अंतरिक्ष चीरने वाले ‘ASAT’ और देश की पहली Hypersonic मिसाइल से लेकर समंदर के खूंखार ‘वरुणास्त्र’ तक, कैसे ‘DRDO’ के जिद्दी वैज्ञानिकों ने भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाकर खड़ा कर दिया सुपरपावर देशों की कतार में

दोस्तों, जब भी भारत की सैन्य ताकत की बात होती है ना, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले राफेल फाइटर जेट या अमेरिका से मंगाए गए अपाचे हेलिकॉप्टर की तस्वीर घूमने लगती है।

हम हिंदुस्तानी अक्सर उन विदेशी हथियारों को देखकर सीना चौड़ा कर लेते हैं जो हमने अरबों डॉलर देकर गोरे देशों से खरीदे हैं।

लेकिन सच कहूं तो असली गुरूर बाज़ार से भारी कीमत चुकाकर खरीदे हुए हथियारों में नहीं होता।

असली हैसियत तो तब पता चलती है जब पूरी दुनिया आपके खिलाफ खड़ी हो, हर बड़ा देश आपको तकनीक देने से साफ मना कर दे, और आप अपने ही घर में, अपने ही दम पर वो ब्रह्मास्त्र बना दें, जिन्हें देखकर उन सुपरपावर देशों के भी पसीने छूट जाएं।

आज हम बात कर रहे हैं उन गुमनाम चेहरों की, जो मीडिया के कैमरों से कोसों दूर, DRDO (डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) की बंद लैब्स में दिन-रात जागकर पसीना बहाते हैं।

ये वो जिद्दी वैज्ञानिक हैं जिन्होंने कसम खा ली थी की भारत को हथियारों के लिए अब किसी के आगे भीख नहीं मांगनी पड़ेगी।

चलिए आज आपको उस ज़बरदस्त सफर पर ले चलते हैं, जहां भारत के DRDO ने ऐसे-ऐसे आविष्कार कर दिखाए की आज अमेरिका और रूस भी हमारी इंजीनियरिंग का लोहा मानते हैं।

बैलगाड़ी से शुरू हुआ DRDO का वो सफर जिसने पश्चिमी देशों के तकनीकी घमंड को पैरों तले कुचल कर रख दिया

आज जब हम आसमान चीरती हुई ब्रह्मोस मिसाइल को देखते हैं, तो यकीन करना मुश्किल होता है की इस ताकत की नींव कितने संघर्ष के बीच रखी गई थी।

आपको याद है वो मशहूर तस्वीर जिसमें भारत के शुरुआती वैज्ञानिक सैटेलाइट को बैलगाड़ी पर रखकर टेस्ट साइट तक पंहुचा रहे थे? वो कोई मज़ाक नहीं था।

वो हमारे देश की असलियत थी। हमारे पास ना तो हाई-टेक लैब्स थीं, ना करोड़ों का बजट, और ना ही विदेशियों का कोई सपोर्ट।

बात 80 और 90 के दशक की है। उस दौर में अगर भारत को कोई हाई-टेक्नोलॉजी चाहिए होती थी, तो हमें अमेरिका या रूस के आगे झोली फैलानी पड़ती थी।

जब भारत ने मौसम और अंतरिक्ष की जानकारी के लिए ‘क्रायोजेनिक इंजन’ बनाना चाहा, तो रूस हमें वो तकनीक देने को तैयार था। लेकिन तभी अमेरिका बीच में आ गया।

अमेरिका ने अपने घमंड में रूस को धमकाया और भारत को वो क्रायोजेनिक तकनीक देने से साफ मना करवा दिया (इसे Tech-denial regime कहते हैं)।

इन गोरे देशों को लगता था की भारत हमेशा ऐसा देश रहेगा जो हथियारों और तकनीक के लिए उनके टुकड़ों पर पलेगा।

अगर भारत को सुपरकंप्यूटर चाहिए? तो मना कर दो। इंजन चाहिए? तो ब्लैकमेल करो। लेकिन अमेरिका एक बहुत बड़ी गलती कर बैठा।

वो ये भूल गया की जब एक हिंदुस्तानी के आत्मसम्मान पर चोट लगती है ना, तो वो पहाड़ का सीना भी चीर देता है।

इसी विदेशी ब्लैकमेलिंग और घमंड ने भारत के उन वैज्ञानिकों के अंदर एक ऐसी ‘ज़िद्द’ पैदा कर दी, जिसने इतिहास बदल डाला।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी उस टीम ने इस अपमान को दिल पर ले लिया। उन्होंने ठान लिया की “तुम हमें तकनीक नहीं दोगे?

कोई बात नहीं, अब हम खुद अपने घर में वो हथियार बनाएंगे जो तुम्हारी नींदें हराम कर देंगे।” और बस, यहीं से जन्म हुआ DRDO का।

ये प्रोजेक्ट एक ऐसा महायज्ञ था जिसमें देश के वैज्ञानिकों ने अपनी जवानी झोंक दी, ताकि आज हम और आप चैन की नींद सो सकें।

जब विदेशियों ने इंजन देने से किया साफ इनकार तो DRDO वैज्ञानिकों ने खुद बना डाला देश का पहला स्वदेशी टर्बोजेट इंजन

बहुत से लोग सोचते हैं की आज तो भारत के पास बहुत पैसा है, हम कहीं से भी कुछ भी खरीद सकते हैं। लेकिन हकीकत ये है की क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (Critical Technology) आज भी कोई देश किसी को नहीं देता।

ड्रोन्स और क्रूज़ मिसाइलों को लंबी दूरी तक उड़ाने वाले जेट इंजन के मामले में पश्चिमी देशों ने हमेशा भारत के साथ सौदेबाज़ी और नखरेबाज़ी की है।

वे हमें इंजन तो देते थे, लेकिन शर्त लगा देते थे की आप इसे फलां मिसाइल में नहीं लगा सकते या इतनी दूरी से ज़्यादा इस्तेमाल नहीं कर सकते।

लेकिन अगस्त 2026 आते-आते DRDO ने ऐसा बम फोड़ा है की चीन और पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञों के होश फाख्ता हो गए हैं।

बरसों की तपस्या के बाद, DRDO की सबसे अहम लैब ‘गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट’ (GTRE) और हैदराबाद की एक प्राइवेट कंपनी ‘आज़ाद इंजीनियरिंग’ ने मिलकर वो कारनामा कर दिखाया है, जो अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे गिने-चुने देश ही कर पाए थे।

भारत ने अपना पहला पूरी तरह से स्वदेशी ‘एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन’ (Expendable Turbojet Engine) बनाकर तैयार कर लिया है!

अब आप सोचेंगे कि भई इंजन ही तो है, इसमें इतनी बड़ी क्या बात है? तो सुनिए! रॉकेट का इंजन बनाना फिर भी आसान होता है क्योंकि उसमें ईंधन और ऑक्सीजन पहले से भरे होते हैं।

लेकिन ‘टर्बोजेट’ इंजन बनाना इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा सिरदर्द है।

ये इंजन पहले बाहर से हवा खींचता है, फिर उसे भयंकर दबाव (Compress) में लाता है, और फिर उस हवा के साथ फ्यूल जलाकर इतना भयंकर थ्रस्ट (Thrust) पैदा करता है की मिसाइल हवा को चीरते हुए निकल जाती है।

इसके लिए ऐसे मेटल्स चाहिए होते हैं जो हज़ारों डिग्री के तापमान पर भी ना पिघलें। इसमें 3D प्रिंटिंग और दुनिया की सबसे प्रिसिजन वाली मैन्युफैक्चरिंग लगती है।

और हमारे वैज्ञानिकों ने 350 किलो थ्रस्ट-क्लास का ये एकदम कॉम्पैक्ट और पावरफुल इंजन अपने ही देश में बना डाला!

इस एक इंजन के बनने का सीधा सा मतलब समझ रहे हैं आप? ये एक ‘एक्सपेंडेबल’ इंजन है, मतलब ये एक ही बार इस्तेमाल होता है।

इसे सीधे तौर पर ‘क्रूज़ मिसाइलों’ और ‘लोइटरिंग म्युनिशंस’ (यानी हवा में मंडराने वाले वो सुसाइड ड्रोन्स जो टारगेट देखते ही उस पर गिर कर फट जाते हैं) में फिट किया जाएगा।

कल तक हम हर मिसाइल के लिए विदेशी इंजनों का इंतज़ार करते थे। अब हम अपनी ही फैक्ट्री में रोज़ ऐसे सैकड़ों सुसाइड ड्रोन्स और लॉन्ग-रेंज मिसाइलें बना सकते हैं।

अगर कल को लद्दाख या अरुणाचल बॉर्डर पर चीन कोई भी जुर्रत करता है ना, तो हम इन्हीं स्वदेशी इंजनों से लैस हथियारों का ऐसा ‘स्वार्म’ (झुंड) भेजेंगे जो उनके एयर-डिफेंस सिस्टम की धज्जियां उड़ा कर रख देगा।

ये स्वदेशी टर्बोजेट इंजन सिर्फ एक मशीन नहीं है दोस्त, ये अमेरिका और यूरोप के उस गुरूर पर जड़ा गया सबसे करारा तमाचा है जो सोचते थे की भारत कभी खुद का जेट इंजन नहीं बना सकता।

अंतरिक्ष में घुसकर सैटेलाइट तबाह करने वाला DRDO का ASAT और हवा को चीरने वाली हाइपरसोनिक तकनीक जिसने बड़े-बड़े देशों की नींद उड़ा दी

अब ज़रा नज़र उठाते हैं सीधे अंतरिक्ष की तरफ। 27 मार्च 2019 का वो दिन आपको याद है? जब अचानक से पूरे देश में खबर फैल गई थी की भारत ने कुछ बहुत बड़ा कर दिया है। वो कोई मामूली दिन नहीं था।

उस दिन DRDO के वैज्ञानिकों ने ‘मिशन शक्ति’ (Mission Shakti) के तहत वो कारनामा कर दिखाया था, जिसने रातों-रात भारत को दुनिया के उन टॉप 4 देशों की कतार में ले जाकर खड़ा कर दिया, जिनकी अंतरिक्ष में तूती बोलती है।

DRDO ने एक ‘एंटी-सैटेलाइट मिसाइल’ (ASAT) बनाई और उसे सीधे 300 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में दाग दिया।

वहां हमारा ही एक पुराना लाइव सैटेलाइट घूम रहा था, जो गोली की रफ्तार से भी कई गुना तेज़ उड़ रहा था।

ज़रा सोचिए, 300 किलोमीटर ऊपर, इतनी भयंकर स्पीड से भागते हुए एक छोटे से टारगेट को धरती से मिसाइल मार कर बिल्कुल सटीक तरीके से उड़ा देना…

भाईसाब, ये वो अचूक गणित और इंजीनियरिंग थी जिसे देखकर नासा (NASA) से लेकर पेंटागन तक के पसीने छूट गए थे।

अमेरिका और चीन… बस इन दो देशों को घमंड था की वे अंतरिक्ष में राज करते हैं। लेकिन हमारे DRDO ने उस दिन बिना किसी शोर-शराबे के इस एलीट क्लब का दरवाज़ा लात मारकर खोल दिया और अंदर एंट्री ले ली।

इस एक टेस्ट का मतलब समझते हैं आप? आज के समय में कोई भी जंग ज़मीन पर लड़ने से पहले आसमान में लड़ी जाती है।

दुश्मन के जासूसी सैटेलाइट्स, उनका जीपीएस (GPS), उनका कम्युनिकेशन… सब अंतरिक्ष से कंट्रोल होता है।

अब अगर चीन या पाकिस्तान कोई भी चालाकी करने की सोचेंगे ना, तो हमारे वैज्ञानिक धरती से एक बटन दबाएंगे और अंतरिक्ष में बैठे उनके सैटेलाइट्स के परखच्चे उड़ जाएंगे। इसे कहते हैं स्पेस की सर्जिकल स्ट्राइक!

और बात सिर्फ अंतरिक्ष तक ही कहां रुकने वाली थी। इसके बाद DRDO ने हाथ डाला उस तकनीक में जिसे ‘भविष्य का ब्रह्मास्त्र’ कहा जाता है- हाइपरसोनिक तकनीक (HSTDV)।

इसे मामूली मिसाइल समझने की भूल मत करना। ये आवाज़ की रफ्तार से 6 गुना ज़्यादा तेज़ (Mach 6) उड़ती है! इसके अंदर ‘स्क्रैमजेट’ (Scramjet) इंजन लगा होता है।

आम इंजन तो हवा खींचकर काम चलाते हैं, लेकिन जब कोई चीज़ हवा को चीरते हुए इतनी भयंकर रफ्तार से उड़ती है, तो उस हवा को इंजन के अंदर जलाना ऐसा ही है जैसे किसी भयंकर तूफान के बीच माचिस की तीली जलाकर रखना।

लेकिन हमारे जिद्दी वैज्ञानिकों ने इसे भी सच कर दिखाया। जब ये हाइपरसोनिक मिसाइल आसमान से दुश्मन की तरफ गिरती है ना, तो दुनिया का कोई भी रडार या एयर-डिफेंस सिस्टम इसे रोक नहीं सकता।

अमेरिका का ‘पैट्रियट’ हो या रूस का ‘S-400’, इस रफ्तार के आगे सब पानी भरते हैं। जब तक दुश्मन के रडार ऑपरेटर को स्क्रीन पर कुछ दिखेगा और वो बटन दबाने की सोचेगा, तब तक तो ये मिसाइल उसके पूरे बेस को राख में मिला चुकी होगी।

DRDO के अग्नि 5 और ब्रह्मोस जैसे वो अचूक ब्रह्मास्त्र जिनके नाम से ही बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक मच जाती है भयंकर दहशत

अब आते हैं उस हथियार पर जिसे हम गर्व से ‘मिसाइलों का बाप’ कहते हैं। जी हां, मैं बात कर रहा हूँ हमारी ‘अग्नि-5’ (Agni-V) की।

ये भारत की ICBM (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) है, जिसने चीन के उस घमंड को चकनाचूर कर दिया की भारत सिर्फ एक क्षेत्रीय ताकत है।

5000 से 7000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली ये मिसाइल जब लॉन्च पैड से आग उगलते हुए निकलती है, तो सीधे बीजिंग में बैठे शी जिनपिंग की कुर्सी हिलने लगती है।

पूरा का पूरा चीन, उसका एक-एक कोना, आज हमारी अग्नि-5 के रडार पर है। और अभी हाल ही में DRDO ने जो ‘दिव्यास्त्र’ (MIRV तकनीक) का टेस्ट किया है ना, उसने तो दुश्मनों की रूह कंपा दी है।

MIRV का मतलब है की एक ही मिसाइल आसमान में जाएगी, लेकिन जब वो टारगेट के ऊपर पहुंचेगी तो उसमें से एक नहीं, बल्कि कई सारे परमाणु बम अलग-अलग दिशाओं में गिरेंगे।

दुश्मन का डिफेंस सिस्टम पागल हो जाएगा की आखिर वो किसे रोके और किसे छोड़े! एक तीर और दसियों निशाने!

और जब हम मिसाइलों की बात कर ही रहे हैं, तो ‘ब्रह्मोस’ (BrahMos) को कैसे भूल सकते हैं? कहने को तो ये रूस के साथ मिलकर बनाई गई है, लेकिन इसका असली जलवा और इसका दिमाग पूरी तरह से हिंदुस्तानी है।

ये दुनिया की सबसे तेज़ सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है। ये आवाज़ से लगभग 3 गुना ज़्यादा तेज़ (Mach 2.8) उड़ती है।

इसका काम करने का तरीका इतना खूंखार है की ये समंदर की लहरों या ज़मीन के बिल्कुल चिपक कर उड़ती है, ताकि दुश्मन के रडार इसे पकड़ ही ना सकें।

और जब ये अपनी फुल स्पीड में किसी दुश्मन के जंगी जहाज़ या बंकर से टकराती है, तो बिना किसी बारूद के भी सिर्फ अपनी ‘काइनेटिक एनर्जी’ (रफ्तार की ताकत) से ही पूरे के पूरे जहाज़ को बीच से फाड़ कर रख देती है।

पहले हम इन हथियारों को सिर्फ अपने पास रखते थे, लेकिन आज देखिए! हम यही ब्रह्मोस मिसाइलें फिलीपींस जैसे देशों को बेच रहे हैं।

जो चीन कल तक दूसरों को डराता था, आज जब उसके पड़ोस में भारत की ब्रह्मोस तैनात होती है, तो उसे पसीने आ जाते हैं।

हवा में वर्चस्व कायम करने के लिए DRDO ने एक और ऐसा साइलेंट किलर बनाया है जिसने डॉगफाइट (हवा में लड़ाकू विमानों की आमने-सामने की जंग) का इतिहास ही बदल दिया है।

इसका नाम है ‘अस्त्र’ (Astra) मिसाइल। ये ‘बियॉन्ड विजुअल रेंज’ (BVR) मिसाइल है। पहले क्या होता था की पायलट को दुश्मन का जहाज़ अपनी आंखों से देखना पड़ता था, फिर वो पीछे लगकर उसे मारता था।

लेकिन अस्त्र मिसाइल के आने के बाद, हमारा इंडियन एयरफोर्स का पायलट बिना दुश्मन को अपनी नंगी आंखों से देखे, मीलों दूर से ही एक बटन दबाकर पाकिस्तानी या चीनी जेट के चीथड़े उड़ा सकता है।

दुश्मन को पता भी नहीं चलेगा की मौत किस दिशा से आई!

समंदर की गहराइयों में छुपकर शिकार करने वाला DRDO का खूंखार ‘वरुणास्त्र’ और न्यूक्लियर सबमरीन जिसने बढ़ा दी नौसेना की ताकत

DRDO सिर्फ ज़मीन और आसमान में ही मौत का खेल नहीं खेलता, बल्कि समंदर की अथाह गहराइयों में भी इसने दुश्मनों की कब्र खोदने का पूरा इंतज़ाम कर रखा है।

पानी के अंदर की जंग सबसे भयानक होती है, क्योंकि वहां दुश्मन आपको दिखाई नहीं देता।

समंदर में राज करने के लिए DRDO ने जो खूंखार हथियार बनाया है, उसका नाम है ‘वरुणास्त्र’ (Varunastra)।

इसे आप समंदर के अंदर का ब्रह्मोस समझ लीजिए! यह एक स्वदेशी हैवीवेट टॉरपीडो (Heavyweight Torpedo) है।

जब कोई दुश्मन देश की पनडुब्बी (Submarine) हमारे समंदर में घुसपैठ करने की कोशिश करती है, तो हमारे युद्धपोत से वरुणास्त्र दागा जाता है।

यह पानी के अंदर 74 किलोमीटर प्रति घंटे से भी ज़्यादा की रफ़्तार से तैरता है। इसके अंदर लगा सॉलिड-स्टेट गाइडेंस सिस्टम इतना चालाक है की यह समंदर की गहराई में छुपी दुश्मन की पनडुब्बी को उसके इंजन की आवाज़ और हलचल से ढूंढ निकालता है।

एक बार इसने टारगेट को लॉक कर लिया, तो फिर दुश्मन की पनडुब्बी चाहे जितना छटपटा ले, यह सीधे जाकर उससे टकराएगा और पानी के अंदर ही उसके चीथड़े उड़ा देगा।

लेकिन भारतीय नौसेना की ताकत में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक लोहा तब साबित हुआ, जब भारत ने अपनी पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी INS अरिहंत को पानी में उतारा।

पनडुब्बी तो हम बना रहे थे, लेकिन उसे चलाने के लिए एक बेहद कॉम्पैक्ट और भयंकर ताकतवर ‘न्यूक्लियर रिएक्टर’ चाहिए था।

आम डीज़ल पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार समंदर की सतह पर आना पड़ता है, जिससे वो रडार की पकड़ में आ जाती हैं।

लेकिन परमाणु रिएक्टर वाली पनडुब्बी पानी के अंदर महीनों तक बिना बाहर आए छुपी रह सकती है।

इस असंभव काम को DRDO ने भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) के साथ मिलकर सच कर दिखाया।

उन्होंने 83 मेगावाट (83 MW) का एक ऐसा न्यूक्लियर रिएक्टर डिज़ाइन किया, जो इतनी छोटी सी जगह में फिट हो सके और पनडुब्बी को असीमित ताकत दे सके।

इसी तकनीक के दम पर भारत ने अपना ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ (Nuclear Triad) पूरा किया। मतलब अब हम ज़मीन, आसमान और पानी के अंदर… तीनों जगहों से परमाणु हमला कर सकते हैं।

अगर कल को दुश्मन ने भारत पर सरप्राइज़ अटैक करके हमारे ज़मीनी बेस उड़ा भी दिए, तो समंदर की गहराई में छुपी हमारी अरिहंत पनडुब्बी वहीं से बैलिस्टिक मिसाइलें दागेगी और दुश्मन के पूरे देश को राख में मिला देगी।

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यकीन नहीं होता की ये वही देश है जिसे कभी सुपरकंप्यूटर देने से मना कर दिया गया था। जिस देश के वैज्ञानिकों ने कभी विदेशियों के ताने सुने थे।

अब्दुल कलाम साहब ने जिस आज़ाद और मज़बूत भारत का सपना देखा था, आज DRDO की नई पीढ़ी के वैज्ञानिक उसे उसी शिद्दत से जी रहे हैं।

अमेरिका की ब्लैकमेलिंग से लेकर चीन की धमकियों तक… हर चीज़ का एक ही इलाज है, और वो है ‘आत्मनिर्भरता’।

सैल्यूट है उन गुमनाम वैज्ञानिकों को, जिन्होंने हिंदुस्तान की सरहदों को लोहे की तरह अभेद्य बना दिया है।

जब तक DRDO जैसी संस्थाएं और उसमें काम करने वाले वो जुनूनी हिंदुस्तानी इस देश में ज़िंदा हैं, तब तक दुनिया की कोई भी सुपरपावर आंख उठाकर हमारी तरफ देखने की जुर्रत नहीं कर सकती!

भारत माता की जय!

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