जब रेगिस्तान में पढ़ा सूखा, तो पानी की जगह 40 हज़ार किलो ‘घी’ डाल कर रख दी मंदिर की नींव, भारत की वास्तुकला और धर्म के लिए समर्पण का जीता-जागता चमत्कार बीकानेर का ‘भंडासर जैन मंदिर’

आज मैं आपको भारत भूमि के एक ऐसे अजूबे के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिसकी कहानी सुनकर आप हैरान रह जायेंगे और अपनी संस्कृति पर आपको सौ गुना ज्यादा गर्व होने लगेगा!

हम बात कर रहे हैं बीकानेर में शान से खड़े ‘भंडासर जैन मंदिर’ (Bhandasar Jain Temple) की।

दोस्तों ये कोई मामूली ईंट-पत्थर का मंदिर नहीं है। जब पूरी दुनिया मिट्टी और पानी से इमारतें खड़ी कर रही थी, तब हमारे पूर्वजों ने इस भव्य तीन मंजिला मंदिर की नींव में पानी की एक बूंद तक नहीं डाली!

जी हाँ, बिल्कुल सही सुना आपने। इस मंदिर की नींव और पत्थरों को जोड़ने वाले मसाले में पानी की जगह पूरे 40,000 किलो शुद्ध देसी घी उड़ेल दिया गया था!

सोच कर ही दिमाग सुन्न हो जाता है ना? चलिए आज इस इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं की आखिर वो क्या वजह थी जिसने रेगिस्तान के बीचों-बीच घी की नदियां बहा दीं।

अंग्रेजों की इमारतों का गुणगान छोड़िए और देखिए हमारे भारत का वो अजूबा जिसकी नींव में पानी की एक बूंद भी नहीं डाली गई

अक्सर हम लोग इटली के ‘पीसा की झुकी मीनार’ (Leaning Tower of Pisa) को देखकर बड़ा दांतों तले उंगली दबाते हैं।

सच कहूं तो वो इंजीनियरिंग का फेलियर है, जो अपनी ही नींव पर सीधी खड़ी नहीं रह पाई! अगर असली और अचूक इंजीनियरिंग देखनी है, तो बीकानेर के इस भंडासर जैन मंदिर को आकर देखो।

मुगलों के बनाए मकबरों पर तो वामपंथी इतिहासकार सैकड़ों किताबें लिख मारते हैं, लेकिन इस मंदिर के चमत्कार को उन्होंने हमेशा दबा कर रखा।

कल्पना कीजिए उस दौर की, जब ना तो आज की तरह बड़ी-बड़ी क्रेनें थीं, ना सीमेंट था और ना ही 3D मैपिंग वाली कोई टेक्नोलॉजी।

उस दौर में लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) और संगमरमर को तराश कर इतनी गगनचुंबी और मजबूत इमारत खड़ी कर देना अपने आप में एक चमत्कार है।

लेकिन इस चमत्कार की सबसे बड़ी खूबी इसका ढांचा नहीं, बल्कि इसके ज़मीन के नीचे दबी वो नींव है, जो पानी या सीमेंट से नहीं, बल्कि शुद्ध देसी घी से सींची गई है।

आप किसी भी मॉडर्न इंजीनियर से पूछ कर देख लो की क्या घी और चूने को मिलाकर कोई इतनी मजबूत नींव बन सकती है जो 500 साल तक टस से मस न हो?

वो आपको पागल समझेगा! विज्ञान के सारे फॉर्मूले यहां आकर फेल हो जाते हैं। लेकिन जो काम विज्ञान नहीं कर पाता, वो हमारे देश में आस्था और धर्म के प्रति समर्पण कर दिखाता है।

इस मंदिर की नींव में पानी की जगह डाला गया वो 40 हज़ार किलो घी आज भी हमारी उस गौरवशाली वास्तुकला का सबूत है, जिसे कोई विदेशी आक्रांता या इतिहासकार मिटा नहीं पाया।

जब रेगिस्तान के भयंकर सूखे में पानी बन गया था सोना, तो सेठ भांडाशाह ने भगवान के लिए खोल दिए शुद्ध देसी घी के भंडार

अब सवाल ये उठता है की आखिर ऐसा क्या हो गया था की मंदिर की नींव में पानी की जगह घी डालना पड़ गया? इसके पीछे का इतिहास इतना इमोशनल और त्याग से भरा है की सुनकर किसी की भी आँखें भर आएं।

इस मंदिर के निर्माण की शुरुआत 15वीं सदी में यानी 1468 ईस्वी में हुई थी। बीकानेर में एक बहुत ही रईस और धर्मपरायण जैन व्यापारी हुआ करते थे, जिनका नाम था ‘सेठ भांडाशाह ओसवाल’।

वो जितने बड़े करोड़पति थे, उतने ही ज़मीन से जुड़े हुए इंसान। धर्म-कर्म और भगवान के प्रति उनकी आस्था का कोई ठिकाना नहीं था।

उन्होंने ही जैन धर्म के 5वें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ (Lord Sumatinatha) के लिए एक भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प लिया था।

काम ज़ोर-शोर से शुरू हुआ। पत्थरों की कटाई होने लगी, नींव खोदी जाने लगी। लेकिन तभी कुदरत ने एक भयंकर इम्तिहान ले लिया।

उस दौर में बीकानेर और आस-पास के पूरे मारवाड़ इलाके में एक खौफनाक अकाल (सूखा) पड़ गया। यार, रेगिस्तान में सूखा पड़ने का मतलब समझते हो आप?

मीलों-मीलों दूर तक पीने के लिए एक बूंद पानी नहीं मिलता। इंसानों से लेकर जानवरों तक के हलक सूख गए थे। पानी की कीमत सचमुच सोने-चांदी से भी ज़्यादा हो गई थी।

ऐसे में मंदिर के कारीगरों और मज़दूरों ने सेठ भांडाशाह के सामने हाथ जोड़ लिए। बोले की “सेठ जी, पीने के लिए तो पानी है नहीं, तो फिर चूने और गारे (मसाले) में मिलाने के लिए पानी कहाँ से लाएं? काम रोकना पड़ेगा।”

कोई और आम इंसान होता तो शायद हालात से समझौता कर लेता और कहता की चलो यार, जब बारिश होगी तब मंदिर-वंदिर बनवा लेंगे।

लेकिन सेठ भांडाशाह किसी और ही मिट्टी के बने थे! उनका भगवान के प्रति जो समर्पण था, वो किसी सूखे या अकाल से डरने वाला नहीं था।

उन्होंने वो फैसला लिया जिसे सुनकर उस ज़माने में बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के भी होश उड़ गए। सेठ जी ने फरमान जारी कर दिया की-

“मेरे भगवान के मंदिर का काम एक दिन के लिए भी नहीं रुकेगा। अगर पानी नहीं है, तो क्या हुआ? नींव भरने और गारे में पानी की जगह मेरे खजाने से शुद्ध देसी घी निकालो और उसे मिलाओ!”

एक बूंद घी चाटने पर मिले ताने ने खड़ा कर दिया भारत का सबसे बड़ा चमत्कार, और सेठ ने अपना सारा खजाना भगवान के चरणों में कर दिया न्योछावर

वैसे, देसी घी के इस्तेमाल के पीछे बीकानेर में एक बहुत ही मशहूर और दिल छू लेने वाली लोककथा भी गूंजती है। कहते हैं की सेठ भांडाशाह ओसवाल के पास अथाह दौलत थी, लेकिन वो अन्न और ईश्वर के प्रसाद का एक कण भी बर्बाद नहीं होने देते थे।

कहानी कुछ यूँ है की एक दिन जब मंदिर का काम चल रहा था, तब सेठ जी वहां मुआयना करने पहुंचे। वहां किसी बर्तन से शुद्ध घी की एक बूंद ज़मीन पर गिर गई।

सेठ जी ने बिना किसी की परवाह किए उस मिट्टी में गिरी घी की बूंद को अपनी उंगली से उठाया और चाट लिया, ताकि अन्न और भगवान की दी हुई इस चीज़ का अपमान न हो।

अब वहां पास में ही खड़ा एक कारीगर ये सब देख रहा था। उसे लगा की इतना बड़ा करोड़पति सेठ है और एक बूंद घी के लिए ऐसी हरकत कर रहा है!

उसने तंज़ कसते हुए सेठ जी को ताना मार दिया की “क्या सेठ जी! इतने बड़े आदमी हो, लाखों का कारोबार है, और एक बूंद घी के लिए इतनी कंजूसी और लालच? ऐसे कैसे बनेगा इतना बड़ा मंदिर?”

दोस्त, ये ताना सीधा सेठ जी के दिल पर जाकर लगा। लेकिन उन्होंने उस कारीगर पर कोई गुस्सा नहीं किया, उसे नौकरी से नहीं निकाला।

उन्होंने बस ये ठान लिया की आज इस दुनिया को ये दिखाना ही पड़ेगा की मैं कंजूस नहीं हूँ, बल्कि मेरा लालच सिर्फ मेरे भगवान के चरणों की धूल पाने का है।

सेठ जी ने उसी वक़्त अपना पूरा खजाना खोल दिया। उन्होंने साबित कर दिया की वो धर्म के लिए अपनी जान और अपनी पाई-पाई तक लुटा सकते हैं।

उन्होंने शहर भर का घी खरीद लिया और देखते ही देखते 40,000 किलो शुद्ध देसी घी मंदिर की उस गहरी नींव में उड़ेल दिया गया। उस कारीगर का सिर भी शर्म और सेठ जी की भक्ति देखकर झुक गया।

500 साल बाद आज भी 50 डिग्री की गर्मी में फर्श और दीवारों से रिसता है घी, जिसकी महक से विदेशी वैज्ञानिकों के भी उड़ जाते हैं होश

अब आप सोच रहे होंगे की चलो यार, इतिहास में कभी किसी ने घी डाल भी दिया होगा, तो आज 500 साल बाद उसका क्या? मिट्टी ने सोख लिया होगा!

बस यहीं आकर तो दुनिया का बड़े से बड़ा विज्ञान हमारे सनातन और जैन धर्म के आगे घुटने टेक देता है।

आज 2026 आ चुका है, पीढ़ियां की पीढ़ियां गुज़र गईं, मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के राज खत्म हो गए, लेकिन उस धर्मनिष्ठ सेठ भांडाशाह का वो 40 हज़ार किलो देसी घी आज भी ज़िंदा है!

ज़रा आज के समय का चमत्कार सुनिए। जब मई-जून के महीने में बीकानेर में भयंकर झुलसा देने वाली गर्मी पड़ती है और पारा 45 से 50 डिग्री के बीच पहुंच जाता है, तब इस मंदिर के फर्श और लाल पत्थरों की दीवारों से सचमुच घी रिसने लगता है!

जी हाँ, 5 सदियों से ज़मीन के नीचे दबा वो शुद्ध देसी घी गर्मी पाकर आज भी बाहर आने लगता है।

गर्मियों के दिनों में आप इस मंदिर में जाएं, तो फर्श इतना चिकना हो जाता है की पुजारियों और श्रद्धालुओं को फिसलने से बचने के लिए बहुत संभल-संभल कर चलना पड़ता है।

मंदिर के गर्भगृह में कदम रखते ही आपको किसी परफ्यूम या अगरबत्ती की नहीं, बल्कि शुद्ध देसी घी की सोंधी महक आएगी।

गोरे लोग अपने महंगे-महंगे कैमरे और टेस्टिंग किट लेकर यहाँ आते हैं, दीवारों का मुआयना करते हैं, सैंपल लेते हैं, लेकिन आज तक कोई भी साइंस ये डिकोड नहीं कर पाया की आख़िर 5 सदियों बाद भी पत्थरों के बीच से वो घी वापस रिस कर बाहर कैसे आ रहा है!

सोने की नक्काशी, उस्ता कला, और लाल पत्थर से बना भगवान सुमतिनाथ का ये भव्य दरबार दुनिया की किसी भी इमारत पर भारी है

सेठ भांडाशाह तो अपना सारा खजाना लुटाकर इस दुनिया से चले गए, लेकिन 1514 ईस्वी में उनकी बेटी ने इस भव्य मंदिर का निर्माण पूरा करवाया।

यह मंदिर जैन धर्म के 5वें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का दरबार है। और भाईसाहब, इस मंदिर की कारीगरी के आगे दुनिया का हर महल और हर मकबरा आपको एकदम फीका लगने लगेगा।

अगर आप इसके आर्किटेक्चर को करीब से देखें, तो ये तीन मंजिला इमारत लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) और सफ़ेद संगमरमर का एक ऐसा बेजोड़ संगम है जिसे देखकर आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।

मंदिर के अंदर की दीवारों और खंभों पर जो नक्काशी की गई है, उसे बीकानेर की मशहूर ‘उस्ता कला’ (Usta Art) कहा जाता है।

कारीगरों ने 24 कैरेट असली सोने की पत्तियों (Gold leaf paintings) से भगवान की लीलाओं और जैन तीर्थंकरों की कहानियों को उकेरा है। रंग आज भी इतने ताज़े लगते हैं जैसे कल ही किसी ने ब्रश चलाया हो।

और शीशे (Mirror work) का वो बारीक काम… यार क्या गज़ब की कलाकारी है! जब मंदिर के गर्भगृह में दीपक जलाया जाता है, तो उसकी एक लौ हज़ारों शीशों से टकराकर पूरे दरबार को ऐसे जगमगा देती है की लगता है साक्षात देवता स्वर्ग से उतर आए हों।

आप मंदिर की तीसरी मंज़िल यानी उसके शिखर पर चले जाइए, वहां से पूरे बीकानेर शहर का जो नज़ारा दिखता है, वो आपकी आत्मा को एक अजीब सा सुकून दे जाएगा।

आज ये मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित एक राष्ट्रीय स्मारक है, लेकिन दुख इस बात का है की हमारे ही देश के करोड़ों लोग इसके वजूद तक से अनजान हैं।

मेरी तो बस एक ही गुज़ारिश है। छुट्टियों में अपने बच्चों को Disneyland या यूरोप ले जाने के बजाय, कभी उन्हें अपने राजस्थान के बीकानेर ले जाइए।

उन्हें वो दीवारों से रिसता हुआ घी दिखाइए ताकि उन्हें पता चले की हमारी वास्तुकला के आगे दुनिया का हर विज्ञान बच्चा है।

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