क्या कश्मीर में हिंदू होना ही बन गया सब से बड़ा गुनाह? पहलगाम के बाद अब कुलगाम में सनातनियों का नरसंहार, बार-बार हिंदूओं का नाम पूछकर ही ये जिहादी क्यों करते कत्लेआम

क्या कश्मीर में हिंदू होना ही बन गया सब से बड़ा गुनाह? पहलगाम के बाद अब कुलगाम में सनातनियों का नरसंहार, बार-बार हिंदूओं का नाम पूछकर ही ये जिहादी क्यों करते कत्लेआम

कभी-कभी समझ नहीं आता की आखिर एक सनातनी की जान की कीमत इस देश में कितनी रह गई है? जब भी कश्मीर से किसी के मारे जाने की खबर आती है, तो दिल में एक अजीब सा खौफ और बेबसी दौड़ जाती है।

जब आपको ये पता चले की किसी बेगुनाह इंसान को सिर्फ इसलिए गोलियों से छलनी कर दिया गया क्योंकि उसका नाम एक ‘हिन्दू’ नाम था, क्योंकि वो एक ‘सनातनी’ था… तो मन में सिर्फ एक ही सवाल आता है..

क्या आज कश्मीर में हिन्दू होना ही अपने आप में सबसे बड़ा गुनाह बन गया है? क्या अपने परिवार का पेट पालने के लिए वहां जाकर दो वक्त की रोटी कमाना मौत को दावत देना है?

अभी कुलगाम से जो खौफनाक वारदात सामने आई है, उसने पूरे देश के हिंदुओं को झकझोर कर रख दिया है।

ये कोई आतंकी हमला नहीं, बल्कि एक मज़हबी और जिहादी नरसंहार था, जहाँ इंसानों को बकरियों की तरह लाइन में खड़ा किया गया, उनका धर्म पूछा गया, और फिर जो हिन्दू निकले, उन्हें गोलियों से भून दिया गया।

आइए ज़रा इस खूनी खेल की परतों को उधेड़ते हैं और देखते हैं की आखिर इस कायर जिहादी मानसिकता का असली मक़सद क्या है।

खून से लाल हुई कश्मीर की वादी, और एक बार फिर गूंजा वही खौफनाक सवाल “तुम हिन्दू हो या मुस्लिम”

ज़रा उस खौफनाक मंज़र की कल्पना कीजिए। शुक्रवार की शाम का वक्त (जुलाई 2026 का आख़िरी हफ्ता)। जगह थी दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले का केलम (Kelam) गांव।

दिन भर की मेहनत के बाद ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले गरीब मज़दूर अपने कमरों की तरफ जा रहे थे। उन्हें बस इस बात की फिक्र थी की आज की दिहाड़ी मिल गई, अब चूल्हा जलेगा और पेट में कुछ अन्न जाएगा।

तभी वहां मौत की एंट्री होती है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) के कायर आतंकी एक काले रंग का बैग लटकाए वहां पहुंचते हैं।

उस बैग में उन्होंने मौत का सामान यानी AK-47 छिपा रखी थी। अब यहाँ सबसे खौफनाक बात सुनिए। वो आतंकी वहां आकर कोई अंधाधुंध फायरिंग नहीं करते। वो किसी को भी यूं ही गोली नहीं मारते ।

वो बाकायदा रुकते हैं। मज़दूरों को डरा-धमका कर एक साथ खड़ा करते हैं और फिर उनसे एक-एक करके उनका नाम, उनकी जाति और उनका धर्म (Religion) पूछते हैं।

ज़रा सोचिए उस पल का खौफ! जब एक बंदूकधारी आपके माथे पर गन रखकर पूछे की “बता तेरा मज़हब क्या है?”

जैसे ही उन मज़दूरों में से कुछ कहते हैं की हम “हिन्दू” हैं… आतंकियों की आँखों में जिहादी खून उतर आता है।

वो तुरंत उन हिन्दू मज़दूरों को बाकी मुस्लिम मज़दूरों से अलग करते हैं। और फिर… बिना कोई रहम खाए, एकदम करीब से उनके सीने और सिर में अंधाधुंध गोलियां उतार देते हैं।

वो बेगुनाह हिन्दू मज़दूर वहीं ईंट-भट्ठे की लाल मिट्टी पर तड़प-तड़प कर अपनी जान दे देते हैं। ये पढ़कर कलेजा फट जाता है! क्या कोई इंसान इतना क्रूर हो सकता है?

तुमने गोली एक इंसान को नहीं मारी, तुमने गोली उसके धर्म को देखकर मारी।

अगर वो किसी और मज़हब का होता, तो शायद आज ज़िंदा होता। कश्मीर की हवाओं में एक बार फिर वही खौफनाक सवाल गूंज रहा है-

“तुम हिन्दू हो या मुस्लिम?” और अगर तुम हिन्दू हो, तो तुम्हारी सज़ा सिर्फ मौत है।

पेट पालने कश्मीर गए थे छतीसगढ़ के दीपक और भूपेंद्र, लेकिन जिहादियों ने उन्हें दे दी खौफनाक मौत

जब हम कहते हैं की ये जिहादी सबसे बड़े कायर और बुज़दिल होते हैं, तो वो बात सौ टके सच है। इन नामर्दों की औकात नहीं है की ये सीना तानकर हमारी भारतीय सेना के कमांडोज़ का सामना कर सकें।

जब सेना के जवान सामने आते हैं, तो ये चूहों की तरह जंगलों और गुफाओं में छिप जाते हैं।

अपनी इस नामर्दी और फ्रस्ट्रेशन को मिटाने के लिए ये कायर उन निहत्थे और गरीब मज़दूरों को अपना शिकार बनाते हैं, जिनके पास आत्मरक्षा के लिए एक लाठी तक नहीं होती।

जिन दो लोगों को कुलगाम में नाम पूछकर मारा गया, वे कोई बहुत बड़े रसूखदार, करोड़पति या कश्मीर की ज़मीन खरीदने वाले नेता नहीं थे।

वे तो छतीसगढ़ के सक्ती और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जैसे पिछड़े और गरीब ज़िलों से आए दिहाड़ी मज़दूर थे। मृतकों के नाम थे दीपक रात्रे (महज़ 24 साल) और भूपेंद्र भैना (28 साल)।

ये दोनों बेचारे 7-8 महीने पहले ही अपने परिवार की गरीबी दूर करने और पेट पालने कश्मीर गए थे। इस खौफनाक हत्या के बाद पूरे छतीसगढ़ में भयंकर उबाल है।

छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पीड़ित परिवारों के लिए तुरंत 5-5 लाख रुपये की आर्थिक मदद का ऐलान किया और अधिकारियों को उनके पार्थिव शरीर ससम्मान वापस लाने के सख्त निर्देश दिए हैं।

क्या आपको पता है दीपक रात्रे के परिवार का हाल क्या है? उसके परिवार में उसकी एक बूढी माँ है जो अब रो-रोकर अधमरी हो चुकी है।

घर में एक अपाहिज भाई है, जिसकी सारी ज़िम्मेदारी उसी 24 साल के दीपक के कंधों पर थी।

उसकी एक जवान पत्नी है जिसका सुहाग उजड़ गया और… और एक साल का छोटा सा मासूम बच्चा है, जिसे ये भी नहीं पता की ‘पापा’ शब्द का मतलब क्या होता है!

उस एक साल के बच्चे को इन कायर जिहादियों ने हमेशा के लिए अनाथ कर दिया। क्यों? क्योंकि उसके पिता का नाम दीपक था, क्योंकि वो एक सनातनी था!

दिन भर मिट्टी सानकर, ईंटें ढोकर 500-600 रुपये कमाने वाले उस गरीब मज़दूर का कश्मीर के किसी सियासी मसले से क्या लेना-देना था?

क्या यही तुम्हारा जिहाद है? एक निहत्थे, गरीब, और धूल में सने हुए हिन्दू मज़दूर के सीने में गोलियां उतारना तुम्हें ‘जन्नत’ दिलाएगा?

धिक्कार है ऐसी मानसिकता पर जो बेगुनाहों के खून से अपना मज़हब चमकाना चाहती है।

दीपक के भाई मनोज और उनके चाचा हलधर रात्रे ने जब रोते हुए मीडिया को बताया की “आतंकियों ने नाम और धर्म पूछकर गोली मारी,” तो पूरे छतीसगढ़ और देश के करोड़ों हिंदुओं का दिल दहल गया।

वो लाशें जब तिरपाल में लपेट कर उनके गांवों में पहुँचीं, तो चीख-पुकार सुनकर पत्थर का भी दिल पसीज जाए। लेकिन उन जिहादियों और उनको पालने वाले ईकोसिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

नाम पूछना और फिर चुन-चुनकर हिन्दुओं का कत्लेआम करना, आखिर क्या है इस खौफनाक खूनी खेल का असली मकसद

अब आते हैं उस सबसे बड़े सवाल पर जो इस वक्त हर सनातनी के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा है। आखिर ये आतंकी गोली मारने से पहले नाम और धर्म क्यों पूछते हैं? वो सीधे आकर फायरिंग क्यों नहीं कर देते?

इसे आतंकवाद की भाषा में ‘टारगेटेड किलिंग’ कहा जाता है। और इसका मक़सद सिर्फ दो लोगों की जान लेना नहीं था, बल्कि कश्मीर में बचे-खुचे हिंदुओं और भारत के बाकी राज्यों से वहां काम करने गए लाखों मज़दूरों के दिलों में भयंकर खौफ (Terror) पैदा करना है।

ये जिहादी दुनिया को और भारत सरकार को एक बहुत ही खौफनाक मैसेज देना चाहते हैं। वो मैसेज ये है की “कश्मीर की धरती पर किसी भी गैर-मुस्लिम या हिन्दू के लिए कोई जगह नहीं है।”

ये सीधे तौर पर डेमोग्राफी यानी जनसांख्यिकी का खेल है। ये चाहते हैं की इस तरह चुन-चुनकर हिंदुओं को मारा जाए, ताकि डर और दहशत के मारे यूपी, बिहार, छतीसगढ़ या देश के किसी भी कोने से कोई हिन्दू मज़दूर, व्यापारी या बैंक कर्मचारी कभी कश्मीर में कदम रखने की जुर्रत न करे।

आपको अक्टूबर 2021 का वो खूनी हफ्ता याद है? जब इन दरिंदों ने बिहार के बांका से गए गोलगप्पे बेचने वाले गरीब अरविन्द कुमार साह और रेहड़ी लगाने वाले वीरेंद्र पासवान को सरेआम सड़क पर गोलियों से भून दिया था।

फिर शोपियां और पुलवामा में यूपी के रहने वाले मनीष कुमार और राम सागर जैसे निहत्थे मज़दूरों को उनके कमरों में घुसकर ग्रेनेड से उड़ा दिया गया।

राजस्थान के बैंक मैनेजर विजय कुमार से लेकर यूपी-बिहार के रेहड़ी वालों तक, इन जिहादियों ने पिछले कुछ सालों में दर्जनों गैर-कश्मीरी हिन्दू मज़दूरों को इसी तरह चुन-चुनकर मारा है।

इनका मास्टरप्लान ये है की अगर बाहरी हिन्दू डरकर कश्मीर छोड़ देंगे, तो कश्मीर पूरी तरह से इनके कब्ज़े में रहेगा। फिर वहां सिर्फ इनका जिहादी एजेंडा चलेगा।

जब ये मज़दूरों को लाइन में लगाकर उनसे उनका नाम पूछते हैं, तो ये असल में बाकी लोगों के दिमाग में एक मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा कर रहे होते हैं।

ये जताना चाहते हैं की “अगर तुम्हारा नाम हिन्दू वाला है, अगर तुम माथे पर तिलक या हाथ में कलावा बांधते हो, तो कश्मीर में तुम्हारी जान की कोई गारंटी नहीं है।”

ये सनातन धर्म के खिलाफ कश्मीर की वादियों में छेड़ा गया एक ऐसा खूनी युद्ध है, जिसे अगर आज नहीं कुचला गया, तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।

पहलगाम में कलमा और कुलगाम में मज़हब का सवाल, ये सिर्फ आतंकी हमले नहीं बल्कि सनातनियों को मिटाने का जिहादी ब्लूप्रिंट है

अगर आप सोच रहे हैं की कुलगाम की ये घटना कोई इत्तेफाक है या किसी पागल आतंकी की सनक है, तो आप बहुत बड़े मुगालते में जी रहे हैं।

ये एक पूरा का पूरा जिहादी टूलकिट है, जिसे बहुत सोच-समझकर कश्मीर में लागू किया जा रहा है।

ज़रा अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाइए और थोड़ा पीछे जाइए। आपको अप्रैल 2025 का वो खौफनाक ‘पहलगाम नरसंहार’ तो याद ही होगा!

पहलगाम में इन आतंकियों ने क्या किया था? वहां भी इन दरिंदों ने बिल्कुल यही खूनी पैटर्न अपनाया था। उस वक़्त भी इन्होंने पर्यटकों को रोका था और बंदूक की नोक पर उनसे ज़बरदस्ती ‘कलमा’ पढ़ने को कहा था।

ज़रा सोचिए उस मंज़र के बारे में! जो लोग कलमा पढ़ गए, उन्हें छोड़ दिया गया, और जो लोग कलमा नहीं पढ़ पाए- ज़ाहिर सी बात है वो हिन्दू थे- उन्हें वहीं लाइन में खड़ा करके जानवरों की तरह मार डाला गया। उस ‘कलमा टेस्ट’ ने पूरे देश के रोंगटे खड़े कर दिए थे।

और अब कुलगाम में भी हुबहू वही हुआ। पहलगाम में ‘कलमा’ का टेस्ट और कुलगाम में ‘मज़हब’ का सवाल! फिर रियासी में तीर्थयात्रियों की बस पर हुआ खौफनाक हमला।

ये सब क्या है भाई? ये कोई कानून व्यवस्था बिगड़ने का मामला नहीं है। ये एक मज़हबी युद्ध (Religious War) है जिसे सनातनियों के खिलाफ छेड़ा गया है।

ये एक ब्लूप्रिंट है जिसका बस एक ही मेसेज है की अगर तुम अल्लाह को नहीं मानते, अगर तुम हिन्दू हो, तो तुम्हें जीने का कोई हक़ नहीं है।

हम कब तक इस सच्चाई से आंखें चुराते रहेंगे? हमारे सेक्युलर और लिबरल लोग हमेशा कहते हैं की “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।”

अरे भाई, अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, तो गोली मारने से पहले वो आतंकी मज़दूरों का धर्म क्यों पूछ रहा था? क्यों उसने मुस्लिम मज़दूरों को अलग कर दिया और सिर्फ हिंदुओं का सीना छलनी किया?

सच तो ये है की आतंकवाद का एक बहुत पक्का धर्म है, और वो धर्म सिर्फ और सिर्फ ‘काफिरों’ (हिन्दुओं) के खून का प्यासा है।

1990 से लेकर आज तक नहीं बदली ये खूनी मानसिकता आखिर सनातनी खून की इतनी प्यासी क्यों है ये जिहादी कौम

जब भी कश्मीर में नाम पूछकर कत्लेआम होता है, तो 1990 के उस खौफनाक दौर के ज़ख्म हरे हो जाते हैं।

‘द कश्मीर फाइल्स’ में जो आपने देखा, वो कोई कहानी नहीं थी, वो वही खूनी हकीकत थी जो आज कुलगाम में दोहराई गई है।

1990 के उस मनहूस दौर में क्या हुआ था? मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से खुलेआम ऐलान होता था की “यहाँ सिर्फ निज़ाम-ए-मुस्तफा चलेगा!”

कश्मीरी पंडितों के घर के बाहर पर्चे चिपकाए जाते थे की “या तो धर्म बदलो, या कश्मीर छोड़ो, या मरने के लिए तैयार रहो।”

उस वक़्त भी चौराहों पर लोगों को रोककर उनका नाम पूछा जाता था। जिसके नाम के आगे ‘भट्ट’, ‘पंडित’, ‘कौल’ या ‘टिक्कू’ लगा होता था, उसे सरेआम गोलियों से भून दिया जाता था।

आज 2026 आ गया है। पूरे 36 साल गुज़र गए! कश्मीर में इतना कुछ बदल गया।

वहां से धारा 370 उखड़ कर कूड़ेदान में चली गई, पत्थरबाज़ी बंद हो गई, सिनेमा हॉल खुल गए, विकास हो गया… लेकिन एक चीज़ आज तक नहीं बदली!

और वो है इस जिहादी कौम के दिमाग में भरा हुआ हिंदुओं के प्रति वो ज़हरीला खौफनाक ‘नफरत का कीड़ा’।

ये नफरत आती कहाँ से है यार? ये कोई पैदाइशी बीमारी नहीं है, ये नफरत इन्हें बाकायदा पढ़ाई और पिलाई जाती है।

लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) जैसे आतंकी संगठन इसी नफरत की फैक्ट्रियां चलाते हैं। वहां नौजवानों का ब्रेनवॉश किया जाता है।

उन्हें बताया जाता है की ‘काफिर’ (हिन्दू) को मारना सबसे बड़ा सवाब (पुण्य) का काम है। उन्हें ये यकीन दिलाया जाता है की एक हिन्दू को मारकर उन्हें जन्नत में हूरें मिलेंगी।

जब तक ये नफरत की फैक्ट्रियां और वो ज़हरीली किताबें मौजूद हैं, तब तक ये खूनी खेल कभी बंद नहीं होने वाला।

निंदा और मुआवज़े से नहीं बुझेगी ये आग, अब इन जिहादियों को उन्हीं की भाषा में चुन-चुनकर जवाब देने का आ गया है वक्त

अब आते हैं हमारे लचर सिस्टम और नेताओं के उस रटे-रटाए रवैये पर, जिसने खून के आंसू रुला दिए हैं।

जैसे ही कुलगाम का ये नरसंहार हुआ, टीवी पर नेताओं का वही पुराना घिसा-पिटा नाटक शुरू हो गया।

किसी ने ‘कड़ी निंदा’ कर दी, किसी ने ट्वीट करके अफ़सोस जता दिया। जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला सामने आए, निंदा की, और 10-10 लाख रुपये के मुआवज़े का ऐलान करके अपना पल्ला झाड़ लिया। कांग्रेस के खड़गे साहब ने भी बस दो लाइन बोल दीं।

सच कहुँ तो हमें ये ‘कड़ी निंदा’ अब नहीं सुननी! क्या 10 लाख रुपये में तुम दीपक के उस एक साल के अनाथ बच्चे को उसका बाप लौटा सकते हो?

क्या वो मुआवज़े के चंद कागज़ उसकी पत्नी का उजड़ा हुआ सुहाग वापस ले आएंगे? हमारे देश के नेताओं को लगता है की हिन्दू की जान की कीमत बस 10 लाख रुपये और एक ट्वीट है।

किसी हिन्दू को काट दो, फिर थोड़े पैसे फेंक दो और मामला रफ़ा-दफ़ा!

अब सनातनी समाज इस मोमबत्ती वाले ड्रामे, शांति मार्च और ‘कड़ी निंदा’ वाले पाखंड से बुरी तरह पक चुका है। हमारा खून कोई पानी नहीं है की जो चाहे, जब चाहे, नाम पूछकर उसे सड़क पर बहा दे।

अब वक़्त आ गया है की इन कायर जिहादियों को उसी भाषा में जवाब दिया जाए जो भाषा ये समझते हैं! और वो भाषा है- खून का बदला खून!

अब कश्मीर में कोई रहम नहीं, कोई मानवाधिकार का रोना नहीं। हमारी भारतीय सेना और सुरक्षाबलों को अब पूरी तरह से खुला छूट (Free hand) मिलना चाहिए।

‘ऑपरेशन ऑल-आउट’ का ऐसा भयंकर और खौफनाक रूप शुरू होना चाहिए की इन जिहादियों की रूह कांप जाए।

जिस तरह इन्होंने नाम पूछकर हमारे बेगुनाह मज़दूरों को छांटकर मारा है ना, बिल्कुल उसी तरह अब सुरक्षाबलों को इनके ठिकानों, इनके घरों और इन्हें पनाह देने वाले लोकल लोगों को चुन-चुनकर नेस्तनाबूद करना होगा।

इनके इकोसिस्टम को ऐसा कुचलो की आने वाले 100 सालों तक कोई जिहादी किसी सनातनी का नाम और मज़हब पूछने की जुर्रत न कर सके।

अगर ये हमें डर के साये में जीने पर मजबूर कर रहे हैं, तो अब खौफ इन्हें भी महसूस होना चाहिए।

जब तक इनके घरों से इनके आतंकियों की लाशें नहीं उठेंगी, जब तक इन्हें ये एहसास नहीं होगा की एक हिन्दू का खून बहाने की कीमत क्या होती है, तब तक ये कीड़े बिलों से बाहर आते रहेंगे।

अब शांति के कबूतर उड़ाने का वक़्त नहीं है, अब बाज़ बनकर इन जिहादी दरिंदों की गर्दन दबोचने का वक़्त है!

भारत माता की जय! जय श्री राम!

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