देश में हमेशा के लिए खत्म होने जा रही सोशल मीडिया कंपनियों की दादागिरी, ‘IT एक्ट धारा 79’ में बदलाव करके इनसे ‘लीगल प्रोटेक्शन’ छीनने जा रही भारत सरकार

अमेरिका की सिलिकॉन वैली में बैठे इन ‘टेक-माफियाओं’ को शायद ये ग़लतफहमी हो गयी थी की ये दुनिया के भगवान हैं।

इन्हें लगने लगा था की इनकी बनाई हुई सोशल मीडिया वेबसाइटें और ऐप्स किसी भी देश के संविधान, वहां की चुनी हुई सरकार और वहां के कानून से ऊपर हैं।

आप खुद सोचिए, एक प्राइवेट कंपनी इतनी बेलगाम कैसे हो सकती है की वो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुने हुए प्रधानमंत्री का सरेआम अपमान कर दे?

लेकिन कहते हैं ना की जब गीदड़ की मौत आती है, तो वो शहर की तरफ भागता है। इन सोशल मीडिया कंपनियों ने भी बिल्कुल यही किया, उन्होंने हमारे देश के सवेदनशील मामलों में टांग घुसा कर गड़बड़ी करने की जुर्रत करी!

आज भारत सरकार इन कंपनियों का वो गुरूर तोड़ने जा रही है जिसकी वजह से ये अब तक सीना तान कर घूम रहे थे।

सरकार इनके गले से वो ‘सेफ हार्बर’ नाम की कानूनी ढाल हमेशा के लिए नोच लेने की तैयारी में है, जिसकी आड़ में ये देश में दंगे भड़काते थे और फिर बड़ी मासूमियत से पल्ला झाड़ लेते थे।

देश के प्रधानमंत्री का वीडियो डिलीट करने की हिमाकत और विदेशी टेक कंपनियों की हेकड़ी निकालने का शुरू हुआ असली खेल

दोस्त, ये कोई छोटी-मोटी बात थोड़ी है! ज़रा उस दिन के घटनाक्रम को ठंडे दिमाग से सोचिए। फेसबुक ने हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो अपने प्लेटफार्म से सीधे हटा दिया।

और गलती से नहीं हटाया, बल्कि बाकायदा दोपहर 12:30 बजे से लेकर शाम 5:30 बजे तक, पूरे 5 घंटे तक, वो वीडियो डिलीट ही रखा गया!

एक देश के प्रधानमंत्री का वीडियो, जिसे करोड़ों लोग देखते हैं, उसे एक अमेरिकी कंपनी अपनी मर्जी से हटा देती है? मतलब इनकी हिम्मत तो देखिए!

ये कोई ‘टेक्निकल ग्लिच’ या सर्वर डाउन होने वाली बात नहीं थी। ये शुद्ध रूप से अपनी पावर का नंगा नाच था।

जुकरबर्ग की टीम को लगा की वो भारत के प्रधानमंत्री को भी सेंसर कर सकते हैं, उनकी आवाज़ दबा सकते हैं। ये उनकी वो तानाशाही थी जिसे वो ‘कम्युनिटी गाइडलाइन्स’ का नाम देकर दुनिया भर में थोपते आए हैं।

लेकिन भाई, ये नया भारत है। यहाँ तुम हमारे प्रधानमंत्री का वीडियो हटाओगे, तो तुम्हारा पूरा लीगल सिस्टम ही उखाड़ कर फेंक दिया जाएगा।

जैसे ही ये कांड हुआ, दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भूचाल आ गया। सरकार को भी समझ आ गया की अगर आज इन्हें नहीं रोका गया, तो कल को ये चुनाव भी मेनिपुलेट (Manipulate) करने लगेंगे।

बस यहीं से शुरू हुआ विदेशी टेक कंपनियों की हेकड़ी निकालने का असली खेल! सरकार ने तय कर लिया की अब इन कंपनियों की गर्दन नापी जाएगी और वो भी इनके ही बनाए हुए जाल में फंसाकर।

क्या है IT एक्ट की धारा 79, जिसकी आड़ में फेसबुक, X और यूट्यूब चला रहे थे अपना ‘डिजिटल जंगलराज’

अब आप सोच रहे होंगे की सरकार ऐसा क्या करने वाली है जिससे जुकरबर्ग से लेकर एलन मस्क तक की रातों की नींद उड़ गई है?

तो भाई, इसका जवाब छुपा है भारत के IT Act 2000 की ‘धारा 79’ में। इसी धारा को अंग्रेजी में ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbor) कहा जाता है।

ये सेफ हार्बर आखिर है क्या बला? इसे एकदम ठेठ देसी भाषा में समझो। मान लो आपका एक मकान है। आपने वो मकान किसी को किराए पर दे दिया।

अब किराएदार उस मकान में बैठकर बम बना रहा है, हथियार रख रहा है या आतंकवादी साजिश रच रहा है, तो पुलिस सबसे पहले किसको पकड़ेगी? ज़ाहिर है किराएदार को।

आप पुलिस से कह दोगे की “हुज़ूर, मैं तो सिर्फ मकान मालिक हूँ, मुझे क्या पता अंदर क्या हो रहा है।” पुलिस आपको छोड़ देगी।

बस, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसी कंपनियां अब तक इसी ‘मकान मालिक’ वाली छूट का फायदा उठा रही थीं।

भारत का कानून कहता था की ये कंपनियां सिर्फ ‘प्लेटफार्म’ हैं। यानी अगर कोई यूज़र (किराएदार) फेसबुक, ट्विटर (X), या किसी भी दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आकर देश-विरोधी पोस्ट डाले, हेट स्पीच फैलाए या फेक न्यूज़ का कचरा फैलाए, तो सरकार उस यूज़र को पकड़ेगी, फेसबुक को नहीं।

फेसबुक कोर्ट में जाकर कह देता था की “हमारी कोई गलती नहीं, हमने थोड़ी पोस्ट किया है।” इसी लीगल इम्युनिटी (कानूनी छूट) को सेफ हार्बर कहते हैं।

लेकिन अब खेल पलट रहा है! भारत सरकार कह रही है की बेटा, तुम सिर्फ मकान मालिक नहीं हो। तुम तो उस किराएदार को बाकायदा बम बनाने का सामान भी सप्लाई कर रहे हो!

मतलब, तुम्हारे अल्गोरिदम जानबूझकर भड़काऊ पोस्ट्स को वायरल करते हैं। इसलिए अब सरकार IT Act में बदलाव करके इनका ये ‘सेफ हार्बर’ अधिकार ही छीनने जा रही है।

जैसे ही ये ढाल छिनी, ये कंपनियां सिर्फ ‘प्लेटफार्म’ नहीं रह जाएंगी, बल्कि ‘पब्लिशर’ (Publisher) बन जाएंगी।

इसका सीधा सा मतलब ये है की कल को अगर फेसबुक या यूट्यूब पर किसी ने भी दंगा भड़काने वाली या देश-विरोधी कोई भी पोस्ट डाली, तो सीधा मुक़दमा पोस्ट करने वाले पर तो होगा ही, साथ ही फेसबुक के इंडिया हेड और जुकरबर्ग के नाम से भी एफआईआर (FIR) कटेगी!

सीधा मानहानि और देशद्रोह का केस ठुकेगा। इसी हंटर के डर से आज इन कंपनियों के दफ्तरों में मातम पसरा हुआ है।

विदेशी ‘बॉट नेटवर्क’ और अल्गोरिदम का गंदा खेल जिसने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर रची थी देश जलाने की साजिश

वैसे इन कंपनियों का ये ‘अल्गोरिदम वाला जिहाद’ कोई आज की बात नहीं है।

आप खुद अपने मोबाइल में देखिए, अगर आप कोई अच्छी, पॉजिटिव या देश के विकास वाली खबर शेयर करेंगे, तो फेसबुक और एक्स (X) उसे 10-20 लोगों से ज़्यादा नहीं दिखाएंगे।

लेकिन जैसे ही आप कोई भड़काऊ, झूठी या हिन्दू-विरोधी पोस्ट डालेंगे, इनका अल्गोरिदम उसे रातों-रात लाखों लोगों तक पहुंचा देगा। ये कोई इत्तेफाक नहीं है, ये पूरी की पूरी एक सेटिंग्स है।

अभी हाल ही का ताज़ा उदाहरण ले लीजिए। जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो भयंकर और उग्र प्रोटेस्ट (प्रदर्शन) हुआ, आपको क्या लगता है वो अपने आप हो गया?

बिल्कुल नहीं! पुलिस और इंटेलिजेंस की जांच में अब जो खुलासे हो रहे हैं, वो किसी के भी रोंगटे खड़े कर देंगे।

जंतर-मंतर वाले इस कांड की स्क्रिप्ट भारत में नहीं, बल्कि विदेशों में बैठे एक खौफनाक ‘बॉट नेटवर्क’ (Bot Network) ने रची थी।

20 से 23 जुलाई के बीच सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित डिजिटल कैंपेन चलाया गया। रातों-रात हज़ारों फेक एकाउंट्स पैदा हो गए, जो एक ही तरह के भड़काऊ हैशटैग और फेक न्यूज़ लगातार पोस्ट कर रहे थे।

मज़े की बात देखिए, फेसबुक और एक्स (Twitter) के अल्गोरिदम ने इन फेक एकाउंट्स को बैन करने के बजाय इनकी पोस्ट्स को और ज़्यादा पुश किया!

अब दिल्ली पुलिस ने सीधे मेटा (Meta), गूगल और एक्स (X) की गर्दन दबोच ली है। पुलिस ने बाकायदा नोटिस भेजकर इन कंपनियों से उन हज़ारों फेक एकाउंट्स का आईपी एड्रेस (IP Address) और सर्वर डेटा मांग लिया है।

पुलिस ये जानना चाहती है की ये भड़काऊ कैंपेन किसने चलाया? इसे विदेश से किसने फंड किया? और सबसे बड़ा सवाल- फेसबुक और X ने इसे रोका क्यों नहीं?

जब पुलिस इनसे डेटा मांगती है, तो ये ‘यूज़र प्राइवेसी’ का चोचला पहनकर बैठ जाते हैं। पर अब ये सब नहीं चलने वाला।

सरकार समझ चुकी है की इस टूलकिट का सीधा कनेक्शन देश को जलाने से है।

89 प्रतिशत भारतीयों पर कब्ज़ा और फेक न्यूज़ की फैक्ट्री, विदेशी टेक माफियाओं के खौफनाक आंकड़े जो आपकी नींद उड़ा देंगे

अगर आप सोच रहे हैं की सरकार इतना कड़ा कदम क्यों उठा रही है, तो ज़रा इन टेक माफियाओं की ताकत और इनके खौफनाक आंकड़ों पर नज़र डालिए।

आज की डेट में भारत की लगभग 89 प्रतिशत डिजिटल आबादी मेटा (मार्क जुकरबर्ग की कंपनी) की मुट्ठी में कैद है।

ज़रा नंबर तो देखिए! भारत में आज व्हाट्सएप (WhatsApp) के 83 करोड़ एक्टिव यूज़र्स हैं। यूट्यूब पर 64 करोड़, इंस्टाग्राम पर 50 करोड़ और फेसबुक पर 36 करोड़ भारतीय बैठे हैं!

भाईसाहब, ये सिर्फ कुछ वेबसाइट्स नहीं हैं, ये अपने आप में एक पूरा का पूरा देश हैं।

जब किसी एक विदेशी आदमी के पास आपके देश के 83 करोड़ लोगों के दिमाग को कंट्रोल करने की ताकत आ जाए, तो वो रातों-रात किसी भी देश में दंगे भड़का सकता है, चुनाव पलट सकता है और सरकारें गिरा सकता है।

और ये बात मैं हवा में नहीं कह रहा हूँ। इसी साल यूनेस्को (UNESCO) और इप्सोस (Ipsos) की एक बहुत बड़ी सर्वे रिपोर्ट आई है।

उस रिपोर्ट के आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं की ये सोशल मीडिया असल में एक ‘फेक न्यूज़ की फैक्ट्री’ बन चुका है।

सर्वे में शामिल 64 प्रतिशत लोगों ने साफ-साफ माना है की सोशल मीडिया आज के समय में गलत जानकारी और झूठ फैलाने का सबसे बड़ा अड्डा है।

इतना ही नहीं, 56% लोगों का मानना है की सोशल मीडिया ही आज न्यूज़ और जानकारी का ‘मेन सोर्स’ (Main Source) बन गया है, और 42% लोगों ने सीधे तौर पर बड़े मैसेजिंग ऐप्स (जैसे WhatsApp) को दंगे और गलत जानकारी फैलाने के लिए कसूरवार ठहराया है।

सोचिए ज़रा! दुनिया भर की संस्थाएं कह रही हैं की तुम्हारे प्लेटफार्म से दुनिया में जहर फैल रहा है, लेकिन इन कंपनियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

उल्टा जब सरकार इनसे कहती है की भाई अपने अल्गोरिदम में सुधार करो, तो ये बहाने बनाने लगते हैं।

ये विदेशी माफिया भारत से हर साल हज़ारों करोड़ रुपये का मुनाफा कूट कर ले जाते हैं, लेकिन जब देश की सुरक्षा की बात आती है तो ये हमें ठेंगा दिखा देते हैं।

आज दिल्ली दरबार में तलब हुए जुकरबर्ग के टॉप अफसर, सांसद निशिकांत दुबे ने दे दिया फाइनल अल्टीमेटम

अब आते हैं आज की सबसे ताज़ा और बड़ी खबर पर। कहते हैं ना की जब लातों के भूत बातों से नहीं मानते, तो उन्हें सीधा ‘दरबार’ में बुलाकर उनकी क्लास लगानी पड़ती है।

आज यानी 5 अगस्त 2026 को दिल्ली में बिल्कुल यही नज़ारा देखने को मिल रहा है।

भारत सरकार ने इस पूरी गुंडागर्दी का संज्ञान लेते हुए मेटा (Meta) के ‘हेड ऑफ पब्लिक पॉलिसी’ जोएल कपलान (Joel Kaplan) और इंस्टाग्राम के तमाम बड़े तकनीकी अधिकारियों का कॉलर पकड़कर उन्हें दिल्ली तलब कर लिया है।

भाईसाहब, आज दिल्ली में इन विदेशी अफसरों के चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई हैं। सरकार इन टेक माफियाओं से सीधा जवाब मांग रही है की तुम्हारा ये ‘अल्गोरिदम’ आखिर काम कैसे करता है?

हमें वो पूरा कोड और सिस्टम समझाओ जिससे तुम देश-विरोधी पोस्ट्स को तो हवा देते हो, लेकिन राष्ट्रवादी पोस्ट्स को दबा देते हो!

इस पूरे मामले पर संसद की सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मामलों की स्थायी समिति ने जो रौद्र रूप दिखाया है, उसे देखकर जुकरबर्ग की टीम पसीने-पसीने हो गई है।

समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने एकदम साफ और कड़े शब्दों में जो अल्टीमेटम दिया है, वो इन विदेशी आकाओं के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।

निशिकांत दुबे ने डंके की चोट पर कहा है की “इस देश का प्रधानमंत्री कोई आम आदमी नहीं होता है।

अगर आप देश के प्रधानमंत्री का कंटेंट 12:30 बजे से लेकर सुबह 5:30 बजे तक, पूरे 5 घंटे तक, डिलीट करके रखते हैं, तो ये कोई छोटी-मोटी चूक नहीं है, ये देश की संप्रभुता पर सीधा हमला है।”

निशिकांत दुबे ने दो टूक कह दिया है की अब ये तुम्हारी वो दो कौड़ी की “सॉरी और माफ़ी” (Apology) से काम नहीं चलने वाला।

तुम एक छोटा सा ट्वीट करके माफ़ी मांग लोगे और हम तुम्हें छोड़ देंगे? बिल्कुल नहीं! सरकार ने साफ़ कर दिया है की खुद मार्क जुकरबर्ग को सामने आकर इस गलती के लिए माफ़ी मांगनी पड़ेगी।

और सिर्फ माफ़ी-वाफ़ी से काम नहीं चलेगा भाई! वो कौन से अधिकारी थे, वो कौन सी टीम थी जिसने प्रधानमंत्री का वीडियो टेक-डाउन किया?

उन सबके नाम सार्वजनिक करो और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करो।

इसके साथ ही सरकार ने बच्चों के साथ दुष्कर्म (CSAM) और देशद्रोही कंटेंट को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति साफ कर दी है।

सरकार ने कह दिया है की अगर तुम महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों का कंटेंट नहीं हटा सकते, अगर तुम देशद्रोही ताकतों के खिलाफ तुरंत एक्शन नहीं ले सकते, और अगर तुम भारत सरकार की चेतावनियों को अपने जूतों पर रखते हो…

तो बेटा तैयार हो जाओ, हम तुम्हारा ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbor) हमेशा के लिए उखाड़ कर फेंक देंगे! और आज इसी बात का सबसे भयंकर खौफ इन टेक कंपनियों के दफ्तरों में मंडरा रहा है।

विदेशी आकाओं को बचाने मैदान में उतरा इंडी गठबंधन, और महुआ मोइत्रा की बेशर्मी ने खोल दी वामपंथियों की पोल

यार, अपने देश की एक बहुत बड़ी और पुरानी त्रासदी रही है। जब भी इस देश पर कोई बाहरी ताकत हमला करती है, तो हमें बाहर वालों से ज़्यादा अपने घर में बैठे ‘जयचंदों’ से लड़ना पड़ता है।

आज जब भारत सरकार इन घमंडी विदेशी टेक कंपनियों की नकेल कस रही है, उनकी हेकड़ी निकाल रही है और भारत की संप्रभुता का झंडा बुलंद कर रही है, तो ज़रा सोचिए इनके बचाव में ढाल बनकर कौन खड़ा है? हमारा अपना विपक्ष!

विपक्षी दलों के ‘इंडी गठबंधन’ और उनके वामपंथी (Left-Liberal) ईकोसिस्टम ने इस पूरे मामले में बेशर्मी और चाटुकारिता की सारी हदें पार कर दी हैं।

जब सरकार विदेशी माफियाओं को घुटनों पर ला रही है, तब टीएमसी (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा का एक ऐसा ट्वीट सामने आया है जिसने इस पूरे विपक्ष की मानसिकता को नंगा करके रख दिया है।

महुआ मोइत्रा ने मार्क जुकरबर्ग को टैग करते हुए एक ट्वीट चिपका दिया। उन्होंने अंग्रेजी में लिखा जिसका मतलब था-

“हैलो मार्क… प्लीज आप डरा-धमका कर पीछे मत हटना और भारत सरकार से माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है। भारत सरकार हर समय अपने नागरिकों को ब्लैकमेल करती है, धमकाती है। अगर कुछ घंटों के लिए एक वीडियो हट भी गया तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ा।”

मतलब आप इनकी सोच का दिवालियापन देखिए यार! इस देश का प्रधानमंत्री 140 करोड़ जनता द्वारा चुना गया है।

एक अमेरिकी अरबपति जो किसी जनता द्वारा नहीं चुना गया, वो हमारे देश के प्रधानमंत्री का अपमान कर रहा है, और हमारे ही देश की एक सांसद उस विदेशी आका की गुलामी में लेटकर कह रही है की “मालिक, आप माफ़ी मत मांगना!”

ये वही विपक्ष है जो दिन-रात संसद में छाती पीटता है की “हाय-हाय लोकतंत्र खतरे में है, आज़ादी खत्म हो गई।”

लेकिन जब एक विदेशी कंपनी हमारे देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक पद (प्रधानमंत्री) की आवाज़ दबाने की कोशिश करती है, तो ये लोग उस कंपनी के तलवे चाटने लगते हैं।

ऐसा क्यों? क्योंकि इन वामपंथियों और विदेशी टेक कंपनियों का एजेंडा एक ही है- किसी भी तरह से राष्ट्रवादी सरकार को बदनाम करना और देश में अस्थिरता फैलाना।

फेसबुक पर जब पहले भी ये आरोप लग चुके हैं की वो एक खास विचारधारा (वामपंथी) वाले कंटेंट की रीच (Reach) बढ़ाता है और राष्ट्रवादी विचारधारा वाले कंटेंट की रीच को दबा देता है, तो अब समझ में आ रहा है की महुआ मोइत्रा जैसे नेता जुकरबर्ग को बचाने के लिए क्यों तड़प रहे हैं।

अगर फेसबुक का ये टूलकिट बंद हो गया, तो इन नेताओं का जो ज़हरीला प्रोपेगेंडा सोशल मीडिया पर चलता है, वो दुकान ही हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।

ये लोग भारत की संसद में बैठते ज़रूर हैं, लेकिन इनकी वफादारी आज भी गोरे आकाओं के पैरों में ही गिरवी रखी है।

खैर, भारत 140 करोड़ लोगों का देश है, जो आज डिजिटल दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है। फेसबुक या यूट्यूब हमें खैरात नहीं बांट रहे हैं.. ये हमारे देश के डेटा से, हमारे एडवरटाइजिंग (Advertising) मार्केट से हर साल अरबों डॉलर कमाकर अमेरिका ले जा रहे हैं।

अगर जुकरबर्ग या किसी भी विदेशी कंपनी को भारत के इस बाज़ार से पैसा कमाना है, तो उन्हें भारत के कानून, भारत की चुनी हुई सरकार और भारत की संप्रभुता के सामने अपना सिर झुकाना ही पड़ेगा।

तुम हमारे देश में आकर हमारे ही नियम नहीं तोड़ सकते।

जय हिन्द!

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