सुबह की धूप तेज है। देहरादून से मसूरी जाने वाली सड़क पर गाड़ियों की कतार खड़ी है। एक स्कूल बस में बच्चे बेचैन हो रहे हैं। बगल में एक ऑटो वाला बार-बार घड़ी देख रहा है। दूर से सायरन की आवाज आती है। लोग सोचते हैं शायद एंबुलेंस है। रास्ता खुल जाएगा।
लेकिन सामने से निकलता है लंबा काफिला। लाल-नीली बत्तियां। कई गाड़ियां। पुलिस वाले हाथ उठाकर सबको रोक देते हैं। एंबुलेंस भी पीछे कहीं फंसी है। मरीज के परिजन खिड़की से झांक रहे हैं। काफिला निकलने में बीस मिनट लगते हैं। फिर भी सड़क तुरंत नहीं खुलती।
यह कोई इक्का-दुक्का नजारा नहीं है। उत्तराखंड की सड़कों पर यह रोज का सच है। और यही सच भाजपा सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।
असली दुश्मन कौन है?
कांग्रेस के नेता बयानबाजी करते हैं। प्रेस कांफ्रेंस करते हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते हैं। लेकिन जमीन पर उनका असर बहुत कम है। रैलियां खाली रहती हैं। कार्यकर्ता बिखरे हुए हैं। जनता उन्हें गंभीरता से नहीं लेती।
असली खतरा कहीं और से आ रहा है।
भाजपा के अपने समर्थक अब गुस्से में हैं। वही लोग जो 2017 और 2022 में वोट देकर सरकार बनाते हैं। वही लोग जो हर चुनावी रैली में झंडा लेकर खड़े होते हैं। अब वही लोग सड़क किनारे खड़े होकर गाली देते हैं। चुपचाप नहीं। घर जाकर परिवार में बात करते हैं। मोहल्ले में बात करते हैं। व्हाट्सएप ग्रुप में वीडियो भेजते हैं।
दुकानदार सबसे ज्यादा परेशान है। राजपुर रोड हो, घंटाघर हो, प्रेमनगर हो या मसूरी रोड। काफिला निकलने से पहले पुलिस दुकान के सामने रुकवा देती है। ग्राहक नहीं आ पाते। दो घंटे की कमाई जाती रहती है। शाम को हिसाब लगाता है तो घाटा दिखता है। पेट्रोल का बिल वही रहता है। किराया वही रहता है। लेकिन आमदनी कट जाती है।
टैक्सी और ऑटो चालक और बुरी हालत में हैं। मीटर चल रहा होता है। यात्री बैठे होते हैं। अचानक सड़क बंद। इंजन बंद करके खड़े रहो। किराया नहीं बढ़ता। समय बर्बाद होता है। अगली बुकिंग छूट जाती है। पहाड़ी सड़क पर एक जाम लग जाए तो पूरा दिन खत्म।
दफ्तर जाने वाले कर्मचारी सबसे ज्यादा चुप रहते हैं। लेकिन अंदर से गुस्सा रखते हैं। सुबह सात बजे निकलते हैं। आठ बजे काफिला आ जाता है। देर हो जाती है। बॉस नाराज होता है। कुछ जगहों पर देरी की छुट्टी कटती है। तनख्वाह में कटाव का डर रहता है। ये वही लोग हैं जो हर महीने आयकर देते हैं। जीएसटी देते हैं।
मरीज के परिजन की हालत और खराब है। एंबुलेंस में बैठा आदमी कराह रहा होता है। परिवार वाले हाथ जोड़कर पुलिस से विनती करते हैं। रास्ता खोल दो भैया। लेकिन जवाब वही मिलता है। थोड़ा इंतजार करो। साहब आ रहे हैं। पहाड़ों में यह इंतजार जान ले लेता है। फिर भी काफिला पहले निकलता है।
किसान अपनी सब्ज़ी और फल लेकर मंडी जा रहा होता है। सुबह जल्दी निकलता है ताकि ताजा माल बेच सके। बीच रास्ते में रुकवा दिया जाता है। धूप में खड़ा रहता है। माल खराब होने लगता है। शाम को भाव गिर चुका होता है। नुकसान किसान का। फायदा किसी और का नहीं।
दैनिक मजदूर भी फंसता है। सुबह काम पर जाना है। शाम को मजदूरी लेकर घर लौटना है। दोनों तरफ जाम। दोनों तरफ इंतजार। पेट्रोल खर्च ज्यादा। कमाई वही।
ये सब लोग भाजपा के खिलाफ नहीं निकले थे। ये लोग विकास चाहते थे। सड़क चाहते थे। बिजली चाहते थे। सुरक्षा चाहते थे। इन्होंने वोट दिया। अब वही वोट देने वाले लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
नेता मंच से आम आदमी की बात करते हैं। गरीब की बात करते हैं। टैक्सपेयर की इज्जत की बात करते हैं। लेकिन सड़क पर वही आम आदमी रुकवा दिया जाता है। जैसे वह कोई बाहरी हो। जैसे उसकी जिंदगी की कोई कीमत न हो।
यह रोज का अपमान धीरे-धीरे नफरत में बदल रहा है। यह नफरत चुनावी भाषणों से नहीं मिटेगी। यह नफरत तभी मिटेगी जब सड़क पर व्यवहार बदलेगा।
कांग्रेस कमजोर है। वह सरकार नहीं गिरा सकती। लेकिन यह वीवीआईपी कल्चर भाजपा के अपने घर में आग लगा रहा है। अपने ही वोटर्स को रोज तड़पा रहा है। अपने ही समर्थकों को शर्मिंदा कर रहा है।
यह विपक्ष की साजिश नहीं है। यह खुद की बनाई हुई बीमारी है। और यही बीमारी 2027 में सबसे महंगी पड़ सकती है।

जब एंबुलेंस रुक जाती है
अप्रैल 2026 में देहरादून में विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान वीआईपी रूट बना दिया गया। सड़क जाम हो गई। एक एंबुलेंस बीच में फंस गई। वीडियो वायरल हुआ। लोग कमेंट लिख रहे थे। शर्म करो नेताओं। मरीज मर रहा है और तुम्हारा काफिला निकल रहा है।
यह कोई एक दिन की घटना नहीं है।
जून 2025 में नैनीताल के कैंची धाम के पास एक और घटना हुई। 40 साल के जगमोहन सिंह खून की उल्टी कर रहे थे। परिवार उन्हें हल्द्वानी अस्पताल ले जा रहा था। सामान्य रास्ता दो घंटे का होता है। उस दिन एंबुलेंस जाम में फंस गई। पांच घंटे से ज्यादा लग गए। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजन बताते हैं कि रास्ते में बार-बार विनती की। रास्ता खोल दो। कोई नहीं सुना।
पहाड़ों में मिनट गिनती के होते हैं। दिल का दौरा पड़े तो हर सेकंड मायने रखता है। सड़क दुर्घटना हो जाए तो खून बहता रहता है। गर्भवती महिला का दर्द शुरू हो जाए तो समय नहीं रुकता। एंबुलेंस में ऑक्सीजन खत्म हो रही हो तो सांस रुकने लगती है। फिर भी काफिला पहले निकलता है। एंबुलेंस इंतजार करती है।
पर्यटक सीजन में हाल और बुरा हो जाता है। मसूरी, नैनीताल, चारधाम मार्ग, जोशीमठ। पहले से जाम लगा होता है। ऊपर से वीआईपी मूवमेंट आ जाता है। पूरा रास्ता बंद। एंबुलेंस घंटों खड़ी रहती है। परिवार वाले खिड़की से बाहर झांकते हैं। पुलिस वाले हाथ हिलाते हैं।
सवाल सीधा है। वीआईपी का सायरन हमेशा एंबुलेंस के सायरन से ऊपर क्यों रहता है?
पुलिस वाले पहले काफिले को रास्ता देते हैं। एंबुलेंस बाद में सोचेगी। यह प्राथमिकता पूरी तरह उल्टी है। सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि मरीज की जान दांव पर लग जाए।
कई बार सोशल मीडिया पर वीडियो आते हैं। दो एंबुलेंस किनारे खड़ी हैं। बीच से लंबा काफिला निकल रहा है। लोग पूछते हैं। यह कैसी व्यवस्था है? प्रधानमंत्री का काफिला कभी-कभी एंबुलेंस को रास्ता देता दिखा है। लेकिन राज्य स्तर पर वही पुरानी बीमारी चल रही है।
परिवार वाले क्या महसूस करते हैं? बेटा या बेटी एंबुलेंस में कराह रहा होता है। माता-पिता हाथ जोड़कर खड़े होते हैं। पुलिस वाले मुंह फेर लेते हैं। क्योंकि ऊपर से आदेश है। काफिला पहले।
यह सिर्फ देरी नहीं है। यह जानबूझकर की गई लापरवाही है। पहाड़ी सड़क संकरी होती है। एक तरफ पहाड़। दूसरी तरफ खाई। एक बार बंद हुआ तो कोई रास्ता नहीं बचता। मैदान में शायद कोई वैकल्पिक रास्ता मिल जाए। पहाड़ में नहीं मिलता।
हर बार जब एंबुलेंस रुकती है तो कोई परिवार टूटता है। कोई मां रोती है। कोई बाप सिर पीटता है। फिर भी व्यवस्था नहीं बदलती।
यह वीवीआईपी कल्चर सिर्फ असुविधा नहीं पैदा कर रहा। यह जानें ले रहा है। और यह जानें उन्हीं लोगों की ले रहा है जो टैक्स देते हैं। जो वोट देते हैं। जो सरकार बनाते हैं।

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति। पूरा शहर ठप
सुरक्षा जरूरी है। कोई इनकार नहीं करता। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या उपराष्ट्रपति आएं तो सुरक्षा कड़ी होनी चाहिए। लेकिन पूरे शहर को बंधक बना देना सुरक्षा नहीं है। यह अति है। यह अहंकार है।
नवंबर 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू देहरादून आईं। विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करने आईं। शहर में सख्त ट्रैफिक प्लान लागू कर दिया गया। 20 निजी स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी गई। बच्चे घर बैठ गए। माता-पिता की छुट्टी खराब हो गई। कई प्रमुख मार्गों पर घंटों डायवर्जन रहा। आराघर से ईसी रोड, फव्वारा चौक, इनकम टैक्स चौक। सड़कें खाली करा दी गईं। आम आदमी का पूरा दिन बर्बाद हो गया।
अगस्त 2026 में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन देहरादून और मसूरी आए। 19 और 20 अगस्त को कई घंटों तक रूट डायवर्जन लागू रहा। दोपहर एक से साढ़े तीन बजे तक। सुबह साढ़े आठ से साढ़े दस बजे तक। फिर दोपहर बारह से तीन बजे तक। पुलिस ने कहा एंबुलेंस और जरूरी सेवाओं को छूट रहेगी। लेकिन जमीन पर क्या होता है, सब जानते हैं। जाम लगते ही सब फंस जाता है। दुकानें बंद। ऑटो रुक जाते हैं। लोग घंटों इंतजार करते हैं।
प्रधानमंत्री जब आते हैं तो और बड़ा बंदोबस्त होता है। पूरे शहर में जीरो जोन जैसा माहौल बना दिया जाता है। स्कूल बंद। दफ्तर प्रभावित। बाजार शांत। सड़कों पर सिर्फ काफिला और पुलिस।
आम आदमी किनारे खड़ा। कभी-कभी तो कई दिन पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। सड़कें साफ। बैरिकेडिंग। चेकिंग। शहर जैसे किसी मेहमान के लिए किराए पर दे दिया गया हो।
सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि आम आदमी की जिंदगी ठप कर दी जाए। एक घंटे का कार्यक्रम पूरे दिन का जाम क्यों बन जाता है? दो घंटे का दौरा पूरे शहर को क्यों रोक देता है?
दुकानदार सुबह से इंतजार करता है। ग्राहक नहीं आ पाते। ऑटो वाला किराया गंवाता है। दफ्तर जाने वाला लेट हो जाता है। मरीज का परिवार एंबुलेंस में फंस जाता है। स्कूली बच्चे घर बैठे रह जाते हैं। सब कुछ एक काफिले के लिए।
ये मेहमान देश के सर्वोच्च पदों पर हैं। इनकी सुरक्षा देश की जिम्मेदारी है। लेकिन टैक्स देने वाली जनता की सुविधा भी देश की जिम्मेदारी होनी चाहिए। शहर को घंटों के लिए बंधक बनाना सुरक्षा नहीं है। यह प्राथमिकताओं का उल्टा होना है।
हर बार जब कोई बड़ा नेता आता है तो शहर रुक जाता है। हर बार जब शहर रुकता है तो आम आदमी गुस्सा करता है। यह गुस्सा जमा हो रहा है। और यह गुस्सा विपक्ष नहीं पैदा कर रहा। खुद की व्यवस्था पैदा कर रही है।
मंत्रियों और अधिकारियों के लंबे काफिले
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपील के बाद अपना काफिला छोटा किया। यह अच्छी बात है। लेकिन समस्या सिर्फ सीएम तक नहीं है।
मंत्रियों के काफिले में पायलट कार, इंटरसेप्टर, सपोर्ट वाहन। शहर के अंदर छोटे से सफर के लिए भी पूरा तामझाम। दिसंबर 2025 में सीएम के काफिले की पायलट कार और इंटरसेप्टर कार सचिवालय गेट पर खराब हो गईं। धक्का देकर स्टार्ट किया गया। सुरक्षा में लापरवाही भी सामने आई।
मई 2026 में एक मंत्री पेट्रोल बचाने का संदेश देने स्कूटी पर निकले। पीछे पूरा वीआईपी काफिला दौड़ रहा था। वीडियो वायरल हुआ। लोग पूछ रहे थे। यह कैसी बचत है?
छोटे अधिकारियों तक यह बीमारी पहुंच गई है। जिला स्तर के अधिकारी भी सायरन लगाकर निकलते हैं। सड़क खाली करवाते हैं। आम आदमी रुकता है।
पहाड़ की संकरी सड़कें और रोज का नरक
मैदान में जाम लगता है तो वैकल्पिक रास्ता मिल जाता है। पहाड़ में नहीं मिलता। एक सड़क बंद हुई तो सब बंद।
मसूरी, नैनीताल, चारधाम मार्ग, जोशीमठ। संकरी सड़कें। एक तरफ पहाड़, एक तरफ खाई। वीआईपी मूवमेंट के लिए सड़क खाली कराई तो पर्यटक फंस जाते हैं। लोकल लोग फंस जाते हैं। स्कूल बस फंस जाती है। एंबुलेंस फंस जाती है।
लोग दो घंटे खड़े रहते हैं। काफिला बीस मिनट में निकल जाता है। बाकी समय इंतजार। गर्मी में पसीना। बारिश में भीगना। बच्चे बेचैन। बुजुर्ग परेशान।
पर्यटक सीजन में तो हाल और खराब हो जाता है। जाम पहले से लगा होता है। ऊपर से वीआईपी काफिला आ जाता है। पूरा सिस्टम ठप।
टैक्स देने वाली जनता का अपमान
ये सड़कें किसके पैसे से बनी हैं? पुलिस किसके टैक्स से तनख्वाह लेती है? पेट्रोल पर कितना टैक्स लगता है, सब जानते हैं।
फिर भी टैक्स देने वाले को सड़क किनारे खड़ा कर दिया जाता है। धूप में। बारिश में। जैसे वह कोई अपराधी हो।
यह सुरक्षा नहीं है। यह अहंकार है।
दुकानदार की दुकान घंटों बंद रहती है। टैक्सी वाला किराया गंवाता है। दफ्तर जाने वाला लेट हो जाता है। मरीज का परिवार घबराता है। किसान अपनी उपज लेकर बाजार नहीं पहुंच पाता।
सब चुपचाप सहते हैं। क्योंकि सामने वर्दी है। सामने सायरन है।
यह अपमान धीरे-धीरे गुस्सा बन रहा है।
सायरन कल्चर अब हर छोटे अधिकारी तक फैल चुका है
पहले सिर्फ बड़े नेता करते थे। अब छोटा नेता भी करता है। अधिकारी भी करता है। कभी-कभी तो उनके स्टाफ वाले भी सायरन लगा लेते हैं।
अप्रैल 2026 में सरकार ने निजी वाहनों पर अनाधिकृत सायरन और रंगीन बत्तियों के खिलाफ अभियान चलाया। अच्छा कदम था। लेकिन सरकारी काफिलों पर वही सख्ती क्यों नहीं दिखती?
सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल और कई स्थानीय लोग बार-बार बोल चुके हैं। वीआईपी कल्चर से जनता परेशान है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का भी हवाला दिया जाता है। लाल बत्ती पर रोक लगी। फिर भी हूटर और सड़क खाली कराने का काम जारी है।
जनता का मूड साफ है। अब बर्दाश्त नहीं।
बीजेपी खुद अपनी कुल्हाड़ी चला रही है
2027 के चुनाव दूर नहीं हैं। रोज का यह गुस्सा वोट में बदलता है।
भाजपा आम आदमी की बात करती है। गरीब की बात करती है। टैक्सपेयर की बात करती है। लेकिन सड़क पर वही आम आदमी रुक रहा है। वही तड़प रहा है।
समर्थक चुपचाप नाराज हो रहे हैं। परिवार में बात होती है। मोहल्ले में बात होती है। सोशल मीडिया पर पोस्ट आते हैं। वीडियो वायरल होते हैं।
एक पार्टी जो आम आदमी का चेहरा बनकर आई है, वह आम आदमी को इस तरह नहीं रख सकती। यह विरोधाभास टिक नहीं सकता।
कांग्रेस फायदा उठाएगी या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन भाजपा अपने ही वोट बैंक को नाराज कर रही है। यह सबसे बड़ा खतरा है।
क्या किया जा सकता है?
हल मुश्किल नहीं है। इच्छाशक्ति चाहिए।
- पहला और सबसे जरूरी: एंबुलेंस को पूर्ण प्राथमिकता। वीआईपी काफिला रुकना चाहिए। एंबुलेंस नहीं रुकेगी। यह नियम सख्ती से लागू हो। उल्लंघन पर कार्रवाई हो।
- दूसरा: शहर के अंदर काफिले का आकार सीमित हो। छोटे सफर के लिए दस-बारह गाड़ियां नहीं चाहिए।
- तीसरा: अनावश्यक सायरन पर पूरी रोक। लंबे समय पहले से सड़क बंद करने की प्रथा बंद हो। सिर्फ जरूरत के समय, जरूरत के रास्ते पर।
- चौथा: मुख्यमंत्री का साफ निर्देश जारी हो और नीचे तक लागू हो। सिर्फ बयान काफी नहीं। मैदान में नतीजा दिखना चाहिए।
- पांचवां: हर जिले में एक हेल्पलाइन या शिकायत व्यवस्था हो। वीआईपी मूवमेंट के दौरान एंबुलेंस फंसे तो तुरंत रिपोर्ट हो और जवाबदेही तय हो।
ये कदम उठाए जाएं तो स्थिति सुधर सकती है। नहीं उठाए गए तो गुस्सा बढ़ता रहेगा।
एंबुलेंस प्राथमिकता कानून
अभी व्यवस्था उल्टी चल रही है। काफिला आ रहा हो तो सड़क खाली कराई जाती है। एंबुलेंस किनारे खड़ी रहती है। मरीज कराहता रहता है। परिवार वाले हाथ जोड़ते हैं। पुलिस वाले कहते हैं थोड़ा इंतजार करो।
यह व्यवस्था बदलनी होगी। और सिर्फ आदेश से नहीं। कानून से।
देश में एंबुलेंस को प्राथमिकता देने के नियम हैं। लेकिन जमीन पर लागू नहीं होते। खासकर जब सामने वीआईपी काफिला हो। पुलिस वाले काफिले को पहले रास्ता देते हैं। क्योंकि ऊपर से दबाव रहता है। साहब आ रहे हैं। देरी नहीं होनी चाहिए।
पहाड़ों में यह लापरवाही जान ले लेती है। संकरी सड़क। एक तरफ पहाड़। दूसरी तरफ खाई। जाम लग जाए तो कोई रास्ता नहीं बचता। दिल का दौरा पड़े तो मिनट गिनती के होते हैं। हादसा हो जाए तो खून बहता रहता है। प्रसव की स्थिति हो तो समय नहीं रुकता। फिर भी एंबुलेंस इंतजार करती है।
अब साफ कानून चाहिए
कानून में लिखा होना चाहिए कि एंबुलेंस को हर हाल में प्राथमिकता मिलेगी। वीआईपी काफिला हो या कोई और। एंबुलेंस के आने पर काफिला रुकेगा। सड़क खोलेगा। कोई अपवाद नहीं। कोई बहाना नहीं।
उल्लंघन करने वाले पुलिसकर्मी या अधिकारी पर सख्त कार्रवाई हो। जुर्माना हो। विभागीय कार्रवाई हो। बार-बार उल्लंघन पर निलंबन तक हो।
हर जिले में शिकायत की व्यवस्था हो। एंबुलेंस फंसी तो परिवार तुरंत रिपोर्ट कर सके। जांच हो। जिम्मेदार तय हो।
मुख्यमंत्री को खुद इस कानून को लागू करवाना होगा। सिर्फ बयान काफी नहीं। मैदान में नतीजा दिखना चाहिए। पुलिस को साफ निर्देश मिले कि मरीज की जान काफिले से बड़ी है।
यह कानून आम आदमी के पक्ष में होगा। टैक्स देने वाले के पक्ष में होगा। उसी के पैसे से सड़क बनी है। उसी के पैसे से पुलिस की तनख्वाह चलती है। उसी की जान दांव पर लगती है।
जब तक एंबुलेंस को कानूनी प्राथमिकता नहीं मिलेगी तब तक यही नजारा रहेगा। काफिला निकलेगा। एंबुलेंस रुकेगी। कोई परिवार टूटेगा। और गुस्सा बढ़ता जाएगा।
कानून बनाओ। लागू करो। वरना यह लापरवाही बार-बार जान लेती रहेगी।
गोल्डन हावर नियम
मेडिकल साइंस में एक नियम है। गोल्डन हावर। हादसा हो या दिल का दौरा। गंभीर चोट लगे तो पहले साठ मिनट सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। इस एक घंटे में सही इलाज मिल जाए तो जान बचने के चांस बहुत बढ़ जाते हैं। देरी हो जाए तो नुकसान बढ़ता जाता है।
पहाड़ों में यह नियम और सख्त हो जाता है। संकरी सड़क। दूर अस्पताल। खराब मौसम। एक छोटी सी देरी भी जान ले सकती है।
अब सोचो। एंबुलेंस निकलती है। मरीज गोल्डन हावर में है। रास्ते में काफिला आ जाता है। सड़क बंद। पुलिस वाले रोक देते हैं। साहब आ रहे हैं। थोड़ा इंतजार करो।
पंद्रह मिनट। बीस मिनट। आधा घंटा। गोल्डन हावर कटता रहता है। मरीज की हालत बिगड़ती रहती है। परिवार वाले देख रहे होते हैं। कुछ नहीं कर पाते।
यह सिर्फ देरी नहीं है। यह गोल्डन हावर का मजाक है। विज्ञान कहता है समय बचाओ। व्यवस्था कहती है काफिला पहले निकालो।
दुनिया भर में इमरजेंसी सेवाएं गोल्डन हावर को ध्यान में रखकर काम करती हैं। रिस्पॉन्स टाइम कम करने की कोशिश होती है। एंबुलेंस को हर हाल में प्राथमिकता दी जाती है। क्योंकि एक मिनट की कीमत जान होती है।
उत्तराखंड में यह नियम कागजों में होगा। सड़क पर नहीं दिखता। वीआईपी मूवमेंट के दौरान एंबुलेंस रुकती है। जाम लगता है। मरीज इंतजार करता है। गोल्डन हावर खत्म होता रहता है।
टैक्स देने वाली जनता पूछती है। हमारे पैसे से बनी सड़क पर हमारी जान क्यों दांव पर लगती है? काफिले की सुविधा गोल्डन हावर से बड़ी कैसे हो गई?
जब तक एंबुलेंस को असली प्राथमिकता नहीं मिलेगी तब तक गोल्डन हावर सिर्फ किताबों में रहेगा। सड़क पर काफिला राज करेगा। और जानें जाती रहेंगी।
नियम साफ होना चाहिए। गोल्डन हावर में कोई काफिला नहीं। कोई रुकावट नहीं। एंबुलेंस पहले। बाकी सब बाद में।
गोल्डन हावर के वैज्ञानिक पहलू
मेडिकल साइंस में गोल्डन हावर कोई कविता नहीं है। यह रिसर्च पर आधारित सच्चाई है।
गंभीर चोट, भारी खून की कमी, दिल का दौरा या दिमाग में ब्लड क्लॉट हो जाए तो शरीर का सिस्टम तेजी से बिगड़ने लगता है। पहले साठ मिनट में अगर सही इलाज मिल जाए तो बचने के चांस बहुत बढ़ जाते हैं। देरी हो तो नुकसान बढ़ता चला जाता है। कभी-कभी वापस नहीं आता।
ट्रॉमा केस में खून बहना बंद करना, सांस की नली साफ रखना और अस्पताल पहुंचाना सबसे जरूरी होता है। दिल के दौरे में ब्लॉकेज खोलने का समय मिनटों में गिना जाता है। स्ट्रोक में दिमाग की कोशिकाएं तेजी से मरने लगती हैं। हर मिनट कीमती होता है।
पहाड़ों में यह और संवेदनशील हो जाता है। अस्पताल दूर होते हैं। सड़क संकरी होती है। मौसम खराब हो सकता है। एंबुलेंस का समय पहले से ही ज्यादा लगता है। ऊपर से जाम या काफिला आ जाए तो गोल्डन हावर खत्म होने लगता है।
विज्ञान साफ कहता है। समय बचाओ। देरी मत करो। इमरजेंसी सेवाओं को रोकना जान जोखिम में डालना है।
जब एंबुलेंस काफिले के लिए रुकती है तो सिर्फ गाड़ी नहीं रुकती। गोल्डन हावर कटता है। मरीज की सेल मरती हैं। खून बहता रहता है। ऑक्सीजन कम होती जाती है। परिवार वाले देखते रहते हैं।
यह कोई भावनात्मक बात नहीं। यह शरीर का विज्ञान है। डॉक्टर और पैरामेडिक इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। रिस्पॉन्स टाइम कम करने की कोशिश इसीलिए होती है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां पहाड़ी इलाके हैं, गोल्डन हावर और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां एक छोटी सी रुकावट भी बड़ा नुकसान कर सकती है।
जब व्यवस्था काफिले को एंबुलेंस से ऊपर रखती है तो वह विज्ञान के खिलाफ जा रही है। टैक्स देने वाली जनता की जान के खिलाफ जा रही है।
गोल्डन हावर का सम्मान करो। एंबुलेंस को रोको मत। वरना विज्ञान की सजा जान के रूप में मिलेगी।
अंत में यही कहना है
उत्तराखंड की भाजपा सरकार का सबसे बड़ा दुश्मन विपक्ष नहीं है। असली दुश्मन यह सायरन वाला वीवीआईपी कल्चर है। यह कल्चर अपनी ही जनता को सड़क पर रोककर तड़पा रहा है। यह कल्चर टैक्स देने वाले को अपमानित कर रहा है। यह कल्चर पहाड़ों की संकरी सड़कों को नरक बना रहा है।
2027 दूर नहीं है। रोज का यह गुस्सा जमा हो रहा है।
टैक्स देने वाली पब्लिक कब तक यह सहेगी? कब तक धूप और बारिश में खड़ी रहेगी? कब तक अपने मरीज को एंबुलेंस में फंसा देखेगी?
जवाब सरकार को देना होगा। और जल्दी देना होगा। वरना यह सायरन वाली कुल्हाड़ी उनके अपने पैरों पर ही चलेगी।
अंत में बात साफ है।
कांग्रेस कमजोर है। वह सड़कों पर उतरकर सरकार नहीं गिरा सकती। लेकिन यह सायरन वाला वीवीआईपी कल्चर रोज सड़क पर उतर रहा है। यह टैक्स देने वाली जनता को धूप और बारिश में तड़पा रहा है। एंबुलेंस रोक रहा है। स्कूली बच्चों को देर करा रहा है। दुकानदार की रोजी छीन रहा है।
यह कल्चर भाजपा के अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। रोज का यह गुस्सा वोट में बदलेगा।
नेताओं को तय करना होगा। काफिला बड़ा रखना है या जनता का भरोसा। सायरन बजाना है या गोल्डन हावर बचाना है।
टैक्स देने वाली पब्लिक कब तक किनारे खड़ी रहेगी? कब तक अपने मरीज को इंतजार करते देखेगी? कब तक अपमान सहेगी?
जवाब अब सड़क पर नहीं, सरकार के फैसले में होना चाहिए। वरना यह सायरन एक दिन उनकी अपनी लुटिया डुबो देगा।
