पैसे ट्रांसफर करने शुरू कर दिए। कल्याण पत्रिका के सब्सक्रिप्शन खाते में अनावश्यक राशि आने लगी। कुछ लोग नकदी भी भेजने की कोशिश करने लगे। प्रबंधन को हैरानी हुई। उन्होंने तुरंत खाता फ्रीज कर दिया और बार-बार स्पष्टीकरण जारी किया।
स्पष्टीकरण में लिखा गया गीता प्रेस बंद नहीं हो रहा। कोई आर्थिक संकट नहीं है। हम कभी दान स्वीकार नहीं करते। न सरकार से, न किसी व्यक्ति से, न किसी संस्था से। कृपया पैसे न भेजें।
फिर भी अफवाह रुकी नहीं। कुछ लोग समझते थे कि प्रबंधन शायद झिझक रहा है। कुछ को लगता था कि अगर दान नहीं लेंगे तो कैसे चलेगा। भावनाएँ इतनी गहरी थीं कि तथ्य भी आसानी से नहीं टिक पा रहे थे।
हड़ताल कुछ समय बाद समाप्त हो गई। काम फिर शुरू हो गया। लेकिन अफवाह जिंदा रही। वह समय-समय पर वापस लौटती रही। जब भी कोई छोटी-मोटी खबर आती, वही पुराना संदेश फिर घूमने लगता।
कोविड के दिनों में यह अफवाह और तेज हो गई। लोग घरों में बंद थे। चिंता ज्यादा थी। कई भक्तों को लगा कि शायद महामारी ने गीता प्रेस को भी प्रभावित कर दिया होगा। फिर वही संदेश फैला संस्थान मुश्किल में है, मदद करो।
प्रबंधन ने फिर वही जवाब दिया। शांत स्वर में, बार-बार। हम बंद नहीं हो रहे। हमारी किताबें बिक रही हैं। हम दान नहीं लेते। अगर कोई पैसे भेज रहा है तो वापस कर दिए जाएंगे।
यह अफवाह इसलिए बार-बार लौटती है क्योंकि लोग गीता प्रेस से सिर्फ व्यापारिक रिश्ता नहीं रखते। उनके लिए यह शुद्ध ज्ञान का स्रोत है। घर घर में रखी गई सस्ती किताबों का प्रतीक है। वे नहीं चाहते कि यह स्रोत कभी सूखे। उनकी चिंता समझ में आती है। लेकिन सच्चाई यह है कि संस्था ने शुरू से ही खुद को दान पर निर्भर नहीं होने दिया।
जब लोग पैसे भेजने पर अड़े रहते हैं तो प्रबंधन को खाते बंद करने पड़ते हैं। बैंक ट्रांसफर रोकने पड़ते हैं। पत्र लिखने पड़ते हैं। हर बार एक ही बात दोहरानी पड़ती है हमारा सिद्धांत साफ है। हम अपनी आय से ही चलते हैं। किताबों की बिक्री से। कोई बाहरी मदद नहीं।
यह झूठ जितना पुराना है, उतना ही जिद्दी भी है। लेकिन हर बार जब यह लौटता है, तथ्य उसे चुप करा देते हैं। मशीनें चल रही होती हैं। किताबें छप रही होती हैं। और संस्थान उसी सिद्धांत पर खड़ा रहता है जिस पर वह सौ साल पहले खड़ा हुआ था।

आंकड़े जो अफवाह को चुप करा देते हैं
अफवाह जब भी उठती है, तो सबसे अच्छा जवाब आंकड़े देते हैं। गीता प्रेस के आंकड़े साफ और ठोस हैं।
दो हजार उन्नीस बीस में बिक्री लगभग अट्ठावन करोड़ रुपये थी। कोविड की पहली लहर आई तो दो हजार बीस-इक्कीस में थोड़ी गिरावट आई और बिक्री बावन करोड़ के आसपास रही। कई लोगों ने सोचा कि अब मुश्किल बढ़ेगी। लेकिन अगला साल आया तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई।
दो हजार इक्कीस-बाईस में बिक्री अचानक सत्तर करोड़ बासठ लाख रुपये पहुँच गई। यह उछाल सिर्फ संयोग नहीं था। महामारी के दिनों में लोग घरों में बैठे शास्त्र पढ़ने लगे। रामचरितमानस, भगवद्गीता और कल्याण की माँग बढ़ी। किताबें नई नई जगहों तक पहुँचीं।
इसके बाद का सफर और तेज रहा। दो हजार बाईस-तेईस में बिक्री एक सौ आठ करोड़ रुपये से ऊपर चली गई। दो हजार तेईस चौबीस में यह आंकड़ा एक सौ पैंतीस करोड़ तक पहुँच गया। हाल के वर्षों में बिक्री और बढ़ी है। दिसंबर दो हजार पच्चीस तक गीता प्रेस कुल मिलाकर एक सौ एक करोड़ से अधिक प्रतियाँ प्रकाशित कर चुका था।
ये आंकड़े सिर्फ बिक्री के नहीं हैं। ये उस मॉडल की ताकत दिखाते हैं जिस पर संस्थान शुरू से चल रहा है। न मुनाफा कमाना, न घाटा सहना, न दान लेना। किताबें जितनी सस्ती रखी जा सकती हैं, उतनी सस्ती रखी जाती हैं। कागज, छपाई, मजदूरी और अन्य खर्च निकालकर बाकी कुछ नहीं बचाया जाता। अगर कुछ बचता है तो नई मशीनों और विस्तार में लगा दिया जाता है।
यही वजह है कि गीता प्रेस आज भी दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू धार्मिक साहित्य का प्रकाशक बना हुआ है। श्रीमद्भगवद्गीता की अकेले अठारह करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ छप चुकी हैं। रामचरितमानस की भी तेरह करोड़ से ऊपर। हनुमान चालीसा जैसी छोटी किताबें तो करोड़ों घरों तक पहुँच चुकी हैं।
कोविड के समय जब कई बड़े प्रकाशन घर संकट में थे, गीता प्रेस ने नई जर्मन और जापानी मशीनें लगाईं। रोजाना हजारों प्रतियाँ छपने लगीं। माँग बढ़ने के बावजूद कीमतें नहीं बढ़ाई गईं। सिद्धांत वही रहा। आय सिर्फ किताबों की बिक्री से। कोई बाहरी मदद नहीं।
आंकड़े जब बोलते हैं तो अफवाह चुप हो जाती है। सत्तर करोड़ से ऊपर की बिक्री, एक सौ करोड़ से अधिक कुल प्रतियाँ और लगातार बढ़ती माँग। ये संख्याएँ साफ बताती हैं कि संस्थान न तो संकट में है और न ही बंद होने वाला है। वह उसी रास्ते पर चल रहा है जिस पर एक हजार नौ सौ तेईस में चला था।
जब राम लौटे तो मानस उड़ चली
जनवरी दो हजार चौबीस। अयोध्या में राम लला की प्राण-प्रतिष्ठा होने वाली थी। तारीख घोषित होते ही देशभर में एक अलग ही हलचल शुरू हो गई। लोग राम को घर लाना चाहते थे। और घर लाने का सबसे सहज तरीका था रामचरितमानस।
गीता प्रेस में ऑर्डर आने शुरू हुए। पहले धीरे-धीरे, फिर तेजी से। प्राण-प्रतिष्ठा के कुछ महीने पहले से माँग बढ़ने लगी थी। तारीख तय होते ही सैलाब आ गया।
आमतौर पर गीता प्रेस हर महीने लगभग पचहत्तर हजार प्रतियाँ रामचरितमानस की छापता था। माँग इतनी बढ़ी कि एक लाख प्रतियाँ छापने लगे। मशीनें दिन-रात चलीं। कर्मचारी अतिरिक्त शिफ्ट में काम करते रहे। फिर भी स्टॉक खाली हो गया।
जयपुर से पचास हजार प्रतियों का ऑर्डर आया। भागलपुर से दस हजार। राजस्थान, बिहार और अन्य राज्यों से और ऑर्डर आते रहे। कई जगहों से शाखाओं ने भी माँग भेजी। प्रबंधन को विनम्रता से कहना पड़ा कि अभी उपलब्ध नहीं है। पहली बार ऐसा हुआ कि गीता प्रेस रामचरितमानस की कमी महसूस कर रहा था।
सुंदरकांड और हनुमान चालीसा की माँग भी तेजी से बढ़ी। लोग सिर्फ बड़ी किताब नहीं, छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ भी घर ले जाना चाहते थे। युवा पाठक भी सामने आए। कई ऐसे लोग थे जो पहली बार रामचरितमानस पढ़ने की इच्छा जता रहे थे।
माँग इतनी ज्यादा थी कि प्रेस ने अपनी वेबसाइट पर रामचरितमानस अपलोड कर दिया। लोग डिजिटल रूप में पढ़ और डाउनलोड कर सकें। कुछ दिनों के लिए यह व्यवस्था की गई ताकि कम से कम ज्ञान की भूख पूरी हो सके।
यह सिर्फ किताब की बिक्री नहीं थी। यह एक पूरे समाज की भावना का प्रकटीकरण था। राम मंदिर बनने के बाद लोग राम को अपने घर, अपने मन और अपनी अगली पीढ़ी तक पहुँचाना चाहते थे। और गीता प्रेस की किताबें ही उनके लिए सबसे शुद्ध और विश्वसनीय माध्यम थीं।
मशीनें थकीं। कर्मचारी थके। लेकिन माँग थमी नहीं। गीता प्रेस ने जितना हो सका, उतना छापा। फिर भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाया। यह कमी किसी कमजोरी की नहीं थी। यह उस गहरी आस्था की निशानी थी जो सदियों बाद फिर से जाग रही थी।
एक करोड़ का इनकार
जून दो हजार तेईस में केंद्र सरकार ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार देने की घोषणा की। पुरस्कार के साथ एक करोड़ रुपये का नकद हिस्सा भी था।
ट्रस्टी बोर्ड ने रात में बैठक की। फैसला साफ था। सम्मान स्वीकार करेंगे। पैसे नहीं लेंगे।
अगले दिन प्रबंधक लालमणि तिवारी ने साफ कहा – यह हमारे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। लेकिन हमारा सिद्धांत है कि हम किसी भी तरह का दान स्वीकार नहीं करते। इसलिए नकद राशि नहीं लेंगे।
यह फैसला किसी विरोध या प्रदर्शन के लिए नहीं था। यह उस सिद्धांत की निरंतरता थी जो एक हजार नौ सौ तेईस से चली आ रही है। जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी दान का प्रस्ताव रखा था, तब भी संस्था ने विनम्रता से मना कर दिया था।
कई लोग राजनीतिक शोर में उलझ गए। लेकिन गीता प्रेस शांत रहा। उसने न तो पुरस्कार को अस्वीकार किया और न ही सिद्धांत को तोड़ा। सम्मान लिया, पैसे नहीं।
नई पीढ़ी के लिए एक उपहार
दो हजार छब्बीस में गीता प्रेस ने अपनी पहली त्रिभाषी भगवद्गीता जारी की। मूल संस्कृत श्लोक, उनका रोमन ट्रांसलिटरेशन, हिंदी अनुवाद और अंग्रेजी अनुवाद – सब एक ही किताब में।
यह किताब उन युवाओं के लिए है जो देवनागरी पढ़ने में सहज नहीं हैं। उन प्रवासी भारतीयों के लिए है जो घर से दूर हैं। उन विदेशी पाठकों के लिए है जो गीता पढ़ना चाहते हैं लेकिन भाषा की दीवार आड़े आती है।
श्लोक का उच्चारण सही हो सके, अर्थ दोनों भाषाओं में समझ में आ सके – यही मकसद था। सौ साल बाद भी संस्थान नई जरूरत को समझ रहा है। पुरानी शुद्धता को बचाए रखते हुए नए पाठकों तक पहुँचने का रास्ता खोज रहा है।
दो पुरुष जिन्होंने सब बदल दिया
कहानी जयदयाल गोयंदका से शुरू होती है। राजस्थान के चुरू से आए मारवाड़ी व्यापारी। बंगाल के बांकुड़ा में कपड़ा, मिट्टी का तेल और बर्तन का व्यापार करते थे। गीता से गहरा लगाव था।
एक हजार नौ सौ बाईस के आसपास उन्होंने कलकत्ता की एक प्रेस से गीता छपवाई। किताब आई तो गलतियों से भरी हुई थी। जब उन्होंने प्रेस वाले से शिकायत की तो जवाब मिला – अगर इतनी शुद्धता चाहिए तो अपना प्रेस खोलो।
गोयंदका ने वही किया।
गोरखपुर के व्यवसायी घनश्यामदास जालान ने मदद की। एक हजार नौ सौ तेईस में एक छोटी सी इमारत किराए पर ली गई। किराया दस रुपये महीना था। बोस्टन से आई एक ट्रेडल मशीन पर उनतीस अप्रैल एक हजार नौ सौ तेईस को पहली गीता छपी। कीमत एक रुपया।
उस छोटी सी शुरुआत के साथ एक और नाम जुड़ा – हनुमान प्रसाद पोद्दार। जिन्हें सब भाईजी कहते थे। वे कल्याण पत्रिका के संपादक बने। जीवन भर संस्थान की आत्मा बने रहे। उन्होंने लेखकों से संपर्क रखा, पाठ सुधारे, पाठकों से जुड़ाव बनाए रखा। गांधी जी भी कल्याण के पहले अंक में लिख चुके थे।
दोनों पुरुषों ने एक साधारण सा फैसला लिया। शुद्ध पाठ, सस्ता दाम, कोई दान नहीं, कोई विज्ञापन नहीं। और फिर सौ साल तक उसी फैसले पर डटे रहे।
गहरी सच्चाई
कई लोग कहते हैं कि सनातन धर्म को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। गीता प्रेस की कहानी इस बात का जवाब है कि सनातन कभी गया ही नहीं था।
यह संस्था नारे नहीं लगाती। यह सिर्फ किताबें छापती है। शुद्ध पाठ, सही अनुवाद, सस्ती कीमत। कोई विज्ञापन नहीं। कोई दान नहीं। कोई राजनीतिक दबाव नहीं। सिर्फ काम।
जब कोविड आया तो लोग घर बैठे शास्त्र पढ़ने लगे। जब राम मंदिर बना तो लोग मानस घर ले जाने लगे। जब नई पीढ़ी आई तो संस्थान ने त्रिभाषी गीता निकाली। जब सरकार ने पुरस्कार दिया तो सिद्धांत नहीं छोड़ा।
यह सब चुपचाप हुआ। बिना शोर के। बिना दावे के।
सनातन कभी मरा नहीं था। वह गीता प्रेस की मशीनों में, कल्याण के पन्नों में, और उन करोड़ों घरों में जिंदा था जहाँ एक सस्ती सी किताब रखी हुई है।
जयदयाल गोयंदका और हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी)
गीता प्रेस की कहानी दो पुरुषों के बिना अधूरी है। जयदयाल गोयंदका और हनुमान प्रसाद पोद्दार। एक ने नींव रखी। दूसरे ने उसे जीवन दिया। दोनों मारवाड़ी परिवार से थे। दोनों ने व्यापार छोड़कर सनातन की सेवा को अपना जीवन बना लिया।
जयदयाल गोयंदका – सेठजी
जयदयाल गोयंदका का जन्म चार जून एक हजार आठ सौ पचासी को राजस्थान के चूरू में हुआ। परिवार मध्यम वर्ग का अग्रवाल था। पिता का नाम खूबचंद था। लोग उन्हें सेठजी कहते थे।
व्यापार के सिलसिले में वे बंगाल के बांकुड़ा में बस गए। कपास, मिट्टी का तेल, कपड़ा और बर्तन का कारोबार करते थे। ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। सही भाव और सही तौल उनका सिद्धांत था।
व्यापार के बाद वे गीता पढ़ते। यात्राओं में जहां भी जाते, सत्संग करते। दोस्तों के साथ गीता पर चर्चा करते। धीरे-धीरे यह सत्संग का दायरा बढ़ता गया।
समस्या यह थी कि शुद्ध गीता आसानी से नहीं मिलती थी। एक हजार नौ सौ बाईस के आसपास उन्होंने कलकत्ता की वणिक प्रेस से गीता छपवाई। किताब आई तो गलतियों से भरी हुई। उन्होंने शिकायत की तो प्रेस वाले ने कहा – अगर इतनी शुद्धता चाहिए तो अपना प्रेस खोलो।
एक हजार नौ सौ तेईस में दस रुपये किराए के मकान में गीता प्रेस की नींव पड़ी। बोस्टन से आई छोटी मशीन पर पहली शुद्ध गीता छपी।
सेठजी ने सिर्फ प्रेस नहीं खोला। उन्होंने गीता तत्व विवेचनी नाम से गीता का भाष्य लिखा। करीब एक सौ पंद्रह पुस्तकें उनके नाम पर हैं। चूरू में ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम खोला। ऋषिकेश में गीता भवन की स्थापना की।
वे साधारण जीवन जीते थे। ऊंचे विचार रखते थे। सत्रह अप्रैल एक हजार नौ सौ पैंसठ को ऋषिकेश के गीता भवन में उनका शरीर शांत हो गया। वे लगभग सौ वर्ष जिए।
हनुमान प्रसाद पोद्दार – भाईजी
हनुमान प्रसाद पोद्दार का जन्म सत्रह सितंबर एक हजार आठ सौ बानवे को शिलांग में हुआ। परिवार राजस्थान के रतनगढ़ से जुड़ा मारवाड़ी अग्रवाल परिवार था। माता रिखीबाई का देहांत बचपन में ही हो गया। दादी ने उनका पालन-पोषण किया। परिवार के इष्टदेव हनुमानजी के नाम पर उनका नाम हनुमान प्रसाद रखा गया।
युवावस्था में वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। अनुशीलन समिति से संपर्क रहा। अलीपुर जेल में कैद भी रहे। बाद में बंबई आए। लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, मदनमोहन मालवीय जैसे नेताओं से संपर्क हुआ। लोग उन्हें स्नेह से भाईजी कहने लगे।
जयदयाल गोयंदका से मुलाकात उनके जीवन का मोड़ बनी। सेठजी को वे गुरु समान मानने लगे। व्यापार छोड़कर पूर्ण रूप से आध्यात्मिक सेवा में लग गए।
एक हजार नौ सौ छब्बीस में कल्याण पत्रिका शुरू हुई। भाईजी उसके आदि संपादक बने। पहला अंक अगस्त एक हजार नौ सौ छब्बीस में निकला। गांधीजी का लेख भी उसमें छपा था। गांधीजी ने सलाह दी कि विज्ञापन कभी न छापें। आज भी कल्याण में कोई विज्ञापन नहीं छपता।
भाईजी ने लगभग पैंतालीस वर्ष तक कल्याण का संपादन किया। उन्होंने शुद्ध पाठ, सही अनुवाद और सस्ती कीमत पर जोर दिया। गीता वाटिका में रहकर उन्होंने संस्थान को आत्मा दी। हजारों पन्नों का मौलिक लेखन किया। भक्तों से पत्राचार किया। गरीब छात्रों और विधवाओं की मदद की।
वे सम्मान से दूर रहे। भारत रत्न जैसे पुरस्कार ठुकरा दिए। बाईस मार्च एक हजार नौ सौ इकहत्तर को गोरखपुर में उनका देहावसान हुआ।
दोनों का मेल
सेठजी ने नींव रखी। भाईजी ने उस पर इमारत खड़ी की। एक ने शुद्ध गीता का सपना देखा। दूसरे ने उसे घर-घर पहुँचाया। एक ने सिद्धांत दिए। दूसरे ने उन्हें जीवन में उतारा।
दोनों ने साबित किया कि सनातन को किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं। शुद्ध भाव, दृढ़ सिद्धांत और निरंतर सेवा काफी है।
गीता प्रेस आज भी उन्हीं के सिद्धांतों पर चल रहा है। न दान, न विज्ञापन, न मुनाफा। सिर्फ सेवा।
गीता प्रेस कभी गया ही नहीं था
बहुत लोग कहते हैं कि सनातन धर्म को फिर से जगाने की जरूरत है। कि वह कहीं खो गया था। कि अब उसे वापस लाना है।
गीता प्रेस की कहानी इस बात को गलत साबित करती है।
सौ साल से ज्यादा समय से यह संस्थान चुपचाप काम कर रहा है। न शोर, न नारे, न कोई बड़ा दावा। सिर्फ शुद्ध किताबें छापता रहा। सस्ते दाम पर। बिना दान के। बिना विज्ञापन के।
जब कोविड आया तो बिक्री बढ़ी। जब राम मंदिर बना तो रामचरितमानस की माँग आसमान छू गई। जब सरकार ने सम्मान दिया तो सिद्धांत नहीं छोड़ा। और अब जब नई पीढ़ी आई तो उसने उनके लिए नई किताब निकाली।
त्रिभाषी गीता – नई पीढ़ी के लिए
- मूल संस्कृत श्लोक
- रोमन ट्रांसलिटरेशन (उच्चारण के लिए)
- हिंदी अनुवाद
- अंग्रेजी अनुवाद
- सब एक ही किताब में
उन प्रवासी भारतीयों के लिए है जो विदेश में रहते हैं।
श्लोक का सही उच्चारण हो सके। अर्थ दोनों भाषाओं में समझ में आ सके। यही मकसद था।
गीता प्रेस कभी बंद नहीं हुआ। कभी संकट में नहीं पड़ा। कभी रुका नहीं।
वह उसी तरह काम कर रहा है जैसे एक हजार नौ सौ तेईस में शुरू हुआ था।
- शुद्ध पाठ
- सस्ता दाम
- कोई दान नहीं
- कोई समझौता नहीं
सनातन कभी गया ही नहीं था।
वह गीता प्रेस की मशीनों में जिंदा था।
कल्याण के पन्नों में जिंदा था।
और उन करोड़ों घरों में जिंदा था जहाँ एक सस्ती सी किताब रखी हुई है।
नई पीढ़ी के लिए त्रिभाषी गीता निकालकर गीता प्रेस ने फिर साबित कर दिया – हम यहीं हैं। हम कभी गए ही नहीं थे।
त्रिभाषी गीता की विशेषताएं
गीता प्रेस ने सौ साल से ज्यादा के इतिहास में पहली बार त्रिभाषी भगवद्गीता निकाली है। यह संस्करण संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी को एक ही किताब में लाता है।
मुख्य विशेषताएं
1. चार भागों में व्यवस्थित श्लोक: हर श्लोक इस क्रम में दिया गया है:
- मूल संस्कृत श्लोक।
- रोमन ट्रांसलिटरेशन (उच्चारण के लिए)।
- हिंदी भावार्थ।
- अंग्रेजी अनुवाद।
- इससे पाठक एक साथ सही उच्चारण भी सीख सकता है और अर्थ भी समझ सकता है।
2. देवनागरी न जानने वालों के लिए खास: जो लोग देवनागरी नहीं पढ़ पाते, वे रोमन लिपि की मदद से श्लोक का शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं। युवा पीढ़ी, दक्षिण भारत के पाठक और विदेश में रहने वाले भारतीय परिवारों के लिए यह बहुत उपयोगी है।
- आकर्षक प्रस्तुति: पुस्तक उच्च गुणवत्ता वाले आर्ट पेपर पर छपी है। प्रसंग के अनुसार चुनिंदा चित्र भी शामिल किए गए हैं। इससे किताब सिर्फ पढ़ने लायक नहीं, देखने में भी सुंदर लगती है।
- शुद्धता और सुलभता का मेल: गीता प्रेस की सदियों पुरानी शुद्धता बनी हुई है। साथ ही भाषा की दीवार हटा दी गई है। न कोई बदलाव, न कोई समझौता। सिर्फ पहुंच आसान बनाई गई है।
- लक्षित पाठक: युवा पीढ़ी। भारतीय प्रवासी (डायस्पोरा)। विदेशी पाठक। छात्र और साधक जो एक साथ तीन भाषाओं में गीता पढ़ना चाहते हैं।
यह संस्करण साबित करता है कि गीता प्रेस पुरानी परंपरा को बचाए रखते हुए नई जरूरतों को समझता है। सनातन की वाणी अब और भी ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है।
अंत में
अगली बार जब कोई संदेश आए – गीता प्रेस बंद होने वाला है – तो बस ये आंकड़े याद कर लेना। सत्तर करोड़ रुपये की बिक्री। एक सौ करोड़ से ऊपर प्रतियाँ। एक करोड़ रुपये का इनकार। और एक नई किताब जो युवाओं के लिए बनी है।
अफवाहें आती रहेंगी। लेकिन तथ्य शांत स्वर में जवाब देते रहेंगे।
गीता प्रेस न तो बंद हुआ और न ही बंद होने वाला है। वह उसी तरह काम कर रहा है जैसे एक हजार नौ सौ तेईस में शुरू हुआ था। शुद्धता के साथ। सस्ते दाम पर। बिना किसी दान के।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
