हम अक्सर अपनी ज़िंदगी की छोटी-छोटी परेशानियों का रोना रोते रहते हैं। कभी ऑफिस में बॉस ने डांट दिया, कभी मनपसंद खाना नहीं मिला, या कभी ट्रेन लेट हो गई तो हमें लगता है की दुनिया का सारा दुख हमारे ही हिस्से में आ गया है।
लेकिन जब आप हरियाणा की इस धाकड़ शेरनी, शर्मिला धनखड़ की कहानी सुनेंगे ना, तो आपका ज़िन्दगी की तरफ पूरा नजरिया ही बदल जायेगा।
आपको लगेगा की एक इंसान, वो भी एक औरत, इतना दर्द, इतना ज़ुल्म और इतना टॉर्चर सहकर भी ज़िंदा कैसे रह सकती है?
और सिर्फ ज़िंदा ही नहीं रही.. उस औरत ने उस दर्द को अपनी ऐसी भयंकर ताकत बनाया की आज वो ‘Commonwealth Games’ में ‘Gold Medal’ जीतने वाली भारत की पहली पैरा-एथलीट महिला बन गयी है।
ये कोई फिल्मी कहानी नहीं है, जिसमें हीरो आखिरी सीन में आकर सब कुछ ठीक कर देता है।
ये एक ऐसी असली कहानी है जहाँ हीरो भी वो खुद थी, अपनी रक्षक भी वो खुद थी और अपना मुकद्दर लिखने वाली भी वो खुद ही थी।
आज जिस शर्मिला धनखड़ के गले में 2026 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स का सोने का मेडल चमक रहा है, जिस औरत को आज पूरा देश सैल्यूट कर रहा है, एक वक़्त ऐसा भी था जब इसी समाज ने उसे पैरों की धूल समझकर सड़क पर फेंक दिया था।
खौफनाक रात का वो मंजर जब एक बेबस माँ को बिना कपड़ों के अपनी दो बच्चियों के साथ सड़क पर फेंक दिया गया
सोचकर देखिए वो नज़ारा… सर्दियों की एक कड़कड़ाती रात। घड़ी में रात के 11 बज रहे थे। आस-पास का पूरा इलाका गहरी नींद में सोया हुआ था।
लेकिन शर्मिला की ज़िंदगी में उस रात एक ऐसा खौफनाक तूफ़ान आया जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया।
उसका पति, जो नशे में पूरी तरह धुत था, एक हैवान की तरह घर में घुसा। उसे इंसान कहना भी इंसानियत को गाली देने जैसा होगा, वो एक पूरा का पूरा राक्षस था।
उस नशेड़ी ने बिना किसी बात के, बिना किसी रहम के शर्मिला को पीटना शुरू कर दिया। ये कोई मामूली मारपीट नहीं, ये एक खौफनाक टॉर्चर था जो पूरे चार घंटे तक चला!
रात के 11 बजे से लेकर 3 बजे तक… वो हैवान एक लाचार औरत को जानवरों की तरह पीटता रहा।
शर्मिला रोती रही, चीखती रही, रहम की भीख मांगती रही, लेकिन उस नशेड़ी के सिर पर तो खून सवार था।
घर के एक कोने में दुबकी उनकी दो छोटी-छोटी बच्चियां दहशत के मारे कांप रही थीं और अपनी माँ को लहूलुहान होते हुए देख रही थीं।
और हद तो तब पार हो गई जब रात के 3 बजे, उस राक्षस ने इंसानियत की बची-खुची मर्यादाओं को भी तार-तार कर दिया।
उसने मारते-मारते शर्मिला और उसकी दोनों बच्चियों को बिना कपड़ों के ही घर से बाहर सड़क पर फेंक दिया!
ज़रा सोचिए उस बेबस माँ की हालत! एक तरफ शरीर से खून रिस रहा है, हड्डियों में बेइंतहा दर्द है, और दूसरी तरफ कड़ाके की ठंड में अपनी इज्ज़त और अपनी दो मासूम बच्चियों को सीने से लगाए वो औरत बीच सड़क पर खड़ी है।
इस दर्द की कल्पना करने भर से ही कलेजा फट जाता है।
वो तो भला हो आस-पास के कुछ पड़ोसियों का, जिनकी नींद इस चीख-पुकार से टूट गई। जब उन्होंने सड़क पर उस बेबस औरत और उसकी बच्चियों को ठिठुरते देखा, तो उनका भी दिल दहल गया।
उन्होंने फौरन शर्मिला को कंबल ओढ़ाया और उनके मायके वालों को खबर दी। आधी रात को शर्मिला के बूढ़े और लाचार माता-पिता अपनी लहूलुहान बेटी और नातिनों को उस नरक से निकालकर अपने घर ले गए।
वो रात शर्मिला की ज़िंदगी की सबसे खौफनाक रात थी, लेकिन शायद उसी रात, उस मार और उस बेइज़्ज़ती के बीच कहीं अंदर ही अंदर एक ऐसी चिंगारी भड़क चुकी थी, जो आने वाले वक़्त में एक भयंकर ज्वालामुखी बनने वाली थी।
अंधी माँ और गरीब किसान पिता की वो होनहार बेटी जिसकी किस्मत में समाज ने सिर्फ दर्द लिखा था
अब आप सोच रहे होंगे की आखिर ऐसी नौबत आई कैसे? ये जानने के लिए हमें थोड़ा फ्लैशबैक में चलना होगा।
शर्मिला की कहानी शुरू होती है हरियाणा के एक छोटे से गाँव ‘छिथरोली’ (Chhithroli) से। जब शर्मिला पैदा हुई, तो घर में जश्नों का माहौल नहीं था, क्योंकि घर की आर्थिक हालत पहले से ही बेहद खस्ता थी।
पिता एक बेहद गरीब किसान थे, जो दिन-रात खेतों में मिट्टी फांककर दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करते थे। और माँ… उनकी माँ तो जन्म से ही देख नहीं सकती थीं (Blind)।
अब ऐसे हालात में पैदा हुई बच्ची की ज़िंदगी भला कितनी आसान हो सकती थी? लेकिन किस्मत को शायद इतने से भी तसल्ली नहीं मिली।
जब शर्मिला महज़ 2 साल की थी, तब उसे एक भयंकर बुखार ने जकड़ लिया। गाँव में कोई अच्छा डॉक्टर नहीं था, कोई खास सुविधा नहीं थी।
जब तक कुछ समझ आता, पोलियो ने उस 2 साल की मासूम के पैरों पर हमेशा के लिए अपना कब्ज़ा जमा लिया। एक तो घर में भयंकर गरीबी, उस पर से विकलांगता का बोझ!
समाज के लोगों ने तो उसी दिन कह दिया था की “ये लड़की तो इस गरीब बाप के लिए उम्र भर का श्राप बन गई है।”
लेकिन वो लोग शर्मिला के अंदर की उस आग को नहीं पहचान पाए। पैर भले ही काम नहीं करते थे, लेकिन उस लड़की का दिमाग़ कंप्यूटर से भी तेज़ चलता था।
स्कूल में जब उसने जाना शुरू किया, तो उसने ठान लिया था की वो अपनी लाचारी को कभी अपनी पहचान नहीं बनने देगी।
आप यकीन नहीं मानेंगे भाई, क्लास 1 से लेकर क्लास 10 तक शर्मिला अपने पूरे स्कूल की टॉपर रही! हर साल उसका नाम बोर्ड पर सबसे ऊपर लिखा जाता था।
वो पढ़-लिखकर कुछ बड़ा करना चाहती थी, एक मुकाम हासिल करना चाहती थी।
पर हमारा ये जो दोगला समाज है ना, ये किसी औरत को, और खासकर एक विकलांग लड़की को आगे बढ़ते हुए कहाँ देख सकता है!
जैसे ही शर्मिला बड़ी हुई, वही पुरानी घिसी-पिटी सोच हावी हो गई- “लड़की सयानी हो गई है, ऊपर से पैर खराब हैं, इसके हाथ पीले कर दो, यही इसकी नियति है।”
गरीब पिता समाज के तानों के आगे मजबूर हो गया। उसने अपनी होनहार, टॉपर बेटी के हाथ से किताबें छीन लीं और उसकी शादी एक ऐसे शख़्स से कर दी, जो नशे की लत में पूरी तरह डूबा हुआ था।
एक ऐसा आदमी जिसे अपनी ज़िंदगी का होश नहीं था, उसके पल्ले एक टॉपर लड़की को बांध दिया गया।
एक होनहार बच्ची के सारे सपने, उसकी सारी काबिलियत को उस शादी के हवन कुंड में ज़िंदा जला दिया गया।
शर्मिला की शादी एक शादी नहीं थी दोस्त, वो एक ऐसा पिंजरा था जहाँ उसे हर दिन एक नई मौत मरना था। नशेड़ी पति का टॉर्चर, गालियां, और बेतहाशा मार-पीट उसकी ज़िंदगी का रूटीन बन गया था।
और समाज? समाज तो बस ये कह कर पल्ला झाड़ लेता था की “औरत का तो यही नसीब है, उसे एडजस्ट करना ही पड़ता है।”
लेकिन उस रात की 4 घंटे की खौफनाक पिटाई ने उस ‘एडजस्ट’ करने वाली औरत को अंदर से पूरी तरह मार दिया था।
और जब इंसान अंदर से मर जाता है ना, तब उसके अंदर से जो बागी पैदा होता है, उसे दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती!
चार घंटे तक बेरहमी से मार खाने के बाद भी ताने मारने वाले वो बुज़दिल रिश्तेदार और समाज का दोगलापन
जब उस खौफनाक रात के बाद शर्मिला अपने माता-पिता के घर पहुंची, तो उसे लगा की शायद अब उसके अपनों का प्यार उसके घावों पर मरहम लगाएगा।
उसे लगा की कम से कम यहाँ उसे सुरक्षा मिलेगी। लेकिन भाई, हमारे समाज का एक बहुत ही कड़वा और घिनौना सच है- यहाँ औरतों को न्याय नहीं, सिर्फ ताने मिलते हैं।
इसे अंग्रेजी में ‘विक्टिम शेमिंग’ (Victim Shaming) कहते हैं, यानी जिसके साथ ज़ुल्म हुआ है, उसी को कटघरे में खड़ा कर दो।
जैसे ही ये खबर फैली की शर्मिला अपने पति का घर छोड़कर दो बच्चियों के साथ मायके आ गई है, तो रिश्तेदारों और पड़ोसियों का तांता लग गया।
लेकिन वो लोग वहाँ उसका हालचाल पूछने या उसे हिम्मत देने नहीं आए थे। वो तो वहां पंचायत लगाने आए थे।
आप सोचिए, जिस औरत के शरीर पर नीले निशान पड़े हैं, जिसकी बच्चियां खौफ से कांप रही हैं, उसी औरत के मुंह पर खड़े होकर ये सो-कॉल्ड रिश्तेदार कह रहे थे- “अरे, आदमी तो मारता ही है, औरत को थोड़ा बहुत सहना पड़ता है!”
हद तो तब हो गई जब कुछ लोगों ने शर्मिला के माथे पर ही ‘घर तोड़ने वाली’ का ठप्पा लगा दिया।
लोग कहने लगे, “इसी में कोई खोट होगा, वरना कोई आदमी अपनी बीवी-बच्चों को आधी रात को नंगा करके सड़क पर थोड़ी फेंकता है! इसने ही घर उजाड़ लिया अपना।”
ज़रा इस घटिया मानसिकता को देखिए! उस नशेड़ी हैवान पति से कोई सवाल नहीं पूछ रहा था। उसे किसी ने गलत नहीं ठहराया।
सारी गलती, सारा दोष उस बेचारी अपाहिज औरत के सिर मढ़ दिया गया जो खुद मौत के मुंह से वापस लौट कर आई थी।
ये वो दौर था जब शर्मिला पूरी तरह से टूट चुकी थी। एक तो बचपन से पोलियो का दर्द, फिर पति की वो दरिंदगी, और अब इन रिश्तेदारों के ज़हरीले बाण!
कोई भी आम इंसान होता तो शायद इसी डिप्रेशन में घुट-घुट कर अपनी जान दे देता। लेकिन शर्मिला बाकियों जैसी कमजोर नहीं थी।
वो चुपचाप उन तानों को सुन रही थी, पर उसके अंदर ही अंदर एक ऐसा तूफ़ान सुलगने लगा था जो एक दिन इन सबकी बोलती बंद करने वाला था।
जब ज़िंदगी में आया फरिश्ता और 34 की उम्र में एक टूट चुकी औरत ने उठाया लोहा
कहते हैं ना की जब ऊपर वाला सारे दरवाज़े बंद कर देता है, तो वो कहीं न कहीं से एक छोटी सी खिड़की ज़रूर खोलता है।
शर्मिला की इस घुटन भरी ज़िंदगी में वो खिड़की बनकर आए ‘अजीत सिंह’। अजीत सच में किसी फरिश्ते से कम नहीं थे।
जब अजीत को शर्मिला की कहानी और उसके दर्द के बारे में पता चला, तो उन्होंने समाज की परवाह किए बिना शर्मिला का हाथ थामने का फैसला किया।
अजीत ने ना सिर्फ शर्मिला से शादी की, बल्कि उनके बचपन के पोलियो और उनके अतीत के सारे दर्दों को भी अपना लिया।
और सबसे बड़ी बात, जो एक असली मर्द की पहचान होती है, अजीत ने शर्मिला की दोनों बेटियों को बिल्कुल अपनी सगी बेटियों की तरह सीने से लगा लिया।
शादी के बाद अजीत ने देखा की शर्मिला के अंदर एक अजीब सी घुटन है। वो बाहर से शांत दिखती थी, लेकिन अंदर ही अंदर समाज के वो ताने उसे खा रहे थे।
वो कुछ साबित करना चाहती थी। तब अजीत ने कुछ ऐसा किया जिसने इतिहास की नींव रख दी। अजीत ने शर्मिला से कहा- “तुम रोना बंद करो, और मैदान में उतरो। तुम्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।”
अब ज़रा सोचिए दोस्त! जिस उम्र में आम एथलीट रिटायरमेंट (Retirement) की फाइलें तैयार करने लगते हैं, जब 34 साल की उम्र में खिलाड़ियों के शरीर जवाब देने लगते हैं…
उस उम्र में दो बच्चों की एक अपाहिज माँ ने मैदान में उतरने का फैसला किया। ये अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं था।
शुरुआत में शर्मिला ने पैरा-कबड्डी (Para-Kabaddi) खेलना शुरू किया। पसीना बहाया, अपनी कमज़ोरियों से लड़ीं। लेकिन फिर उनका रुख ‘पैरा-एथलेटिक्स’ की तरफ हो गया।
इसी सफर में वो रेवाड़ी के मशहूर ‘राव तुलाराम स्टेडियम’ पहुंचीं। वहां उनकी मुलाकात हुई पैरालंपियन कोच ‘टेक चंद’ (Paralympian Tek Chand) से।
टेक चंद ने शर्मिला की आँखों में वो दबी हुई आग और वो जुनूनी गुस्सा देख लिया था। टेक चंद ने समझ लिया था की अगर इस गुस्से को सही दिशा मिल जाए, तो ये औरत पोडियम पर आग लगा सकती है।
उन्होंने शर्मिला के हाथों में ‘शॉट पुट’ (Shotput – गोला फेंक) थमा दिया और उन्हें एक असली योद्धा की तरह ट्रेन करना शुरू किया।
घर बिक गया और अंधी माँ ने दांव पर लगा दिए खेत, लेकिन इस शेरनी ने हार मानने से कर दिया इंकार
जैसे ही शर्मिला ने लोहे के उस गोले को हाथ में उठाया, उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल गई।
वो गोला सिर्फ एक खेल का हिस्सा नहीं था, वो उनके लिए अपने उस नशेड़ी पति, उन रिश्तेदारों और इस समाज के मुँह पर मारा जाने वाला तमाचा था!
ट्रेनिंग शुरू करते ही शर्मिला ने मैदान में तहलका मचा दिया। 2021 की अपनी पहली ही ‘पैरा नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप’ में इस शेरनी ने ऐसा दहाड़ लगाई की सब सन्न रह गए।
जिस औरत ने 34 की उम्र में खेल शुरू किया था, उसने अपनी पहली ही नेशनल चैंपियनशिप में सीधे गोल्ड मेडल (Gold Medal) पर कब्ज़ा कर लिया।
और बात सिर्फ गोल्ड तक नहीं रुकी, उसने F57 कैटेगरी का नेशनल रिकॉर्ड भी चकनाचूर कर दिया!
लेकिन दोस्त, एक ग़रीब खिलाड़ी के लिए असली लड़ाई मैदान के अंदर नहीं, मैदान के बाहर होती है। नेशनल रिकॉर्ड तो बन गया, लेकिन अब सपना दुनिया फतह करने का था।
और जैसे-जैसे खेल बड़ा होता गया, खर्चे भी भयंकर होने लगे। वर्ल्ड लेवल की ट्रेनिंग, खास डाइट, इंटरनेशनल किट और महंगी कोचिंग… एक आम परिवार के लिए ये सब उठाना नामुमकिन सा था।
2023 आते-आते हालत ये हो गई की परिवार के पास ट्रेनिंग के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची।
अब क्या किया जाए? क्या 34 की उम्र में देखा गया ये सपना पैसों की कमी से टूट जाएगा? क्या समाज फिर से हंसेगा? नहीं!
अजीत सिंह और शर्मिला ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे सुनकर अच्छे-अच्छों के रोंगटे खड़े हो जाएं।
शर्मिला के सपनों में जान फूंकने के लिए अजीत ने रेवाड़ी में बना अपना पुश्तैनी घर तक बेच डाला! जी हाँ, वो घर जिसमें वो सुकून से रह सकते थे, उसे बेचकर सारा पैसा ट्रेनिंग में झोंक दिया गया।
और हद तो तब पार हो गई जब शर्मिला की बूढ़ी और जन्म से अंधी माँ को ये बात पता चली। उस माँ ने अपनी लाठी के सहारे चलते हुए अपना आधा एकड़ पुश्तैनी खेत भी दांव पर लगा दिया और उसे बेच डाला!
उस बेबस माँ ने अपनी सारी जमापूंजी अपनी बेटी के अरमानों पर न्योछावर कर दी।
उस वक़्त शर्मिला की आँखों से आंसू नहीं, बल्कि खून उतर रहा था। जब मीडिया ने उनसे पूछा की सब कुछ बिक गया है, अब आगे क्या, तो शर्मिला ने वो ऐतिहासिक लाइन कही थी जो आज भी हर एथलीट के दिल में गूंजती है-
“स्पोर्ट्स ने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है… पहले दुनिया जीतूंगी, मेडल लाऊंगी, और फिर अपना वो घर वापस खरीदूंगी!”
ये एक बागी औरत की हुंकार थी। एक ऐसी औरत जिसका सब कुछ छिन गया था, लेकिन उसका जज़्बा हिमालय से भी ऊंचा था।
और फिर आया 2026 का Commonwealth Games, जब इस लाचार औरत ने ‘Gold Medal’ जीतकर पूरी दुनिया में गाड़ दिया भारत का झंडा
ज़िंदगी में जब आप अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं ना, जब आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचता, तब जो ताक़त पैदा होती है, उसे दुनिया की कोई चीज़ नहीं रोक सकती।
अपना घर, अपनी ज़मीन, सब कुछ बेचकर जब शर्मिला धनखड़ ने इंडिया की नीली जर्सी पहनी, तो उनके कंधों पर सिर्फ एक देश का भार नहीं था।
उनके कंधों पर उस अंधी माँ का कर्ज़ था जिसने खेत बेच दिए, उस पति का विश्वास था जिसने अपना पुश्तैनी घर बेच दिया, और उन दो बेटियों का भविष्य था जिन्हें आधी रात को नंगा करके सड़क पर फेंका गया था।
और फिर वो ऐतिहासिक पल आ ही गया, जिसका इंतज़ार भारत के हर खेल प्रेमी को था। 2026 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स (Glasgow Commonwealth Games 2026) का वो भव्य स्टेडियम।
पूरी दुनिया की नज़रें उस मैदान पर टिकी थीं। विमेंस शॉट पुट (Women’s Shot Put) की F57 कैटेगरी का फाइनल इवेंट चल रहा था।
गोरे देशों की सुविधाओं में पली-बढ़ी एथलीट्स मैदान में थीं। और उनके बीच व्हीलचेयर पर खड़ी थी हरियाणा के एक छोटे से गाँव की वो औरत, जिसने अपनी आधी ज़िंदगी घरेलू हिंसा और तानों के बीच गुज़ारी थी।
जब शर्मिला का नाम पुकारा गया और वो थ्रोइंग सर्कल में आईं, तो स्टेडियम में भयंकर शोर था। लेकिन कसम से यार, उस वक़्त शर्मिला के दिमाग़ में वो शोर नहीं, बल्कि कुछ और ही गूंज रहा होगा।
जब उन्होंने वो 3 किलो का लोहे का गोला अपने हाथ में उठाया, तो उनके हाथों में महज़ लोहे का वज़न नहीं था।
उस गोले में उन 4 घंटों की मार का दर्द था, उस आधी रात की कड़कड़ाती ठंड की सिहरन थी, और उन बुज़दिल रिश्तेदारों के तानों की गूंज थी जिन्होंने उसे ‘घर तोड़ने वाली’ कहा था।
शर्मिला ने अपनी आँखें बंद कीं, पूरी ताक़त, पूरा गुस्सा और अपनी ज़िंदगी का सारा दर्द उस दाहिने हाथ में इकट्ठा किया और एक भयंकर हुंकार के साथ उस लोहे के गोले को हवा में उछाल दिया!
वो गोला हवा को चीरता हुआ गया और ज़मीन पर एक ऐसे निशान पर जाकर गिरा जिसने उसी सेकंड इतिहास के पन्ने फाड़कर एक नया अध्याय लिख दिया।
9.81 मीटर! जी हाँ, 9.81 मीटर का वो ऐतिहासिक और जादुई थ्रो! स्टेडियम में बैठे विदेशी भी सन्न रह गए। कमेंटेटर्स की आवाज़ें कांपने लगीं।
स्कोरबोर्ड पर नंबर 1 की पोज़िशन पर चमक उठा- ‘Sharmila Dhankar, INDIA – GOLD’।
2026 के उस पल में शर्मिला धनखड़ कॉमनवेल्थ पैरा-एथलेटिक्स के इतिहास में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की पहली महिला बन चुकी थीं!
आपको सुनने में 9 मीटर बहुत कम लग रहा होगा, लेकिन ध्यान रखिये एक ‘अपाहिज’ के लिए इतनी दूरी पर एक लोहे के गोले को फेकना वैसा ही है जैसा एक तीरंदाज़ के लिए आँखें बंद करके निशाना लगाना!
जो कारनामा आज तक सुविधाओं में पलने वाले बड़े-बड़े एथलीट नहीं कर पाए, वो कारनामा उस 34 साल की ‘अपाहिज’ और ‘घरेलू हिंसा’ की शिकार औरत ने कर दिखाया था।
जब शर्मिला के गले में वो चमकता हुआ सोने का मेडल डाला गया… शर्मिला की आँखों से आंसू बह रहे थे। लेकिन वो आंसू लाचारी के नहीं थे, वो आंसू जीत के थे।
वो आंसू चीख-चीख कर उस नशेड़ी पहले पति और उन दोगले रिश्तेदारों को बता रहे थे की “देख लो इस मैडल को! तुमने मुझे घर से निकाला था ना, आज पूरी दुनिया मुझे अपने सिर-आँखों पर बिठा रही है!”
आज उनके पास अपना वो बिका हुआ घर वापस खरीदने की ताक़त है। आज उनकी उस अंधी माँ के खेत भी वापस आएंगे और दुनिया का हर वो सम्मान मिलेगा जिसकी वो हक़दार हैं।
ये मेडल सिर्फ शर्मिला का नहीं है, ये उस हर औरत का है जिसे आज भी चारदीवारी के अंदर पीटा जाता है। जिसे बात-बात पर ताने मारे जाते हैं, जिसे अपाहिज या कमज़ोर समझकर पैरों की धूल समझा जाता है।
शर्मिला धनखड़, तुम्हें पूरे हिंदुस्तान का करोड़ों बार सलाम! तुमने सिर्फ सोना नहीं जीता, तुमने इस देश की करोड़ों लड़कियों के मुर्दा दिलों में फिर से ज़िंदगी और आग फूंक दी है!
नारी शक्ति को सलाम! भारत माता की जय!
