कोयंबटूर की व्यस्त सड़कों पर आज पंप, मोटर और मशीन टूल्स के कारखाने नजर आते हैं। शहर को दक्षिण भारत का इंजीनियरिंग केंद्र कहा जाता है। लेकिन इस पहचान के पीछे एक ऐसा नाम छिपा है जिसे ज्यादातर लोग अभी भी नहीं जानते। गोपालस्वामी दोरैस्वामी नायडू। स्कूल की तीसरी कक्षा छोड़ने वाला लड़का, जिसने मोटरसाइकिल खोलकर सीखा और बाद में भारत का पहला स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर बनाया। थॉमस एडिसन की कहानी दुनिया जानती है। नायडू की कहानी अभी भी अनकही रह गई है।
कलंगल का बेचैन लड़का
जी.डी. नायडू का जन्म 23 मार्च 1893 को कोयंबटूर के पास कलंगल गांव में हुआ। तब वह इलाका मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। परिवार तेलुगु बोलता था और खेती पर निर्भर था। छोटे से गांव में जीवन सादा था। खेत, बैल और मौसम के हिसाब से दिन कटते थे।
मां की मौत तब हो गई जब वह कुछ महीने का ही था। पिता गोपालस्वामी ने अकेले ही उसे संभाला। घर में मां की कमी साफ महसूस होती रही। छोटा लड़का खेतों के आसपास घूमता, मिट्टी में खेलता और गांव के रास्तों पर नजर दौड़ाता रहता।
स्कूल की दुनिया उसे कभी नहीं भाई। किताबें और रटी-रटाई बातें उसे बेकार लगतीं। कक्षा में बैठना उसके लिए सजा जैसा था। वह बाहर की दुनिया को ज्यादा करीब पाता। तीसरी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते उसका मन पूरी तरह भर चुका था। उसने पढ़ाई छोड़ दी।
शरारत उसके स्वभाव का हिस्सा थी। एक बार उसने शिक्षक के चेहरे पर रेत फेंक दी और भाग निकला। पिता को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने उसे स्कूल से निकाल लिया और खेतों में काम पर लगा दिया। अब दिन भर हल चलाना, पौधों की देखभाल करना और मिट्टी से जूझना उसकी दिनचर्या बन गई।
खेतों ने उसे धैर्य सिखाया। मौसम का मिजाज समझना, फसल की जरूरत पहचानना और मेहनत का मूल्य जानना। लेकिन गांव से कभी-कभी गुजरने वाली मशीनें उसकी कल्पना को कहीं ज्यादा बांध लेतीं। कोई मोटर की आवाज सुनाई देती तो वह रुक जाता। ध्यान से देखता। पूछता। याद रखता।
औपचारिक शिक्षा बहुत कम थी। फिर भी उसके अंदर एक आदत गहरी बैठ चुकी थी। चीजों को छूकर, खोलकर और जोड़कर समझना। किताबों से नहीं, हाथों से। कलंगल का यह बेचैन लड़का अभी नहीं जानता था कि यही आदत आगे चलकर उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत बनेगी।

वो मोटरसाइकिल जिसने सब कुछ बदल दिया
जब नायडू सोलह साल का था, एक दिन कलंगल के आसपास एक ब्रिटिश राजस्व अधिकारी 1912 मॉडल की रज मोटरसाइकिल पर आया। गांव के लड़के ने वैसी मशीन पहले कभी नहीं देखी थी। चमकदार धातु, तेज आवाज और सड़क पर सरपट दौड़ती गाड़ी। उसकी नजर उस पर ठहर गई।
मोटरसाइकिल की रफ्तार और नियंत्रण ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया। वह सोचने लगा कि अगर यह मशीन इंसान के हाथ में इतनी आसानी से चल सकती है तो इसमें और क्या-क्या छिपा होगा। उसी पल उसके मन में एक पक्का फैसला बैठ गया। उसके पास भी ऐसी मोटरसाइकिल होनी चाहिए।
कलंगल छोड़कर वह कोयंबटूर पहुंच गया। होटल में वेटर का काम पकड़ लिया। सुबह से रात तक प्लेटें उठाना, मेहमानों की सेवा करना और छोटे-मोटे काम करना। थकान तो होती थी, लेकिन वह हर रोज कुछ पैसे बचा लेता। तीन साल तक यही सिलसिला चला।
आखिरकार तीन सौ रुपये जुट गए। उसने वह मोटरसाइकिल खरीद ली। ज्यादातर युवा इसे गर्व से सड़क पर दौड़ाते। नायडू ने कुछ और किया। वह घर ले गया और धीरे-धीरे उसे खोलने लगा। स्क्रू, नट, चेन, इंजन के छोटे-छोटे हिस्से। सबको अलग किया। फिर एक-एक करके जोड़ा।
बार-बार यही प्रक्रिया दोहराई। कभी कोई हिस्सा सही जगह नहीं बैठता तो फिर से शुरू करता। घंटों बैठकर देखता कि कौन सा पुर्जा कैसे काम करता है। आवाज कैसे बदलती है। ताकत कहां से आती है। धीरे-धीरे पूरी मशीन उसके दिमाग में बस गई।
वह मोटरसाइकिल सिर्फ सवारी का साधन नहीं रही। वह उसका पहला शिक्षक बन गई। उन दिनों में नायडू ने जो सीखा, वह किसी स्कूल या किताब से नहीं मिला था। हाथों से खोलकर, जोड़कर और बार-बार आजमाकर सीखा था। कलंगल का बेचैन लड़का अब एक स्वयं-सिखाया मैकेनिक बन चुका था। और यही आदत आगे चलकर उसकी पूरी जिंदगी की दिशा तय करने वाली थी।

एक बस से परिवहन साम्राज्य तक
1920 में नायडू ने परिवहन का काम शुरू किया। कोयंबटूर के उद्योगपति रॉबर्ट स्टेन्स ने चार हजार रुपये का ऋण दिया। उससे उन्होंने एक मोटर कोच खरीदी। खुद स्टीयरिंग संभाली और पोलची से पलानी के बीच सेवा शुरू कर दी।
उन दिनों ज्यादातर लोग बैलगाड़ी या पैदल ही सफर करते थे। मोटर बस देखकर लोग हैरान होते। नायडू ने शुरुआत से ही साफ-सफाई और समय की पाबंदी पर जोर दिया। गाड़ी साफ रखी। ठीक समय पर रवाना की। यात्रियों के साथ व्यवहार भी अच्छा रखा। धीरे-धीरे लोग भरोसा करने लगे।
शुरुआती सालों में नायडू खुद गाड़ी चलाते थे। इंजन की आवाज सुनकर ही खराबी पहचान लेते। रास्ते में कोई दिक्कत आती तो खुद उतरकर ठीक करते। यात्री देखकर हैरान होते कि मालिक खुद इतनी मेहनत कर रहा है।
मांग बढ़ने लगी। एक कोच दो हो गई। फिर और। नायडू ने सिस्टम बनाया। साफ बस स्टैंड, सही टिकटिंग और अनुशासन। 1933 तक यूनिवर्सल मोटर सर्विस यानी यूएमएस के पास करीब दो सौ अस्सी बसें हो चुकी थीं। यह देश के सबसे बड़े और कुशल निजी परिवहन नेटवर्क में से एक बन गया।
नायडू ने सिर्फ बसें नहीं चलाईं। उन्होंने दिखाया कि व्यवस्थित और भरोसेमंद सेवा आम लोगों की जिंदगी आसान बना सकती है। एक बस से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे पूरे इलाके का परिवहन साम्राज्य बन गया। और इसी सफलता ने आगे उन्हें और बड़े कामों की ओर धकेला।
भारत का पहला इलेक्ट्रिक मोटर और कोयंबटूर का निर्माण
1930 में नायडू ने कोयंबटूर के पीलमेडु में न्यू इलेक्ट्रिक वर्क्स शुरू की, जो बाद में नेशनल इलेक्ट्रिक वर्क्स कहलाई। भारत अभी भी आयातित इलेक्ट्रिक मोटर्स पर निर्भर था। नायडू इसे बदलना चाहता था। डी. बालसुंदरम नायडू के साथ मिलकर 1937 में देश का पहला स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर तैयार किया।
यह एक उपलब्धि उससे कहीं ज्यादा मायने रखती थी। स्थानीय निर्माण से लागत घटी और विदेशी निर्भरता कम हुई। दूसरे वर्कशॉप बढ़ने लगे। मोटर की सफलता से बालसुंदरम ने टेक्स्टूल की नींव रखी, और बाद में लक्ष्मी मशीन वर्क्स जैसी बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी बनी। कोयंबटूर धीरे-धीरे औद्योगिक और इंजीनियरिंग केंद्र बनने लगा। कलंगल के शांत गांव का लड़का उसकी नींव रखने वालों में शामिल था।
वो गैजेट्स जिन्होंने रोज़मर्रा की ज़िंदगी आसान बना दी
नायडू के आविष्कार हमेशा किसी व्यावहारिक समस्या से शुरू होते थे। वह विदेश यात्रा करता, ध्यान से देखता और विचारों को भारतीय परिस्थितियों और जेब के हिसाब से ढालकर लाता।
बेल्जियम में उसने खिलौना कार की छोटी मोटर को शेविंग रेजर से जोड़ा। नतीजा निकला रासंट इलेक्ट्रिक रेजर, जो ड्राई सेल से चलता था। यूरोप में पेटेंट कराया। मोटर जर्मनी से, केसिंग स्विट्जरलैंड से और स्टील स्वीडन से आता था। लंदन में पहले महीने में करीब साढ़े सात हजार टुकड़े बिके। अमेरिकी पत्रिकाओं में इसके विज्ञापन छपे। रेजर दशकों बाद भी आधुनिक लगता था।
बिना बिजली वाले घरों और दफ्तरों के लिए मिट्टी के तेल से चलने वाला पंखा बनाया। सुपर-थिन शेविंग ब्लेड बनाए। फल का जूस निकालने वाला यंत्र, मैकेनिकल कैलकुलेटर और टिकट वेंडिंग मशीन बनाई। छेड़छाड़-रहित वोट रिकॉर्डिंग मशीन तैयार की। 1941 में घोषणा की कि वह भारत में पांच वाल्व वाला रेडियो सेट सिर्फ सत्तर रुपये में बना सकता है, जबकि तब रेडियो बहुत महंगे होते थे।
1952 में करीब दो हजार रुपये की दो सीट वाली पेट्रोल इंजन कार निकाली। आम भारतीय आखिरकार अपना वाहन खरीद सकते थे। सरकार ने जरूरी लाइसेंस देने से इनकार कर दिया। उत्पादन रुक गया। कार प्रोटोटाइप ही रह गई। एक और उदाहरण उस विचार का जो सिस्टम के तैयार होने से पहले आ गया था।
हर नए यंत्र के साथ आमतौर पर नया वर्कशॉप या कारखाना खुलता था। नायडू उत्पाद और रोजगार एक साथ बनाता था। उसका विश्वास था कि तकनीक आम आदमी की सेवा करे, दूर की चीज न बनी रहे।
किसान, वैज्ञानिक और अप्रत्याशित प्रयोग
नायडू कलंगल की मिट्टी कभी नहीं भूला। उसी प्रयोगशील नजरिए से खेती की ओर लौटा। अपने फार्म पर हाइब्रिड किस्मों पर काम किया। असामान्य रूप से ऊंचे कपास के पौधे उगाए। मक्का और पपीते में सुधार किया। नतीजे देखने लोग आने लगे।
उनमें भारत के दो बड़े नाम शामिल थे। भौतिक विज्ञानी सी.वी. रमन और इंजीनियर एम. विश्वेश्वरैया। रमन ने बाद में नायडू के बारे में दुर्लभ गर्मजोशी से लिखा। “मिस्टर नायडू सचमुच एक करोड़ में एक आदमी हैं, शायद यह भी कम कहा गया है।” नोबेल विजेता की प्रशंसा वजनदार थी। जो लोग उनके साथ काम करते थे, वे पहले से जानते थे। यहां एक ऐसा दिमाग था जो इंजन से फसल तक आसानी से घूमता था और हमेशा बेहतर तरीका ढूंढता रहता था।
वो शिक्षक जो व्यावहारिक कौशल में विश्वास रखता था
नायडू की अपनी पढ़ाई छोटी और बेचैन रही थी। वह नहीं चाहता था कि दूसरे युवा भी कक्षा और वर्कशॉप के बीच उसी खाई से गुजरें। 1940 के दशक के मध्य में उसने आर्थर होप पॉलीटेक्निक और आर्थर होप कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में ये संस्थान गवर्नमेंट पॉलीटेक्निक और गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, कोयंबटूर बन गए। भारत का पहला पॉलीटेक्निक काफी हद तक उनके प्रयास और दान से बना।
1945 में वह प्रिंसिपल रहे। उनका मानना था कि चार साल के डिग्री कोर्स समय बर्बाद करते हैं। दो साल का व्यावहारिक प्रशिक्षण उन्हीं कौशलों को ज्यादा प्रभावी ढंग से सिखा सकता है। ब्रिटिश प्रशासन ने यह विचार ठुकरा दिया। नायडू ने इस्तीफा दे दिया। संस्थान चलते रहे, लेकिन छोटे और हाथ से सीखने वाले कोर्स का उनका नजरिया कठोर व्यवस्था के खिलाफ एक शांत विरोध बनकर रह गया।
जी.डी. नायडू चैरिटीज के जरिए उन्होंने कल्याण योजनाएं, शोध छात्रवृत्तियां और कौशल प्रशिक्षण चलाया। दसवीं पास न करने वालों के लिए भी रास्ता खुला रखा। ज्ञान उन तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, यही चाहत थी।
अपने समय से आगे होने की कीमत
सफलता बिना टकराव के नहीं आई। लाइसेंस मिलना मुश्किल था। सरकारी बाधाएं परियोजनाओं को धीमा करती रहीं। कुछ आविष्कारों को घर से ज्यादा विदेश में गर्मजोशी मिली। रासंट रेजर यूरोप में अच्छा बिका। सस्ती कार भारतीय सड़कों पर नहीं उतर पाई। अन्नादुरई ने बाद में कहा था कि समाज ने जी.डी. नायडू की बुद्धि का पूरा इस्तेमाल नहीं किया। आविष्कार मूल्यवान संसाधन थे जिन्हें व्यवस्था अक्सर अनछुआ छोड़ देती थी।
नायडू काम करते रहे। सिर्फ यह दिखाने के लिए कि केंद्रित मेहनत क्या कर सकती है, उन्होंने ग्यारह घंटे में नींव से लेकर पूरा घर बना दिया। नेताओं और ऐतिहासिक क्षणों की तस्वीरें खींचीं। यात्रा की, देखा और नए विचारों के साथ लौटे। तमिलनाडु के बाहर पहचान दशकों तक सीमित रही। कहानी ज्यादातर क्षेत्रीय बनी रही। उन लोगों तक पहुंची जो उस औद्योगिक परिदृश्य में रहते और काम करते थे जिसे उन्होंने बनाने में मदद की।
नायडू के व्यावसायिक सिद्धांत
जी.डी. नायडू का व्यवसाय सिर्फ मुनाफे पर नहीं टिका था। उनके काम करने का तरीका साफ और व्यावहारिक था:
- पहला सिद्धांत: समझना। किसी भी मशीन या समस्या को वे खोलकर देखते। मोटरसाइकिल से लेकर बस और मोटर तक, हर चीज को टुकड़ों में जांचा। बिना समझे आगे नहीं बढ़ते।
- दूसरा सिद्धांत: साफ-सफाई और अनुशासन। यूएमएस की बसें हमेशा साफ रहतीं। समय की पाबंदी सख्त थी। बस स्टैंड व्यवस्थित रखे जाते। यात्री भरोसा करते क्योंकि सेवा भरोसेमंद थी।
- तीसरा सिद्धांत: आम आदमी की जरूरत। महंगे और दिखावटी सामान बनाने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। सस्ता रेडियो, मिट्टी के तेल वाला पंखा, किफायती कार जैसी चीजें उन्होंने इसलिए बनाईं क्योंकि वे आम लोगों के काम आ सकें।
- चौथा सिद्धांत: रोजगार पैदा करना। हर नए आविष्कार के साथ अक्सर एक नया वर्कशॉप या कारखाना खुलता। उत्पाद के साथ नौकरियां भी बढ़तीं। कोयंबटूर में कई छोटे-बड़े यूनिट इसी सोच से जुड़े।
- पांचवां सिद्धांत: स्वदेशी समाधान। विदेशी मशीनों पर निर्भर रहने की जगह स्थानीय स्तर पर बनाना। 1937 का पहला इलेक्ट्रिक मोटर इसी सोच का नतीजा था।
नायडू का मानना था कि व्यवसाय तभी टिकाऊ होता है जब वह समस्या हल करे, सिस्टम बनाए और लोगों को साथ लेकर चले। डिग्री या बड़े दावे की जरूरत नहीं। समझ, मेहनत और व्यावहारिक नजरिया काफी है। उनकी यह सोच आज भी कोयंबटूर की कई वर्कशॉप में जीवित है।
जी.डी. नायडू के योगदान पर चर्चा
जी.डी. नायडू का योगदान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। उन्होंने परिवहन, इंजीनियरिंग, आविष्कार, कृषि और शिक्षा में काम किया। हर जगह उनका नजरिया व्यावहारिक रहा:
- परिवहन: उन्होंने 1920 में एक बस से शुरुआत की। यूनिवर्सल मोटर सर्विस को करीब दो सौ अस्सी बसों वाले नेटवर्क तक पहुंचाया। साफ-सफाई, समय की पाबंदी और व्यवस्थित सेवा पर जोर दिया। आम लोगों के आवागमन को आसान बनाया।
- इंजीनियरिंग: उनका सबसे बड़ा योगदान 1937 का पहला स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर था। नेशनल इलेक्ट्रिक वर्क्स से निकला यह मोटर कोयंबटूर को औद्योगिक केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। आगे चलकर टेक्स्टूल और लक्ष्मी मशीन वर्क्स जैसी कंपनियां इसी सोच से जुड़ीं।
- आविष्कार: उन्होंने रोजमर्रा की जरूरतें देखीं। रासंट इलेक्ट्रिक रेजर, मिट्टी के तेल वाला पंखा, सस्ता रेडियो, जूस निकालने वाला यंत्र, वोट रिकॉर्डिंग मशीन और किफायती कार जैसी चीजें बनाईं। हर उत्पाद के साथ अक्सर नया वर्कशॉप भी खुलता था। रोजगार बढ़ता था।
- कृषि: उन्होंने हाइब्रिड किस्मों पर काम किया। ऊंचे कपास के पौधे, बेहतर मक्का और पपीता उगाए। सी.वी. रमन और एम. विश्वेश्वरैया जैसे लोग उनके फार्म पर आए।
- शिक्षा: उन्होंने व्यावहारिक प्रशिक्षण पर जोर दिया। आर्थर होप पॉलीटेक्निक और कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना में भूमिका निभाई। लंबे डिग्री कोर्स की जगह हाथ से सीखने वाले कोर्स की वकालत की। जी.डी. नायडू चैरिटीज के जरिए कौशल प्रशिक्षण और कल्याण कार्य चलाए।
नायडू का असल योगदान यह था कि उन्होंने समस्या को करीब से देखा, समाधान निकाला और उसे आम आदमी की पहुंच में रखा। कोयंबटूर की औद्योगिक पहचान आज भी उनकी इसी सोच से जुड़ी हुई है।
जी.डी. नायडू के प्रमुख आविष्कार
जी.डी. नायडू के आविष्कार हमेशा किसी साफ जरूरत से शुरू होते थे। वे दिखावे की मशीनें नहीं बनाते थे। उनका ध्यान आम आदमी के काम आने वाली चीजों पर रहता था:
- स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर: सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार था भारत का पहला स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर। 1937 में उन्होंने डी. बालसुंदरम नायडू के साथ मिलकर इसे तैयार किया। नेशनल इलेक्ट्रिक वर्क्स से निकला यह मोटर कोयंबटूर की औद्योगिक यात्रा का बड़ा पड़ाव बना।
- रासंट इलेक्ट्रिक रेजर: उनकी एक और खास देन थी। बेल्जियम में खिलौना कार की छोटी मोटर को रेजर से जोड़कर उन्होंने इसे बनाया। यूरोप में पेटेंट कराया। जर्मनी, स्विट्जरलैंड और स्वीडन से पुर्जे मंगाकर उत्पादन शुरू किया। लंदन में पहले महीने में ही काफी संख्या में बिके।
- दैनिक उपकरण: मिट्टी के तेल से चलने वाला पंखा उन्होंने उन इलाकों के लिए बनाया जहां बिजली नहीं थी। सुपर-थिन शेविंग ब्लेड, फल का जूस निकालने वाला यंत्र और मैकेनिकल कैलकुलेटर भी उनके काम का हिस्सा रहे।
- मशीनें व रेडियो: उन्होंने छेड़छाड़-रहित वोट रिकॉर्डिंग मशीन बनाई। टिकट वेंडिंग मशीन तैयार की। 1941 में उन्होंने बताया कि पांच वाल्व वाला रेडियो सेट सिर्फ सत्तर रुपये में बनाया जा सकता है। उस समय रेडियो बहुत महंगा होता था।
- सस्ती कार: 1952 में उन्होंने करीब दो हजार रुपये की दो सीट वाली पेट्रोल कार तैयार की। आम लोगों के लिए सस्ता निजी वाहन का सपना था। लेकिन सरकार ने लाइसेंस नहीं दिया। उत्पादन आगे नहीं बढ़ सका।
नायडू के आविष्कार सिर्फ मशीनें नहीं थे। वे समस्या देखकर समाधान निकालने का तरीका थे। हर नई चीज के साथ अक्सर नया वर्कशॉप भी खुलता था। उत्पाद के साथ रोजगार भी बढ़ता था। उनकी यही सोच कोयंबटूर की इंजीनियरिंग पहचान का आधार बनी।
उनकी कहानियाँ आज भी क्यों मायने रखती हैं
जी.डी. नायडू का निधन 4 जनवरी 1974 को हुआ। वह अस्सी साल के थे। कोयंबटूर का इंजीनियरिंग और विनिर्माण केंद्र के रूप में उदय आज भी उनकी छाप लिए हुए है। पॉलीटेक्निक और कॉलेज जो उन्होंने खड़े करने में मदद की, आज भी पीढ़ियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। 1967 में खुला जी.डी. नायडू साइंस म्यूजियम और इंडस्ट्रियल एग्जीबिशन उनकी कई मशीनों और विचारों को संजोए हुए है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्युमेंट्री “जीडी नायडू द एडिसन ऑफ इंडिया” ने उनके जीवन को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाया। हाल के वर्षों में आर. माधवन अभिनीत बायोपिक ने नई दिलचस्पी जगाई है और नई पीढ़ी को उस व्यक्ति से मिलने का न्योता दिया है जिसके पीछे यह उपाधि है।
उनकी कहानियों का गहरा महत्व सरल है। नायडू ने एक तरीका दिखाया जो आज भी काम करता है। समस्या को ध्यान से देखो। मौजूदा समाधान को तब तक खोलो जब तक समझ न आ जाए। उसे ऐसे रूप में फिर से बनाओ जो आम भारतीय खरीद और इस्तेमाल कर सकें। उन्होंने यही मोटरसाइकिल, बस, मोटर, रेजर, रेडियो, फसल और कक्षा के साथ किया। सार्वजनिक प्रशंसा की ज्यादा मांग नहीं की और जितनी मिलनी चाहिए थी उससे कम मिली। फिर भी संस्थान, उद्योग और व्यावहारिक आविष्कार की शांत आदत बनी हुई है। स्टार्टअप और बदलाव के जश्न के इस दौर में कलंगल का स्कूल छोड़ने वाला लड़का अभी भी साफ सबक देता है। जिज्ञासा, धैर्य और बेहतर जवाब को उल्टा इंजीनियर करने का साहस एक शहर को बदल सकता है और समय के साथ एक राष्ट्र को भी। एडिसन का नाम दुनिया जानती है। जी.डी. नायडू का काम कोयंबटूर की वर्कशॉप और कक्षाओं में रोज चल रहा है। बाकी भारत अभी उसे पकड़ने की शुरुआत कर रहा है।
जी.डी. नायडू 4 जनवरी 1974 को इस दुनिया से चले गए। लेकिन उनकी सोच कोयंबटूर की वर्कशॉप और कक्षाओं में आज भी जिंदा है। पॉलीटेक्निक और कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे संस्थान कुशल हाथ तैयार कर रहे हैं। साइंस म्यूजियम उनकी मशीनों को संजोए हुए है। हाल के वर्षों में बायोपिक और चर्चाओं ने नई पीढ़ी का ध्यान उनकी ओर खींचा है।
नायडू का असल सबक डिग्री या बड़े दावों में नहीं था। समस्या को करीब से देखना, चीजों को खोलकर समझना और आम आदमी की पहुंच में समाधान लाना। आज जब देश स्वदेशी निर्माण और कौशल की बात करता है, तब कलंगल के उस बेचैन लड़के की कहानी पहले से ज्यादा प्रासंगिक लगती है। उनकी विरासत सिर्फ पुरानी मशीनों में नहीं, बल्कि बनाने और सीखने की उस आदत में बसी है जो अभी भी शहर को आगे बढ़ा रही है।
