जब भी सावन का महीना आता है, तो हिंदुस्तान की हवाओं में एक अलग ही मस्ती सी छा जाती है। ऐसा लगता है जैसे पूरी की पूरी धरती ने भगवान शिव की भक्ति की चादर ओढ़ ली हो।
आप आज किसी भी हाईवे पर निकल जाइए, आपको सिर्फ और सिर्फ एक ही रंग दिखाई देगा- भगवा!
इस 2026 साल का भी ये भगवा पर्व अब शुरू हो चुका है। देश के कोने-कोने से लाखों-करोड़ों लोग कंधे पर सजी-धजी कांवर उठाए, डीजे और डमरू की ताल पर झूमते हुए चले आ रहे हैं।
लोग अक्सर पूछते हैं की भाई, इतनी भयंकर बारिश में, तपती धूप में, नंगे पैर ये लोग कैसे मीलों चल लेते हैं? इसका जवाब आपको किसी साइंस की किताब में नहीं मिलेगा।
इसका जवाब उस गूंज में है जो इन कांवरियों के सूखे गलों से निकलती है- ‘बम-बम भोले!’
जब इंसान का शरीर पूरी तरह जवाब दे देता है, तब उसके अंदर बैठी आस्था उसे धक्का मार-मार कर आगे ले जाती है।
चलिए, आज आपको इस रोंगटे खड़े कर देने वाले महा-पर्व की वो असली कहानी और ज़मीनी हकीकत बताते हैं, जो शायद आपने इस तरह से कभी महसूस नहीं की होगी।
सावन की झमाझम बारिश और भगवा रंग में रंगी सड़कें, 2026 की कांवर यात्रा में उमड़ा शिवभक्तों का सैलाब जिसे देखकर दुनिया है दंग
इस वक्त अगस्त 2026 का महीना चल रहा है और सावन अपनी पूरी चरम सीमा पर है। आप दिल्ली-मेरठ हाईवे चले जाइए, हरिद्वार के घाटों पर जाकर देखिए, या फिर बिहार और झारखंड के सुल्तानगंज से देवघर वाले रास्ते पर नज़र दौड़ाइए…
हर तरफ पैर रखने तक की जगह नहीं है। ऐसा लग रहा है जैसे आसमान से बारिश की बूंदें नहीं, बल्कि सीधे शिव की कृपा बरस रही हो।
हरिद्वार की हर की पौड़ी से गंगाजल भरकर जब ये लाखों शिवभक्त अपने-अपने शहरों और गांवों की तरफ मुड़ते हैं, तो वो नज़ारा सच में किसी जादू से कम नहीं होता।
सड़कों पर बड़े-बड़े डीजे-वीजे लगे हैं, शिवजी के एकदम कड़क और जोशीले भजन बज रहे हैं, और उन भजनों पर थिरकते हुए ये कांवरिये अपनी धुन में मगन होकर चले जा रहे हैं।
कोई अपनी बूढ़ी माँ को कंधे पर बैठाकर ला रहा है, तो कोई अपने छोटे से बच्चे को उंगली पकड़ाकर नंगे पैर चला आ रहा है।
आप ज़रा उस जज़्बे को इमेजिन करके देखिए! एक आदमी जो आम दिनों में शायद अपने घर से डेढ़ किलोमीटर दूर सब्ज़ी मंडी तक पैदल जाने में कतराता हो, वो इस सावन के महीने में डेढ़ सौ, दो सौ, यहाँ तक की पांच सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा कर रहा है!
और भाईसाहब, अब माहौल इसलिए भी गज़ब है क्योंकि अब सूबे के योगी बाबा खुद शिवभक्तों के स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए खड़े हैं।
आपको याद होगा, एक वो भी दौर था जब पिछली सरकारें कांवरियों को सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर लाठियां मारती थीं, डीजे बंद करवा देती थीं और हुड़दंगी बताकर जेल में डाल देती थीं।
लेकिन आज वक्त बदल चुका है। आज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद हेलीकॉप्टर में बैठकर इन कांवरियों के ऊपर आसमान से गुलाब के फूलों की बारिश करते हैं!
आसमान से बरसते ये फूल उन वामपंथियों और लिबरलों के मुंह पर सीधा तमाचा है जिन्हें इस यात्रा से भयंकर मिर्ची लगती है।
जब नीलकंठ का गला जल रहा था तब शुरू हुई थी ये परंपरा, जानिए कांवर उठाने के पीछे की वो असली पौराणिक कहानी
अब सवाल ये आता है की आखिर ये कांवर यात्रा शुरू कैसे हुई? कंधे पर पानी ढोकर पैदल चलने का ये सिलसिला कब और क्यों चालू हुआ?
इसकी कहानी किसी भी आम कहानी से बहुत अलग और एकदम रोंगटे खड़े कर देने वाली है।
बात तब की है जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन चल रहा था। सब लोग अमृत के लालच में मथनी चला रहे थे।
लेकिन अमृत से पहले उस मंथन से निकला एक भयंकर कालकूट विष (ज़हर)। वो विष इतना तेज़ और खतरनाक था की अगर वो धरती पर गिर जाता, तो पूरी की पूरी दुनिया, सारे इंसान, जानवर, पेड़-पौधे सब कुछ पल भर में जलकर राख हो जाते। देवता हों या दानव, सब अपनी जान बचाकर भागने लगे।
तब इस दुनिया को बचाने के लिए आगे आए हमारे देवों के देव, महादेव! शिवजी ने उस खौफनाक ज़हर को अपने हाथों में लिया और गट-गट करके पी गए।
लेकिन उन्होंने उस ज़हर को अपने पेट में नहीं जाने दिया, उसे अपने गले में ही रोक लिया।
ज़हर की उस भयंकर गर्मी और जलन से महादेव का गला एकदम नीला पड़ गया, और तभी से उनका नाम पड़ गया ‘नीलकंठ’।
ज़हर तो शिवजी ने पी लिया, लेकिन उसकी जलन इतनी खौफनाक थी की भोलेनाथ का पूरा शरीर तपने लगा।
उनकी उस भयंकर तपन और जलन को शांत करने के लिए ही सभी देवताओं ने पवित्र गंगा नदी का ठंडा जल लाकर उनके ऊपर चढ़ाना शुरू किया।
कहते हैं की रावण, जो भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था, उसने भी कांवर उठाकर शिवजी का जलाभिषेक किया था।
इसके अलावा भगवान परशुराम ने भी अपने आराध्य देव महादेव को शीतलता पहुँचाने के लिए कांवर उठाई थी और मीलों पैदल चलकर यूपी के बागपत में ‘पुरा महादेव’ में गंगाजल चढ़ाया था।
बस यार, वही जो प्यार और फिक्र उस वक्त देवताओं और भक्तों के मन में अपने भोलेनाथ के लिए थी ना, वही आज के इन कांवरियों के दिलों में है।
ये कांवरिये मीलों पैदल चलकर जो गंगाजल लाते हैं, वो सिर्फ एक रस्म नहीं है। ये शिवभक्त आज भी यही सोचकर जल चढ़ाते हैं की “मेरे भोले के गले में जलन हो रही होगी, मैं अपनी मेहनत और तपस्या से लाया हुआ ये ठंडा जल उनके गले पर चढ़ाऊंगा, तो उन्हें थोड़ा सुकून मिलेगा।”
पैरों में छाले और नसों को जला देने वाला दर्द, लेकिन मजाल है जो शिव के दीवानों के कदम एक पल के लिए भी रुक जाएं
दूर से देखने पर या टीवी पर खबर देखने पर बहुत से लोगों को लगता है की “अरे, ये तो बस लड़कों की एक टोली है जो सड़कों पर डीजे बजाते हुए पिकनिक मनाने निकल पड़ी है।”
लेकिन भाई, जो लोग ऐसा सोचते हैं ना, उन्हें एक बार सिर्फ 10 किलोमीटर नंगे पैर डामर की सड़क पर चल कर देखना चाहिए, सारी अकल ठिकाने आ जाएगी।
कांवर यात्रा कोई पिकनिक-विकनिक नहीं है। ये एक ऐसा खौफनाक और कठोर ‘तप’ है जिसे सहना हर किसी के बस की बात नहीं।
कांवर के नियम इतने कड़े होते हैं की सुनकर ही अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाएं।
इसका सबसे बड़ा नियम तो यही है की एक बार आपने हरिद्वार या किसी भी तीर्थ से गंगाजल से भरी कांवर अपने कंधे पर उठा ली, तो फिर आप उसे रास्ते में कहीं ज़मीन पर नहीं रख सकते।
अगर आपको आराम करना है, खाना खाना है, तो आपको अपनी कांवर किसी स्टैंड पर टांगनी होगी या किसी दूसरे कांवरिये को पकड़ानी होगी। ज़मीन से टच हुई, तो कांवर खंडित!
अब ज़रा उस शारीरिक टॉर्चर के बारे में सोचिए। सावन के महीने में मौसम सबसे बड़ा दुश्मन होता है। कभी अचानक से झमाझम बारिश शुरू हो जाती है और शरीर पूरी तरह भीग कर कांपने लगता है।
और अगले ही घंटे ऐसी चिलचिलाती धूप निकलती है की डामर की सड़क एकदम तवे की तरह उबलने लगती है। उसी उबलती हुई सड़क पर ये शिवभक्त नंगे पैर चलते हैं।
चलते-चलते पैरों के तलवों में बड़े-बड़े पानी भरे छाले पड़ जाते हैं। पैरों की नसें दर्द से ऐसी तन जाती हैं जैसे अभी फट पड़ेंगी।
कंधे पर रखी लकड़ी की कांवर का वजन लगातार एक ही जगह पर पड़ने से कंधे की चमड़ी तक छिल जाती है।
शरीर का पोर-पोर दर्द से चीखने लगता है, दिमाग कहता है की “बस कर भाई, अब और नहीं चला जाएगा, यहीं बैठ जा।”
लेकिन मजाल है जो शिव के इन दीवानों के कदम एक पल के लिए भी रुक जाएं!
जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाता है, तो ये लोग बस आसमान की तरफ देखते हैं और पूरी ताकत से चिल्लाते हैं- “हर हर महादेव!” या “बम-बम भोले!”
और कसम से यार, उस एक जयकारे में इतनी भयंकर एनर्जी होती है की वो सारा दर्द, सारी थकान बिल्कुल गायब हो जाती है।
ये कोई अंधविश्वास नहीं है, ये वो शुद्ध आस्था है जो इंसान के शरीर की हर लिमिट को पार कर जाती है।
डाक कांवरियों का वो खौफनाक तप जिसे देखकर हो जाते रोंगटे खड़े, बिना रुके मीलों तक दौड़ने का ये कैसा चमत्कार
आम कांवर में तो फिर भी आदमी रात को किसी पंडाल में रुक कर अपनी कमर सीधी कर लेता है या बैठ कर थोड़ा सुस्ता लेता है।
लेकिन भाई, अगर आपने कभी हाईवे पर ‘डाक कांवर’ (Dak Kanwar) वालों को दौड़ते हुए देखा है ना, तो कसम से आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
ये तपस्या का एकदम एक्सट्रीम (Extreme) लेवल है जिसे समझना आम इंसान के बस की बात नहीं।
डाक कांवर का नियम इतना तगड़ा है की गंगाजल एक सेकंड के लिए भी एक जगह रुकना नहीं चाहिए। ये लड़के किसी रिले रेस (Relay race) की तरह भागते हैं।
इनके पीछे-पीछे इनका ट्रक या डीजे चलता रहता है। एक लड़का पूरी जान लगाकर डामर की सड़क पर नंगे पैर दौड़ता है।
जब उसकी सांसें उखड़ने लगती हैं और फेफड़े जवाब देने लगते हैं, तो भागते-भागते ही दूसरा लड़का कांवर अपने कंधे पर शिफ्ट कर लेता है और आगे दौड़ पड़ता है।
200 से 300 किलोमीटर की ये ‘नॉन-स्टॉप’ दौड़ सच में किसी चमत्कार से कम नहीं है। विज्ञान और मेडिकल साइंस के सारे नियम यहाँ आकर फेल हो जाते हैं।
कोई प्रोफेशनल एथलीट भी नंगे पैर उबलती सड़क पर इतना नहीं दौड़ सकता। लेकिन शिव के ये दीवाने बिना रुके, बिना थके, बस अपनी मंज़िल की तरफ आंधी की तरह भागते रहते हैं।
ना कोई सेठ ना कोई मजदूर, सब बन जाते हैं सिर्फ ‘भोले’, कांवर यात्रा ने कैसे उखाड़ फेंका जात-पात और अमीरी-गरीबी का सारा घमंड
अक्सर बहुत से लोग और दिल्ली के कुछ ज्ञान बांटने वाले पत्रकार हिंदू समाज को जातियों और वर्गों में बांटने की कोशिश करते रहते हैं।
लेकिन अगर आपको हिंदू समाज का असली भाईचारा देखना है, तो सावन के महीने में ज़रा हाईवे पर आकर देखिए।
कांवर यात्रा ने कैसे जात-पात और अमीरी-गरीबी के पूरे सिस्टम को जड़ से उखाड़ फेंका है, ये देखकर किसी की भी आंखें खुल जाएंगी।
एक बार भगवा कपड़े पहनकर कांवर उठा ली, तो फिर कोई शर्मा जी, वर्मा जी, दलित या राजपूत नहीं रहता। सब के सब सिर्फ और सिर्फ ‘भोले’ बन जाते हैं।
करोड़ों का टर्नओवर चलाने वाला मर्सिडीज़ का मालिक और ईंट-गारा उठाने वाला एक दिहाड़ी मजदूर, दोनों एक ही रंग के कपड़े में, एक ही सड़क पर नंगे पैर चलते हैं।
आप पहचान ही नहीं सकते की इनमें से अमीर कौन है और गरीब कौन!
दोनों एक-दूसरे को ‘भोले’ कहकर बुलाते हैं। रात को जब भंडारे के टेंट में सोते हैं ना, तो कोई VIP ट्रीटमेंट नहीं होता।
वो करोड़पति सेठ भी उसी दरी पर ज़मीन पर लेटता है जिस पर वो गरीब मजदूर लेटा है। भोले के दरबार में सारा घमंड, सारी औकात और बैंक बैलेंस धरा का धरा रह जाता है।
यहाँ सब एक बराबर हैं। ये जो जात-पात को मिटाने वाला असली सनातनी जादू है ना, वो आपको दुनिया के किसी और धर्म या आयोजन में देखने को ही नहीं मिलेगा।
छालों पर दवा लगाते अनजान हाथ और सड़कों पर लंगर, कांवर यात्रा में दिखता है सनातनी प्रेम का वो असली रंग जो कहीं और नहीं मिलता
रास्ते भर जो नज़ारे दिखते हैं, वो इंसानियत और सेवा की सबसे बड़ी मिसाल हैं। जगह-जगह जो लंगर, टेंट और मेडिकल कैंप लगते हैं, वहां लोकल लोग अपना पैसा और समय लगाकर शिवभक्तों की सेवा में दिन-रात एक कर देते हैं।
सोचिए ज़रा, एक बिल्कुल अनजान आदमी, जिसका शायद उस कांवरिये से कोई खून का रिश्ता नहीं है, वो उसके पैरों के छालों पर दवा लगा रहा होता है।
कोई किसी के पैर दबा रहा है, किसी के कंधों की मालिश कर रहा है, तो कोई रात के दो बजे भी गरम-गरम पूड़ियां तलकर उन्हें अपने हाथों से खिला रहा है। ये सेवा भाव आपको किसी NGO में नहीं मिलेगा।
ये हमारे सनातन धर्म का वो असली रंग है, जो किताबों में नहीं बल्कि इन सड़कों पर बहता है। अपनापन ऐसा की जैसे कोई अपने सगे भाई की सेवा कर रहा हो।
जो लोग इन कांवरियों की सेवा करते हैं, उनका मानना होता है की शिवभक्त की सेवा कर ली, मतलब साक्षात महादेव की सेवा कर ली।
जय महाकाल! बम-बम भोले!
