जरा सोच कर देखिये, जुलाई की भयंकर गर्मी हो या अगस्त की मानसून वाली बारिश.. आप अपनी मेहनत की कमाई से ऑफिस जा रहे होते हैं या किसी ज़रूरी काम से निकले होते हैं। तभी अचानक पीछे से पुलिस की हूटर बजाती जिप्सियां आती हैं।
खाकी वर्दी वाले ऐसे डंडे फटकारते हुए आते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा राक्षस सड़क से गुजरने वाला हो जिससे हमें खतरा हो। वो आपको और आपके जैसे हज़ारों टैक्स भरने वाले आम लोगों को सड़क किनारे कीड़े-मकोड़ों की तरह धकेल देते हैं।
फिर कुछ मिनट बाद काले शीशे वाली, चमचमाती AC गाड़ियों का एक लंबा-चौड़ा काफिला फर्राटे भरते हुए निकल जाता है। अंदर कौन बैठा है? कोई बाबू, कोई अधिकारी या कोई नेता!
और बाहर कौन खड़ा है? वो आम हिंदुस्तानी जिसकी खून-पसीने की कमाई से इनकम टैक्स, रोड टैक्स और टोल टैक्स कटता है, और उसी पैसे से इन ‘नवाबों’ की गाड़ियों में पेट्रोल डलता है।
सच कहूं तो, आज के टाइम में आम आदमी के सीने में जो सबसे भयंकर आग सुलग रही है ना, वो किसी विपक्षी पार्टी के भड़काने से नहीं, बल्कि इसी सड़े हुए और ‘VVIP कल्चर’ से लग रही है।
बीजेपी के टॉप लीडरशिप को आज ये बात बहुत गहराई से समझनी होगी। आज उत्तराखंड से लेकर मणिपुर और मध्य प्रदेश तक, बीजेपी शासित राज्य सरकारों के लिए सबसे बड़ा खतरा कोई विपक्षी नेता नहीं है।
इनका सबसे बड़ा भस्मासुर इनके अपने ही सिस्टम में बैठा है।
वो प्रशासन, वो बाबूशाही जो अपने रुतबे के लिए पूरी की पूरी जनता को सड़कों पर घंटों बंधक बना देती है.. ये सिस्टम बीजेपी के उस कोर वोटर (मिडल क्लास) को अंदर ही अंदर सरकार से अलग कर रहा है।
अगर वक्त रहते इस लाल बत्ती वाले माइंडसेट को कुचला नहीं गया, तो यही जनता अगली बार बैरिकेड नहीं, बल्कि पूरी की पूरी सत्ता उखाड़ फेंकेगी।
वोट और टैक्स से बनी सरकार में सड़कों पर जलील होता आम आदमी, VIP कल्चर बना BJP के लिए सबसे बड़ी मुसीबत
ज़रा ग्राउंड की हकीकत समझिए। आज भारत का मिडल क्लास बहुत जागरूक हो चुका है।
वो जानता है की उसने एक ऐसी पार्टी को भारी बहुमत देकर सत्ता में बिठाया है जिसने ‘वीआईपी कल्चर’ को जड़ से उखाड़ने का वादा किया था।
प्रधानमंत्री मोदी जी ने खुद 2017 में गाड़ियों से लाल बत्ती हटवा दी थी ताकि ये नवाब कल्चर खत्म हो। लेकिन ग्राउंड लेवल पर इन छुटभैये नेताओं ने क्या जुगाड़ निकाला?
इन्होंने लाल बत्ती की जगह भयंकर आवाज़ वाले हूटर, सायरन और गाड़ियों के काफिले को अपना नया ‘स्टेटस सिंबल’ बना लिया।
प्रशाषन आज एक आम आदमी के साथ ऐसा बर्ताव करता है जैसे वो कोई बहुत बड़ा गुनहगार हो। आप किसी नेता या अफसर की गाड़ी के लिए घंटों तक पूरा शहर चोक कर देते हो।
बच्चा स्कूल के लिए लेट हो रहा है, कोई इंटरव्यू के लिए भाग रहा है, किसी की दुकान का टाइम निकल रहा है, किसी को जल्दी से अस्पताल पहुँचाना है..
लेकिन इस प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। इन्हें तो सत्ता की सनक में बस अपना ‘रुतबा’ दिखाना है।
इस बाबूशाही को ये बात समझ नहीं आती की जब एक आम आदमी गर्मी में तपते हुए इन AC गाड़ियों को घूरता है, तो उसके दिमाग में क्या चल रहा होता है।
वो सोचता है की यार, मैंने वोट देकर इन्हें इसलिए कुर्सी पर बिठाया था ताकि मेरी ज़िंदगी आसान हो, लेकिन ये तो मेरी ही ज़िन्दगी सड़क पर नर्क बना रहे हैं।
बीजेपी को ये बात अपने पल्ले बांध लेनी चाहिए की उनका वोटर बहुत लॉयल है, वो आसानी से पाला नहीं बदलता..
लेकिन जब उसके स्वाभिमान पर चोट लगती है तो वो खामोशी से सोचने पर मजबूर हो जाता है। और यही खामोशी चुनाव वाले दिन सबसे भारी पड़ती है।
रुद्रपुर की तपती सड़क से लेकर देहरादून तक उत्तराखंड की जनता का फूटा गुस्सा, VIP रूट के नाम पर बंधक बने लोग
अब हवा-हवाई बातें छोड़कर सीधा ज़मीनी सुबूतों पर आते हैं। अभी पिछले ही महीने, जुलाई 2026 में उत्तराखंड के रुद्रपुर में जो कांड हुआ, उसने पूरे सिस्टम की नींद उड़ा कर रख दी है।
देवभूमि उत्तराखंड, जो बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है, वहां की जनता का सब्र अब इस वीआईपी कल्चर के आगे जवाब दे रहा है।
रुद्रपुर में जिला अस्पताल के पास पुलिस ने मुख्यमंत्री के वीआईपी मूवमेंट के लिए पूरा ट्रैफिक रोक दिया। पारा 42 डिग्री के पार जा रहा था, आसमान से आग बरस रही थी।
लोग पसीने से नहाए हुए थे और पुलिस वालों से मिन्नतें कर रहे थे की यार हमें जाने दो। लेकिन पुलिस अपनी उसी रौब वाली भाषा में उन्हें हड़का रही थी।
बस फिर क्या था! पब्लिक का मीटर घूम गया। लोग अपनी गाड़ियां छोड़कर सीधे पुलिस वालों से भिड़ गए।
आम जनता सरेआम पुलिस को सुना रही थी की “तुम्हारे नेताओं के चक्कर में हम क्यों मरें यहां गर्मी में?” लोगों ने बैरिकेड्स खुद ही धकेल दिए और पुलिस वालों की एक न सुनी।
और ये सिर्फ रुद्रपुर का हाल नहीं है भाई। देहरादून, जो की राजधानी है, वहां तो आए दिन सीएम या किसी न किसी मंत्री के काफिले के चक्कर में घंटों जाम लग जाता है।
मसूरी जाने वाले रास्तों पर जब कोई बड़ा बाबू वीकेंड मनाने निकलता है, तो लोकल जनता को अपने ही शहर में अछूतों की तरह साइड में खड़ा कर दिया जाता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी के लिए ये रुद्रपुर का बवाल एक बहुत बड़ा वेक-अप कॉल है। देवभूमि की जनता बहुत शांत और आध्यात्मिक है।
वो जल्दी सड़कों पर नहीं उतरती। लेकिन जब वो अपने ही राज्य में इस प्रशानिक रवैये का शिकार होती है, तो उसका गुस्सा सीधा सरकार के खाते में दर्ज होता है।
धामी जी को तुरंत इस बाबूशाही पर नकेल कसनी होगी, वरना VIP कल्चर के चक्कर में सरकार की पूरी छवि मटियामेट हो जाएगी।
मणिपुर में सुलगती आग के बीच VIP काफिलों को दिखाए जा रहे काले झंडे, ज़मीनी हकीकत से कट चुका है ये नवाब सिस्टम
अब ज़रा पहाड़ों से उतरकर नॉर्थ-ईस्ट का हाल देख लेते हैं। मणिपुर पिछले काफी समय से किन हालात से गुज़र रहा है, ये पूरे देश को पता है।
वहां की आम जनता कैंपों में रहने को मजबूर है, इंटरनेट बंद हो जाता है, लोग खौफ के साए में जी रहे हैं।
ऐसे भयंकर और संवेदनशील माहौल में एक समझदार प्रशासन क्या करता है? वो जनता के बीच जाता है, सादगी से रहता है और उन्हें ये एहसास दिलाता है की सरकार उनके साथ खड़ी है।
लेकिन हमारे इस ‘नवाब सिस्टम’ का घमंड तो देखिए! जब पूरा प्रदेश सुलग रहा है, तब भी वहां के लोकल नेताओं और मंत्रियों को 20-20 गाड़ियों के सायरन वाले काफिले में घूमने का चस्का लगा हुआ है।
जब आम आदमी अपनी रोजी-रोटी और सुरक्षा के लिए रो रहा हो, और उसी वक्त उसके सामने से कोई नेता ब्लैक शीशे वाली गाड़ी में हूटर बजाते हुए निकले, तो पब्लिक का मीटर घूमना तो पक्का है।
और यही हुआ है अभी अगस्त 2026 में! मणिपुर के मखान गांव और नेशनल हाईवे-2 (NH-2) पर जनता का गुस्सा सीधे ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
जब वीआईपी काफिले वहां से गुज़रने की कोशिश कर रहे थे, तो आम जनता ने सीधे तौर पर बगावत कर दी।
लोगों ने बीच सड़क पर टायर जला दिए, रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया और सीएम से लेकर मंत्रियों के काफिलों को सरेआम काले झंडे दिखाए गए।
बात इतनी बढ़ गई की वहां के डिप्टी सीएम तक के काफिले को पब्लिक के भारी विरोध और ब्लॉकेड का सामना करना पड़ा।
ये कोई छोटी-मोटी घटना नहीं है भाई। ये चीख-चीख कर बता रही है की आपका सिस्टम ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुका है।
जब जनता दर्द में होती है, तो उसे आपके इस भौकाल और आपके इस पावर-शो (Power show) से चिढ़ होने लगती है।
मजबूरी में आकर अब सरकार को वहां वीआईपी काफिलों का साइज़ छोटा करने का आदेश देना पड़ा है। लेकिन सवाल ये है की ये अकल पहले क्यों नहीं आई?
मणिपुर की ये घटना हर उस बीजेपी शासित राज्य के लिए एक बहुत बड़ा अलार्म है, जो सोचता है की चुनाव जीतने के बाद वो पब्लिक को सड़क पर कैसे भी ट्रीट कर सकता है।
जनता वोट इसलिए देती है ताकि आप उसकी सेवा करें, ना कि इसलिए की आप चुनाव जीतने के बाद उसी जनता के सामने सायरन बजाते हुए गाड़ियां दौड़ाएं।
अगर आप पब्लिक के दर्द को नहीं समझेंगे और सिर्फ अपनी सिक्योरिटी और प्रोटोकॉल का रोना रोते रहेंगे, तो वो दिन दूर नहीं जब पब्लिक आपको उसी वीआईपी रूट पर पैदल चलने को मजबूर कर देगी।
सड़क पर बजते हॉर्न और पुलिस से भिड़ता मिडल क्लास, MP से लेकर महाराष्ट्र तक बीजेपी के कोर वोटर का छलक रहा सब्र
अब पब्लिक बेवकूफ नहीं रही है भाई। पहले लोग जाम में फंसते थे तो मन ही मन गालियां देकर या किस्मत को कोस कर चुपचाप खड़े रहते थे।
लेकिन अब दौर बदल गया है। अब जब पुलिस वाले किसी मंत्री या अधिकारी के लिए पब्लिक को रोकते हैं, तो पब्लिक चुप नहीं बैठती।
जनता ने इस वीवीआईपी अहंकार का एक नया और बेहद करारा इलाज ढूंढ लिया है- ‘हॉर्न प्रोटेस्ट’ (Honking Protest)।
ज़रा मध्य प्रदेश के ग्वालियर का वो जुलाई 2026 वाला किस्सा याद कीजिए। वहां वीआईपी मूवमेंट के लिए पुलिस ने घंटों तक शहर का ट्रैफिक रोक दिया।
उसी जाम में एक आदमी अपनी प्रेग्नेंट बीवी के साथ फंसा हुआ था। जब काफी देर तक गाड़ियां टस से मस नहीं हुईं और पुलिस वालों ने दादागिरी दिखाई, तो उस आदमी का सब्र टूट गया।
वो अपनी गाड़ी से बाहर निकला, सीधा पुलिस वालों के पास गया और बीच सड़क पर उनकी क्लास लगा दी।
उसने पुलिस वालों को सरेआम लताड़ा और फिर पीछे मुड़कर पूरी पब्लिक से कहा की “बजाओ हॉर्न! कोई अपनी गाड़ी का हॉर्न बंद नहीं करेगा!”
देखते ही देखते पूरे जाम में फंसी गाड़ियों ने एक साथ कान फाड़ू हॉर्न बजाना शुरू कर दिया। वो शोर इतना भयंकर था की पुलिस वालों के पसीने छूट गए।
और ये सिर्फ एमपी का हाल नहीं है। महाराष्ट्र के पुणे में अभी जब देवेंद्र फडणवीस के काफिले की वजह से शहर में भयंकर जाम लगा, तो सोशल मीडिया पर लोगों ने सरकार को ऐसा लपेटा की जवाब देते नहीं बना।
मुंबई में तो अप्रैल 2026 में एक आम महिला अपनी गाड़ी से उतरकर सीधे मंत्री जी के काफिले के सामने खड़ी हो गई थी।
उसने सरेआम पुलिस और उस मंत्री को सुनाया की “तुम्हारे इस तमाशे की वजह से हम आम जनता क्यों परेशान हों?”
बीजेपी की टॉप लीडरशिप को ये बात बहुत बारीकी से समझनी होगी। ये जो सड़कों पर हॉर्न बजा रहा है, पुलिस से भिड़ रहा है, ये कोई भाड़े का प्रदर्शनकारी नहीं है।
ये वो ‘मिडल क्लास’ है जो बीजेपी का सबसे वफादार और कोर वोटर है। ये वो इंसान है जो हर महीने अपनी सैलरी कटने से पहले भारी-भरकम टैक्स सरकार के खजाने में डालता है।
अगर आप अपने इसी कोर वोटर को सड़कों पर जलील करोगे, तो नतीजा बहुत भयंकर होगा।
ये वोटर इतना समझदार है की शायद वो विपक्षी नेताओं के बहकावे में न आए, लेकिन वो इस ‘वीवीआईपी घमंड’ से इतना निराश हो जाएगा की वोटिंग वाले दिन घर से निकलेगा ही नहीं।
और अगर बीजेपी का ये कोर वोटर घर बैठ गया, तो सत्ता की नींव दरकने में देर नहीं लगेगी।
VIP काफिलों के लिए रोक दी जाती है एंबुलेंस, बाबूशाही की चाटुकारिता ले रही मरीजों की जान
यार एक बात बताओ, इंसान की जान से बढ़कर भी कोई वीआईपी मूवमेंट होता है क्या? अगर आप किसी आम आदमी से पूछोगे तो वो कहेगा बिल्कुल नहीं।
लेकिन हमारे देश के सिस्टम में बैठे बाबुओं से पूछोगे, तो उनके लिए किसी मंत्री का 5 मिनट का समय एक आम आदमी की पूरी ज़िंदगी से ज़्यादा कीमती है।
और ये कोई हवा-हवाई बात नहीं है भाई, ये सड़क पर होने वाले वो रोज़ के मर्डर हैं जिन्हें सिस्टम बड़ी चालाकी से ‘प्रोटोकॉल’ का नाम दे देता है।
अभी इसी महीने (अगस्त 2026) की घटनाएं उठाकर देख लीजिए। दिल्ली एम्स (AIIMS) के बाहर के रास्तों से लेकर गुजरात और हरियाणा के कई बीजेपी शासित इलाकों में ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिन्हें देखकर किसी भी पत्थर दिल इंसान का खून खौल जाए।
सड़क पर एक एंबुलेंस खड़ी है, उसका सायरन चीख-चीख कर कह रहा है की अंदर कोई अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
एंबुलेंस का ड्राइवर पुलिस वालों के सामने हाथ जोड़ रहा है। लेकिन खाकी वर्दी पहने वो अफसर बिल्कुल पत्थर बने खड़े हैं। क्यों? क्योंकि सामने से किसी बड़े साहब या मंत्री जी का काफिला गुज़रने वाला है!
ज़रा सोचिए, उस एंबुलेंस के अंदर बैठे परिवार पर क्या गुज़र रही होगी? एक तरफ उनका अपना खून तड़प रहा है, और दूसरी तरफ सिस्टम की ये बेशर्मी!
क्या उस नेता या मंत्री को ये पता होता है की उसके काफिले के लिए पीछे किसी की जान जा रही है? शायद नहीं!
इन सब मामलों में एक बड़ा हाथ उस जिला प्रशासन का भी होता है, जिन्हें अपने आकाओं की चाटुकारिता करने की गंदी बीमारी लग चुकी है।
इन अफसरों को लगता है की अगर मंत्री जी की गाड़ी 10 सेकंड के लिए भी एंबुलेंस की वजह से स्लो हो गई, तो मंत्री जी नाराज़ हो जाएंगे और इनकी मलाईदार पोस्टिंग छिन जाएगी।
अपनी नंबर बढ़ाने और चमचागिरी के चक्कर में ये अधिकारी इंसानियत को सरेआम सूली पर चढ़ा देते हैं।
लेकिन इन्हें ये समझ नहीं आता की जब वो तड़पता हुआ परिवार और वहां खड़ी आम पब्लिक ये नज़ारा देखती है, तो वो उस पुलिस वाले को गाली नहीं देती… वो सीधा उस सरकार को और उस नेता को गाली देती है जो उस AC गाड़ी के अंदर बैठा होता है।
अगर सिस्टम किसी की जान नहीं बचा सकता, तो उसे वीआईपी रूट के नाम पर किसी की जान लेने का भी कोई हक़ नहीं है!
अब वक्त आ गया है की उत्तराखंड से लेकर मध्य प्रदेश और मणिपुर तक, सभी बीजेपी मुख्यमंत्रियों को अपनी आँखें खोलनी होंगी।
उन्हें तुरंत एक सख्त और डिक्टेटर वाला आदेश पास करना चाहिए। ये नियम बना देना चाहिए की किसी भी मंत्री, अधिकारी या खुद सीएम के काफिले के लिए आम जनता का ट्रैफिक 3 मिनट से ज़्यादा किसी भी कीमत पर नहीं रोका जाएगा।
लोकतंत्र में ये बात हमेशा याद रखनी चाहिए की असली राजा वो नहीं है जो ब्लैक शीशे वाली गाड़ी में सायरन बजाते हुए बैठा है।
असली राजा वो है जो बाहर 45 डिग्री की गर्मी में पसीना बहाकर इस देश की इकॉनमी चला रहा है और टैक्स भर रहा है।
