आज जब भी हम अयोध्या जाते हैं और रामलला को उस गगनचुंबी, भव्य राम मंदिर में विराजमान देखते हैं ना, तो आंखें छलक आती हैं।
सदियों की गुलामी का वो कलंक अब हमेशा के लिए मिट चुका है। लेकिन क्या कभी हमने गहराई से सोचा है की उस मंदिर की नींव में सिर्फ पत्थर और सीमेंट नहीं है?
उस नींव में एक ऐसे शेर का बेमिसाल त्याग और उसकी कुर्सी की बलि चढ़ी है, जिसने अपने राजनीतिक करियर से कहीं ज्यादा अपने ‘राम’ को अहमियत दी।
आज 21 अगस्त 2026 है। आज ही के दिन हमारे बाबूजी, यानी हिन्दुओं के असली ‘हृदय सम्राट’ कल्याण सिंह जी इस दुनिया को अलविदा कह गए थे।
आज उनकी 5वीं पुण्यतिथि है।
ज़रा सोचिए, अगर उस वक्त यूपी की कुर्सी पर कोई ऐसा नेता बैठा होता जिसे सिर्फ अपनी सत्ता का मोह होता, जिसे सेक्युलर ईकोसिस्टम की ‘गुड बुक’ में बने रहने की खुजली होती, तो क्या होता?
शायद रामलला आज भी उसी फटे हुए टेंट में तिरपाल के नीचे सर्दी और बरसात झेल रहे होते।
बाबूजी कल्याण सिंह वो इंसान थे जिन्होंने डंके की चोट पर इस पूरे सेक्युलर ईकोसिस्टम को उसकी असली औकात दिखा दी थी।
अरे भाई, आज के इस मतलबी दौर में नेता एक छोटे से वार्ड मेंबर की कुर्सी नहीं छोड़ते! और उस शेर ने रामकाज के लिए यूपी जैसे सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री वाली गद्दी को एक झटके में लात मार दी थी।
बाबूजी का वो अमर त्याग ही था जिसने आज के इस भव्य राम मंदिर की पक्की ज़मीन तैयार की।
आज जो रामलला भव्य मंदिर में हैं विराजमान, उसकी नींव में बाबूजी कल्याण सिंह के त्याग और कुर्सी की चढ़ी बलि
बात है 6 दिसंबर 1992 की। अयोध्या की सड़कों पर देश के कोने-कोने से लाखों की तादाद में रामभक्त और कारसेवक उमड़ पड़े थे। चारों तरफ बस ‘जय श्री राम’ का ही जयघोष गूंज रहा था।
उस वक्त केंद्र में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार बैठी थी। दिल्ली में बैठे उन नेताओं के पसीने छूट रहे थे।
ऊपर से लगातार कल्याण सिंह सरकार पर भयंकर दबाव बनाया जा रहा था की किसी भी तरह से इन कारसेवकों की भीड़ को रोको, चाहे उन पर गोलियां ही क्यों न चलानी पड़ें!
लेकिन यूपी की गद्दी पर इस बार कोई मुल्लों की गुलामी करने वाला नहीं बैठा था। बाबूजी को अच्छी तरह याद था की कैसे 1990 में मुलायम सिंह की सरकार ने निहत्थे रामभक्तों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा कर पूरी सरयू नदी को लाल कर दिया था।
वो पाप, वो सनातनियों के खून का कलंक बाबूजी अपने माथे पर कैसे ले लेते? उन्होंने तुरंत डीजीपी, चीफ सेक्रेटरी और पुलिस के तमाम आला अधिकारियों को तलब किया और एक ऐसा कड़क आदेश दिया जिसने इतिहास रच दिया।
6 दिसंबर 1992 का वो ऐतिहासिक दिन जब दिल्ली की सत्ता कांप रही थी और कल्याण सिंह ने रामभक्तों की ढाल बनकर लिख दिया इतिहास
मीटिंग में बाबूजी ने अफसरों की आंखों में आंखें डालकर एकदम दो टूक कह दिया था-
“सुन लो कान खोलकर! हालात चाहे जैसे भी हों, मेरे रहते किसी भी रामभक्त कारसेवक पर एक भी गोली नहीं चलेगी। अगर तुम्हें डंडा चलाना है तो चलाओ, लेकिन मेरी पुलिस की बंदूक से एक भी फायर नहीं होगा!”
ये कोई मामूली बात नहीं थी यार! एक मुख्यमंत्री सीधे-सीधे दिल्ली की सत्ता और पूरे सेक्युलर सिस्टम से पंगा ले रहा था।
उन्हें पता था की इसका अंजाम क्या होगा। उन्हें मालूम था की अगर बाबरी का वो गुलामी वाला ढांचा गिरा, तो उनकी सरकार सीधा बर्खास्त कर दी जाएगी।
लेकिन बाबूजी ने कारसेवकों की जान को अपनी सरकार से करोड़ों गुना ऊपर रखा।
वो रामभक्तों की ढाल बनकर खड़े हो गए। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था की रामलला की मुक्ति के लिए अगर उन्हें अपनी सत्ता की बलि देनी पड़ी, तो वो हंसते-हंसते दे देंगे।
उनके इसी एक फैसले ने सदियों की गुलामी के उस प्रतीक को धूल में मिला दिया। उस दिन जो हुआ, वो इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया।
रामकाज के लिए एक पल में लात मार दी मुख्यमंत्री की कुर्सी और अपने कंधों पर ले ली बाबरी ध्वंस की पूरी जिम्मेदारी
जैसे ही अयोध्या में सदियों की गुलामी का वो कलंक, वो तथाकथित बाबरी ढांचा ज़मींदोज़ हुआ, दिल्ली में बैठे विपक्षी आकाओं के तो जैसे होश ही उड़ गए।
ऐसा लगा जैसे पूरे सेक्युलर और वामपंथी खेमे में मातम छा गया हो। लेकिन लखनऊ में बैठे बाबूजी कल्याण सिंह के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक गज़ब का सुकून था।
उन्हें अच्छी तरह पता था की अब दिल्ली वाले उनकी सरकार को बर्खास्त कर देंगे। लेकिन बाबूजी ने किसी के बर्खास्त करने का इंतज़ार ही नहीं किया!
उन्होंने तुरंत अपना कागज़-कलम उठाया, खुद अपना इस्तीफा लिखा और बिना एक सेकंड की देरी किए सीधे गवर्नर हाउस पहुँच गए।
उन्होंने मुख्यमंत्री की उस गद्दी को ऐसे लात मार दी जैसे कोई फटे-पुराने जूते को उतार कर फेंक देता है।
ज़रा सोचिए! आज के नेता एक छोटे से मंत्री पद के लिए अपना ज़मीर बेच देते हैं, दिन-रात पलटी मारते हैं, और उस शेर ने रामकाज के लिए यूपी की सबसे पावरफुल गद्दी एक झटके में कुर्बान कर दी।
और जानते हो उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्योंकि बाबूजी इस सेक्युलर सिस्टम की चालाकी को बहुत अच्छे से समझते थे।
उन्हें मालूम था की अगर उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया और पूरी ज़िम्मेदारी अपने सिर नहीं ली, तो ये विपक्षी सरकारें और कोर्ट-कचहरी मिलकर एक-एक आम कारसेवक को चुन-चुन कर मुकदमों में फंसा देंगे। उन गरीब और भोले-भाले रामभक्तों की ज़िंदगी जेलों में सड़ा दी जाएगी।
बाबूजी ने सीना ठोक कर सुप्रीम कोर्ट से लेकर जनता की अदालत तक में गरजते हुए कहा-
“हां, ये सब मेरे राज में हुआ है। इसकी पूरी ज़िम्मेदारी मेरी है। जो सज़ा देनी है मुझे दो, मुझे जेल में डाल दो या सूली पर चढ़ा दो, लेकिन मेरे किसी भी रामभक्त कारसेवक को कोई हाथ नहीं लगाएगा!”
उन्होंने उसी दिन भरे मंच से वो अमर डायलॉग बोला था जो आज भी हर सनातनी के कानों में गूंजता है-
“मैंने राम मंदिर के लिए अपनी सत्ता को ठोकर मार दी है। अरे सत्ता तो आती-जाती रहेगी, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर बनकर रहेगा!”
वामपंथियों और सेक्युलर मीडिया के मुंह पर तमाचा जब बाबूजी ने सीना ठोक कर कहा था “नो रिग्रेट नो रिपेंटेंस नो सॉरो”
ढांचा टूटने के बाद का नज़ारा तो और भी देखने लायक था। ये लुटियंस दिल्ली वाले, अंग्रेजी बोलने वाले एलीट पत्रकार और सेक्युलर मीडिया वाले बाबूजी पर टूट पड़े।
पूरे ईकोसिस्टम को लग रहा था की कल्याण सिंह अब डर जाएंगे, हाथ जोड़कर माफ़ी मांगेंगे, कैमरे के सामने रो-रो कर कहेंगे की ‘मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई, लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ गया’।
अरे भाई, वो शेर कल्याण सिंह थे, सेक्युलर सिस्टम के पाले हुए कोई रबर स्टाम्प नेता नहीं!
जब ये वामपंथी पत्रकार उनके सामने माइक लेकर पहुंचे, तो बाबूजी ने इनकी आँखों में आंखें डालकर वो चार शब्द कहे, जिसने पूरे सेक्युलर ईकोसिस्टम की नींव हिला कर रख दी और उन्हें उनकी हैसियत दिखा दी।
अंग्रेजी मीडिया को उसी की भाषा में जवाब देते हुए उन्होंने डंके की चोट पर कहा- “No Regret, No Repentance, No Sorrow, No Grief!” (यानी- मुझे कोई पछतावा नहीं है, कोई पश्चाताप नहीं है, कोई दुख नहीं है और कोई शोक नहीं है)।
उन्होंने साफ कह दिया की अरे कैसी मस्जिद? वो तो गुलामी का एक कलंक था, बाबर नाम के लुटेरे का निशान था जिसे रामभक्तों ने हमेशा-हमेशा के लिए धो डाला।
बाबूजी ने लिबरलों के जले पर नमक छिड़कते हुए 6 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय गौरव (National Pride) का दिन’ घोषित कर दिया था।
सच कहूँ तो, आज़ाद भारत के इतिहास में किसी भी राजनेता ने डंके की चोट पर ऐसा ‘अनअपोलोजेटिक हिन्दुत्व’ (Unapologetic Hindutva) कभी नहीं दिखाया था।
वामपंथियों को समझ ही नहीं आ रहा था की इस आदमी से कैसे लड़ें, जिसे ना तो कुर्सी का कोई लालच है और ना ही जेल जाने का कोई डर!
उन्होंने सनातनी समाज के मन से वो हारने और दबने वाली ग्रंथि को हमेशा के लिए निकाल फेंका था।
हिन्दू गौरव दिवस पर सनातनी समाज का संकल्प, बाबूजी का जो सपना था उसे हमें मिलकर बचाए रखना है
खैर, वक्त बीतता गया। बाबूजी ने जो तपस्या की थी, जो त्याग किया था, उसका फल मिलने में भले ही दशकों लग गए, लेकिन भगवान राम ने अपने इस सच्चे भक्त को निराश नहीं किया।
ये उनका परम सौभाग्य ही था की वो जीते-जी 2019 में सुप्रीम कोर्ट का वो ऐतिहासिक फैसला अपनी आँखों से देख पाए।
और तो और, अगस्त 2020 में जब प्रधानमंत्री मोदी जी ने अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन किया, तो बाबूजी के आंसुओं की धार नहीं रुक रही थी। उनका जीवन धन्य हो गया था।
उन्होंने कह दिया था की “अब मेरी ज़िंदगी का इकलौता मक़सद पूरा हो गया है, अब मैं शांति से आँखें मूंद सकता हूँ।” और ठीक एक साल बाद, 21 अगस्त 2021 को वो हमेशा के लिए रामजी के चरणों में लीन हो गए।
आज 21 अगस्त 2026 है। आज उनकी 5वीं पुण्यतिथि है। आज पूरे उत्तर प्रदेश और खासकर उनके गृह क्षेत्र अलीगढ़ में जो ‘हिन्दू गौरव दिवस’ मनाया जा रहा है,…
वो उस शेर को सनातनी समाज की तरफ से एक भावुक सलामी है। आज असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से लेकर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ तक, हर कोई बाबूजी के उसी हिन्दुत्वनिष्ठ मार्ग पर चलकर देश को आगे बढ़ा रहा है।
सच कहूँ तो, हम आज की पीढ़ी वाले बहुत खुशनसीब हैं यार! हमने गुलामी के उस ढांचे को टूटते हुए भले ही ना देखा हो, लेकिन रामलला को भव्य मंदिर में विराजते हुए ज़रूर देख लिया।
जब भी कभी अपने परिवार या दोस्तों के साथ अयोध्या जाना, जब रामपथ पर चलते हुए उस मंदिर के शिखर को देखना, और जब अंदर जाकर अपने रामलला की उस मोहक मूरत के सामने सिर झुकाना…
तो एक बार, सिर्फ एक पल के लिए अपनी आँखें बंद करके उस शेर ‘कल्याण सिंह’ को ज़रूर याद कर लेना।
याद कर लेना उस बाबूजी को, जिसने उस दिन केंद्र सरकार के सामने घुटने टेकने से इंकार कर दिया था।
याद कर लेना उस इंसान को, जिसने तुम्हारे लिए, तुम्हारे धर्म के लिए, और तुम्हारे राम के लिए अपनी कुर्सी को ऐसे लात मार दी थी जैसे कोई मिट्टी का खिलौना हो।
अगर वो उस दिन झुक जाते, तो शायद आज तुम और हम अयोध्या में वो भव्य मंदिर कभी नहीं देख पाते।
उनकी पुण्यतिथि पर आज पूरा हिन्दू समाज सिर्फ यही कह रहा है- बाबूजी, आपने जो सपना देखा था, वो हमने पूरा कर दिया है, और अब आपके इस हिन्दुत्व के किले को हम अपनी आखिरी सांस तक बचाकर रखेंगे!
जय श्री राम! बाबूजी कल्याण सिंह अमर रहें!
