सवर्णों के टैक्स से चलता देश और बदले में मिलता अन्याय, आरक्षण की आग में जलते सवर्णों का जंतर मंतर में हल्ला बोल, आरक्षण की चिता जलाने के लिए आखिरकार छिड़ गया क्रांति का गदर

जिस देश का पूरा का पूरा सिस्टम, यहाँ की इकॉनमी, टैक्स का सबसे बड़ा हिस्सा सवर्ण (General Category) समाज अपने कंधों पर ढो रहा है, उसी देश में उस सवर्ण के साथ क्या हो रहा है?

आप दिन-रात मेहनत करो, अपनी खून-पसीने की कमाई से टैक्स भरो… और जब बात नौकरी, कॉलेज की सीट या न्याय की आए, तो सिस्टम आपके मुंह पर ‘सवर्ण’ होने का ठप्पा लगाकर आपका हिस्सा आरक्षण के नाम पर दूसरों को बाँट देता है।

इसी अन्याय के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘Reservation Hatao Andolan’ शुरू हो गया है।

ये सालों से घुट-घुट कर जी रहे एक पूरे समाज का उबलता हुआ वो लावा है, जो आखिरकार सड़कों पर फट पड़ा है।

देश का पेट पालने वाले सवर्णों के सब्र का बांध टूटा, जंतर मंतर पर आरक्षण के खिलाफ दिखा महारौद्र रूप

ये आंदोलन दिल्ली को हमेशा याद रहेगा। प्रशासन को लग रहा था की सवर्ण समाज तो हमेशा की तरह चुपचाप सब सह लेगा, चार लोग आएंगे और नारे लगाकर चले जाएंगे।

लेकिन जब पूरे देश के अलग-अलग कोनों से हज़ारों की तादाद में सवर्ण युवा हाथों में भगवा झंडे लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो अच्छे-अच्छों की हवा टाइट हो गई। जंतर-मंतर का पूरा इलाका भगवा रंग में रंग गया।

पुलिस ने हर तरफ भयंकर बैरिकेडिंग कर रखी थी, लेकिन इन युवाओं का जोश रुकने वाला कहाँ था। बैरिकेड्स के ठीक सामने बैठकर इन शेरों ने सरेआम ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ शुरू कर दिया।

‘सियावर रामचंद्र की जय’ और ‘आरक्षण हटाओ’ के नारों से पूरी दिल्ली कांप उठी थी। ये कोई ‘CJP’ प्रोटेस्ट के जैसे भाड़े की भीड़ नहीं थी जो बिरयानी खाने आई हो।

ये वो युवा थे जिनका टैलेंट दिन-दहाड़े सिस्टम ने लूटा है। इनके चेहरों पर वो गुस्सा और दर्द साफ छलक रहा था जो सालों से इनके सीने में धधक रहा है।

85 परसेंट लाने वाला धक्के खा रहा और 45 परसेंट वाला कुर्सी पर बैठा है, सिस्टम का ये कैसा दोमुहा रवैया

ज़रा सोचिए, एक ही क्लासरूम है, एक ही टीचर है, दोनों बच्चे एक ही बेंच पर बैठकर पढ़ रहे हैं। लेकिन जैसे ही रिज़ल्ट आता है, सिस्टम उनके बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर देता है जिसे पार करना सवर्ण के लिए नामुमकिन हो जाता है।

85 से 90 परसेंट मार्क्स लाने वाला जनरल कैटेगरी का लड़का सड़कों पर धक्के खा रहा है।

और वहीं दूसरी तरफ? 40-45 परसेंट लाने वाला महज़ अपनी जाति का सर्टिफिकेट लहराते हुए मलाईदार कुर्सी पर जाकर बैठ जाता है। ये टैलेंट का कत्ल नहीं तो और क्या है?

इस पूरे ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की नींव किसी राजनीतिक पार्टी ने नहीं रखी है। इसे खड़ा किया है हर्ष दुबे जैसे एक NEET एस्पिरेंट ने, जिसने अपनी आँखों के सामने अपने सपनों को आरक्षण की आग में जलते हुए देखा है।

सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम) पर ‘Reservation Hatao Andolan’ नाम के पेज के जरिए जो 56 लाख (5.6 मिलियन) से ज़्यादा युवाओं का सैलाब जुड़ा है, वो इस बात का सबूत है की सवर्ण युवा अब जाग चुका है।

कल मंच पर मशहूर इन्फ्लुएंसर और बेबाक पत्रकार अजीत भारती ने भी जो दहाड़ लगाई, उसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। इन युवाओं की मांग एकदम साफ़ और सीधी है- “आरक्षण देना है तो गरीब को दो, जाति को नहीं!”

जिसके बाप-दादा पहले से ही आईएएस-आईपीएस हैं, उसे तुम आरक्षण की बैसाखी क्यों पकड़ा रहे हो? इसी मंच से “वन फॅमिली, वन रिजर्वेशन” (एक परिवार को सिर्फ एक बार आरक्षण) का नियम लागू करने की भी कड़क मांग उठी।

अगर वाकई तुम्हें पिछड़ों का विकास करना है, तो एक ही परिवार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आरक्षण की मलाई क्यों खिला रहे हो?

फर्जी SC ST एक्ट की तलवार और UGC का नया काला कानून, सवर्ण छात्रों को बर्बाद करने का नया हथियार

आरक्षण से तो हम मारे ही जा रहे थे, लेकिन इस सिस्टम ने हमें पूरी तरह बर्बाद करने के लिए कुछ ऐसे खौफनाक हथियार बना रखे हैं जिनका नाम सुनते ही डर लगता है।

इनमें सबसे ऊपर है ‘SC/ST एक्ट’। खुलेआम जंतर-मंतर से कल आवाज़ उठी की इस एक्ट को तुरंत रद्द किया जाए।

आज हालत ये है की इस एक्ट का इस्तेमाल न्याय के लिए कम और सवर्णों को ब्लैकमेल करने के लिए ज्यादा हो रहा है।

जरा सी कहा-सुनी हो जाए, आपसी विवाद हो जाए, तो सीधा SC/ST एक्ट की फर्जी एफआईआर ठोक दी जाती है।

बिना जांच के गिरफ़्तारी की तलवार हर सवर्ण के गले पर लटकी रहती है। क्या हम अपने ही देश में कोई बंधुआ मज़दूर हैं जो इस डर के साए में जिएं?

और तो और, अब यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) एक नया काला कानून लेकर आ रहा था- ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’।

इस एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कानून के नाम पर कॉलेजों के अंदर ‘इक्विटी स्क्वॉड’ बनाने की साज़िश रची जा रही थी।

मतलब सवर्ण छात्रों के खिलाफ कैंपस में फर्जी भेदभाव के केस ठोकने और उनका पूरा करियर पल भर में बर्बाद करने का एक और पक्का इंतज़ाम!

लेकिन ये सवर्णों के इसी गुस्से और खौफ का नतीजा है की सरकार के भी हाथ-पाँव फूलने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में ही इस कानून पर रोक लगा दी थी।

और अभी 20 अगस्त 2026 को ही केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जाकर कहना पड़ा की वो इस ‘काले कानून’ पर पुनर्विचार कर रहे हैं। यही है आंदोलन की असली ताकत!

पुलिस की लाठियां और धारा 163 का खौफ, फिर भी नहीं झुके करणी सेना और जनरल सेना के शेर

कल प्रसाशन की हालत देखने लायक थी। रातों-रात पूरे नई दिल्ली इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 थोप दी गई।

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की परमिशन तक नहीं दी। पुलिस लगातार कोशिश कर रही थी की इन युवाओं को रामलीला मैदान की तरफ खदेड़ दिया जाए, लेकिन सवर्ण शेर अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिले।

जब पुलिस से बात नहीं संभली, तो उन्होंने रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और ITBP के जवानों को उतार दिया। शाम साढ़े सात बजे के करीब पुलिस ने अपनी असली बर्बरता दिखानी शुरू कर दी।

शांति से प्रदर्शन कर रहे करीब 50 से ज़्यादा सवर्ण युवाओं को कॉलर पकड़कर, घसीटते हुए पुलिस वैन में ठूंस लिया गया और हिरासत में ले लिया गया।

लेकिन क्या पुलिस की इन लाठियों और हिरासत के डर से आंदोलन रुक गया? बिल्कुल नहीं!

राजस्थान से आई करणी सेना, जनरल सेना और चाणक्य सेना के जो हज़ारों शेर वहां सीना ताने खड़े थे, वो पुलिस से रत्ती भर भी नहीं डरे।

उन्होंने साफ कह दिया है की तुम हमें जेल में डाल दो या लाठियां बरसाओ, हम अपना हक़ मांगे बिना वापस नहीं लौटेंगे।

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