अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक करोड़ों 'मूलनिवासियों' का खून पीकर खड़े हुए 'ईसाइयों के चर्च', अगर सनातन धर्म के वनवासी योद्धा न होते तो इन गोरों ने भारत के आदिवासियों का भी कर दिया होता वैसा ही हाल

अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक करोड़ों ‘मूलनिवासियों’ का खून पीकर खड़े हुए ‘ईसाइयों के चर्च’, अगर सनातन धर्म के वनवासी योद्धा न होते तो इन गोरों ने भारत के आदिवासियों का भी कर दिया होता वैसा ही हाल

कभी आपने सोचा है की इन गोरों ने कैसे लीपापोती करते हुए पूरी दुनिया के दिमाग में ये बात ठूंस-ठूंस कर भर दी की ये जो गोरे अंग्रेज और ईसाई मिशनरी थे, ये तो ‘शांति’, ‘सेवा’ और ‘प्यार’ के सबसे बड़े दूत थे।

ऐसा नैरेटिव बनाया गया जैसे पूरी दुनिया को ‘सभ्य’ (Civilized) बनाने का ठेका इन्हीं के पास था।

लेकिन सच कहूँ तो, जब आप इनका ये ‘शांति’ वाला सफेद नकाब नोचेंगे, तो अंदर से इतना खून, इतनी दरिंदगी और इतनी लाशें गिरेंगी की आप गिनते-गिनते थक जाएंगे।

आज दुनिया को ‘सभ्यता’ और ‘समानता’ का ज्ञान बांटने वाले इन पश्चिमी देशों और ईसाइयों के चर्च की नींव ही करोड़ों बेगुनाह ‘मूलनिवासियों’ (Indigenous people) की कब्रों पर खड़ी है।

न्यूज़ीलैंड से लेकर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक, जहाँ-जहाँ इन गोरे ईसाई मिशनरियों ने अपने नापाक पैर रखे, वहां-वहां मूलनिवासियों का खुल्लम-खुल्ला कत्लेआम शुरू हो गया।

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है। जो दरिंदगी इन गोरों ने पूरी दुनिया में खुलेआम की, वो भारत में आकर क्यों फेल हो गई? क्यों ये मिशनरी भारत के आदिवासियों और वनवासियों को पूरी तरह से मिटा नहीं पाए?

इसका इकलौता और सबसे बड़ा कारण था- यहाँ मौजूद ‘सनातन संस्कृति’ की वो अजेय ढाल!

अगर हमारे यहाँ भगवान राम से लेकर भगवान बिरसा मुंडा और कोमाराम भीम जैसे सनातन रक्षक वनवासी योद्धाओं का वो अभेद्य रक्षा कवच ना होता, तो आज भारत के आदिवासियों का भी न्यूज़ीलैंड के ‘माओरी’ और अमेरिका के रेड इंडियंस जैसा ही खौफनाक हाल हो चुका होता।

शांति और सेवा का नकाब ओढ़कर पूरी दुनिया में कैसे इन क्रूर ईसाईयों ने बिछाई करोड़ों मूलनिवासियों की लाशें

जब आप दुनिया का असली इतिहास पढ़ेंगे ना भाई साहब, तो पता चलेगा की 15वीं और 16वीं सदी में जब ये गोरे नाविक और पादरी जहाज़ों में भरकर निकले, तो इनके एक हाथ में ‘बाइबल’ थी और दूसरे हाथ में खून से सनी तलवार।

इनका मकसद दुनिया को कोई ज्ञान बांटना नहीं था, बल्कि दुनिया भर की उन तमाम प्रकृति-पूजक संस्कृतियों को जड़ से उखाड़ फेंकना था, जो इनके धर्म को नहीं मानती थीं।

ये गोरे जहाँ भी गए, वहाँ के मूलनिवासियों ने इन्हें इंसान समझकर पनाह दी। लेकिन इन पादरियों और मिशनरियों ने उन्हें कभी इंसान माना ही नहीं।

इनकी नज़र में जो इंसान प्रकृति की पूजा करता है, जो नदियों, पेड़ों, पहाड़ों और सूर्य को भगवान मानता है, वो तो ‘असभ्य’, ‘बर्बर’ और ‘जंगली’ है।

उसे तो जीने का कोई हक ही नहीं है। अफ्रीका के घने जंगलों से लेकर ऑस्ट्रेलिया के तपते रेगिस्तानों तक, इन गोरों ने शिकारियों की तरह आदिवासियों का कत्लेआम किया।

आपको जानकर भयंकर हैरानी होगी की एक वक्त था जब पूरे ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में 300 से ज़्यादा ऐसी महान प्राचीन आदिवासी सभ्यताएं और 500 से ज़्यादा भाषाएं थीं।

इन ईसाइयों ने उन सभी को हमेशा-हमेशा के लिए धरती के नक़्शे से ही मिटा दिया। आज वो बस कुछ म्यूज़ियम में रखी पुरानी हड्डियों और मूर्तियों तक सिमट कर रह गई हैं।

जिन सभ्यताओं ने हज़ारों सालों तक प्रकृति को सहेज कर रखा था, उन्हें इन ‘सभ्य’ गोरों ने महज़ 100-200 सालों में राख के ढेर में बदल दिया।

और मज़े की बात देखिए यार, जिन हाथों से इन्होंने करोड़ों आदिवासियों का गला रेता, आज उन्हीं हाथों से ये यूनाइटेड नेशंस (UN) में बैठकर ‘आदिवासी दिवस’ मनाने का पाखंड करते हैं!

‘कोलंबस’ को हीरो बताने वाला इतिहास का सबसे घिनौना सच, अमेरिका की 6 करोड़ ‘रेड इंडियंस’ जनजाति का खौफनाक नरसंहार

हमारे सेक्युलर एजुकेशन सिस्टम ने ‘क्रिस्टोफर कोलंबस’ (Christopher Columbus) को कुछ इस तरह पेश किया है जैसे वो कोई बहुत बड़ा हीरो, साहसी या महान खोजी था जिसने अमेरिका ‘डिस्कवर’ किया।

अरे भाई, अमेरिका कहीं समुद्र में खोया हुआ थोड़ी था जो ये वहां जाकर उसे खोज लेगा! वहाँ पहले से ही करोड़ों की आबादी रहती थी।

असल में कोलंबस कोई हीरो नहीं, बल्कि मानव इतिहास का सबसे खूंखार, लालची और बेरहम कातिल था।

साल 1492 का वो मनहूस वक्त था जब कोलंबस पहली बार बहामास के तट पर पहुंचा। वहाँ अरावाक (Arawak) नाम की एक बहुत ही भोली-भाली आदिवासी जनजाति रहा करती थी।

उन सीधे-सादे लोगों ने जब इन गोरे अजनबियों को देखा तो उन्हें लगा की शायद कोई देवदूत आसमान से उतरे हैं।

उन्होंने आगे बढ़कर कोलंबस और उसके आदमियों का ज़बरदस्त स्वागत किया, उन्हें अपने घर का खाना खिलाया और रहने की जगह दी। और बदले में कोलंबस ने अपनी डायरी में क्या लिखा पता है?

उसने लिखा की “ये लोग बहुत सीधे और बेवकूफ हैं, इनके पास कोई हथियार नहीं है… मात्र 50 सैनिकों के साथ हम इन सबको अपना गुलाम बना सकते हैं।”

बस! यहीं से शुरू हुआ अमेरिका में रेड इंडियंस (Red Indians) के नरसंहार का वो काला अध्याय, जिसे पढ़कर आज भी पत्थर दिल इंसान की रूह कांप जाए।

स्पेन, पुर्तगाल और यूरोप के बाकी हिस्सों से भर-भर कर गोरे ईसाई अमेरिका पहुंचने लगे। वहाँ पहले से ही माया (Maya), इन्का (Inca), ओल्मेक और एज़्टेक जैसी बेहद महान और विकसित सभ्यताएं बसती थीं।

ये लोग भी हमारी ही तरह शुद्ध प्रकृति के पुजारी थे। लेकिन इन गोरे आक्रांताओं ने गनपाउडर, तोपों और तलवारों के दम पर उनकी पूरी की पूरी बस्तियां जला कर राख कर दीं। उनका सोना और खजाना लूटकर यूरोप भेज दिया गया।

ये कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है दोस्त। खुद एक स्पेनिश पादरी हुआ करता था ‘बार्टोलोम डे लास कासास’ (Bartolomé de las Casas)।

उसने साल 1542 में एक किताब लिखी थी जिसका नाम था ‘A Short Account of the Destruction of the Indies’। इस किताब में जो चश्मदीद सच लिखा है, वो आपके रोंगटे खड़े कर देगा।

कासास ने खुद माना है की जो रेड इंडियन और मूलनिवासी अपना पुश्तैनी धर्म छोड़कर ‘ईसाई’ बनने से मना कर देते थे, उन्हें ये पादरी और सैनिक लकड़ी के लट्ठों से बांध देते थे।

और फिर उन्हें धीमी-धीमी आग पर तब तक भूना जाता था जब तक की वो ज़िंदा जलकर कोयला न बन जाएं!

ज़रा सोचिए इस क्रूरता का लेवल! ये लोग आदिवासी बच्चों को उनकी माओं के हाथों से छीनकर पत्थरों पर पटक कर मार डालते थे, ताकि आगे चलकर इनकी नस्ल ही आगे न बढ़ सके।

जो आदिवासी बच जाते, उन्हें सोने की खदानों में जानवरों की तरह मरने तक काम करने के लिए धकेल दिया जाता।

साल 1500 ईस्वी के आस-पास पूरे अमेरिका महाद्वीप में लगभग 6 करोड़ (60 Million) मूलनिवासी रहा करते थे। लेकिन इन ‘शांतिदूतों’ के आने के सिर्फ 100 साल के भीतर ही वो 6 करोड़ की आबादी कटकर महज़ 1 करोड़ रह गई।

और आज की डेट में अगर आप अमेरिका में असली रेड इंडियंस ढूंढने निकलेंगे, तो उनकी संख्या 28 लाख से भी कम बची है।

जो थोड़े बहुत नाममात्र के बचे भी हैं, वो अपनी ही ज़मीन पर जंगलों के छोटे-छोटे रिज़र्वेशन कैंप्स में जानवरों की तरह रहने को मजबूर हैं।

उनका पूरा धर्म, उनकी भाषा, उनके देवी-देवता… सब कुछ मिटा दिया गया और उनकी ज़मीन पर बड़े-बड़े आलीशान चर्च तान दिए गए।

चेचक की बीमारी वाले कंबल और बाइसन भैंसों का कत्लेआम, ताकि भूखे तड़प कर मर जाएं प्रकृति के पुजारी

अब ज़रा इन ‘सभ्य’ गोरों की दरिंदगी का एक और खौफनाक लेवल सुनिए। जब बंदूकों और तोपों से भी अमेरिका के मूलनिवासियों का पूरी तरह से खात्मा नहीं हो पा रहा था, तो इन गोरे आक्रांताओं ने इतिहास का सबसे पहला और सबसे नीच ‘जैविक हमला’ (Biological Warfare) किया।

बात साल 1763 के आस-पास की है। अमेरिकी और ब्रिटिश फौजों ने एक बहुत ही शैतानी साज़िश रची। इन्होंने रेड इंडियंस के कबीलों में ‘दोस्ती’ और ‘तोहफे’ के नाम पर कंबल बंटवाए।

उन बेचारों को क्या पता था की ये कंबल मौत का फरमान हैं! असल में उन कंबलों में ‘चेचक’ (Smallpox) की बीमारी के वायरस जानबूझकर डाले गए थे।

अमेरिका के आदिवासियों के शरीर में इस नई यूरोपीय बीमारी से लड़ने की कोई इम्युनिटी (Immunity) नहीं थी। नतीजा क्या हुआ? गांव के गांव, कबीले के कबीले इस भयंकर बीमारी की चपेट में आ गए।

लाखों आदिवासी, जिनमें मासूम बच्चे और औरतें शामिल थीं, तड़प-तड़प कर, अपने शरीर को खुजला-खुजला कर खौफनाक मौत मारे गए।

लेकिन इनकी हैवानियत यहीं नहीं रुकी। रेड इंडियंस और अमेरिका के मूलनिवासी पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर थे। उनका जीवन ‘बाइसन’ (Bison) यानी अमेरिकी जंगली भैंसे के इर्द-गिर्द घूमता था।

वे बाइसन की पूजा करते थे, उसी का मांस खाते थे, उसकी खाल से अपने टेंट और कपड़े बनाते थे, और उसकी हड्डियों का इस्तेमाल तांत्रिक अनुष्ठानों में करते थे।

इन गोरों ने सोचा की अगर इन आदिवासियों को पूरी तरह से घुटनों पर लाना है, तो इनका ‘भगवान’ और इनका ‘खाना’ दोनों छीन लो।

1870 के दशक में इन गोरे ईसाइयों ने अमेरिका भर में बाइसन भैंसों का महा-कत्लेआम शुरू कर दिया। ट्रेनों में भर-भर कर गोरे शिकारी आते थे और शौक-शौक में लाखों-करोड़ों बाइसन को गोलियों से भून डालते थे।

बाइसन की खोपड़ियों और हड्डियों के पहाड़ खड़े कर दिए गए थे भाई साहब! आज भी इंटरनेट पर आप 1870 के दशक की वो तस्वीरें देख सकते हैं जहाँ गोरे लोग बाइसन की खोपड़ियों के 50-50 फुट ऊंचे पहाड़ पर गर्व से खड़े होकर पोज़ दे रहे हैं।

ये इसलिए किया गया ताकि रेड इंडियंस के पास खाने को कुछ न बचे और वो भूख से तड़प कर मर जाएं।

‘स्टोलन जनरेशन’ का वो काला अध्याय, जब चर्च के पादरियों ने न्यूज़ीलैंड के माओरी और ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के बच्चे छीनकर उन्हें बना लिया गुलाम

19वीं सदी में जब ये गोरे मिशनरी और अंग्रेज अपने जहाज़ों में भरकर न्यूज़ीलैंड पहुंचे, तो वहाँ की सीधी-साधी माओरी जनजाति के योद्धाओं ने अपनी पारंपरिक ‘हाका’ (Haka) शैली में नाच-गाकर इनका स्वागत किया था।

उन बेचारों ने इन विदेशियों को अपना मेहमान समझा, उन्हें रहने की जगह दी। कोई और होता तो इस एहसान के तले दब जाता, लेकिन बदले में इन नीच गोरों ने क्या किया?

इन्होंने सबसे पहले एक बहुत ही खौफनाक मनोवैज्ञानिक खेल खेला। इन्होंने माओरी युवाओं को शराब और तंबाकू की ऐसी भयंकर लत लगाई की पूरी की पूरी नस्ल ही नशेड़ी बन गई।

फिर 1840 में ‘ट्रीटी ऑफ़ वेटंगी’ (Treaty of Waitangi) नाम का एक धोखेबाज़ समझौता थोप कर उनकी पुश्तैनी ज़मीनें हड़प ली गईं।

जहाँ कल तक माओरी अपने प्रकृति के देवताओं की पूजा करते थे, वहाँ रातों-रात बड़े-बड़े चर्च खड़े कर दिए गए। आज वो महान माओरी संस्कृति सिर्फ एक ‘शोपीस’ बनकर रह गई है।

गोरे टूरिस्ट आते हैं, माओरी लोगों का डांस देखते हैं, तालियां बजाते हैं और चले जाते हैं। वो लोग अपनी ही धरती पर अजनबी और रिफ्यूजी हो गए हैं।

चलिए, अब ज़रा ऑस्ट्रेलिया की तरफ चलते हैं। क्या आपको पता है की ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया (Tasmania) द्वीप पर इन गोरे ईसाइयों ने क्या किया था? 1803 से लेकर 1830 के बीच वहाँ ‘ब्लैक वॉर’ (Black War) नाम का एक खुला कत्लेआम चला।

अंग्रेजों ने तस्मानिया के मूलनिवासियों (पलावा जनजाति) को जानवरों की तरह हंट (Hunt) किया। जैसे लोग जंगलों में तीतर या हिरण का शिकार करते हैं, वैसे ही इन गोरों ने वहां के आदिवासियों का शिकार किया।

27 सालों के भीतर एक-एक पुरुष को गोलियों से उड़ा दिया गया। आज तस्मानिया में शुद्ध खून वाला एक भी मूलनिवासी ज़िंदा नहीं है। पूरी की पूरी नस्ल को ही धरती से मिटा दिया गया। इसे कहते हैं शुद्ध नरसंहार!

और जो ऑस्ट्रेलिया की मुख्य भूमि पर आदिवासी बच गए थे, उनके साथ जो हुआ वो शायद मौत से भी ज़्यादा दर्दनाक था।

19वीं और 20वीं सदी में ऑस्ट्रेलियाई सरकार और ईसाई चर्च ने मिलकर एक पॉलिसी बनाई। इसका मक़सद था- ‘Breed out the black’ (यानी इनके काले रंग और संस्कृति को ही मिटा दो)।

पुलिस और पादरी अचानक आदिवासी बस्तियों में घुसते और रोती-बिलखती माओं की गोद से उनके छोटे-छोटे बच्चों को ज़बरदस्ती छीन कर ले जाते।

इन छीने गए बच्चों को इतिहास में ‘स्टोलन जनरेशन’ (Stolen Generation) कहा जाता है। इन मासूम बच्चों को चर्च के मिशनरी स्कूलों और अनाथालयों में जानवरों की तरह ठूंस दिया गया।

वहां इन्हें अपनी मूल भाषा बोलने पर बुरी तरह पीटा जाता था, उनके गले में ज़बरदस्ती क्रॉस (Cross) लटका दिया जाता था और उन्हें सिखाया जाता था की तुम्हारे मां-बाप ‘असभ्य जंगली’ थे और अब तुम्हें गोरे ईसाइयों की तरह ‘सभ्य’ बनना है।

बड़े होने पर इन बच्चों को गोरे ईसाई परिवारों में बिना किसी पगार के नौकर और गुलाम बना दिया गया। चर्च के पादरियों और बिशपों ने इन मासूमों के साथ वो हर शारीरिक और मानसिक शोषण किया, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

गॉड ग्लोरी और गोल्ड की वो खूनी त्रिमूर्ति जिसके लालच में मिटा दी गईं दुनिया की सैकड़ों प्राचीन सभ्यताएं

आखिर ये सब क्यों हो रहा था? क्या सच में ये गोरे लोग दुनिया का भला करना चाहते थे? बिल्कुल नहीं। इन तमाम औपनिवेशिक और मिशनरी अभियानों के पीछे सिर्फ तीन मकसद थे, जिन्हें इतिहास में ‘3 Gs’ कहा जाता है- गॉड (God), ग्लोरी (Glory), और गोल्ड (Gold)।

सबसे पहला था गॉड (God)। यानी दुनिया भर के उन तमाम लोगों को तलवार और लालच के दम पर ईसाई बनाना, जो प्रकृति की पूजा करते थे।

जहाँ-जहाँ ये गोरे पहुंचे, इन्होंने सबसे पहले वहां के हज़ारों साल पुराने पवित्र स्थलों और मूर्तियों को चकनाचूर किया और उनकी छाती पर अपना क्रॉस (Cross) गाड़ दिया।

दूसरा था ग्लोरी (Glory)। यानी यूरोप के उन भूखे और लालची राजाओं के साम्राज्य का विस्तार करना।

जो ज़मीनें हज़ारों सालों से उन आदिवासियों की थीं, जहाँ उनके पूर्वजों की राख दफन थी, उन ज़मीनों पर अचानक एक गोरा नाविक आकर अपना झंडा गाड़ देता था और कहता था की “आज से ये ज़मीन स्पेन या ब्रिटेन के राजा की है।”

और तीसरा और सबसे खतरनाक मकसद था गोल्ड (Gold)। यानी लूट!

इन गोरे ईसाइयों ने अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया की ज़मीनों से टनों सोना, चांदी और कीमती खनिज लूटे। वहां के खजाने लूट-लूट कर जहाज़ों के ज़रिए यूरोप भेजे गए।

आज जो यूरोप की बड़ी-बड़ी इमारतें और अर्थव्यवस्थाएं इतनी चमचमाती हुई दिखती हैं ना, वो कोई इनकी मेहनत का नतीजा नहीं है। वो चमक दुनिया भर के करोड़ों मूलनिवासियों के खून और उनके लूटे गए ‘गोल्ड’ की बदौलत है।

गोरे ईसाइयों के इस खूनी रथ को कैसे भारत की धरती पर सनातन धर्म ने चारों खाने चित कर दिया

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के करोड़ों आदिवासियों का खून पीने के बाद जब ये गोरे आक्रांता और ईसाई मिशनरी अपने जहाज़ों में भरकर भारत के तटों पर उतरे, तो इन्हें लगा था की यहाँ भी इनका वो खूनी ‘3G मॉडल’ (गॉड, ग्लोरी, गोल्ड) बहुत आसानी से चल जाएगा।

इन्होंने सोचा था की जैसे इन्होंने रेड इंडियंस और माओरी जनजाति को शराब पिलाकर, छल-कपट से और बंदूकों के दम पर ख़त्म कर दिया, वैसे ही ये भारत के जंगलों में रहने वाले करोड़ों वनवासियों का भी सफाया कर देंगे या उन्हें अपना गुलाम बना लेंगे।

लेकिन यहाँ आकर इनका सामना किसी साधारण कबीले या असंगठित समाज से नहीं हुआ था। भारत की धरती पर इनका सीधा टकराव उस ‘सनातन धर्म’ से हुआ, जिसकी जड़ें पाताल से भी गहरी और जिसका मस्तक आकाश से भी ऊंचा था।

ये गोरे यहाँ बुरी तरह से चारों खाने चित हो गए। आखिर क्यों? क्यों ये भारत के वनवासियों का अमेरिका वाला हाल नहीं कर पाए?

इसका सबसे बड़ा और इकलौता कारण ये था की सनातन धर्म कोई विदेशी या थोपा हुआ मज़हब नहीं है। यह दुनिया का सबसे प्राचीन और इकलौता ऐसा धर्म है जो पूरी तरह से प्रकृति से जन्मा है।

ज़रा सोचकर देखिए! दुनिया भर के मूलनिवासी क्या करते थे? वे पेड़ों की पूजा करते थे, नदियों को माँ मानते थे, सूर्य को जल चढ़ाते थे और पहाड़ों को अपना देवता मानते थे। और हम सनातनी क्या करते हैं? हम भी तो यही करते हैं!

भारत की संस्कृति सिर्फ शहरों (नागर संस्कृति) में नहीं पनपी, बल्कि हमारे महान ऋषियों ने जंगलों और गुफाओं में बैठकर ही वेदों का सबसे गहरा ज्ञान लिखा था।

हमारे यहाँ शहर और जंगल के बीच कोई नफरत या दूरी नहीं थी, बल्कि ये दोनों एक ही शरीर की दो आंखें थीं।

अगर कोई आपसे पूछे की भारत में हिंदू और वनवासी (आदिवासी) समाज का रिश्ता कितना पुराना और कितना गहरा है, तो उसे त्रेता युग के दर्शन करवा देना।

हमारी रामायण की पूरी की पूरी कथा ही नगर (अयोध्या) और वनवासियों के अटूट मेलजोल पर आधारित है।

जब भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास मिला, तो उन्होंने सबसे पहले किसे गले लगाया था? निषादराज गुह को! एक वनवासी राजा को भगवान राम ने अपने सगे भाई भरत के समान सम्मान दिया।

जब भगवान राम जंगलों में भटक रहे थे, तो वो किसी बड़े महलों वाले राजा के पास मदद मांगने नहीं गए। वो गए शबरी के आश्रम में।

शबरी, जो एक वनवासी भीलनी थीं, उनके जूठे बेर खाकर भगवान राम ने पूरी दुनिया को ये संदेश दे दिया की सनातन धर्म में कोई ऊंच-नीच नहीं है, यहाँ तो सिर्फ प्रेम और भक्ति का राज चलता है।

इसी नागर और आरण्यक (जंगल) के संगम ने इन गोरों के मंसूबों पर ऐसा पानी फेरा की इनकी सारी चालाकियां धरी की धरी रह गईं।

जब चर्च की धर्मांतरण वाली साज़िश से टकराए भगवान बिरसा मुंडा और कोमाराम भीम, कांप उठी थी गोरों की रूह

19वीं सदी के आखिर में ये पादरी झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के घने जंगलों में घुसने लगे। वहां जाकर इन्होंने वही गंदा खेल शुरू किया जो ये अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में खेल चुके थे।

इन्होंने भोले-भाले वनवासियों की गरीबी और उनके सीधेपन का फायदा उठाना शुरू किया। ‘सेवा’ और ‘इलाज’ के नाम पर लालच देकर, डरा-धमका कर और कभी-कभी ज़बरदस्ती उनके गले में क्रॉस लटकाना शुरू कर दिया।

जो ज़मीनें हज़ारों सालों से आदिवासियों की थीं, उन्हें ब्रिटिश कानूनों के दम पर हड़प कर वहां बड़े-बड़े चर्च बनाए जाने लगे।

पादरियों ने वनवासियों से कहना शुरू कर दिया की तुम्हारी संस्कृति, तुम्हारे सरना स्थल और तुम्हारे देवी-देवता सब ‘अंधविश्वास’ हैं, तुम हमारे धर्म में आ जाओ।

लेकिन इन गोरों को अंदाज़ा ही नहीं था की वो किस बारूद के ढेर पर बैठकर माचिस जला रहे हैं।

जब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा, तब छोटानागपुर (झारखंड) की धरती से एक ऐसा तूफान उठा जिसने इन अंग्रेजों और पादरियों की ईंट से ईंट बजा कर रख दी। और उस तूफान का नाम था- भगवान बिरसा मुंडा!

महज़ 20-22 साल के एक युवा ने अपने वनवासी समाज को जगाने के लिए जो बिगुल फूंका, उसे इतिहास में ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) कहा जाता है।

वामपंथी इतिहासकार हमेशा ये छुपाने की कोशिश करते हैं की बिरसा मुंडा की लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों के टैक्स या ज़मीन के खिलाफ थी।

अरे झूठ बोलते हैं ये लोग! भगवान बिरसा मुंडा की असली लड़ाई तो उन ईसाई पादरियों और मिशनरियों के खिलाफ थी जो आदिवासियों का धर्म भ्रष्ट कर रहे थे।

बिरसा मुंडा ने अपने लोगों से डंके की चोट पर कहा की ये गोरे मिशनरी हमारे सबसे बड़े दुश्मन हैं। उन्होंने नारा दिया की अपनी जड़ों की तरफ लौटो, अपनी प्रकृति पूजा और अपने सनातन मूल्यों को मत छोड़ो।

जब बिरसा मुंडा के हाथ में तीर-कमान उठे, तो उन जंगलों में बने चर्चों के पादरियों की रूह कांप गई थी! बिरसा के तीरों ने बंदूकों वाले अंग्रेजों को दिन में तारे दिखा दिए।

और ये सिर्फ उत्तर या मध्य भारत की बात नहीं थी। दक्षिण भारत के जंगलों में भी इन आक्रांताओं को ऐसा ही भयंकर जवाब मिला।

जब अंग्रेजों और निज़ाम ने मिलकर हमारे वनवासियों के ‘जल, जंगल और ज़मीन’ पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, तो वहां अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम जैसे शूरवीरों ने जो ‘रम्पा विद्रोह’ किया, उसने पूरी ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं।

कोमाराम भीम ने तो गोंड आदिवासियों को एकजुट करके ऐसा गुरिल्ला युद्ध लड़ा की अंग्रेजों को जंगलों में घुसने से पहले सौ बार सोचना पड़ता था।

यही वो सनातन की अजेय ताकत और वनवासियों का वो फौलादी जज़्बा था, जिसके आगे दुनिया भर का खून पीने वाले ये ईसाई मिशनरी भारत में आकर घुटने टेकने पर मजबूर हो गए।

जय श्री राम! जय भगवान बिरसा मुंडा!

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