अगर आप दिन-रात न्यूज़ चैनल्स की डिबेट्स देखते हैं या फिर सोशल मीडिया पर नेताओं के भाषण सुनते हैं, तो आपको भी यही लगता होगा की हमारे देश में तो बस हर गली-नुक्कड़ पर जाति के नाम पर मार-काट मची हुई है।
एक ऐसा माहौल और झूठा नैरेटिव हमारे दिमाग में ठूंस दिया गया है जैसे आम समाज का हर आदमी बस सुबह उठकर यही सोचता है की आज किस दलित पर अत्याचार करना है।
लेकिन झूठ के पैर नहीं होते! आज हम उस कड़वे सच का कच्चा-चिट्ठा खोलने जा रहे हैं, जिसे दबाने के लिए ये ईकोसिस्टम दिन-रात पसीना बहाता है।
देश के कुल अपराधों का महज़ 1 प्रतिशत SC-ST के खिलाफ और 90 प्रतिशत मुकदमों में जातिवाद का दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं
चलिए सीधे सरकारी आंकड़ों पर बात करते हैं। जब आप NCRB का डेटा देखेंगे तो सब कुछ दूध का दूध, और पानी का पानी हो जायेगा।
देश भर में हर साल करोड़ों अपराध दर्ज होते हैं। हत्या, लूट, मारपीट, धोखाधड़ी… न जाने क्या-क्या! लेकिन क्या आपको पता है की भारत में दर्ज होने वाले कुल अपराधों में से महज़ 1 प्रतिशत अपराध ही SC/ST समुदाय के खिलाफ होते हैं!
जी हाँ, सिर्फ 1 प्रतिशत। मतलब समझ रहे हैं आप? देश में होने वाले 99 प्रतिशत अपराध बाकी समाज झेल रहा है, लेकिन टीवी डिबेट्स से लेकर संसद तक हाहाकार सिर्फ इस 1 प्रतिशत को लेकर मचाया जाता है।
और मज़े की बात तो ये है की इस 1 प्रतिशत में से भी सिर्फ 10 प्रतिशत मामले ही SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के तहत दर्ज होते हैं।
अब जरा दिल थाम कर सुनिए क्योंकि सबसे बड़ा धमाका तो अब होने वाला है। जो ये 1 प्रतिशत अपराध होते हैं ना, इनमें से 90 प्रतिशत मामलों में दूर-दूर तक कोई ‘जातिगत’ (Caste-related) एंगल होता ही नहीं है!
मतलब 90 प्रतिशत मुक़दमे ऐसे हैं जिनका जातिवाद से कोई लेना-देना ही नहीं है।
तो फिर ये मामले हैं क्या? असल में ये आम लड़ाई-झगड़े हैं। वही झगड़े जो भारत के हर गांव, हर मोहल्ले में हर दिन होते हैं।
किसी का नाली का विवाद है, किसी की खेत की मेड़ को लेकर कहासुनी हो गई, किसी का 500 रुपये का लेन-देन फंसा है, या फिर बच्चों के बीच क्रिकेट खेलते हुए कोई लड़ाई हो गई।
NCRB का डेटा खुद बता रहा है की दर्ज होने वाले मामलों में सबसे बड़ी कैटेगरी ‘सिंपल हर्ट’ (Simple Hurt) यानी सामान्य मारपीट और गाली-गलौज की होती है।
लेकिन होता क्या है? जैसे ही दो लोगों के बीच कोई आम झगड़ा होता है, तो सामने वाले को सबक सिखाने और ब्लैकमेल करने के लिए तुरंत उस झगड़े को ‘जातिगत अत्याचार’ का रंग दे दिया जाता है।
मतलब झगड़ा हुआ था खेत की बाउंड्री पर, लेकिन थाने में जाकर एफआईआर (FIR) लिखवाई जाती है की “मुझे जातिसूचक गालियां दी गईं और मुझे अपमानित किया गया।”
और मज़ेदार बात तो ये है की कई बार तो अपराध खुद उसी समुदाय के लोगों द्वारा अपने ही लोगों पर किया जाता है, लेकिन नैरेटिव ऐसा सेट किया जाता है जैसे बाकी समाज के लोग उन पर जुल्म ढा रहे हों।
आदर्श मुनि त्रिवेदी के सर्वे ने निकाल दी झूठे इकोसिस्टम की हवा, 86 प्रतिशत मुकदमों में OBC और मुस्लिम आरोपी
सालों से एक ही झूठ बेचा जा रहा था की समाज का एक खास वर्ग ही अत्याचार कर रहा है और बाकी सब बेकसूर हैं।
लेकिन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (MP High Court Bar Association) के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील रहे स्वर्गीय आदर्श मुनि त्रिवेदी जी ने जब एक विस्तृत सर्वे करवाया, तो जो हकीकत सामने आई, उसने इस पूरे झूठे प्रोपेगेंडा की सरेआम बखिया उधेड़ दी।
इस ऐतिहासिक सर्वे की रिपोर्ट ने साबित कर दिया की SC/ST एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों में सबसे ज्यादा आरोपी कौन निकल के आ रहे हैं।
सर्वे के मुताबिक, इस एक्ट के तहत दर्ज कुल मामलों में से 81 प्रतिशत आरोपी सीधे तौर पर OBC (पिछड़ा वर्ग) समाज से आते हैं! और 5 प्रतिशत मुक़दमे मुस्लिम/अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों पर दर्ज होते हैं।
अगर आप थोड़ा सा गणित लगाएं, तो 81 और 5 मिलकर होते हैं 86 प्रतिशत! मतलब देश में दर्ज होने वाले SC/ST एक्ट के कुल 86 प्रतिशत मुकदमों में ओबीसी और मुस्लिम समाज के आरोपी होते हैं।
बाकी बचे खुचे मामलों में आम समाज के लोग लपेटे जाते हैं।
ज़मीन पर असलियत में इस SC/ST एक्ट का डंडा सबसे ज्यादा OBC वर्ग की पीठ पर ही बरस रहा है।
समस्तीपुर की मूनचुन शाह की रुला देने वाली कहानी और कैसे ज़मीन हड़पने का खौफनाक कानूनी हथियार बन चुका है SC-ST एक्ट
आंकड़ों से बाहर निकलकर जब आप ज़मीन पर उतरते हैं, तो इस एक्ट के दुरुपयोग की जो खौफनाक तस्वीरें सामने आती हैं, वो किसी भी इंसान का दिल दहला देने के लिए काफी हैं।
आज की तारीख में यह कानून न्याय दिलाने का ज़रिया कम, और ज़मीनें हड़पने, बेगुनाहों से उगाही (Extortion) करने और पुरानी दुश्मनी निकालने का एक भयंकर ‘कानूनी हथियार’ ज़्यादा बन चुका है।
लोग अब इस एक्ट का खौफ दिखाकर दिन-दहाड़े लोगों की प्रॉपर्टी कब्ज़ा रहे हैं, और प्रशासन इस कानून के डर से आंखें मूंदे बैठा रहता है।
ज़रा बिहार के समस्तीपुर की रहने वाली मूनचुन शाह की रुला देने वाली कहानी सुनिए। यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, बल्कि आज के लचर सिस्टम की वो कड़वी हकीकत है जो आए दिन देश के किसी न किसी कोने में घट रही है।
मूनचुन शाह एक बेहद साधारण महिला हैं। उनकी जीवन भर की गाढ़ी कमाई से बनी दुकान और घर पर गांव के ही कुछ ‘दलित दबंगों’ ने कब्ज़ा कर लिया।
जब किसी की आंखों के सामने उसका आशियाना उजड़ रहा हो, तो वो क्या करेगा? ज़ाहिर सी बात है, वो विरोध करेगा।
मूनचुन शाह के पति ने भी अपनी प्रॉपर्टी बचाने के लिए उन कब्ज़ाधारियों का विरोध किया और पुलिस से मदद मांगने की कोशिश की।
लेकिन यहाँ कहावत सच हो गई- उल्टा चोर कोतवाल को डांटे! अपनी गलती मानने और कब्ज़ा छोड़ने के बजाय, उन दबंगों ने मूनचुन के पति पर ही उल्टे फर्जी SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा ठोक दिया।
और हमारा अंधा कानून देखिए, बिना किसी ठोस जांच-पड़ताल के एक बेगुनाह आदमी को, जो खुद अपनी ज़मीन छिनने का शिकार था, उसे ही सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
एक तरफ घर और दुकान छिन गई, और दूसरी तरफ जिस पति को न्याय मिलना चाहिए था, वो फर्जी एक्ट के तहत जेल में चला गया।
यह सिर्फ एक मूनचुन शाह की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे देश में आम नागरिकों और निर्दोष लोगों को इसी तरह डराया और ब्लैकमेल किया जा रहा है।
अगर आप किसी की मनमानी का विरोध करेंगे, तो वो सीधे आपको ‘SC/ST Act’ का खौफ दिखाएगा और आप अपनी ही प्रॉपर्टी छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाएंगे।
आपसी झगड़ों को जातिगत रंग देकर ब्लैकमेल करने का खौफनाक धंधा, SC/ST Act के 75 प्रतिशत से ज़्यादा मामले पूरी तरह से फर्जी
आपको जानकर हैरानी होगी की अदालतों में जाने वाले SC/ST एक्ट के मुकदमों में से लगभग 75 प्रतिशत से ज़्यादा मामले जांच और ट्रायल के बाद पूरी तरह से फर्जी (Fake) साबित होते हैं।
कोर्ट खुद मानता है की इन मामलों में कोई सच्चाई नहीं थी और आरोपी को बाइज्जत बरी कर दिया जाता है।
लेकिन भाईसाहब, भारत में ‘बाइज्जत बरी’ होने की जो कीमत चुकानी पड़ती है, वो कौन लौटाएगा?
जब तक फैसला आता है, तब तक उस निर्दोष इंसान के जीवन के 5 से 10 साल जेल की सड़न और कोर्ट-कचहरी के धक्कों में बर्बाद हो चुके होते हैं।
समाज में उसकी इज़्ज़त नीलाम हो चुकी होती है, उसकी नौकरी जा चुकी होती है, और उसका परिवार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है।
अब सवाल ये उठता है की लोग इतने बड़े पैमाने पर फर्जी मुक़दमे आख़िर करते क्यों हैं? इसका सीधा सा जवाब है-सरकारी मुआवज़े का लालच!
कानून के तहत, जैसे ही किसी पर यह एक्ट लगता है, शिकायतकर्ता को सरकार की तरफ से तुरंत लाखों रुपये का मुआवज़ा, और कई मामलों में तो ताउम्र पेंशन और नौकरी जैसी सुविधाएं तक मिलने लगती हैं।
बस, इसी मलाई ने इस एक्ट को एक रैकेट में तब्दील कर दिया है। किसी भी आम इंसान से सरेराह लड़ पड़ो, उसे दो गाली दो, और अगर वो पलट कर आपको जवाब दे दे, तो सीधा थाने जाकर कह दो की “मुझे जाति सूचक गालियां दी गई हैं।”
बिना किसी सबूत के अगले OBC आदमी की ज़िंदगी नर्क बन जाएगी, और शिकायत करने वाले के बैंक खाते में सरकार लाखों रुपये ट्रांसफर कर देगी।
आपसी खुन्नस निकालने और रातों-रात अमीर बनने का इससे आसान शॉर्टकट आज के समय में और क्या हो सकता है?
