जिन ‘आदिवासी बेटियों’ के हाथों में वामपंथियों ने थमाई ‘बंदूकें’, आज वही ‘नक्सल’ महिलाएं शान से कर रही ‘स्वदेशी फैशन शो’, कैसे मोदी सरकार की नीतियों ने बंदूकें छुड़वाकर भटकी हुई बेटियों को दी नई जिंदगी

कभी-कभी सच में ऐसे नज़ारे देखने को मिल जाते हैं जो इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज़ हो जाते हैं।

7 अगस्त 2026 की तारीख भी हिंदुस्तान के लिए कुछ ऐसी ही रही। जगह थी रायपुर का पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम।

मौका था राष्ट्रीय हथकरघा दिवस (National Handloom Day) का। पूरा का पूरा ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था।

आप सोच रहे होंगे की यार किसी फैशन शो में इतनी क्या खास बात हो गई? तो भाई, ज़रा दिल थाम कर सुनिए…

क्योंकि उस चमचमाते रैंप पर जो 9 महिलाएं कैटवॉक कर रही थीं, वो कोई मुंबई या दिल्ली से बुलाई गई प्रोफेशनल मॉडल्स नहीं थीं।

वो बस्तर और सुकमा के बीहड़ों की वो खूंखार पूर्व महिला नक्सली थीं, जिनके नाम से ही कभी पूरे इलाके में दहशत फैल जाती थी!

सच में, ये सीन देखकर वहां मौजूद हर इंसान की आंखें फटी की फटी रह गईं। ज़रा सोचिए इस बदलाव को!

जिन कंधों पर कल तक 15-20 किलो की AK-47 और रायफलें टंगी होती थीं, आज उन पर छत्तीसगढ़ का मशहूर और खूबसूरत ‘कोसा सिल्क’ लहरा रहा था।

जिन पैरों ने सालों-साल पुलिस और सुरक्षाबलों की गोलियों से बचते हुए घने जंगलों की खाक छानी थी, आज वही पैर शानदार हील्स (Heels) पहनकर एकदम गजब के कॉन्फिडेंस के साथ रैंप पर चल रहे थे।

कल तक जिनके चेहरों पर पुलिस का खौफ और मौत की दहशत छपी रहती थी, आज उन चेहरों पर एक अजीब सा सुकून, मुस्कान और आज़ादी की चमक थी।

ऑडिटोरियम में आगे की कतार में बैठे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और पूर्व सीएम रमन सिंह जब खड़े होकर इन बेटियों के लिए तालियां बजा रहे थे, तो वो सिर्फ तालियां नहीं थीं भाई।

वो तालियों की गूंज दरअसल उस वामपंथी विचारधारा के मुंह पर पड़ा सबसे करारा तमाचा था, जिसने दशकों से हमारी इन भोली-भाली आदिवासी बेटियों को बरगला कर उन्हें हत्यारा बना दिया था।

ये महज़ कोई स्वदेशी फैशन शो नहीं था यार। ये भारत माता के माथे से लाल आतंक के उस घिनौने कलंक को मिटाने का जीता-जागता जश्न था।

सोशल मीडिया पर जैसे ही इन पूर्व नक्सलियों के रैंप वॉक का वीडियो वायरल हुआ, पूरे देश में तहलका मच गया।

हर कोई बस एक ही बात लिख रहा था की देखिए, कैसे कम्युनिज़्म (Communism) इंसान के हाथ में बंदूक थमाकर उसे हैवान बना देता है..

और कैसे हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद और मोदी सरकार की नीतियां उसी इंसान के हाथों से बंदूक छीनकर उसे वापस समाज में सम्मान की ज़िंदगी से जोड़ देती हैं।

ये वामपंथ की अब तक की सबसे भयंकर वैचारिक हार है!

अर्बन नक्सलियों का खेल जिन्होंने मासूम आदिवासी बेटियों को बनाया था खूंखार हत्यारा, कैसे होता आदिवासी महिलाओं का ब्रेनवॉश

अब सवाल ये उठता है की सुकमा और दंतेवाड़ा के जंगलों में रहने वाली इन मासूम लड़कियों के हाथों में ये बंदूकें आखिर आईं कहाँ से?

कौन हैं वो लोग जिन्होंने इन्हें अपने ही देश, अपनी ही पुलिस और अपने ही समाज के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए भड़काया?

अगर इसका जवाब ढूंढना है ना, तो आपको बस्तर के जंगलों में नहीं, बल्कि वामपंथियों के अड्डो में जाना होगा।

ये वो सफेदपोश ‘अर्बन नक्सल’ हैं जो दिन में तो मानवाधिकार और आज़ादी का ज्ञान बघारते हैं, और रात के अंधेरे में इन्हीं जंगलों में ‘माओ-लेनिन’ का ज़हरीला साहित्य बांटते हैं।

इन अर्बन नक्सलियों का पाखंड देखिए ज़रा! अपने खुद के बच्चों को तो ये लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके अमेरिका और लंदन की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों में पढ़ने भेजते हैं।

वहां इनके बच्चे मैनेजमेंट और लॉ की डिग्रियां लेते हैं। लेकिन जब बात हमारी आदिवासी बेटियों की आती है, तो ये उनके हाथों से किताबें और कलम छीनकर उन्हें लाल सलाम का झंडा और लैंडमाइन थमा देते हैं।

क्या गजब की क्रांति है! अपने बच्चों को ‘डिग्री’ और गरीबों के बच्चों को ‘बंदूक’!

जंगलों के अंदर इन महिला नक्सलियों की जो असली ज़िंदगी होती है ना, उसका सच सुन लेंगे तो रूह कांप जाएगी। वहां कोई क्रांति-व्रांति नहीं चल रही होती।

वहां सिर्फ और सिर्फ शोषण का नंगा नाच चलता है। बड़े-बड़े नक्सली कमांडर इन कम उम्र की लड़कियों का ब्रेनवॉश करते हैं।

उन्हें सिर्फ एक मशीन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जब सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ होती है, तो यही कायर नक्सली कमांडर इन लड़कियों को ढाल बनाकर आगे खड़ा कर देते हैं ताकि पुलिस की पहली गोली इन्हें लगे और वो खुद जंगल के रास्ते दुम दबाकर भाग सकें।

इतने सालों तक इस वामपंथी ईकोसिस्टम ने इन लड़कियों के दिमाग में यही ज़हर घोला की सरकार तुम्हारी दुश्मन है, पुलिस तुम्हारी जान ले लेगी, समाज तुम्हें कभी नहीं अपनाएगा।

कम्युनिज़्म ने असल में इन लड़कियों के अंदर के इंसान को मार डाला था। एक ऐसी विचारधारा जो आपको अपने ही देशवासियों का खून पीने के लिए उकसाती है, वो विचारधारा इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन है।

लेकिन कहते हैं ना की झूठ के पैर नहीं होते। अर्बन नक्सलियों की वो खूनी दुकान अब हमेशा के लिए बंद होने की कगार पर पहुँच चुकी है।

मोदी सरकार ने इस नेक्सस को जिस तरह से तोड़ा है, उसने इन वामपंथियों की रातों की नींदें उड़ा दी हैं।

मोदी सरकार का ‘ऑपरेशन कगार’ का कड़ा प्रहार और आत्मसमर्पण नीति जिसने लाल आतंक की रीढ़ तोड़कर रख दी

अब आते हैं उस बात पर जिसने इस पूरे खेल को पलट कर रख दिया। जब तक केंद्र में और राज्य में ढुलमुल सरकारें थीं, तब तक ये नक्सली बस्तर में अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे।

लेकिन भाई, जब केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में विष्णु देव साय की ‘डबल इंजन’ सरकार ने टॉप गियर में काम करना शुरू किया ना, तो इन लाल सलाम वालों के पसीने छूट गए।

देश के गृह मंत्री अमित शाह ने तो खुले मंच से कसम खा ली थी की मार्च 2026 तक भारत को ‘नक्सल-मुक्त’ बनाना है। और ये सिर्फ कोई खोखला राजनीतिक बयान नहीं था!

सरकार ने सुरक्षाबलों को एकदम ‘फ्री हैंड’ दे दिया। फिर शुरू हुआ बस्तर के जंगलों में ‘ऑपरेशन कगार’ (Operation Kagar)। इस ऑपरेशन के तहत सेना और पुलिस ने कोई रहम नहीं दिखाया।

जो नक्सली हथियार उठाने पर आमादा थे, उन्हें चुन-चुनकर सीधा ऊपर का टिकट काट दिया गया। दशकों से जो बड़े-बड़े टॉप नक्सली कमांडर जंगलों में छिपकर बैठे थे, उनकी ऐसी धुलाई हुई की पूरे नेक्सस में खौफ बैठ गया।

लेकिन मोदी सरकार की रणनीति का असली मास्टरस्ट्रोक सिर्फ ‘गोली’ नहीं था। सरकार जानती थी की कई भटके हुए आदिवासी युवाओं को डरा-धमका कर इस दलदल में धकेला गया है।

इसलिए एक तरफ तो ऑपरेशन कगार का खौफ था, और दूसरी तरफ सरकार ने एक बेहद शानदार ‘सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी’ (पुनर्वास नीति) पेश कर दी।

प्रशासन ने जंगलों में पर्चे बंटवा दिए और सीधा संदेश दिया- “अगर हाथ में बंदूक रखोगे, तो मारे जाओगे। लेकिन अगर हथियार डालकर मेनस्ट्रीम (मुख्य समाज) में आना चाहते हो, तो हम तुम्हें अपनाएंगे।”

सरकार ने वादा किया की जो भी सरेंडर करेगा, उसे सुरक्षित घर मिलेगा, रोज़गार की ट्रेनिंग मिलेगी, आर्थिक मदद दी जाएगी और एक सम्मानजनक आज़ाद ज़िंदगी मिलेगी।

बस, यही वो ‘ब्रह्मास्त्र’ था जिसने लाल आतंक की कमर तोड़ दी। जो सुकमा और दंतेवाड़ा कभी ‘रेड कॉरिडोर’ कहलाते थे, आज वो सरकार की इसी नीति की वजह से धीरे-धीरे ‘ग्रीन कॉरिडोर’ में बदल रहे हैं।

सुकमा के खूंखार जंगलों से लेकर रायपुर के चमचमाते रैंप तक भटकी हुई आदिवासी बेटियों की वापसी की भावुक कहानी

यकीन मानिए, कागज़ पर नीतियां बनाना अलग बात है, लेकिन उन नीतियों को ज़मीन पर उतारना और किसी की ज़िंदगी बदलना बहुत ही जज़्बाती काम होता है।

सुकमा का वो सरकारी पुनर्वास केंद्र (Rehabilitation Centre)… जहां ये 9 पूर्व महिला नक्सली रह रही थीं।

जब प्रशासन ने तय किया की इन महिलाओं को ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ पर रायपुर के रैंप पर उतारा जाएगा, तो किसी को यकीन ही नहीं था की ऐसा सच में हो पाएगा।

ज़रा सोचिए पुनीम देवे (उम्र करीब 31 साल) और नंदिनी (18 साल) जैसी उन लड़कियों के बारे में! ये वो लड़कियां थीं जिन्होंने अपनी पूरी जवानी बस्तर के खूंखार जंगलों, मच्छरों, लैंडमाइंस और बंदूकों के बीच काट दी थी।

जब इन्हें सुकमा से रायपुर लाया गया और एक हफ्ते की स्पेशल ट्रेनिंग शुरू हुई, तो वो नज़ारा किसी को भी भावुक कर दे।

जिंदगी में पहली बार इन लड़कियों ने किसी ‘ब्यूटी पार्लर’ का मुंह देखा था। जब ये पहली बार शीशे के सामने खड़ी हुईं और इनका मेकअप हुआ, तो वो खुद को पहचान ही नहीं पा रही थीं।

जिस उम्र में लड़कियों को सजना-संवरना चाहिए, उस उम्र में वामपंथियों ने इनके हाथों में बारूद थमा दिया था। ट्रेनिंग के दौरान सबसे मुश्किल काम था इन्हें हील्स (Heels) पहनाकर चलाना।

जिन पैरों में सालों तक भारी-भरकम और भद्दे जंगल-बूट रहे हों, उनके लिए हील्स पहनना किसी पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था।

लेकिन इन लड़कियों ने हार नहीं मानी! और सच कहूं तो ये रैंप वॉक की ट्रेनिंग सिर्फ शारीरिक नहीं थी। यह पूरी तरह से एक ‘मानसिक’ (Psychological) ट्रेनिंग थी।

इन लड़कियों के अंदर कहीं न कहीं ये खौफ और हीन भावना भरी थी की “हम तो मुजरिम हैं, हमने तो पुलिस पर गोलियां चलाई हैं, लोग हमें कैसे अपनाएंगे?” प्रशासन के अफसरों और ट्रेनर्स ने उनके अंदर से इसी खौफ को बाहर निकाला।

और आखिराकर जब वो पल आया! जब 7 अगस्त को वो स्टेज पर कोसा सिल्क पहनकर रैंप पर उतरीं! ऑडिटोरियम की वो तालियां, सीएम साहब का खड़े होकर सम्मान देना…

उस एक पल में उन लड़कियों के अंदर का सारा डर, सारा अपराधबोध हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो गया। उन्हें लगा की हाँ, यह देश हमारा है, यह सिस्टम हमारा है और हम इस समाज का एक अटूट हिस्सा हैं।

खूनी कम्युनिज्म का असली चेहरा जो आदिवासियों को हथियार थमाता है और विकास का विरोध करता है

अब ज़रा उन कम्युनिस्ट और झोलाछाप एनजीओ वालों की बात कर लेते हैं। जब पुलिस जंगलों में किसी नक्सली को मार गिराती है, तो दिल्ली से लेकर न्यूयॉर्क तक ये ‘मानवाधिकार’ वाले तमाशा बना देते हैं.. “अरे देखो, आदिवासियों पर अत्याचार हो रहा है!”

लेकिन आज आपसे एक सीधा सवाल है भाई- जब ये 9 भटकी हुई लड़कियां रैंप पर स्वदेशी साड़ियां पहनकर आज़ादी की सांस ले रही हैं, तो तुम्हारे मुंह में दही क्यों जम गया है?

आज तुम्हारी ज़बान पर ताला क्यों लगा है? क्योंकि आज तुम्हारा वो खूनी एजेंडा नंगा हो चुका है! कम्युनिज्म (Communism) कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है यार, ये एक दिमागी बीमारी है।

ये आपको सिर्फ और सिर्फ तोड़ना सिखाती है। ये वो कैंसर है जो एक गरीब आदिवासी को भड़काता है की वो अपने ही गांव के स्कूल को बम से उड़ा दे, अपनी ही सड़कें खोद दे, और विकास करने आए अफसरों का गला काट दे।

लेकिन आज सोशल मीडिया पर एक जुमला बहुत ज़बरदस्त वायरल हो रहा है- “फ्रॉम लेनिन टू लिनेन” (From Lenin to Linen)!

मतलब, जिन वामपंथियों ने इन्हें लेनिन और माओ की खूनी किताबें पढ़ाई थीं, आज उसी खूनी विचारधारा को लात मारकर ये महिलाएं लिनेन और सिल्क के कपड़ों में शान से घूम रही हैं।

‘कैंप से लेकर रैंप’ (From Camps to Ramp) तक का यह सफर सिर्फ 9 महिलाओं का सफर नहीं है। ये पूरे भारत के राष्ट्रवाद की उस विदेशी और ज़हरीली कम्युनिस्ट सोच पर बहुत बड़ी जीत है।

आज इन महिलाओं की मुस्कान ने उन तमाम अर्बन नक्सलियों की नींदें हराम कर दी हैं, जो अब तक इनके खून की दलाली खाकर विदेशों से फंडिंग बटोरते थे।

गोलियों की गूंज से स्वदेशी आर्थिक हुनर तक, कैसे सभ्य समाज में लौट रहा नया बस्तर और छत्तीसगढ़

ज़रा याद कीजिए, आज से 10-15 साल पहले तक बस्तर और दंतेवाड़ा की पहचान क्या थी?

जब भी टीवी पर बस्तर का नाम आता था, तो स्क्रीन पर बारूदी सुरंगें (Landmines), आईईडी (IED) धमाकों में उड़े हुए पुलिस के वाहन और खून से लाल हुई ज़मीन की तस्वीरें ही छाई रहती थीं।

पूरे देश को लगता था की यार वहां तो सिर्फ मौत का ही राज है। लेकिन आज वो भयानक तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है भाई!

विकास की जो लहर कभी सुकमा और बीजापुर के जंगलों के बाहर से ही लौट जाया करती थी, आज वो एकदम बीहड़ों के बीचों-बीच पहुँच रही है।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत जो चमचमाती सड़कें अब उन गांवों तक पहुँच रही हैं जहाँ कभी नक्सलियों का राज चलता था, उसने लाल आतंक को कमजोर कर दिया है।

जब सड़क पहुंचती है ना दोस्त, तो सिर्फ गाड़ियां नहीं आतीं, बल्कि वहां स्कूल आते हैं, अस्पताल आते हैं और सबसे बड़ी बात… वहां पुलिस और प्रशासन पहुँचता है!

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा ने दिन-रात एक करके दिल्ली से लेकर रायपुर तक जो कड़क प्लान बनाया है, उसका असर अब सीधे ज़मीन पर दिख रहा है।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर ग्रामोद्योग विभाग ने जो ‘कोसल फैब’ (Koshal Fab) जैसे ब्रांड्स उतारे हैं और स्वदेशी को बढ़ावा दिया है, ये सिर्फ कपड़े बेचने का कोई सरकारी अभियान नहीं है।

ये हमारे आदिवासियों को आर्थिक रूप से आज़ाद करने की एक बहुत बड़ी मुहीम है। जब गांव के किसी आदिवासी के हाथ में खुद की मेहनत से कमाए हुए पैसे आते हैं, जब वो देखता है की सरकार उसके हुनर की इज़्ज़त कर रही है, तो भला वो किसी नक्सली कमांडर के बहकावे में क्यों आएगा?

नक्सलियों ने दशकों तक आदिवासियों को गरीबी और भुखमरी में इसलिए रखा ताकि वो 100-200 रुपये थमाकर उनसे पुलिस पर हमला करवा सकें।

लेकिन आज जब वही आदिवासी अपने हाथों से बुने कपड़ों को राष्ट्रीय मंच पर बिकता देखता है, तो उसका सारा भ्रम टूट जाता है।

गोलियों की खौफनाक गूंज आज हथकरघा की खनक में बदल रही है, और सच कहूं तो यही हमारे नए और बदलते हुए बस्तर की सबसे खूबसूरत धुन है।

‘कम्युनिज्म’ की सबसे बड़ी वैचारिक हार और नए भारत की वो नारी शक्ति जिसका अब कोई अर्बन नक्सल इस्तेमाल नहीं कर पाएगा

रायपुर के उस ऑडिटोरियम में जो कुछ भी हुआ, वो वामपंथ और कम्युनिज्म के ताबूत में ठोकी गई आख़िरी कील है! किसी भी युद्ध को जीतने का मतलब सिर्फ दुश्मनों को गोलियों से भून देना नहीं होता।

असली जीत तब होती है जब आप दुश्मन की विचारधारा को ही ज़मींदोज़ कर दें। उसके दिमाग से ‘कट्टरपंथ’ का वो सड़ा हुआ कचरा निकालकर उसे एक सच्चा और ज़िम्मेदार हिंदुस्तानी बना दें।

मोदी सरकार की यह सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी बिल्कुल यही काम कर रही है। ये गोलियों पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है।

आज जो भी थोड़े-बहुत नक्सली सुकमा और दंतेवाड़ा के घने जंगलों में भटके हुए हैं, पुलिस के डर से छुपकर बैठे हैं… उनके लिए ये रैंप वॉक एक बहुत बड़ा अल्टीमेटम है!

अब वो भी समझ गए हैं की इनके वो आका जो इन्हे भड़काते हैं, वो सिर्फ इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। अब इन्हे समझ आ गया है की हथियार डालकर अपने परिवार के साथ इज़्ज़त की रोटी कमाने में ही उनकी ज़िंदगी खुशहाल हो सकती है ।

अंत में बस यही कहूँगा की आज पूरी दुनिया देख रही है की ये है हमारा ‘नया भारत’! यहाँ नारी शक्ति का मतलब बम, गन-पाउडर या खून-खराबा नहीं है।

यहाँ की बेटियां जब अपने हुनर, अपनी संस्कृति और अपने आत्मसम्मान के साथ कदम बढ़ाती हैं, तो उनके कदमों की आहट विदेशों तक बैठे देश-विरोधियों की नींव हिला देती है।

इन 9 पूर्व महिला नक्सलियों ने रैंप पर अर्बन नक्सलियों के उस पूरे ज़हरीले ईकोसिस्टम को अपनी हील्स के नीचे कुचल कर रख दिया है।

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