बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 2- 2014 में मोदी जी को ‘चायवाला’ बोलकर ‘मणिशंकर अय्यर’ ने कैसे थाली में सजाकर बीजेपी को दे दिया एक आम हिंदुस्तानी का वोटबैंक

राजनीति में एक बात कही जाती है की बीजेपी तो चुनाव जीतने की मशीन बन चुकी है। कुछ लोगों को लगता है की बीजेपी के पास कोई ऐसी जादुई छड़ी या चमत्कारी फॉर्मूला है की वो कभी चुनाव हार ही नहीं सकती।

लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बहुत अलग है। सच कहूं तो बीजेपी कोई अजेय पार्टी नहीं है जिसे हराया न जा सके।

असल में बीजेपी के चुनाव जीतने का सबसे बड़ा राज़ उनका खुद का कैडर नहीं, बल्कि सामने बैठा विपक्ष है.. क्योंकि हमारा विपक्ष खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में एक्सपर्ट है।

जब भी चुनाव आता है, विपक्ष का कोई न कोई बड़ा नेता ऐसा भारी ‘सेल्फ-गोल’ कर देता है जो सीधे आम जनता पर गहरी चोट कर जाता है।

और बीजेपी के रणनीतिकार इतने चतुर हैं की वो इसी ‘रायते’ को समेटते हैं और अपनी जीत की शानदार दावत उड़ा लेते हैं।

इस नई सीरीज़ में हम उन्हीं ऐतिहासिक राजनीतिक गलतियों (Self-goals) का ऑपरेशन कर रहे हैं, जहाँ विपक्ष ने अपनी बदज़ुबानी और घमंड के चलते थाली में सजाकर सत्ता बीजेपी को सौंप दी।

और इस लिस्ट में अगली बारी आती है साल 2014 के उस ऐतिहासिक चुनाव की। वो चुनाव, जिसने देश की राजनीति की पूरी धुरी ही पलट कर रख दी थी।

ज़रा याद कीजिए वो दौर। कैसे विपक्ष ने एक इंसान की गरीबी और उसके चाय बेचने वाले अतीत का मज़ाक उड़ाया था।

उन्हें लगा था की वो सिर्फ मोदी जी को नीचा दिखा रहे हैं, लेकिन असल में उन्होंने देश के करोड़ों मिडिल क्लास लोगों के स्वाभिमान पर हाथ डाल दिया था।

मणिशंकर अय्यर के उस एक ‘चायवाले’ तंज ने कैसे देश के आम हिंदुस्तानी और खासकर हिन्दू समाज को एक-तरफा BJP के पाले में डाल दिया, इसकी कहानी समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा।

सीधे 2014 के चुनाव में नहीं, बल्कि 2013 के उस खौलते हुए सियासी माहौल से शुरुवात करते हैं।

साल 2013 का वो दौर जब एक ‘मुख्यमंत्री’ के नाम से ही कांपने लगा था कांग्रेस दरबार

2013 वो वक्त था जब देश में कांग्रेस नीत यूपीए-2 (UPA-2) की सरकार चल रही थी। और सच बताऊं? जनता इस सरकार से सिर्फ बुरी तरह ऊब ही नहीं चुकी थी.. बल्कि पक चुकी थी।

हर दूसरे दिन अख़बार खोलो तो एक नया घोटाला मुंह चिढ़ाता हुआ मिल जाता था। कभी 2G घोटाला, कभी कोयला घोटाला (Coalgate), तो कभी कॉमनवेल्थ गेम्स की भसड़।

देश का आम आदमी देख रहा था की कैसे उसकी टैक्स की कमाई को कुछ सफेदपोश नेता डकार रहे हैं। उधर दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी ने माहौल को और भी निराशाजनक बना दिया था।

पब्लिक को लगने लगा था की देश भगवान भरोसे चल रहा है। अर्थव्यवस्था गोते खा रही थी, और दिल्ली के दरबार में बैठे कांग्रेसी नेताओं को लग रहा था की पब्लिक चाहे जितना रो ले, वोट तो आख़िरकार हमें ही देगी। उनका ये घमंड सातवें आसमान पर था।

लेकिन तभी भारत के पश्चिमी कोने से एक तूफ़ान उठना शुरू हुआ। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी।

मोदी जी उस वक्त तक लगातार तीन बार गुजरात का चुनाव जीत चुके थे और पूरे देश में ‘गुजरात मॉडल’ की चर्चा होने लगी थी। सोशल मीडिया नया-नया उफान पर था और युवाओं के बीच मोदी की रैलियों के वीडियो आग की तरह फैल रहे थे।

जून 2013 में जब गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई, तो पार्टी ने नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए ‘चुनाव अभियान समिति’ (Election Campaign Committee) का अध्यक्ष बना दिया।

बस! यही वो पल था जब कांग्रेस के शाही दरबार में जैसे भूचाल आ गया।

कांग्रेस के नेता इस कदर बावले हो गए की उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था की रिएक्ट कैसे करें। अब कायदे से अगर आप एक मज़बूत विपक्ष या सत्ताधारी पार्टी हैं, तो आपको सामने वाले के दावों का तार्किक जवाब देना चाहिए।

आपको बताना चाहिए की हमारा ‘विकास मॉडल’ तुम्हारे मॉडल से बेहतर क्यों है। लेकिन कांग्रेस के पास तो विकास के नाम पर गिनाने के लिए सिर्फ़ घोटालों की लंबी लिस्ट थी।

तो जब मुद्दों की कमी पड़ गई, तो कांग्रेस ने वही किया जो वो हमेशा से करती आई है- व्यक्तिगत और घटिया हमले। उन्होंने मोदी को एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय उन्हें अपना निजी दुश्मन मान लिया।

उस समय के यूनियन मिनिस्टर सलमान खुर्शीद का वो बयान तो आपको याद ही होगा जब उन्होंने मोदी जी को एक ‘बन्दर’ कह डाला था।

फिर कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने तो हद्द ही पार कर दी और मोदी को एक ‘पागल कुत्ता’ बोल दिया।

कांग्रेस के नेताओं की बयानबाज़ी का स्तर ऐसा गिरता चला गया की पब्लिक हैरान रह गई। उन्हें लगने लगा की यार ये पार्टी विकास और देश की इकॉनमी पर बात करने के बजाय, सुबह से शाम तक सिर्फ मोदी को गालियां क्यों दे रही है?

याद है ना, सालों पहले सोनिया गांधी ने गुजरात चुनाव के दौरान मोदी जी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था? उस एक बयान ने गुजरात के हिन्दू समाज को ऐसा एकजुट किया था की कांग्रेस वहां आज तक वापसी नहीं कर पाई।

लेकिन कांग्रेस ने उस भारी भूल से कोई सबक नहीं सीखा। 2013 आते-आते इनकी बौखलाहट इतनी बढ़ गई की इनके नेता टीवी पर बैठकर मोदी के कपड़ों, उनके रहन-सहन और सबसे ज़्यादा उनके पारिवारिक जीवन का मज़ाक उड़ाने लगे।

कांग्रेसी प्रवक्ताओं और नेताओं की पूरी फौज इस बात पर लग गई की किसी तरह पब्लिक के सामने मोदी की इमेज को एक ‘गंवार’ और ‘निचले दर्जे’ के आदमी की तरह पेश किया जाए।

इन्हें लगता था की अगर हम जनता को बार-बार ये बताएंगे की ये आदमी पहले चाय बेचता था, स्टेशन पर काम करता था, तो पब्लिक इसे रिजेक्ट कर देगी।

लेकिन यहीं पर कांग्रेस के वो बड़े-बड़े रणनीतिकार, जो कैम्ब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़कर आए थे, देश की नब्ज़ पकड़ने में पूरी तरह फेल हो गए।

तुष्टिकरण की अंधी दौड़ और ‘भगवा आतंकवाद’ का वो ज़हरीला नैरेटिव जिसने 2013 में पूरे हिन्दू समाज को कांग्रेस के खिलाफ खड़ा कर दिया

साल 2013 में कांग्रेस सिर्फ भ्रष्टाचार और घोटालों की वजह से ही अपनी ज़मीन नहीं खो रही थी, बल्कि वो एक ऐसा खौफनाक आत्मघाती खेल खेल रही थी जिसने देश के बहुसंख्यक यानी हिन्दू समाज को गहरी चोट पहुंचाई।

2014 के चुनाव से ठीक पहले, अपने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने और तुष्टिकरण की अंधी दौड़ में कांग्रेस के नेताओं ने कुछ ऐसे ज़हरीले बयान दिए, जिन्होंने पूरे हिन्दू समाज को ये सोचने पर मजबूर कर दिया की कांग्रेस को वोट देना खुद की पीठ में छूरा घोपने जैसा होगा।

इस आग में सबसे बड़ा घी डालने का काम किया जनवरी 2013 में कांग्रेस के ‘जयपुर चिंतन शिविर’ ने।

इस शिविर में सुशिल कुमार शिंदे ने भरे मंच से खुलेआम कहा की देश में आरएसएस (RSS) और बीजेपी के लोग “हिन्दू आतंकवाद” (Hindu Terrorism) और “भगवा आतंकवाद” (Saffron Terror) फैला रहे हैं।

ज़रा सोचिए! देश का गृह मंत्री, कुर्सी पर बैठकर दुनिया के सबसे सहिष्णु धर्म को आतंकवाद से जोड़ रहा था।

जिस ‘भगवा’ रंग को हिन्दू सदियों से अपनी आस्था, त्याग और वीरता का प्रतीक मानता आया है, उसे कांग्रेस के मंच से सरेआम ‘आतंकवाद’ का रंग बताया जा रहा था।

यह एक सोची-समझी साज़िश थी ताकि मुस्लिम वर्ग का वोट पक्का किया जा सके। हिन्दू समाज, जो वैसे ही आतंकी हमलों से लहूलुहान था, उसके घावों पर कांग्रेस ने ‘भगवा आतंकवाद’ का नमक छिड़क दिया।

बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी। इसी दौर में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का वो बयान भी चर्चा के केंद्र में आ गया, जिसमें उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राजदूत से कथित तौर पर कहा था की भारत को लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे खूंखार आतंकी संगठनों से उतना खतरा नहीं है, जितना खतरा ‘हिन्दू चरमपंथी गुटों’ से है।

मतलब भारत में रहकर, भारत के ही हिन्दू समाज को पाकिस्तान के आतंकियों से भी बड़ा खतरा बता देना!

इसके साथ ही, कांग्रेस सरकार 2013-14 के आस-पास ‘साम्प्रदायिक हिंसा निवारण बिल’ (Communal Violence Bill) नाम का एक ऐसा खतरनाक ड्राफ्ट लेकर आई थी, जिसका सीधा सा मतलब ये था की अगर देश में कहीं भी दंगा होता है, तो उसका डिफ़ॉल्ट ज़िम्मेदार बहुसंख्यक (यानी हिन्दू) को ही माना जाएगा, और अल्पसंख्यक हमेशा पीड़ित ही कहलाएगा।

और पब्लिक के दिमाग में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का वो पुराना बयान तो गूंज ही रहा था जिसमें उन्होंने कहा था की “देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानों का है।”

जब आप इन सारी कड़ियों को जोड़ते हैं, तो तस्वीर बिल्कुल साफ़ हो जाती है। 2013 आते-आते हिन्दू समाज के भीतर कांग्रेस की इस ‘हिन्दू-विरोधी’ मानसिकता के खिलाफ एक भयंकर ज्वाला भड़क चुकी थी।

हिन्दू समाज अब बस एक मौके की तलाश में था की कैसे इस सत्ता को उखाड़ फेंका जाए।

कांग्रेस अपने इस तुष्टिकरण के घमंड में इतनी अंधी हो चुकी थी की उसे ज़मीन पर उबल रहा ये हिन्दू आक्रोश दिखाई ही नहीं दिया।

और इसी अंधेपन और घमंड के बीच, कांग्रेस ने 2014 में वो ऐतिहासिक ब्लंडर कर दिया जिसने उनकी ताबूत में आख़िरी कील ठोक दी।

2014 में तालकटोरा स्टेडियम में मणिशंकर अय्यर का वो ऐतिहासिक ‘चायवाला’ बयान जिसने लिख दी थी कांग्रेस के अंत की पूरी स्क्रिप्ट

तारीख थी 17 जनवरी 2014। दिन था शुक्रवार। दिल्ली के मशहूर तालकटोरा स्टेडियम में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) का एक बहुत बड़ा और भव्य अधिवेशन चल रहा था।

पूरे देश से कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता, पदाधिकारी और मंत्री वहां जुटे हुए थे। 2014 के लोकसभा चुनाव एकदम सिर पर थे और माहौल में एक अजीब सी टेंशन थी क्योंकि ज़मीन पर मोदी लहर साफ महसूस की जा रही थी।

इसी अधिवेशन के दौरान, मीडिया का जमावड़ा लगा हुआ था। कैमरे ऑन थे, माइक तने हुए थे। तभी मीडिया के सामने आते हैं कांग्रेस के एक बेहद वरिष्ठ, खांटी दरबारी और खुद को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी मानने वाले नेता- मणिशंकर अय्यर।

मीडिया ने जब उनसे नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं पर सवाल पूछा, तो अय्यर के भीतर का वो पूरा का पूरा कैम्ब्रिज और लुटियंस वाला सामंती घमंड जाग उठा।

कैमरे के ठीक सामने आंखें तरेरते हुए, एक बेहद घमंडी और उपहास भरे लहज़े में मणिशंकर अय्यर ने वो शब्द कहे, जो सीधे जाकर देश के करोड़ों लोगों के सीने में चुभ गए।

अय्यर ने कहा- “नरेंद्र मोदी 21वीं सदी में कभी भी इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते… हां, अगर वो चाहें तो हम उनके लिए यहां चाय बेचने का इंतज़ाम कर सकते हैं।”

ज़रा इस बयान की गहराई को समझिए। यह सीधे तौर पर एक ऐसे इंसान का अहंकार बोल रहा था, जो अपने सामने खड़े दूसरे इंसान को कीड़े-मकौड़े के बराबर भी नहीं समझता।

मणिशंकर अय्यर ने यह बात कहकर मुस्कुरा दिया, आस-पास खड़े कांग्रेसी दरबारी भी इस ‘जोक’ पर ठहाके लगाकर हंसने लगे। उन्हें लगा की उन्होंने मोदी की पूरी राजनीतिक हैसियत को दो कौड़ी का कर दिया है।

उन्हें लगा की उन्होंने तालकटोरा स्टेडियम से एक तीर छोड़ा है जो सीधा मोदी के राजनीतिक करियर को खत्म कर देगा।

लेकिन उनको ये अंदाज़ा ही नहीं था की उन्होंने जो तीर छोड़ा है, वो एक ऐसा बूमरैंग (Boomerang) बन चुका है जो वापस आकर कांग्रेस पार्टी के पूरे वजूद को ही जड़ से उखाड़ फेंकने वाला है।

मणिशंकर अय्यर का वो चायवाला तंज मोदी का नहीं बल्कि देश के करोड़ों मिडिल क्लास आम हिंदुस्तानियों का अपमान था

मणिशंकर अय्यर के इस बयान के टीवी पर चलते ही, पूरे देश में जैसे एक सन्नाटा सा छा गया और उसके तुरंत बाद जो भूचाल आया, उसने सब कुछ पलट कर रख दिया।

आप खुद एक आम इंसान के नज़रिए से सोचिए।

भारत का जो बहुसंख्यक समाज है, जो विशाल हिन्दू वोटबैंक है- जिसमें हमारे ओबीसी (OBC) भाई, दलित, आदिवासी और वो गरीब सवर्ण शामिल हैं जो दिन-रात एक करके अपने परिवार का पेट पालते हैं- वो इस बयान को सुनकर क्या सोच रहा होगा?

क्या भारत के हर घर में कोई टाटा, बिड़ला या अंबानी पैदा होता है? नहीं ना!

इस देश की असली रीढ़ वो करोड़ों मिडिल क्लास लोग हैं जो सड़कों पर ठेला लगाते हैं, जो कड़कड़ाती ठंड में खेतों में पानी देते हैं, जो फैक्ट्रियों में पसीना बहाते हैं और जो नुक्कड़ पर चाय की टपरी चलाकर पाई-पाई जोड़ते हैं ताकि उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ सकें।

जब मणिशंकर अय्यर ने ‘चायवाले’ का मज़ाक उड़ाया, तो वो सिर्फ नरेंद्र मोदी का मज़ाक नहीं था। वो देश के उन करोड़ों मज़दूरों, किसानों और छोटे दुकानदारों का मज़ाक था।

उस दिन देश के हर उस बाप को लगा की ये सूट-बूट वाले नेता मेरी गरीबी और मेरी मेहनत पर ठहाके लगा रहे हैं।

उस एक बयान ने पब्लिक के दिमाग में ये बात पत्थर की तरह सेट कर दी की “अगर कोई गरीब का बेटा, जिसका कोई बैकग्राउंड नहीं है, वो अपनी मेहनत से देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचना चाहता है, तो ये कांग्रेसी उसे उसकी हैसियत याद दिलाने आ जाते हैं।”

जनता, और ख़ासकर हिन्दू समाज जो वैसे भी कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियों से भीतर ही भीतर उबल रहा था, उसे अब मोदी में सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि अपना अक्स दिखने लगा।

उन्हें लगा की मोदी की लड़ाई अब सिर्फ मोदी की नहीं है, बल्कि ये हर उस आम हिंदुस्तानी की लड़ाई है जिसे इस दरबारी ईकोसिस्टम ने हमेशा अपने जूतों की नोक पर रखा है।

विपक्ष ने सोचा था की इस ‘चायवाले’ वाले तंज से मोदी डिफेन्सिव (Defensive) हो जाएंगे, शर्मिंदा हो जाएंगे और पब्लिक उन्हें एक ‘लो-क्लास’ नेता मानकर रिजेक्ट कर देगी।

लेकिन यहीं पर विपक्ष अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल कर बैठा। उन्होंने एक जलते हुए अलाव में घी का पूरा का पूरा पीपा उड़ेल दिया था।

अब बारी बीजेपी और नरेंद्र मोदी की थी। उन्हें समझ आ गया था की विपक्ष ने उन्हें वो अस्त्र सौंप दिया है, जिसकी काट पूरे ब्रह्मांड में किसी के पास नहीं है।

आपदा को अवसर में बदलने की BJP की कला और मोदी जी का वो मास्टरस्ट्रोक जिसने विपक्ष को कर दिया चारों खाने चित

राजनीति में एक बहुत पुरानी कहावत है की आपका दुश्मन जब कोई भारी गलती कर रहा हो, तो उसे कभी बीच में मत टोको।

मणिशंकर अय्यर ने जब वो चायवाला बयान दिया, तो कांग्रेस के दरबारी तो तालियां पीट रहे थे, लेकिन बीजेपी के वार रूम में बैठे रणनीतिकारों की आंखें चमक उठी थीं।

उन्हें समझ आ गया था की कांग्रेस ने अपने ही पैरों पर सिर्फ कुल्हाड़ी नहीं मारी है, बल्कि पूरा का पूरा बुलडोज़र चढ़ा लिया है।

अगर विपक्ष की जगह कोई और होता, तो शायद इस अपमान पर बौखला जाता। गालियां देने लगता या फिर डिफेन्सिव होकर सफाई देने लगता की “नहीं-नहीं, हमारे नेता तो बहुत पढ़े-लिखे हैं।”

लेकिन यहीं पर नरेंद्र मोदी और बीजेपी की वो चाणक्य नीति काम आई, जिसे आज तक विपक्ष डिकोड नहीं कर पाया है। मोदी जी ने आपदा को अवसर में बदलने की जो कला दिखाई, उसने विपक्ष के सारे पैंतरे एक ही झटके में धूल चटा दिए।

मोदी जी ने अपनी रैलियों में इस अपमान को छिपाया नहीं, बल्कि उसे अपने सीने पर एक चमकदार मेडल की तरह सजा लिया।

जब वो लाखों की भीड़ के सामने मंच पर आए, तो उन्होंने कांग्रेस को उसी की भाषा में, लेकिन पूरी मर्यादा और एक ज़बरदस्त पंच के साथ जवाब दिया।

मोदी जी ने मंच से दहाड़ते हुए कहा- “हाँ… मैं एक गरीब घर से आता हूँ। हाँ… मैंने रेलवे स्टेशन पर चाय बेची है। लेकिन कांग्रेस के नेताओं कान खोलकर सुन लो, मैंने चाय ज़रूर बेची है, लेकिन तुम्हारी तरह अपना देश नहीं बेचा!”

भाई साहब! जैसे ही ये लाइन पब्लिक के कानों में पड़ी, रैलियों में जो तालियों और सीटियों का बवंडर उठा, उसने दिल्ली तक की ज़मीन हिला दी।

पब्लिक पागल हो गई। मोदी जी ने विपक्ष के फेंके हुए उस कीचड़ को उठाया और उससे अपने लिए एक ऐसा मज़बूत किला बना लिया जिसे भेदना कांग्रेस के बस की बात ही नहीं थी।

उन्होंने इस पूरी लड़ाई का नैरेटिव ही पलट दिया। जो कांग्रेस इसे मोदी का पर्सनल अपमान बनाना चाहती थी, बीजेपी ने बहुत ही चतुराई से इसे ‘अमीर बनाम गरीब’ और ‘कामदार बनाम नामदार’ की सीधी लड़ाई बना दिया।

मोदी जी ने हर रैली में जनता से सीधा कनेक्ट करते हुए पूछा की “क्या एक गरीब मां का बेटा, जिसने बचपन में गरीबी देखी है, जिसने चाय बेची है, क्या उसे इस देश का प्रधानमंत्री बनने का हक नहीं है? क्या ये गद्दी सिर्फ दिल्ली के शहज़ादों के लिए रिज़र्व है?”

विपक्ष चारों खाने चित हो चुका था। जिस बयान को उन्होंने मोदी की कमज़ोरी समझकर उछाला था, वही बयान अब उनके गले की ऐसी फांस बन गया था जिसे ना वो उगल पा रहे थे और ना ही निगल पा रहे थे।

राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस पार्टी को समझ ही नहीं आ रहा था की इस सुनामी को रोकें तो कैसे रोकें।

क्योंकि अब पब्लिक के सामने मोदी एक नेता नहीं, बल्कि उनके अपने घर का वो संघर्षशील बेटा बन चुके थे, जिसका दिल्ली के अमीर लोग मज़ाक उड़ा रहे थे।

‘चाय पे चर्चा’ का वो ऐतिहासिक अभियान जिसने पूरे देश के वोटर को बीजेपी के पीछे खड़ा कर दिया

अब ज़रा बीजेपी के इलेक्शन मैनेजमेंट की दाद दीजिए। उन्होंने इस मुद्दे को सिर्फ रैलियों के भाषणों तक सीमित नहीं रखा।

उन्हें पता था की लोहा एकदम गरम है, बस अब हथौड़ा इतनी ज़ोर से मारना है की उसकी गूंज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सुनाई दे। यहीं से जन्म हुआ भारत के चुनावी इतिहास के सबसे धाकड़ और इनोवेटिव कैंपेन का- ‘चाय पे चर्चा’।

बीजेपी ने सोचा की अगर कांग्रेस को चायवालों से इतनी ही दिक्कत है, तो चलो अब पूरा का पूरा चुनाव ही चाय की टपरी से लड़ा जाएगा।

रातों-रात पूरे देश में एक भयंकर नेटवर्क तैयार किया गया। भारत के हर नुक्कड़, हर चौराहे, हर गांव और शहर की हज़ारों चाय की दुकानों (Tea Stalls) को चुना गया।

वहां बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगाई गईं, इंटरनेट और DTH (डायरेक्ट टू होम) का सेटअप जोड़ा गया।

ज़रा उस वक्त की कल्पना कीजिए। शाम का वक्त है। मोहल्ले की उसी पुरानी चाय की टपरी पर गांव और शहर के लोग हाथ में कुल्हड़ या कांच के गिलास में चाय लिए खड़े हैं।

और सामने लगी बड़ी सी स्क्रीन पर, देश का होने वाला प्रधानमंत्री सीधे उनसे लाइव जुड़ रहा है।

मोदी जी स्क्रीन के उस पार बैठे चाय पी रहे हैं और स्क्रीन के इस पार खड़ी जनता उनके साथ चाय पीते हुए अपने सवाल पूछ रही है, देश के मुद्दों पर बात कर रही है।

टेक्नोलॉजी और ज़मीनी जुड़ाव का ऐसा कॉम्बिनेशन (Combination) भारत की राजनीति ने पहले कभी नहीं देखा था।

इस कैंपेन ने एक झटके में उस वीआईपी कल्चर की धज्जियां उड़ा दीं, जिसमें नेता सिर्फ चुनाव के वक्त हेलिकॉप्टर से हाथ हिलाने आते थे।

‘चाय पे चर्चा’ ने देश के उस मिडिल क्लास, लोअर-मिडिल क्लास और गरीब तबके को पूरी तरह से बीजेपी के पीछे गोलबंद कर दिया।

जो वोटर अब तक कन्फ्यूज़ था या जो कभी-कभार कांग्रेस के लुभावने वादों के झांसे में आ जाया करता था, वो अब इमोशनली मोदी से जुड़ चुका था।

चाय की वो आम सी दुकान, जो भारत के हर मोहल्ले की पहचान है, वो अचानक से लोकतंत्र का सबसे बड़ा सिंबल बन गई।

कांग्रेस के नेता अपने ड्राइंग रूम में बैठकर सिर पीट रहे थे। उन्होंने जिस शब्द (‘चायवाला’) का इस्तेमाल मोदी को राजनीतिक रूप से खत्म करने के लिए किया था, बीजेपी ने बिना कोई एक्स्ट्रा मेहनत किए, उसी शब्द को अपनी मार्केटिंग का सबसे बड़ा ब्रांड बना लिया था।

हर हिंदुस्तानी जो सुबह उठकर चाय की चुस्की लेता था, उसे अब मोदी अपने घर के सदस्य जैसे लगने लगे थे।

विपक्ष ने अपनी एक ही गलती से बीजेपी के लिए ऐसा अचूक और अभेद्य हथियार तैयार कर दिया था, जिसने 2014 के चुनावों में ऐसी आंधी ला दी की बड़े-बड़े कांग्रेसी दिग्गजों के तंबू उखड़ गए।

बीजेपी को अब कुछ नया करने की ज़रूरत ही नहीं थी, उनका आधा काम तो मणिशंकर अय्यर पहले ही कर चुके थे!

2014 की वो सुनामी जिसमें बह गया कांग्रेस का अहंकार और बीजेपी को मिल गई एक ऐतिहासिक जीत

16 मई 2014 का वो दिन तो हर उस हिंदुस्तानी को याद ही होगा जिसने थोड़ी बहुत भी राजनीति देखी है।

सुबह-सुबह टीवी पर नतीजे आने शुरू हुए और दोपहर होते-होते दिल्ली के उन शाही महलों में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे सांप सूंघ गया हो।

जिस कांग्रेस को लगता था की भारत पर राज करना तो उनके परिवार की जागीर है, उस पार्टी को देश की जनता ने सिर्फ 44 सीटों पर समेट कर रख दिया।

44 सीटें यार! मतलब इतनी पुरानी और बड़ी पार्टी को इस देश की जनता ने लोकसभा में ‘विपक्ष के नेता’ का पद पाने लायक भी नहीं छोड़ा।

वहीं दूसरी तरफ, जिस ‘चायवाले’ का ये लोग मज़ाक उड़ा रहे थे, उसकी अगुवाई में बीजेपी ने अकेले 282 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। पूरे 30 साल बाद देश में किसी सिंगल पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी।

ये कोई मामूली जीत नहीं थी, ये सच में एक भयंकर सुनामी थी। और इस सुनामी को उस विकराल रूप तक पहुंचाने में मणिशंकर अय्यर के उस एक बयान और कांग्रेस के दरबारी घमंड का बहुत बड़ा हाथ था।

जो दरबारी कल तक टीवी स्टूडियो में बैठकर चाय बेचने वाले की औकात नाप रहे थे, आज वही लोग रुआंसे चेहरों के साथ टीवी पर बैठकर अपनी हार के बहाने ढूंढ रहे थे।

इस पूरी कहानी से हमें ये ही पता चलता है की जो लोग दिन-रात ये रोना रोते हैं की “बीजेपी को हराना नामुमकिन है”, उन्हें एक बार ठंडे दिमाग से इस हकीकत को समझ लेना चाहिए।

राजनीति में कोई भी पार्टी, चाहे वो बीजेपी ही क्यों ना हो, अजेय नहीं होती। बीजेपी कोई ‘तिलिस्मी’ ताकत नहीं है जो हार ही नहीं सकती।

हकीकत तो ये है की विपक्ष खुद ज़मीनी हकीकत से कटी हुई सोच के कारण ऐसे-ऐसे ‘सेल्फ-गोल’ मार देता है की बीजेपी को जीत के लिए बस अपनी जगह पर मज़बूती से खड़े रहना पड़ता है।

अगर 2013-14 में कांग्रेस अपनी घोटालों वाली छवि सुधारने पर काम करती, विकास के मुद्दों पर मोदी से डिबेट करती, या अपने संगठन को मज़बूत करती, तो शायद बीजेपी के लिए ये जीत इतनी बड़ी और इतनी आसान बिल्कुल नहीं होती।

अपनी इसी सीरीज़ के अगले एपिसोड (Episode 2) में हम विपक्ष के ऐसे ही दूसरे ‘सेल्फ-गोल’ की बखिया उधेड़ेंगे, जिसने जनता को हमेशा के लिए उनसे दूर कर दिया और बीजेपी को एक और शानदार राजनैतिक बढ़त दे दी।

तब तक के लिए, सोचिएगा ज़रूर की राजनीति के इस खेल में रायता कौन फैला रहा है और दावत कौन उड़ा रहा है!

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