इतिहास के सबसे बड़े 'नरसंहार' की याद दिलाता आज का '14 अगस्त विभाजन स्मृति दिवस', आजादी की वो भयानक कीमत जो लाखों हिन्दुओं ने अपनी गर्दनें कटवा कर चुकाई

इतिहास के सबसे बड़े ‘नरसंहार’ की याद दिलाता आज का ’14 अगस्त विभाजन स्मृति दिवस’, आजादी की वो भयानक कीमत जो लाखों हिन्दुओं ने अपनी गर्दनें कटवा कर चुकाई

कल 15 अगस्त है। पूरा देश आज़ादी का जश्न मनाएगा, हर सड़क और चौराहे पर तिरंगा फहराया जाएगा, देशभक्ति के गीत बजेंगे।

लेकिन रुकिए! क्या हम उस आज़ादी का जश्न मनाते हुए उस खौफनाक और खून से सनी हुई 14 अगस्त की रात को भूल सकते हैं?

जिस आज़ादी की हम बात करते हैं, क्या वो हमें सच में सिर्फ किसी चरखे को चलाने से या बिना खड़ग और बिना ढाल के मिल गई थी?

नहीं मेरे भाई! इस आज़ादी की जो असली कीमत चुकाई गई है, वो दुनिया के किसी भी इतिहास की सबसे खौफनाक और भयानक कीमत थी।

ये कीमत इस देश के 20 लाख से ज़्यादा हिंदुओं और सिखों ने अपनी गर्दनें कटवा कर, अपनी ज़मीनें छोड़कर और अपनी बहन-बेटियों की आबरू जिहादियों के हाथों लुटाकर चुकाई थी।

14 अगस्त 1947 का वो दिन भारत के सीने पर खींची गई वो खूनी लकीर है, जिससे आज 79 साल बाद भी हमारे पूर्वजों का खून रिस रहा है।

दशकों तक उस समय की सरकारों और उनके पाले हुए इतिहासकारों ने इस खौफनाक दिन को हमसे छुपा कर रखा। उन्होंने हमें सिर्फ जश्न मनाना सिखाया, लेकिन उन 20 लाख लाशों की चीखें हमारे कानों तक नहीं पहुंचने दीं।

उन्हें डर था की अगर आज के हिंदू और सिख को उस जिहादी नफरत का असली सच पता चल गया, तो इनका वो फर्जी ‘भाईचारे’ का महल ढह जाएगा।

लेकिन शुक्र है की साल 2021 में हमारे PM मोदी जी ने देश को पहली बार ये एहसास दिलाया की हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस अंधेरे में नहीं रख सकते।

‘विभाजन स्मृति दिवस’ (Partition Remembrance Day) हमारे उन करोड़ों पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्हें रातों-रात अपने पुश्तैनी घरों, अपनी ज़मीनों और अपने मंदिरों से उखाड़ कर फेंक दिया गया।

ज़रा सोचिए उस मंज़र को! 1 से 2 करोड़ लोग अपनी जान बचाने के लिए एक कपड़ों में, बिना खाने-पीने के पैदल ही बॉर्डर की तरफ भाग रहे थे।

ये दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे दर्दनाक और सबसे खूनी विस्थापन था। आज 14 अगस्त का ये दिन उन 20 लाख हुतात्माओं के खून से लिखा गया वो पन्ना है जो आज हर सनातनी की आंखों से आंसू निकाल देगा।

14 अगस्त के विभाजन के बाद रावलपिंडी से लेकर लाहौर तक जिहादियों का तांडव, ट्रेनों में भरकर आती हमारे पूर्वजों की कटी हुई लाशें

अगर आपको लगता है की बंटवारा सिर्फ ज़मीन के दो टुकड़े होना था, तो ज़रा उस दौर के पंजाब, सिंध, रावलपिंडी, लाहौर और पूर्वी बंगाल का वो इतिहास उठाकर देख लीजिए।

ये कोई दो देशों की सेनाओं की लड़ाई नहीं थी। ये निहत्थे हिंदुओं और सिखों का एकतरफा और सरेआम किया गया शिकार था।

अगस्त 1947 के उन खौफनाक महीनों में जिहादियों की खून की प्यास अपने चरम पर थी। लाहौर और रावलपिंडी की सड़कें हमारे पूर्वजों के खून से लाल हो चुकी थीं।

उन जिहादियों ने गांव के गांव घेर लिए। जो भी काफिर (हिंदू या सिख) दिखा, उसे दर्दनाक तरीके से काट दिया गया। हमारी दुकानों और सदियों पुराने मंदिरों को आग के हवाले कर दिया गया।

छोटे-छोटे मासूम बच्चों को तलवारों पर टांग दिया जाता था। वो दरिंदे हंस रहे थे और हमारे पूर्वज अपनी जान की भीख मांगते हुए तड़प-तड़प कर मर रहे थे।

और वो खूनी ट्रेनें! जिन्हें इतिहास में ‘ब्लड ट्रेन्स’ (Blood Trains) कहा जाता है। जब पाकिस्तान वाले हिस्से से कोई ट्रेन भारत (अमृतसर या दिल्ली) के लिए निकलती थी, तो उस ट्रेन में कोई ज़िंदा इंसान नहीं पहुंचता था।

रेलवे स्टेशनों पर जिहादियों की भीड़ तलवारें और बरछे लेकर खड़ी होती थी। ट्रेन को बीच रास्ते में रोका जाता और डिब्बों के अंदर घुसकर एक-एक हिंदू और सिख को बेदर्दी से काट डाला जाता।

जब वो ट्रेन अमृतसर स्टेशन पर पहुंचती थी, तो स्टेशन मास्टर और वहां खड़े लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। ट्रेन के डिब्बों के अंदर टखनों तक खून भरा होता था।

लाशों के ऊपर लाशें पड़ी होती थीं। किसी का सिर कटा था, किसी के हाथ कटे थे, बच्चों के चिथड़े उड़े हुए थे। और सबसे भयानक बात ये थी की उन ट्रेनों के डिब्बों के बाहर जिहादियों ने खून से लिखा होता था- “आज़ादी का तोहफा!”

अरे, क्या कोई इंसान इतना क्रूर हो सकता है? ये उस कट्टरपंथी मानसिकता का नंगा नाच था जिसे सदियों से मदरसों में पाला गया था।

हमारे पूर्वज अपना सब कुछ, अपनी हज़ारों साल की विरासत उसी ज़मीन पर छोड़कर आ रहे थे, और बदले में उन्हें क्या मिला? उन्हें सिर्फ कटी हुई लाशें और अपने परिवार के चिथड़े मिले।

उन खून से सनी हुई ट्रेनों की छुक-छुक आज भी 14 अगस्त की रात को अमृतसर और दिल्ली के स्टेशनों पर गूंजती है, बस हमारे बहरे हो चुके सेक्युलर सिस्टम को वो आवाज़ सुनाई नहीं देती।

हमारी बहन बेटियों का दर्दनाक चीरहरण, और अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए कुओं में कूदती औरतें, सनातनियों का वो खौफनाक बलिदान

बंटवारे के इस पूरे खूनी इतिहास में एक दर्द ऐसा है जिसे याद करके आज भी मेरा सीना फटने लगता है और आंखें आंसुओं से भर जाती हैं।

ये दर्द है हमारी माताओं, बहनों और बेटियों का चीरहरण। इतिहास के इन काले पन्नों में जो दरिंदगी हमारी हिंदू और सिख महिलाओं के साथ हुई, वो दुनिया के किसी भी युद्ध से ज़्यादा खौफनाक थी।

जिहादियों का निशाना सिर्फ ज़मीनें और घर नहीं थे, उनका सबसे बड़ा निशाना हमारी महिलाओं की इज़्ज़त थी।

हज़ारों-लाखों हिंदू और सिख लड़कियों को सरेआम उनके घरों से बालों से घसीट कर बाहर निकाला गया। उनके पिता और भाइयों के सामने उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किए गए।

हमारी बहन-बेटियों को बाज़ारों में निर्वस्त्र करके घुमाया गया, उनकी छातियों को काटा गया और फिर उन्हें जानवरों की तरह गुलाम बनाकर बेच दिया गया।

कितनों का तो जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर उन्हीं दरिंदों से निकाह करवा दिया गया जिन्होंने उनके सामने उनके परिवार को काटा था।

रावलपिंडी के ‘थुआ खालसा’ (Thoa Khalsa) और ऐसे ही दर्जनों गांवों का वो खौफनाक इतिहास कौन भूल सकता है?

जब जिहादी भीड़ गांव के बाहर आ गई और हमारी माताओं-बहनों को लगा की अब इन दरिंदों के नापाक हाथों से उनकी इज़्ज़त नहीं बच पाएगी, तो उन क्षत्राणियों और सिखणियों ने जो बलिदान दिया, वो सुनकर रूह कांप जाती है।

अपने सनातन धर्म, अपने सतित्व और अपनी आबरू को बचाने के लिए हमारी माताओं और बहनों ने अपने ही हाथों से अपनी बेटियों का गला काटा, और फिर अपने छोटे-छोटे बच्चों को सीने से लगाकर गांव के कुओं में छलांग लगा दी।

एक के बाद एक… दर्जनों महिलाएं उस कुएं में कूदती गईं। वो कुआं ऊपर तक लाशों से पट गया, लेकिन उन देवियों ने जिहादियों के आगे घुटने नहीं टेके।

उन्होंने धर्म के लिए जल समाधि और कुएं की उस खौफनाक मौत को गले लगा लिया, लेकिन अपने जिस्म को अपवित्र नहीं होने दिया।

और जब ये सब हो रहा था, जब हमारी बहनें कुओं में कूद रही थीं, जब बच्चों को भालों पर उछाला जा रहा था, तब दिल्ली के आलीशान बंगलों में बैठे उस समय की सरकारों के नेता क्या कर रहे थे?

वो नेता जो खुद को देश का रहनुमा बताते थे, वो सिर्फ मूक दर्शक बने हुए थे। वो ‘शांति’ और ‘अहिंसा’ का ढोंग रच रहे थे।

किसी भी नेता में इतनी मर्दानगी नहीं थी की वो सेना भेजकर हमारे उन कटते हुए लोगों को बचा सके। उनकी नामर्दी और कुर्सी के लालच ने हमारी देवियों को उन कुओं में कूदने पर मजबूर कर दिया।

आज 14 अगस्त का दिन उन कुओं में दबी हुई चीखों को याद करने का दिन है, ताकि हम कभी भूल ना सकें की इस आज़ादी की कीमत हमारी माताओं ने अपनी जान देकर चुकाई है।

भाईचारे के झूठे नकाब में दफना दिया गया इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार, दरबारी इतिहासकारों का शर्मनाक खेल

जब कोई बहुत बड़ा पाप होता है, तो पापी सबसे पहले अपने जुर्म के सबूत मिटाता है।

आज़ादी के बाद उस समय की सरकारों को अच्छे से पता था की अगर भारत के हिंदू और सिख को ये पता चल गया की उनके 20 लाख पूर्वजों को किस बेरहमी से काटा गया था, तो वो बगावत कर देंगे.. भारत देश के शांतिदूतों का भी वैसा ही हाल कर देंगे। वो इन नेताओं के घरों को आग लगा देंगे।

जिन नेताओं ने बड़े-बड़े मंचों से रैलियां करते हुए दहाड़ कर कहा था की “भारत का बंटवारा हमारी लाश पर होगा”.. बंटवारा उनकी लाश पर नहीं हुआ, बल्कि 20 लाख बेगुनाह हिंदुओं और सिखों की लाशों पर हुआ।

जब रावलपिंडी और लाहौर में हमारे लोग कट रहे थे, तब वो ‘लाश पर बंटवारा’ रोकने वाले नेता दिल्ली के आलीशान बंगलों में बैठकर आज़ादी की स्पीच तैयार कर रहे थे।

और जो हिंदू अपना सब कुछ लुटाकर, अपने परिवार वालों की लाशें वहीं छोड़कर, खून से लथपथ होकर भारत पहुंचे, उनके साथ इन नेताओं ने क्या सुलूक किया?

उन्हें दिल्ली और पंजाब के रिफ्यूजी कैंपों में, फटे हुए टेंटों के नीचे कीड़े-मकोड़ों की ज़िंदगी जीने के लिए छोड़ दिया गया।

इसलिए इस देश के सिस्टम ने एक बहुत बड़ा फ्रॉड किया। उस समय की सरकारों के टुकड़ों पर पलने वाले दरबारी इतिहासकारों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था पर कब्ज़ा कर लिया।

इन्होंने इतिहास की किताबों से उस 20 लाख के कत्लेआम को ऐसे मिटा दिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

ज़रा इन दरबारी कलमकारों की चालाकी देखिए! उन्होंने 1947 के उस एकतरफा कत्लेआम को बड़ी बेशर्मी से ‘सांप्रदायिक दंगे’ (Communal Riots) का नाम दे दिया।

अरे गद्दारों! दंगा वो होता है जहाँ दोनों तरफ से बराबर की लड़ाई हो। जो 1947 में हुआ, वो दंगा नहीं था, वो सीधे जिहादियों द्वारा किया गया सनातनियों का ‘नरसंहार’ (Genocide) था।

ये एक ऐसा जिहाद था जहाँ पहले से तय था की काफिरों को काटना है, उनकी औरतों को उठाना है और उनकी ज़मीनें हड़पनी हैं।

लेकिन इन इतिहासकारों ने हमारे बच्चों को क्या पढ़ाया? इन्होंने हमें रटाया की आज़ादी तो बिना खड़ग और बिना ढाल के मिल गई थी।

हमें ‘अहिंसा’ की झूठी लोरी पिलाकर सुला दिया गया। हमारी किताबों में मुगलों की महानता के तो लंबे-लंबे चैप्टर लिख दिए गए, लेकिन उन खून से सनी हुई ट्रेनों के बारे में एक लाइन नहीं लिखी गई।

रावलपिंडी के उन कुओं के बारे में नहीं बताया गया जो हमारी माताओं-बहनों की लाशों से भर गए थे।

इन्होंने ‘गंगा-जमुनी भाईचारे’ का वो झूठा नकाब पहनाया ताकि हम भूल जाएं की हमारे गले पर किसने चाकू रखा था।

ये इतिहास की सबसे बड़ी डकैती थी, जहाँ हमारे पूर्वजों के दर्द को, उनकी शहादत को और उनकी चीखों को सेक्युलरिज्म के नाम पर हमेशा के लिए ज़मीन में गाड़ दिया गया।

14 अगस्त विभाजन स्मृति दिवस कोई मातम नहीं बल्कि एक ज्वालामुखी है, आज के हिन्दू को इस डरावने इतिहास से सबक लेने की हुंकार

कहा जाता है की जो समाज अपना इतिहास भूल जाता है, उसका भूगोल मिटने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता। 1947 में हमने अपनी ज़मीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा खो दिया।

हमारे तख्त-श्री ननकाना साहिब, हमारे कई सिद्ध पीठ और हमारी वो सिंधु नदी जिसके नाम पर हमारा नाम ‘हिंदू’ पड़ा, वो सब उन जिहादियों के कब्ज़े में चला गया।

आज 14 अगस्त है। ये दिन सिर्फ रोने, आंसू बहाने या मातम मनाने का दिन नहीं है। ये 14 अगस्त का दिन एक धधकता हुआ ज्वालामुखी है!

ये दिन हमें याद दिलाता है की जब-जब हिंदू कमज़ोर पड़ा है, जब-जब हमने इन जिहादियों के झूठे भाईचारे पर भरोसा किया है, तब-तब हमारी पीठ में खंजर घोंपा गया है। 1947 की वो आग आज भी ठंडी नहीं हुई है भाई!

अगर आपको लगता है की वो सब तो 1947 में खत्म हो गया, तो आप आज भी अंधेरे में जी रहे हैं। आज ज़रा आंखें खोलकर कश्मीर का इतिहास देख लीजिए।

जो 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ, वो क्या था? वो उसी 1947 वाले जिहाद का पार्ट-2 था।

आज जो बंगाल के बॉर्डर वाले गांवों में हो रहा है, जो केरल के मलप्पुरम में हो रहा है, वो सब क्या है? ये उस ‘गज़वा-ए-हिंद’ का वो प्रोजेक्ट है जो 1947 में शुरू हुआ था और आज भी जारी है।

इसलिए आज 14 अगस्त को, ‘विभाजन स्मृति दिवस’ के इस मौके पर, अपने बच्चों को 14 अगस्त की वो खूनी दास्तान सुनाओ। उन्हें बताओ की हमारे पूर्वजों ने धर्म के लिए कैसे अपनी गर्दनें कटवा ली थीं लेकिन इस्लाम कबूल नहीं किया था।

जो गलतियां 1947 में हुई थीं, वो अब दोबारा इस पवित्र धरती पर नहीं होनी चाहिए। हिन्दुओं को एकजुट रहना होगा, और अपने उस ‘गंगा-जमुना’ तहजीब के ढोंग से ऊपर उठना होगा।

शान्ति और अहिंसा सिर्फ एक तरफ से नहीं होती.. आज अपने धर्म और अपनी आबरू की रक्षा करने के लिए शस्त्र उठाना बेहद जरुरी है।

भारत माता की जय!

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