सवर्ण हिंदू अफसर अंकित शर्मा को 51 बार चाकुओं से गोदने वाले ‘ताहिर हुसैन’ को फांसी से बचाया और NEET प्रोटेस्ट में पुलिस को सड़क पर पीटने वाले गुंडों को सरकार ने किया माफ़, आखिर देश सेवा करने वालों की जान इतनी सस्ती क्यों

सच कहूँ तो आज इस देश का सिस्टम देखकर कलेजा फट जाता है। हम हमेशा यही सोचते थे की पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी करो, देश की सेवा करो, वर्दी पहनो तो समाज तुम्हारी इज्जत करेगा।

लेकिन आज जो हालात बन गए हैं ना, उन्हें देखकर मन में एक ही सवाल उठता है की क्या इस देश में वर्दी पहनने वालों की, सरकारी अफसरों की और एक सवर्ण (General Caste) हिन्दू की जान की कीमत कुछ बची भी है या नहीं?

जुलाई 2026 के आखिरी दिनों में हमारे सामने दो ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने पूरे देश को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है।

एक तरफ कोर्ट का वो फैसला आता है जो एक खूंखार हत्यारे को फांसी के फंदे से बचा लेता है, और दूसरी तरफ हमारे देश का सिस्टम उन उपद्रवियों को सरेआम माफ कर देता है जो पुलिस वालों को सड़कों पर पीट-पीटकर अधमरा कर देते हैं।

आखिर हमारी सरकार हमारे ही रक्षकों के साथ इतनी क्रूर और दोगली कैसे हो सकती है? चलिए इस भद्दे मज़ाक का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं।

अंकित शर्मा को 51 बार चाकुओं से गोदा और नाले में फेंका, फिर भी कोर्ट को ताहिर हुसैन में दिख रही है सुधार की गुंजाइश

अब ज़रा दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के उस फैसले को देखिए जो 31 जुलाई 2026 को आया।

2020 के दिल्ली दंगों का वो खौफनाक मंज़र तो आपको याद ही होगा, जब 26 साल के युवा इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) अफसर अंकित शर्मा को जिहादी भीड़ ने खींच लिया था।

अंकित शर्मा एक सामान्य परिवार से आने वाले जनरल कास्ट के हिन्दू थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आज भी चीख-चीख कर गवाही देती है की अंकित के शरीर पर चाकुओं के 51 घाव थे। उनके शरीर का कोई ऐसा हिस्सा नहीं बचा था जिसे उन हैवानों ने गोदा न हो।

उनकी आंखें तक निकाल ली गई थीं और इस पूरी बर्बरता के बाद उन्हें एक गंदे नाले में फेंक दिया गया। इस पूरी खौफनाक साजिश का मास्टरमाइंड था जिहादी ताहिर हुसैन और उसके गुर्गे।

लेकिन कोर्ट में क्या हुआ? जज प्रवीण सिंह ने ताहिर हुसैन और उसके 4 साथियों को उम्रकैद की सजा तो सुनाई, लेकिन दिल्ली पुलिस की उस मांग को सिरे से ठुकरा दिया जिसमें इन हैवानों के लिए फांसी (Death Penalty) मांगी गई थी।

कोर्ट ने खुद अपने फैसले में लिखा की यह हत्या “अत्यंत क्रूर और घिनौनी” थी। पर फांसी क्यों नहीं दी? क्योंकि जज साहब का तर्क था की इन हत्यारों में अभी भी “सुधार की गुंजाइश” बाकी है!

अरे भाईसाहब! जो आदमी 51 बार चाकू गोद सकता है, जो इंसानियत की सारी हदें पार करके एक सरकारी अफसर को नाले में फेंक सकता है, उस जिहादी में हमारा कोर्ट कौन सा सुधार ढूँढ रहा है?

क्या वो जेल में बैठकर भजन-कीर्तन करेगा? जो इंसान ऐसी बर्बरता कर सकता है, उसके सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं होती।

‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ केस का वो दोगला सच जिसने एक खूंखार जिहादी को फांसी के फंदे से बचा लिया

हमारे देश के कानून में एक पेंच है जिसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (Rarest of Rare) कहा जाता है। मतलब जब कोई जुर्म इतना खौफनाक हो की समाज की रूह कांप जाए, तभी फांसी दी जाएगी।

अब मुझे कोई ये समझा दे की अगर देश की राजधानी में, एक ड्यूटी पर तैनात IB अफसर को सरेआम 51 बार चाकुओं से गोद देना ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं है… तो फिर क्या है?

क्या उसे 100 बार गोदा जाता तब कोर्ट इसे दुर्लभ मामला मानता? या अगर मरने वाला किसी मुस्लिम समुदाय का होता, तब जाकर इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर माना जाता? अंकित शर्मा के पिता रवींद्र कुमार खुद दिल्ली पुलिस में रहे हैं।

एक बाप जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी खाकी वर्दी पहनकर देश की सेवा की, उसी के बेटे को जिहादियों ने मार डाला और हमारा सिस्टम उन हत्यारों की जान बख्श रहा है।

ये कैसा अंधा कानून है यार? ये फैसला साफ बताता है की सिस्टम की नज़रों में अब एक आम सवर्ण हिंदू अफसर की जान की कोई अहमियत ही नहीं बची है।

नीट प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर बहाया गया पुलिस वालों का खून और वर्दी वालों को सरेआम किया गया लिंच

एक तरफ कोर्ट से पुलिस वालों का मनोबल टूट रहा था, और दूसरी तरफ जुलाई 2026 के अंत में सड़कों पर जो हुआ, उसने खाकी वर्दी को खून के आंसू रुला दिए।

नीट (NEET) परीक्षा के नाम पर दिल्ली के जंतर-मंतर और कई अन्य जगहों पर भारी बवाल हुआ। ‘संसद चलो’ का नारा देकर जो उग्र भीड़ सड़कों पर उतरी, उसने अपना सारा गुस्सा किस पर निकाला?

उन पुलिसवालों पर, जो सिर्फ ऊपर से मिले ऑर्डर्स फॉलो कर रहे थे और अपनी ड्यूटी निभा रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट में पुलिस परिवारों की तरफ से वकील श्रीधर पोटराजू ने जो दर्द बयां किया है, वो रोंगटे खड़े कर देता है।

भीड़ ने पुलिस वालों को चारों तरफ से घेरकर सरेआम पीटा। एक सब-इंस्पेक्टर (SI) की हालत इतनी बुरी कर दी गई की उसकी पूरी वर्दी खून से लथपथ हो गई।

उसकी बेटी का रो-रोकर बुरा हाल है, जिसने बताया की उसके पिता 4 घंटे तक अस्पताल में बेहोश पड़े रहे।

क्या लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करने का मतलब ये होता है की आप पुलिस वालों का सिर फोड़ दें? क्या मानवाधिकार सिर्फ दंगा करने वालों के होते हैं, पुलिसवालों के नहीं?

पुलिस वाले भी इंसान हैं यार, उनके भी बीवी-बच्चे हैं जो शाम को उनके घर लौटने का इंतज़ार करते हैं।

अगर सड़कों पर यूं ही वर्दी वालों को लिंच किया जाएगा, तो फिर समाज में कानून का डर तो वैसे ही खत्म हो जाएगा।

हमलावरों को भटके हुए बच्चे मानकर मोदी जी ने दी खुली माफी, लेकिन क्या देश के रक्षकों की जान इतनी सस्ती है

अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे हैरान करने वाले पहलू पर। हम सब जानते हैं की प्रधानमंत्री मोदी जी देश के मुखिया हैं, उनका दिल बहुत बड़ा है और वो 140 करोड़ देशवासियों के लिए एक पिता के समान हैं।

इसी बड़प्पन और दयालुता के चलते, 31 जुलाई की रात को मोदी जी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो मैसेज डाल दिया।

मोदी जी ने कहा- “मैं इन भटके हुए बच्चों को माफ़ करता हूँ। बच्चों से गलती हो जाती है, इन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर में नहीं घसीटना चाहिए।”

मोदी जी, आपकी दयालुता अपनी जगह बिल्कुल सही हो सकती है। एक मुखिया होने के नाते आपका दिल बड़ा होना भी चाहिए। लेकिन ज़रा उन जवानों के बारे में तो सोचिए जो अस्पताल के बेड पर खून से लथपथ पड़े हैं!

आपके इस ‘माफी’ वाले बयान का उन पुलिस वालों के मनोबल पर क्या असर पड़ा होगा?

एक जवान जो अपनी जान हथेली पर रखकर उग्र भीड़ का सामना कर रहा है, जब उसे पता चलता है की जिस भीड़ ने उसे पीटा, उसे सरकार ने ‘बच्चे’ बोलकर यूं ही क्लीन चिट दे दी है… तो उसका कलेजा टूट जाता है।

क्या इससे कल को एक बहुत ही गलत मैसेज सेट नहीं होगा? अब तो कोई भी भीड़ सड़कों पर उतरेगी, पुलिस वालों पर पत्थर बरसाएगी, उनका खून बहाएगी और ये सोचकर बेख़ौफ़ घूमेगी की बाद में सरकार तो हमें ‘भटके हुए बच्चे’ बोलकर माफ कर ही देगी।

ये नर्मी देश की सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकती है।

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