डॉक्टरों ने कहा ये बच्चा नहीं बचेगा, फिर 'योग' के दम पर मौत को मात देकर पूरी दुनिया में भारत की प्राचीन विद्या का परचम लहराने वाले 'पद्म विभूषण' योग गुरु 'B.K.S. Iyengar' जी को पुण्यतिथि पर सत-सत नमन

डॉक्टरों ने कहा ये बच्चा नहीं बचेगा, फिर ‘योग’ के दम पर मौत को मात देकर पूरी दुनिया में भारत की प्राचीन विद्या का परचम लहराने वाले ‘पद्म विभूषण’ योग गुरु ‘B.K.S. Iyengar’ जी को पुण्यतिथि पर सत-सत नमन

ज़िंदगी और मौत के बीच का फासला इंसान की इच्छाशक्ति से तय होता है। और जब इस इच्छाशक्ति के साथ भारत की महान और प्राचीन विद्या ‘योग’ जुड़ जाए, तो वो चमत्कार होता है जिसके आगे बड़ी-बड़ी मेडिकल साइंस और डॉक्टर भी हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।

आज 20 अगस्त है। आज ही के दिन भारत माता के एक ऐसे ही सच्चे और महान सपूत ने इस दुनिया को अलविदा कहा था।

एक ऐसा इंसान जिसे बचपन में डॉक्टरों ने मरने के लिए छोड़ दिया था, लेकिन उसी इंसान ने अपनी इच्छाशक्ति और सनातन योग के ब्रह्मास्त्र से मौत को ऐसी पटखनी दी की पूरी दुनिया देखती रह गई।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं आधुनिक योग के पितामह, पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति का डंका बजाने वाले महान योग गुरु, पद्म विभूषण बी.के.एस. आयंगर (B.K.S. Iyengar) जी की। आज उनकी पुण्यतिथि है।

आज हम उस अकल्पनीय सफर की बात करेंगे जो एक बिस्तर पर पड़े बीमार बच्चे से शुरू हुआ और दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट तक जा पहुंचा।

मौत के मुहाने पर खड़े एक बीमार बच्चे की वो जादुई कहानी जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया

कहानी शुरू होती है 14 दिसंबर 1918 से। कर्नाटक के बेल्लूर (Bellur) नाम के एक छोटे से गांव में एक बेहद गरीब परिवार में बेलूर कृष्णमाचार सुंदरराज आयंगर (B.K.S. Iyengar) का जन्म हुआ।

लेकिन उनका जन्म कोई खुशियों वाला जन्म नहीं था। ये वो दौर था जब पूरी दुनिया में ‘स्पैनिश फ्लू’ (इन्फ्लुएंजा) नाम की भयंकर महामारी मौत का तांडव मचा रही थी।

आयंगर जी की मां जब गर्भवती थीं, तब वो खुद इस महामारी की चपेट में आ गई थीं।

नतीजा ये हुआ की जब बच्चा पैदा हुआ, तो वो इतना कमज़ोर और बीमार था की किसी को उसके बचने की उम्मीद ही नहीं थी।

बचपन का वो दौर, जिसमें बच्चे खेलते-कूदते हैं, आयंगर जी ने वो पूरा वक्त सिर्फ दर्द और बीमारियों से लड़ते हुए बिताया।

टीबी (Tuberculosis), मलेरिया और टाइफाइड जैसी जानलेवा बीमारियों ने इस छोटे से शरीर को अपना घर बना लिया था।

कुपोषण का ये आलम था की शरीर में मांस नाम की कोई चीज़ ही नहीं बची थी, वो बस हड्डियों का एक ढांचा भर रह गए थे। सांस लेने में भी इतनी तकलीफ होती थी की छाती फूलने की बजाय पिचक जाती थी।

हालात इतने खराब हो गए थे की उस वक्त के बड़े-बड़े डॉक्टरों ने परिवार वालों को साफ-साफ कह दिया था की “तैयारी कर लो, ये बच्चा किसी भी हालत में 20 साल की उम्र पार नहीं कर पाएगा।”

लेकिन कहते हैं ना, ऊपर वाले ने कुछ और ही स्क्रिप्ट लिख रखी थी। डॉक्टरों की वो पर्ची जिसमें मौत की तारीख लिखी जा रही थी, उसे योग ने फाड़कर फेंक दिया।

जिस शरीर को 20 साल में मिट्टी में मिल जाना था, उसी शरीर ने योग की ताकत से 95 साल की एक बेहद स्वस्थ, ऊर्जावान और महान ज़िंदगी जीकर पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया।

पंद्रह साल की उम्र में जब एक कमज़ोर शरीर ने योग को अपनाया और गुरु के कठोर अनुशासन ने बना दिया फौलाद

जब आयंगर जी 15 साल के हुए, तब तक उनका शरीर बीमारियों से लड़ते-लड़ते पूरी तरह टूट चुका था। तब उनके परिवार ने स्वास्थ्य सुधारने की एक आखिरी उम्मीद में उन्हें मैसूर भेज दिया।

वहां उनके बहनोई रहते थे- महान योग गुरु ‘तिरुमलाई कृष्णमाचार्य’, जिन्हें आज पूरी दुनिया आधुनिक योग का पिता मानती है।

लेकिन जब आयंगर जी ने पहली बार योग करने की कोशिश की, तो उनका शरीर इतना अकड़ा हुआ और कमज़ोर था की उंगलियों से अपने पैरों के अंगूठे छूना तो दूर की बात, वो सीधे खड़े भी नहीं हो पाते थे।

ज़रा सा मुड़ने पर शरीर के जोड़ों से कट-कट की आवाज़ें आती थीं और दर्द से चीख निकल जाती थी। लेकिन गुरु भी ऐसे की कोई ढील नहीं! कृष्णमाचार्य जी बहुत ही सख्त अनुशासन वाले गुरु थे।

एक दिन गुरु के एक मुख्य शिष्य वहां से चले गए। अब गुरु जी ने सीधे आयंगर को बुलाया और कहा की “अब से तुम्हें ही कठिन आसनों का प्रदर्शन करना होगा।”

ये आग के दरिया को पार करने जैसा था। दर्द के मारे उनकी आंखों से आंसू बहते थे, मांसपेशियां खिंच जाती थीं, पर आयंगर जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने दर्द को ही अपना दोस्त बना लिया।

यहीं से तो शुरू हुई असली कहानी! उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। जो शरीर कल तक बीमारी से कांपता था, वो गुरु की दी हुई उस कठोर तपस्या से फौलाद बनने लगा।

1937 में, जब वो महज़ 18-19 साल के थे, तब उनके गुरु ने उनका समर्पण देखकर उन्हें पुणे (Pune) जाकर लोगों को योग सिखाने का आदेश दिया।

पुणे जाकर आयंगर जी ने जो किया, वो किसी इंसान के बस की बात नहीं। वहां उन्होंने हर दिन, 10-10 घंटे तक योग का कठोर अभ्यास किया। खुद के शरीर को प्रयोगशाला बना लिया और हर एक आसन की गहराई को समझने लगे।

लकड़ी के ब्लॉक और रस्सियों ने किया वो चमत्कार जिससे बीमार और बुजुर्गों के लिए भी वरदान बन गया ‘आयंगर योग’

पुणे में अभ्यास करते और लोगों को सिखाते हुए आयंगर जी ने एक बहुत बड़ी बात नोटिस की। उन्होंने देखा की योग के जो पारंपरिक आसन हैं, वो बहुत कठिन हैं।

कोई स्वस्थ जवान आदमी तो उन्हें कर लेगा, लेकिन अगर कोई इंसान बीमार है, बुजुर्ग है, या उसके जोड़ों में भयंकर दर्द है, तो वो बेचारा योग कैसे करेगा?

क्योंकि आयंगर जी खुद बचपन में भयंकर बीमारियों और शारीरिक दर्द के उस भयानक दौर से गुज़र चुके थे, इसलिए वो बीमारों का दर्द बहुत अच्छी तरह समझते थे।

बस यहीं से दुनिया के सामने आया योग का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी रूप- ‘आयंगर योग’ (Iyengar Yoga)!

उन्होंने ठान लिया की योग सिर्फ गुफाओं में बैठे साधुओं या एकदम फिट लोगों की बपौती नहीं रहेगा, बल्कि यह हर आम और कमज़ोर इंसान तक पहुंचेगा।

और इसके लिए उन्होंने दुनिया में पहली बार योग करने के लिए प्रॉप्स (Props) यानी सहायक उपकरणों का इस्तेमाल शुरू किया।

रस्सियां, बेल्ट, लकड़ी के छोटे-छोटे गुटके (Blocks), कुर्सियां, और कंबल… उन्होंने इन आम सी चीज़ों को योग का हिस्सा बना दिया।

अगर कोई इंसान झुक नहीं पा रहा है, तो वो लकड़ी के ब्लॉक का सहारा ले सकता है। अगर किसी से पैर नहीं खिंच रहा है, तो वो बेल्ट का इस्तेमाल कर सकता है।

उनका पूरा फोकस शरीर के ‘अलाइनमेंट’ (Alignment) यानी सही मुद्रा पर था।

आयंगर जी के इस तरीके से उन लोगों ने भी योग करना शुरू कर दिया जिन्हें लकवा (Paralysis) मार गया था, जिन्हें हार्ट की गंभीर बीमारियां थीं, या जो अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर बिस्तर पर पड़े थे।

इन प्रॉप्स के सहारे जब बीमार लोगों ने योग किया, तो उन्हें ऐसे चमत्कारी फायदे हुए कि बड़े-बड़े अस्पतालों के डॉक्टर भी पर्चे देखते रह गए।

आयंगर जी ने योग को एक ऐसी साइंटिफिक आर्ट में बदल दिया जिसने इंसान के शरीर और आत्मा को एक धागे में पिरो दिया।

जब मशहूर विदेशी ‘येहुदी मेनुहिन’ ने टेके घुटने और फिर सात समंदर पार बजने लगा भारत की प्राचीन विद्या का डंका

अब आते हैं उस ऐतिहासिक मोड़ पर, जिसने भारत के इस देसी योग को सात समंदर पार पहुंचा दिया।

साल था 1952। दुनिया के सबसे महान और मशहूर वायलिन (Violin) वादक ‘येहुदी मेनुहिन’ (Yehudi Menuhin) भारत के दौरे पर आए हुए थे।

मेनुहिन उस वक्त भयंकर थकान, तनाव और अनिद्रा की बीमारी से बुरी तरह जूझ रहे थे। बड़े-बड़े विदेशी डॉक्टरों का इलाज चल रहा था, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हो रहा था।

उसी दौरान किसी ने उन्हें बी.के.एस. आयंगर जी से मिलने की सलाह दी। मेनुहिन बहुत थके हुए थे, तो उन्होंने साफ कह दिया की “मैं सिर्फ 5 मिनट का समय दे पाऊंगा।”

आयंगर जी जब उनसे मिलने गए, तो उन्होंने कोई लंबी-चौड़ी बात नहीं की। उन्होंने मेनुहिन को बस एक आसन कराया- शवासन!

और भाईसाहब, वो 5 मिनट का समय कब 3 घंटे में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला! आयंगर जी के उस एक आसन ने मेनुहिन को ऐसी गहरी और सुकून भरी नींद में सुला दिया, जिसके लिए वो सालों से तरस रहे थे।

जब वो सोकर उठे, तो उनकी सारी थकान, सारा तनाव छूमंतर हो चुका था। दुनिया का वो महान संगीतकार भारत के इस धोती पहने, छरहरे से गुरु के आगे नतमस्तक हो गया।

यहीं से एक ऐसा सफर शुरू हुआ जिसने पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया। मेनुहिन आयंगर जी के शिष्य बन गए और उन्हें अपने साथ स्विट्ज़रलैंड, लंदन और पेरिस ले गए।

वहां जाकर जब आयंगर जी ने अपनी योग विद्या का प्रदर्शन किया, तो अमेरिका और यूरोप के वो लोग जो अपनी मेडिकल साइंस पर बहुत घमंड करते थे, वो हैरत में पड़ गए।

उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था की बिना किसी महंगी मशीन या दवा के, सिर्फ सांसों और शरीर के तालमेल से कोई इंसान इतना स्वस्थ कैसे हो सकता है!

पूरे पश्चिमी जगत ने भारत की इस महान विद्या के आगे पूरे सम्मान और आदर के साथ अपना सिर झुका लिया।

टाइम मैगजीन से लेकर ऑक्सफोर्ड तक में गूंजा नाम और भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान देकर किया कर्ज अदा

ये सिर्फ एक इंसान की सफलता नहीं थी, ये पूरी सनातन संस्कृति की जीत थी। आयंगर जी के इस अभूतपूर्व योगदान को पूरी दुनिया ने खुले दिल से सलाम किया।

2004 में जब अमेरिका की दुनिया भर में मशहूर ‘टाइम मैगजीन’ (TIME Magazine) ने अपनी ‘100 सबसे प्रभावशाली लोगों’ (100 Most Influential People) की लिस्ट निकाली, तो उसमें हमारे बी.के.एस. आयंगर जी का नाम पूरे सम्मान के साथ शामिल था।

और तो और, सबसे बड़ी डिक्शनरी ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ (Oxford Dictionary) ने ‘Iyengar’ शब्द को बाकायदा एक नाउन (Noun) के तौर पर अपनी डिक्शनरी में शामिल कर लिया।

इसका मतलब है- ‘अष्टांग योग का एक प्रकार’। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर के मेयर तो उनके इतने बड़े मुरीद हो गए थे की उन्होंने 3 अक्टूबर को आधिकारिक रूप से ‘B.K.S. Iyengar Day’ ही घोषित कर दिया था।

भारत की दिग्गज हस्तियों का भी उन पर अटूट विश्वास था। हमारे देश के महान तेज़ गेंदबाज़ ज़हीर खान, जिनके कंधे की चोट ने लगभग उनका करियर खत्म कर दिया था, उनकी चोट को भी आयंगर जी ने अपनी योग विद्या से ठीक किया और ज़हीर फिर से मैदान पर उतरे।

अपने इस महान सपूत को भारत सरकार ने भी वो इज़्ज़त बख्शी जिसके वो हकदार थे। उन्हें 1991 में ‘पद्म श्री’, 2002 में ‘पद्म भूषण’ और 2014 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया।

भारत माता के इस अनमोल रत्न और पूरी दुनिया में सनातन योग विद्या का परचम लहराने वाले बी.के.एस. आयंगर जी को आज उनकी पुण्यतिथि पर हम शत-शत नमन करते हैं।

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