पहाड़ कभी किसी को आसानी से नहीं अपनाते। वे सिर्फ उन लोगों को याद रखते हैं जो अपनी सीमाओं को बार-बार तोड़ते हैं।
30 जुलाई 2026 को पाकिस्तान के ब्रॉड पीक पर एक हिमस्खलन ने दस पर्वतारोहियों को अपनी चपेट में ले लिया। उनमें से एक थे निर्मल पुरजा। दुनिया जिन्हें निम्सदाई के नाम से जानती थी।
वे उस दिन ब्रॉड पीक पर इसलिए थे क्योंकि उन्होंने आखिरी पल में अपनी योजना बदल दी थी। वे बिना ऑक्सीजन के सभी चौदह आठ हजार मीटर की चोटियां दूसरी बार चढ़ने के करीब पहुंच चुके थे। सिर्फ एक चोटी बाकी थी।
एक छोटा सा फैसला और पहाड़ ने अपना फैसला सुना दिया।
सवाल यह है कि म्याग्दी के एक छोटे मगर गांव का लड़का कैसे इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचा? उसकी कहानी सिर्फ चोटियों की नहीं है। वह कहानी अनुशासन, लगन और असम्भव को सम्भव बनाने की है।
पहाड़ की जड़ें – बचपन और परिवार
निर्मल पुरजा का जन्म 25 जुलाई 1983 को नेपाल के म्याग्दी जिले के छोटे से गांव दाना में हुआ। यह गांव करीब 1600 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। धौलागिरी की विशाल चोटी उसके ठीक ऊपर छाया की तरह खड़ी रहती है। परिवार मगर समुदाय से था। मगर लोग नेपाल की पहाड़ियों में लंबे समय से रहते आए हैं। वे साहसी और मेहनती माने जाते हैं।
उनके पिता नंदा बहादुर पुरजा गोरखा सैनिक रह चुके थे। मां पूर्णा कुमारी खेती-बाड़ी वाले परिवार से थीं। दोनों अलग-अलग जाति से थे। उस समय नेपाल में अंतरजातीय विवाह आसान नहीं था। परिवार को सामाजिक दबाव और आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रिश्तेदारों ने दूरी बना ली। पैसे की तंगी हमेशा बनी रही।
जब निर्मल करीब चार साल के थे तब परिवार दाना छोड़कर चितवन के मैदानी इलाके में आ गया। मकसद साफ था। बच्चों को अच्छी पढ़ाई मिल सके। दाना से सड़क तक पैदल कई दिन का सफर था। चितवन में जीवन थोड़ा आसान लगा लेकिन गरीबी पूरी तरह नहीं गई।
घर छोटा था। ऊपरी मंजिल पर मुर्गियां रहती थीं। नीचे परिवार सोता था। रात को मुर्गियों की आवाज और दिन में खेतों का काम आम बात थी। निर्मल बाद में याद करते हुए कहते थे कि बचपन में वे नंगे पैर ही घूमते थे। जूते खरीदने के पैसे नहीं होते थे। यही आदत बाद में उनकी सहनशक्ति का आधार बनी।
तीन बड़े भाई पिता के रास्ते पर चले। वे ब्रिटिश आर्मी की गोरखा ब्रिगेड में भर्ती हो गए। उनकी भेजी हुई तनख्वाह से घर चलता था। इन्हीं पैसों से निर्मल की पढ़ाई हुई। वे भरतपुर के स्मॉल हेवन स्कूल में पढ़े। स्कूल में वे किक-बॉक्सिंग सीखने लगे। शरीर मजबूत बनाने का शौक बचपन से ही था।

लड़केपन में ही उनमें असामान्य लगन दिखी। नौवीं कक्षा में वे सुबह तीन बजे उठ जाते। तीस किलोमीटर दौड़ लगाते। फिर लौटकर बिस्तर में ऐसे लेट जाते जैसे सोए हुए हों। कोई नहीं जानता था कि वे इतनी मेहनत कर रहे हैं। वे कहते थे कि उस उम्र में ही उन्हें लगने लगा था कि वे दूसरों से अलग हैं। उनमें कुछ बड़ा करने की भूख थी।
गोरखा परंपरा परिवार की रगों में बसी हुई थी। पिता और भाइयों की वर्दी देखकर निर्मल के मन में भी वही सपना जगा। गांव के कई युवा गोरखा बनने का सपना देखते थे। यह सिर्फ नौकरी नहीं थी। यह सम्मान और दुनिया देखने का रास्ता था। निर्मल ने भी वही रास्ता चुना।
दाना की पहाड़ियां और चितवन के मैदान दोनों ने मिलकर उन्हें आकार दिया। एक तरफ कठोर पहाड़ी जीवन था। दूसरी तरफ मैदान की भागदौड़। दोनों जगहों ने उन्हें सिखाया कि मुश्किल हालात में भी आगे बढ़ना पड़ता है। परिवार की सादगी ने उन्हें जमीन से जोड़े रखा। गोरखा परंपरा ने उनमें अनुशासन और साहस भरा।
इन्हीं जड़ों से निकला वह लड़का जो बाद में दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर खड़ा हुआ। दाना का वह छोटा घर और मुर्गियों वाली मंजिल आज भी उनकी कहानी की शुरुआत है। पहाड़ ने उन्हें जन्म दिया। परिवार ने उन्हें मजबूती दी। और उसी मजबूती ने उन्हें इतिहास में जगह दिलाई।
पहाड़ चुप रहते हैं। वे न तो तालियां बजाते हैं और न ही शोक मनाते हैं। वे सिर्फ खड़े रहते हैं।
निर्मल पुरजा ने सिर्फ रिकॉर्ड नहीं तोड़े। उन्होंने नेपाली पर्वतारोहियों को दुनिया के सामने एक नई पहचान दी। उन्होंने दिखाया कि सही टीम, सही दिमाग और सही हिम्मत के साथ इंसान अपनी सीमाओं से बहुत आगे जा सकता है।
उनकी आखिरी चढ़ाई ब्रॉड पीक पर खत्म हुई। लेकिन उनकी कहानी वहां खत्म नहीं होती।
आज भी जब कोई युवा पर्वतारोही ऊंची चोटी देखता है और मन में सोचता है कि शायद यह सम्भव हो, तो कहीं न कहीं निम्सदाई की भावना उसमें जिंदा रहती है।
पहाड़ हमेशा रहेंगे। और जो लोग उनकी चुनौती स्वीकार करते हैं, उनकी कहानियां भी लंबे समय तक याद की जाएंगी।
सैनिक वर्ष – गोरखा से स्पेशल बोट सर्विस तक
2003 में अठारह साल की उम्र में निर्मल पुरजा ब्रिटिश आर्मी की ब्रिगेड ऑफ गोरखाज में शामिल हुए। यह उनके लिए सिर्फ नौकरी नहीं थी। यह परिवार की परंपरा थी और एक सपना था। पिता और तीन बड़े भाई पहले से गोरखा में सेवा कर चुके थे। निर्मल ने उसी रास्ते को चुना।
उन्होंने कैटरिक में बेसिक ट्रेनिंग पूरी की। ट्रेनिंग कठोर थी। शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से थका देने वाली। निर्मल ने अच्छा प्रदर्शन किया। वे अपनी बटालियन में आगे बढ़े और क्वीन्स गोरखा इंजीनियर्स के साथ जुड़े। गोरखा रेजिमेंट की पहचान अनुशासन, साहस और कठिन परिस्थितियों में काम करने की क्षमता से होती है। निर्मल ने इन गुणों को और मजबूत किया।
कुछ साल बाद वे और ऊंची चुनौती की ओर बढ़े। 2009 में उन्होंने स्पेशल बोट सर्विस यानी एसबीएस की चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया। एसबीएस रॉयल नेवी की सबसे एलीट स्पेशल फोर्स यूनिट है। चयन बेहद कठोर होता है। ज्यादातर उम्मीदवार बीच में ही हार मान लेते हैं।

निर्मल पास हो गए। वे एसबीएस में चुने जाने वाले पहले गोरखा बने। यह उपलब्धि उनकी मेहनत और लगन का सबूत थी।
एसबीएस में वे ठंडे मौसम की लड़ाई के विशेषज्ञ बने। उन्होंने बर्फीले इलाकों में काम करना सीखा। शरीर को कम तापमान में कैसे सक्रिय रखा जाए, कैसे सांस ली जाए और कैसे फैसले लिए जाएं – ये सब उन्होंने व्यावहारिक रूप से सीखा। ये कौशल बाद में हिमालय की ऊंचाइयों पर बहुत काम आए।
सेना में उन्होंने दुनिया के कई खतरनाक इलाकों में ऑपरेशन किए। अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों में भी उनकी तैनाती रही। वे दरवाजे तोड़कर घुसने वाले अभियानों में शामिल रहे। दुश्मनों को पकड़ने और बम बनाने वालों को रोकने वाले मिशनों में हिस्सा लिया। साथी उन्हें तीव्र एकाग्रता वाला और शारीरिक रूप से बहुत मजबूत व्यक्ति याद करते हैं। वे दबाव में भी शांत रहते और टीम को आगे बढ़ाते।
कुल सोलह साल उन्होंने ब्रिटिश सेना में सेवा दी। इनमें से करीब छह साल गोरखा में और बाकी एसबीएस में बीते। सेना ने उन्हें सिखाया कि थकान और ठंड में भी काम कैसे किया जाता है। लॉजिस्टिक्स को दबाव में कैसे संभाला जाता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात – खुद पर भरोसा कैसे रखा जाता है।
2018 में उन्होंने सेना छोड़ने का फैसला किया। वे अभी पूरे पेंशन के हकदार नहीं बने थे। कई दोस्तों को यह फैसला जोखिम भरा लगा। लेकिन निर्मल का मन पहाड़ों की ओर खिंच चुका था।
उन्होंने हैम्पशायर में अपना घर गिरवी रखा। पैसा जुटाया और पूरी तरह पर्वतारोहण की ओर मुड़ गए।
सेना के ये साल सिर्फ नौकरी नहीं थे। ये उनकी व्यक्तित्व की नींव बने। गोरखा की अनुशासन वाली जिंदगी ने उन्हें मजबूत बनाया। एसबीएस की कठोर ट्रेनिंग ने उन्हें चरम परिस्थितियों में जीवित रहने का हुनर दिया। इन्हीं अनुभवों ने बाद में उन्हें डेथ जोन में काम करने लायक बनाया। पहाड़ पर जब ऑक्सीजन कम हो जाती और ठंड हड्डियों तक पहुंच जाती तब सेना की यादें ही उनका सहारा बनतीं।
डेथ जोन में पहले कदम
निर्मल पुरजा की पहाड़ों से मुलाकात देर से हुई। वे पहले से ही गोरखा और एसबीएस में कठिन जिंदगी जी रहे थे। लेकिन ऊंची चोटियों का खिंचाव अभी नहीं आया था।
2012 में छुट्टी के दौरान उन्होंने एवरेस्ट बेस कैंप की ट्रेक पर जाने का फैसला किया। वजह दिलचस्प थी। जब लोग सुनते थे कि वे नेपाल से हैं तो अक्सर पूछते थे कि एवरेस्ट देखा है या नहीं। निर्मल को हर बार नहीं कहना पड़ता था। यह बात उन्हें चुभती थी। इसलिए उन्होंने खुद को साबित करने के लिए बेस कैंप जाने का मन बना लिया।
ट्रेक के दौरान उन्होंने अमा दबलम जैसी खूबसूरत चोटी देखी। मन में सवाल उठा कि इसकी चोटी पर खड़े होने का अहसास कैसा होगा। उन्होंने गाइड को मनाया और पास की लोबुचे ईस्ट चढ़ने का मौका लिया। लगभग बिना किसी पिछले अनुभव के वे उस चोटी पर पहुंच गए। यह उनका पहला बड़ा कदम था।
इसके बाद रुचि और बढ़ी। 2014 में उन्होंने धौलागिरी चढ़ी। यह उनकी पहली आठ हजार मीटर की चोटी थी। सिर्फ पंद्रह दिनों के सफर में उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की। पहाड़ ने उन्हें अपनाया। शरीर और दिमाग दोनों ने ऊंचाई के दबाव को सहन किया।
13 मई 2016 को वे पहली बार एवरेस्ट की चोटी पर खड़े हुए। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पल था। एसबीएस की ट्रेनिंग और गोरखा की मेहनत अब डेथ जोन में काम आ रही थी। ऑक्सीजन कम होने पर भी वे शांत रहते और आगे बढ़ते।
2017 में उन्होंने एक खास अभियान का नेतृत्व किया। ब्रिटिश आर्मी में गोरखा सेवा के दो सौ साल पूरे होने पर तेरह गोरखा सैनिकों के साथ एवरेस्ट चढ़े। यह सिर्फ चढ़ाई नहीं थी। यह अपनी रेजिमेंट के सम्मान का प्रतीक था। टीम ने सफलतापूर्वक चोटी छुई।
2018 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का सदस्य बनाया। उच्च ऊंचाई वाले पर्वतारोहण में उनकी सेवाओं के लिए यह सम्मान मिला। तब तक उनके मन में एक बड़ा सपना आकार ले चुका था। सभी चौदह आठ हजार मीटर की चोटियां एक साथ चढ़ने का विचार।
ये शुरुआती साल सिर्फ चढ़ाई के नहीं थे। ये सीखने के साल थे। लोबुचे ईस्ट से धौलागिरी और फिर एवरेस्ट तक का सफर ने उन्हें सिखाया कि पहाड़ सिर्फ ताकत नहीं मांगते। वे धैर्य, फैसला और खुद पर भरोसा मांगते हैं। सेना की कठोर जिंदगी ने आधार दिया। पहाड़ों ने उसे और मजबूत किया।
डेथ जोन में पहला कदम रखना आसान नहीं होता। लेकिन निर्मल ने इसे स्वाभाविक तरीके से लिया। वे कहते थे कि जब शरीर थक जाता है तब दिमाग काम करता है। और उनका दिमाग हमेशा आगे बढ़ने को तैयार रहता था। इन्हीं छोटे-छोटे कदमों ने बाद में इतिहास रचने का रास्ता खोला।
प्रोजेक्ट पॉसिबल – छह महीने जिन्होंने दुनिया को चौंका दिया
2019 के वसंत में पुरजा ने प्रोजेक्ट पॉसिबल शुरू किया। लक्ष्य सरल और लगभग अविश्वसनीय था – सात महीनों में सभी चौदह 8000 मीटर से ऊंची चोटियां चढ़ना। उन्होंने 23 अप्रैल को अन्नपूर्णा से शुरुआत की। 24 मई तक उन्होंने नेपाल में छह चोटियां पूरी कर लीं – अन्नपूर्णा, धौलागिरी, कंचनजंगा, एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू। आखिरी तीन चोटियां अड़तालीस घंटे से भी कम समय में आईं।
उस दौरान एवरेस्ट की चोटी के पास ट्रैफिक जाम की प्रसिद्ध तस्वीर दुनिया भर में घूमी। पर्वतारोही फिक्स्ड रस्सियों पर लंबी कतार में खड़े थे। पुरजा ने बाद में कहा कि इस तस्वीर को गलत समझा गया। मौसम की खिड़कियां छोटी होती हैं। जब हालात अनुकूल होते हैं तो हर कोई चोटी पर पहुंचना चाहता है।
जुलाई में पाकिस्तान का चरण आया। उन्होंने नंगा पर्वत, गाशेरब्रम प्रथम, गाशेरब्रम द्वितीय, के2 और ब्रॉड पीक तेजी से चढ़ीं। फिर सितंबर में चो ओयू और मनास्लु आईं। आखिरी चोटी तिब्बत की शीशापंगमा के लिए सामान्य सीजन खत्म होने के बाद चीनी अनुमति चाहिए थी। 29 अक्टूबर 2019 को वे चोटी पर पहुंचे। पूरा प्रोजेक्ट छह महीने और छह दिनों में पूरा हो गया।
उन्होंने पूरक ऑक्सीजन और कुछ पहाड़ों के बीच हेलीकॉप्टर ट्रांसफर का इस्तेमाल किया। मजबूत शेरपा टीमों ने रस्सियां लगाईं और कैंप बनाए। आलोचकों ने इस शैली को औद्योगिक कहा। समर्थकों ने इशारा किया कि किसी ने इतनी तेजी से दुनिया की इतनी ऊंची चोटियों को पार नहीं किया था। रिकॉर्ड टूटे। मानव शरीर कितना सहन कर सकता है इसकी धारणा बदल गई।
के2 की सर्दी और बिना ऑक्सीजन की चुनौती
दो साल बाद पुरजा ने एक और अध्याय लिखा। 16 जनवरी 2021 को दस नेपाली पर्वतारोहियों की टीम सर्दियों में के2 की चोटी पर पहुंची। यह पहाड़ की पहली शीतकालीन चढ़ाई थी और चौदह 8000 मीटर की चोटियों में से आखिरी जो अभी तक ठंडे मौसम में नहीं चढ़ी गई थी। अलग-अलग टीमों के पर्वतारोही एक साथ जुटे। वे चोटी से थोड़ा नीचे रुके ताकि नेपाली राष्ट्रगान गाते हुए अंतिम कदम एक साथ उठा सकें।
पुरजा ने यह चढ़ाई बिना पूरक ऑक्सीजन के पूरी की। उपलब्धि पूरे समूह की थी लेकिन नेपाल के लिए इसका खास वजन था। दशकों तक शेरपा और अन्य नेपाली पर्वतारोही दूसरों के अभियानों में जरूरी सहयोगी रहे थे। अब उन्होंने पर्वतारोहण के आखिरी बड़े पुरस्कारों में से एक खुद के लिए हासिल किया।
इसके बाद के वर्षों में पुरजा बिना ऑक्सीजन की चुनौती को आगे बढ़ाते रहे। उन्होंने सभी चौदह चोटियां बिना बोतलबंद ऑक्सीजन के पूरी कीं और 8000 मीटर की चोटियों की असाधारण संख्या जमा की। एलीट एक्सपेड के जरिए वे व्यावसायिक अभियानों का नेतृत्व करते रहे और साथ ही व्यक्तिगत लक्ष्य भी साधते रहे। पहाड़ उनके लिए कार्यस्थल भी रहे और परीक्षा का मैदान भी।
चोटियों से परे – मीडिया, व्यवसाय और परोपकार
2019 के प्रोजेक्ट ने पुरजा को वैश्विक चेहरा बना दिया। नेटफ्लिक्स ने डॉक्यूमेंट्री 14 पीक्स: नथिंग इज इम्पॉसिबल रिलीज की। उनकी किताब बियॉन्ड पॉसिबल ने कहानी उनके शब्दों में बताई। वे मांग में आने वाले वक्ता बने और नेपाली पर्वतारोहियों की नई पीढ़ी के सार्वजनिक चेहरे बन गए।
उन्होंने निम्सदाई फाउंडेशन की स्थापना की ताकि नेपाल के पहाड़ी समुदायों की मदद हो सके। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और पहाड़ के युवाओं के लिए अवसर उनके लिए मायने रखते थे। वे अक्सर उन जगहों को वापस देने की बात करते थे जिन्होंने उन्हें आकार दिया। एलीट एक्सपेड एक सम्मानित ऑपरेटर बन गई जिसमें कई नेपाली गाइड और स्टाफ काम करते थे।
हैम्पशायर में वे अपनी पत्नी सुचि और 2022 में जन्मी बेटी हिमानी के साथ रहते थे। दोस्त उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करते हैं जो पहाड़ पर तीव्र एकाग्रता से अंग्रेजी देहात में शांत पारिवारिक जीवन में आसानी से बदल सकते थे। यह अंतर चौंकाने वाला था। एक दिन वे 8000 मीटर पर हवा और ठंड से लड़ रहे होते। अगले दिन वे पिता के रूप में इंग्लिश देहात में घूम रहे होते।
निजी जीवन और विवाद
सफलता के साथ जांच भी आई। कुछ पारंपरिक पर्वतारोहियों ने प्रोजेक्ट पॉसिबल की रफ्तार और भारी सहयोग के इस्तेमाल की आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि सच्ची अल्पाइन शैली में ज्यादा आत्मनिर्भरता और फिक्स्ड रस्सियों, ऑक्सीजन व हेलीकॉप्टर पर कम निर्भरता होनी चाहिए। पुरजा का जवाब था कि पहाड़ सबके हैं और नई विधियां सिर्फ मानव क्षमता को और ज्यादा उजागर करती हैं।
2024 में और गंभीर आरोप सामने आए। दो महिलाओं – फिनिश पर्वतारोही लोटा हींतसा और अमेरिकी चिकित्सक एप्रिल लियोनार्डो – ने बैठकों और अभियानों के दौरान अवांछित यौन अग्रिमों का वर्णन किया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनके बयान रिपोर्ट किए। पुरजा ने अपने वकीलों के जरिए आरोपों से पूरी तरह इनकार किया। उन्होंने इन्हें झूठा और मानहानिकारक बताया और कानूनी कार्रवाई की बात कही। आरोप विवादित बने रहे। उन्होंने उनकी सार्वजनिक छवि पर छाया डाली जबकि वे चढ़ाई और नेतृत्व जारी रखते रहे।
वे एक जटिल व्यक्ति थे – प्रेरित, आकर्षक, कभी-कभी ध्रुवीकरण पैदा करने वाले। उनके साथ चढ़ने वाले अक्सर तीव्र वफादारी और असाधारण ऊर्जा की बात करते थे। कुछ को वह तीव्रता कठिन लगती थी। निजी व्यक्ति की पूरी तस्वीर सार्वजनिक उपलब्धियों के पीछे आंशिक रूप से छिपी रही।
हाई एल्टीट्यूड बीमारियों का उपचार
ऊंचाई पर होने वाली बीमारियां मुख्य रूप से तीन तरह की होती हैं। एक्यूट माउंटेन सिकनेस (AMS), हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा (HAPE) और हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा (HACE)। इनका सबसे जरूरी और प्रभावी इलाज एक ही है – तुरंत नीचे उतरना।
एक्यूट माउंटेन सिकनेस (AMS)
यह सबसे आम बीमारी है। सिरदर्द, उल्टी, थकान और नींद न आने जैसे लक्षण दिखते हैं। हल्के लक्षणों में आराम करना, ज्यादा पानी पीना और ऊंचाई न बढ़ाना काफी होता है। डॉक्टर अक्सर एसिटाजोलामाइड (डायमॉक्स) की सलाह देते हैं। यह दवा शरीर को ऊंचाई के हिसाब से ढलने में मदद करती है। लक्षण बढ़ें तो तुरंत नीचे उतरना जरूरी है।
हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा (HAPE)
इसमें फेफड़ों में पानी भर जाता है। सांस फूलना, खांसी और कमजोरी मुख्य लक्षण हैं। यह जानलेवा हो सकती है। इलाज में सबसे पहले नीचे उतरना आता है। पूरक ऑक्सीजन देना बहुत जरूरी है। कुछ मामलों में निफेडिपिन जैसी दवा का इस्तेमाल होता है जो फेफड़ों के दबाव को कम करती है। पोर्टेबल हाइपरबैरिक बैग भी मदद कर सकता है अगर तुरंत उतरना संभव न हो।
हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा (HACE)
यह दिमाग में सूजन की बीमारी है। व्यक्ति का संतुलन बिगड़ जाता है। वह ठीक से चल नहीं पाता। उलझन और बेहोशी तक हो सकती है। यह सबसे खतरनाक स्थिति है। इलाज में तुरंत नीचे उतरना और ऑक्सीजन देना सबसे महत्वपूर्ण है। डेक्सामेथासोन नाम की स्टेरॉयड दवा सूजन कम करने में मदद करती है। देरी होने पर जान जा सकती है।
सामान्य उपाय
ऊंचाई पर हमेशा धीरे-धीरे चढ़ना चाहिए। शरीर को ढलने का समय देना जरूरी है। खूब पानी पिएं। शराब और ज्यादा मेहनत से बचें। लक्षण दिखते ही ऊंचाई न बढ़ाएं। अगर हालत बिगड़े तो बिना देर किए नीचे आएं।
पर्वतारोही अक्सर अपने साथ ऑक्सीजन सिलेंडर, जरूरी दवाएं और अनुभव वाले गाइड रखते हैं। लेकिन कोई भी दवा नीचे उतरने का विकल्प नहीं बन सकती। डेथ जोन में समय बहुत कीमती होता है। सही फैसला और तेज कार्रवाई ही जिंदगी बचाती है।
याद रखें कि यह जानकारी सामान्य है। ऊंचाई पर कोई भी लक्षण दिखें तो तुरंत अनुभवी व्यक्ति या डॉक्टर की सलाह लें। स्वयं दवा शुरू करने से पहले समझदारी से काम लें।
ऊंचाई रोग की रोकथाम के उपाय
ऊंचाई रोग से बचना इलाज से कहीं बेहतर है। सही तैयारी और समझदारी से ज्यादातर समस्याएं रोकी जा सकती हैं।
- धीरे-धीरे चढ़ें: यह सबसे जरूरी नियम है। एक दिन में ज्यादा ऊंचाई न बढ़ाएं। 3000 मीटर के बाद हर रात सोने की ऊंचाई 300 से 500 मीटर से ज्यादा न बढ़ाएं। ऊंचाई पर चढ़कर काम करें लेकिन सोने के लिए नीचे आएं। इसे “हाई क्लाइंब, लो स्लीप” कहते हैं।
- शरीर को ढलने का समय दें: नई ऊंचाई पर पहुंचने के बाद एक-दो दिन आराम करें। शरीर को ऑक्सीजन की कमी के हिसाब से ढलने दें। जल्दबाजी सबसे बड़ा दुश्मन है।
- खूब पानी पिएं: ऊंचाई पर शरीर तेजी से पानी खोता है। दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएं। प्यास न लगे तब भी नियमित अंतराल पर पानी लेते रहें। डिहाइड्रेशन लक्षणों को बढ़ा देता है।
- शराब और सिगरेट से बचें: शराब शरीर को ढलने से रोकती है। सिगरेट ऑक्सीजन लेने की क्षमता घटाती है। ऊंचाई पर इनसे पूरी तरह दूर रहें।
- सही खाना खाएं: हल्का और आसानी से पचने वाला खाना लें। कार्बोहाइड्रेट ज्यादा रखें। ज्यादा तेल और भारी भोजन से बचें। भूख न लगने पर भी थोड़ा-थोड़ा खाते रहें।
- दवा की मदद लें: कुछ लोग डॉक्टर की सलाह से एसिटाजोलामाइड (डायमॉक्स) लेते हैं। यह दवा शरीर को अनुकूल बनाने में मदद करती है। बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से दवा शुरू न करें।
- अपने शरीर की सुनें: सिरदर्द, थकान या मतली महसूस हो तो ऊंचाई न बढ़ाएं। लक्षण बढ़ें तो तुरंत नीचे उतरने के लिए तैयार रहें। अहंकार छोड़कर सतर्क रहना ही समझदारी है।
- अच्छी फिटनेस बनाएं: नियमित व्यायाम और मजबूत फेफड़े मदद करते हैं। लेकिन फिटनेस अकेले पर्याप्त नहीं है। ढलने की प्रक्रिया हर किसी के लिए जरूरी होती है।
ये उपाय अपनाकर ऊंचाई रोग का खतरा काफी कम हो जाता है। पहाड़ सबको समान मौका देते हैं। तैयारी और धैर्य ही सुरक्षित सफर सुनिश्चित करते हैं।
निम्सदाई (निर्मल पुरजा) की प्रमुख उपलब्धियां
निर्मल पुरजा उर्फ निम्सदाई ने पर्वतारोहण की दुनिया में कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाए। उनकी उपलब्धियां सिर्फ चोटियां चढ़ने तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने नेपाली पर्वतारोहियों की पहचान को भी नई ऊंचाई दी।
- सैन्य उपलब्धियां: 2003 में वे ब्रिगेड ऑफ गोरखाज में शामिल हुए। 2009 में वे स्पेशल बोट सर्विस (एसबीएस) में चुने जाने वाले पहले गोरखा बने। गोरखाओं की दो सौ साल की ब्रिटिश सेना सेवा के इतिहास में यह पहली बार हुआ था। वे ठंडे मौसम की लड़ाई के विशेषज्ञ रहे।
- प्रोजेक्ट पॉसिबल (2019): उन्होंने दुनिया की सभी 14 आठ हजार मीटर से ऊंची चोटियां सिर्फ छह महीने और छह दिनों में चढ़ लीं। यह उस समय का विश्व रिकॉर्ड था। पहले यह उपलब्धि लगभग आठ साल में हासिल होती थी। उन्होंने इस दौरान कई स्पीड रिकॉर्ड भी तोड़े। एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू को दो दिनों से भी कम समय में चढ़ना इनमें शामिल है।
- के2 की शीतकालीन चढ़ाई (2021): 16 जनवरी 2021 को वे दस सदस्यीय पूरी नेपाली टीम के साथ के2 की पहली शीतकालीन चढ़ाई में शामिल रहे। उन्होंने खुद यह चढ़ाई बिना पूरक ऑक्सीजन के पूरी की। यह पर्वतारोहण इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
- बिना ऑक्सीजन की चुनौती: उन्होंने बाद में सभी 14 आठ हजार मीटर की चोटियां बिना पूरक ऑक्सीजन के भी पूरी कीं। वे दुनिया के उन चुनिंदा पर्वतारोहियों में शामिल हो गए जिन्होंने यह दोहरा कारनामा किया। उनकी कुल आठ हजार मीटर की सफल चढ़ाईयों की संख्या 50 से ज्यादा पहुंच गई थी।
- अन्य सम्मान और काम: 2018 में उन्हें ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (एमबीई) से सम्मानित किया गया। नेटफ्लिक्स पर उनकी डॉक्यूमेंट्री 14 पीक्स: नथिंग इज इम्पॉसिबल रिलीज हुई। उन्होंने किताब बियॉन्ड पॉसिबल भी लिखी। एलीट एक्सपेड कंपनी के जरिए उन्होंने कई अभियानों का नेतृत्व किया। निम्सदाई फाउंडेशन के माध्यम से पहाड़ी समुदायों की मदद के काम भी किए।
निम्सदाई की उपलब्धियां सिर्फ रिकॉर्ड की सूची नहीं हैं। उन्होंने दिखाया कि सही लगन और मेहनत से कोई भी सीमा पार की जा सकती है। उनकी कहानी आज भी पर्वतारोहियों को प्रेरित करती है।
अंतिम हिमस्खलन और स्थायी विरासत
2026 की गर्मियों में पुरजा काराकोरम लौटे। उन्होंने पहले ही बिना ऑक्सीजन के गाशेरब्रम द्वितीय चढ़ लिया था। ब्रॉड पीक एक अवसरवादी जोड़ था। उनका मानना था कि इससे वे बिना ऑक्सीजन के चौदह चोटियों के ऐतिहासिक दोहरे पूरा होने से एक चोटी दूर रह जाएंगे। 30 जुलाई को पहाड़ ने हिमस्खलन से जवाब दिया।
दस पर्वतारोही मारे गए। उनमें भरोसेमंद नेपाली साथी और अंतरराष्ट्रीय ग्राहक शामिल थे। शवों की बरामदगी धीमी और खतरनाक साबित हुई। नई बर्फ और अस्थिर ढलानों ने हर प्रयास को जटिल बना दिया। पर्वतारोहण समुदाय ने सिर्फ एक रिकॉर्ड धारक का नहीं बल्कि उनके साथ उठी कुशल नेपाली गाइडों की एक पीढ़ी का शोक मनाया।
निर्मल पुरजा की विरासत परतदार है। उन्होंने दिखाया कि एक छोटे मगर गांव का लड़का एक ही सीजन में हर 8000 मीटर की चोटी पर खड़ा हो सकता है। उन्होंने वैश्विक ध्यान को नेपाली पर्वतारोहियों की ओर सहयोगी के बजाय नेता के रूप में स्थानांतरित करने में मदद की। उन्होंने हजारों लोगों को इस साधारण संदेश से प्रेरित किया कि सीमाएं मुख्य रूप से दिमाग में होती हैं। साथ ही वे एक व्यावसायिक दुनिया में काम करते रहे जिसे कुछ लोग पहाड़ों की शुद्धता को कम करने वाला मानते थे और उन्होंने व्यक्तिगत आचरण के बारे में अनसुलझे सवाल छोड़े।
पहाड़ रिकॉर्ड या प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करते। वे उदासीन रहते हैं। जो बचता है वह है निरंतर महत्वाकांक्षा का उदाहरण, गोरखा और एसबीएस में गढ़ी गई अनुशासन और यह विश्वास कि इंसान अभी भी खुद को चौंका सकते हैं। नेपाल और उससे आगे की युवा पर्वतारोहियों की एक पीढ़ी अपने सपनों को उस रास्ते से मापेगी जो उन्होंने खोला।
ब्रॉड पीक पर बर्फ फिर से बैठ गई है। गिरने वाले दस लोगों के नाम अब पहाड़ की लंबी स्मृति का हिस्सा हैं। निर्मल “निम्सदाई” पुरजा की कहानी हिमस्खलन के साथ खत्म नहीं होती। यह हर उस पर्वतारोही में जारी रहती है जो ऊंची चोटी देखता है और तय करता है कि बाधाओं के बावजूद यह अभी भी संभव हो सकता है।
