सियासत में जब सत्ता और विरासत का घमंड इंसान के सिर पर चढ़कर बोलता है ना, तो उसे अपना कल याद नहीं रहता। उसे लगता है की जो कुछ है, बस वो ही है।
आजकल उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के मठाधीश अखिलेश यादव का हाल भी कुछ ऐसा ही हो गया है।
विरासत में बनी-बनाई गद्दी मिल गई, तो यादव जी को लगने लगा की पूरे प्रदेश की चौधराहट उन्हीं की जागीर है।
अभी हाल ही में अखिलेश यादव ने एक ऐसा बयान दे डाला, जिसने पश्चिमी यूपी से लेकर पूरे किसान और जाट समाज की रगों में आग लगा दी है।
भरे मंच से सीना तानकर अखिलेश कहते हैं की “हमने जयंत चौधरी को चवन्नी से रुपया बना दिया, वो कोई चवन्नी थोड़ी हैं जो पलट जाएंगे!”
मतलब हद हो गई अहंकार की! अरे सर जी, आप किसे चवन्नी बता रहे हो? आप उस जयंत चौधरी की हैसियत नाप रहे हो, जिसके दादा चौधरी चरण सिंह को ये देश किसानों का मसीहा मानता है?
जयंत कोई आसमान से टपका हुआ नेता-वेता नहीं है, वो उस खानदान का वारिस है जिसके नाम से पश्चिमी यूपी का किसान आज भी अपनी पगड़ी ऊंची करता है।
अखिलेश को लगता है की चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाले लोग ज़मीन से जुड़े किसानों के नेताओं को कुछ भी कह देंगे और पब्लिक चुपचाप सुन लेगी।
ये सिर्फ जयंत चौधरी का निजी अपमान नहीं है, ये सीधे-सीधे करोड़ों किसानों और पूरे जाट समाज के मुंह पर तमाचा है।
जिस समाजवादी पार्टी का वजूद ही चौधरी खानदान के रहमोकरम पर खड़ा हुआ हो, आज उसी पार्टी का वारिस अपने अन्नदाताओं से पूछ रहा है की तुम्हारी कीमत क्या है?
इसे कहते हैं शुद्ध एहसान फरामोशी! जिस पेड़ की छांव में बैठकर तुमने राजनीति का ककहरा सीखा, आज उसी पेड़ की टहनियों को काट रहे हो!
जब एनकाउंटर के डर से साइकिल पर भाग रहे थे मुलायम सिंह तब चौधरी चरण सिंह ने ही बचाई थी जान
लेकिन अखिलेश यादव शायद इतिहास के वो पन्ने भूल गए हैं या फिर उनके दरबारियों ने उन्हें कभी बताया ही नहीं की उनके पिता मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक बिसात, और यहां तक की उनकी जान, किसकी बदौलत बची थी।
चलिए, आज हम अखिलेश जी को उनके ही कुनबे का वो इतिहास याद दिलाते हैं, जिसे सुनकर शायद उनके घमंड का बुखार उतर जाए।
बात 1980 के दशक की है। उत्तर प्रदेश में विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) मुख्यमंत्री हुआ करते थे। वीपी सिंह का वो दौर डकैतों के खात्मे के लिए जाना जाता है।
उन्होंने चंबल और यूपी के बीहड़ों में डकैतों के खिलाफ इतना भयंकर अभियान छेड़ा था की अच्छे-अच्छे बाहुबलियों की आत्मा काँप जाती थी।
उस वक्त मुलायम सिंह यादव राजनीति में पैर जमा ही रहे थे, लेकिन उन पर आरोप इतने संगीन थे की कोई भी सीधा मुंह बात नहीं करता था।
खुफिया रिपोर्टें कह रही थीं की मुलायम सिंह के चंबल के खूंखार डकैतों (खासकर छविराम जैसे डकैतों) से गहरे ताल्लुकात हैं।
वीपी सिंह कोई कच्चे खिलाड़ी तो थे नहीं। जब उन्हें इस नेक्सस का पता चला, तो उन्होंने सीधा आदेश दे दिया- “मुलायम सिंह का एनकाउंटर कर दो!”
जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। आज जो लोग खुद को पिछड़ों और समाजवाद का मसीहा बताते हैं, उन मुलायम सिंह का एनकाउंटर तय हो चुका था। पुलिस पीछे पड़ गई थी और मौत बिल्कुल सामने खड़ी थी।
उस वक्त मुलायम सिंह को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। जान बचाने के लिए वो अपनी साइकिल और कभी ट्रैक्टरों पर छिपते-छिपाते, खेतों की पगडंडियों से होते हुए रातों-रात इटावा से भागे।
और जानते हैं वो भागकर कहां गए? वो सीधे दिल्ली पहुंचे, उसी खानदान की चौखट पर, जिसके पोते को आज अखिलेश चवन्नी बता रहे हैं!
दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का दरवाज़ा खटखटाया गया। चरण सिंह वो नेता थे जिनकी एक आवाज़ पर दिल्ली की सरकारें हिल जाती थीं।
जब मुलायम ने गिड़गिड़ाकर अपनी जान की भीख मांगी, तो वो चौधरी चरण सिंह ही थे जिन्होंने अपना बड़ा दिल दिखाया।
उन्होंने मुलायम सिंह को अपनी राजनीतिक पनाह दी, उनका एनकाउंटर रुकवाया और सीधे तौर पर अपना ‘चौकीदार’ बनाकर उन्हें उस मौत के मुंह से बाहर खींच लिया।
ज़रा सोचिए, अगर उस दिन चौधरी चरण सिंह ने मुलायम को अपने घर से दुत्कार दिया होता, तो क्या होता? यूपी के किसी बीहड़ में पुलिस की गोलियों से कहानी खत्म हो गई होती!
ना आज कोई समाजवादी पार्टी होती, ना कोई सैफई महोत्सव होता, और ना ही अखिलेश यादव आज अपनी मर्सिडीज़ में बैठकर किसी किसान नेता को ‘चवन्नी’ कहने लायक बचते।
जिस चौधरी खानदान ने तुम्हें मौत के मुंह से निकालकर ज़िंदगी दी, तुम्हारे पिता को नेता बनाया, आज तुम उसी खानदान की कीमत चवन्नी लगा रहे हो?
शर्म आनी चाहिए ऐसे खोखले अहंकार पर। ये सियासत की वो एहसान फरामोशी है, जिसे पश्चिमी यूपी का जाट समाज अपनी चौपालों पर आज भी सुनाता है और दातों तले उंगली दबाता है की कैसे एक परिवार ने इतना बड़ा एहसान पल भर में भुला दिया।
सिर्फ जान नहीं बचाई बल्कि उंगली पकड़कर राजनीति का सरताज बनाया, मुलायम सिंह को ‘नेताजी’ बनाने वाले चरण सिंह ही थे
अगर अखिलेश यादव को लगता है की चौधरी चरण सिंह का एहसान सिर्फ एक एनकाउंटर रुकवाने तक ही सीमित था, तो उन्हें अपने सलाहकारों को हटाकर यूपी का राजनीतिक इतिहास दोबारा पढ़ना चाहिए।
सच तो ये है की अगर चौधरी चरण सिंह ने अपना हाथ मुलायम सिंह के सिर पर न रखा होता, तो मुलायम कभी ‘नेताजी’ नहीं बन पाते। वो महज़ एक अखाड़े के साधारण पहलवान और इटावा के एक छोटे-मोटे मास्टर जी बनकर रह जाते।
ज़रा याद कीजिए 1980 का वो दौर! लोकदल पार्टी में उस वक्त एक से बढ़कर एक दिग्गज नेता लाइन में लगे थे। ऐसे-ऐसे धुरंधर थे जो चौधरी साहब के एक इशारे पर अपनी जान छिड़कते थे।
लेकिन चौधरी चरण सिंह ने उन सभी कद्दावर और वफादार दिग्गजों को दरकिनार करते हुए मुलायम सिंह यादव को सीधा उत्तर प्रदेश लोकदल का प्रदेश अध्यक्ष (State President) बना दिया।
प्रदेश अध्यक्ष बनाने का सीधा मतलब था की चरण सिंह ने पूरे यूपी के किसानों, पिछड़ों और जाटों का वो विशाल वोटबैंक, जिसे उन्होंने अपनी खून-पसीने की कमाई से खड़ा किया था, वो पूरा का पूरा खज़ाना मुलायम सिंह की झोली में डाल दिया।
इतना ही नहीं, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष की आवाज़ बनने का समय आया, तो चौधरी साहब ने फिर से अपने इसी चहेते ‘पहलवान’ पर भरोसा जताया।
उन्होंने मुलायम सिंह को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष का नेता (Leader of Opposition) बनवा दिया। उस कुर्सी ने मुलायम सिंह को वो राजनीतिक कवच और पावर दी, जिसके दम पर वो पूरे सूबे में अपनी धमक और खौफ बना पाए।
चौधरी चरण सिंह ने पिछड़े वर्ग और किसानों की राजनीति की वो पूरी की पूरी चाबी मुलायम सिंह के हाथ में सौंप दी थी। उन्होंने अपने समाज (जाटों और किसानों) से बाकायदा कहा था की “अब मुलायम को मेरा ही अक्स समझना और इसे पूरा समर्थन देना।”
अगर चौधरी चरण सिंह ने उस दौर में मुलायम सिंह को वो ‘रुपया’ न बनाया होता, तो आज अखिलेश यादव सियासत के बाज़ार में सच में एक ‘चवन्नी’ की कीमत भी नहीं रखते!
1989 में रातों-रात गुंडे भेजकर विधायकों को उठवाना और चौधरी अजीत सिंह से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनना
सियासत में एक कहावत है की जो इंसान अपने अहसान करने वाले का सगा नहीं हो सका, वो किसी का सगा नहीं हो सकता।
चौधरी चरण सिंह ने अपनी जिस छतरी के नीचे मुलायम सिंह को पनाह दी थी, उसी खानदान को मुलायम सिंह ने जो सिला दिया, वो यूपी की राजनीति के माथे पर एक ऐसा कलंक है जो कभी मिट नहीं सकता।
बात 1989 की है। देश की राजनीति करवट ले रही थी। वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ चुके थे। उत्तर प्रदेश में जनता दल का डंका बज रहा था और अब बारी थी सूबे का नया मुख्यमंत्री चुनने की।
उस वक्त पूरे उत्तर प्रदेश का बच्चा-बच्चा जानता था की मुख्यमंत्री की कुर्सी का असली और इकलौता हक़दार कौन है। वो नाम था- चौधरी अजीत सिंह (जयंत चौधरी के पिता)।
पूरे प्रदेश के किसानों ने अजीत सिंह के नाम पर वोट दिया था और पार्टी के अधिकतर विधायकों का खुला समर्थन अजीत सिंह की ही झोली में था।
वीपी सिंह खुद चाहते थे की उत्तर प्रदेश की कमान अजीत सिंह के हाथों में जाए।
लेकिन यहीं पर मुलायम सिंह यादव ने अपनी ‘पहलवानी’ का वो गंदा और खौफनाक खेल खेला, जिसने पूरे पश्चिमी यूपी की पीठ में एक गहरा खंजर घोंप दिया।
जब मुलायम को लगा की वो सीधे-सीधे मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे, तो उन्होंने बाहुबल और खौफ का सहारा लिया। रातों-रात डीपी यादव जैसे खूंखार बाहुबलियों और गुंडों की फौज लखनऊ की सड़कों पर उतार दी गई।
ये कोई लोकतांत्रिक चुनाव नहीं रह गया था भाई! बाकायदा विधायकों को उनके कमरों से उठवाया गया (किडनैप किया गया), उन्हें डराया-धमकाया गया और बंदूकों के साये में वोटिंग करवाई गई।
जिस किसान समाज ने अजीत सिंह को अपना मुख्यमंत्री मानकर जश्न की तैयारियां कर ली थीं, अगली सुबह उन्हें पता चला की मुलायम सिंह ने गुंडागर्दी के दम पर वो कुर्सी हथिया ली है।
ज़रा सोचिए उस धोखे की गहराई को! जिस चरण सिंह ने मौत के मुंह से निकालकर तुम्हें जीवनदान दिया, तुमने उसी के बेटे का हक़ रातों-रात डकैती डालकर छीन लिया।
पश्चिमी यूपी का किसान और पूरा जाट समाज उस धोखे को आज तक नहीं भूला है। अजीत सिंह तो अपनी शराफत और उसूलों की राजनीति करते रहे, लेकिन मुलायम सिंह ने साबित कर दिया की सत्ता की भूख के आगे उनके लिए कोई एहसान मायने नहीं रखता।
जिस कुनबे का वजूद ही धोखे पर टिका हो उसका जयंत चौधरी को चवन्नी कहने का अहंकार अब उसी को ले डूबेगा
और अब ज़रा आज के हालात देखिए। पिता ने पीठ में खंजर घोंपा था, और बेटा आज सरेआम मंच से बेइज़्ज़त कर रहा है।
अरे अखिलेश जी, आप किस मुंह से जयंत चौधरी को ‘चवन्नी’ कह रहे हैं? क्या आपको अपना वो दौर याद नहीं जब आप खुद इन्हीं जयंत चौधरी के दरवाज़े पर गठबंधन की भिक्षा मांगने गए थे?
चलिए, फ्लैशबैक में चलते हैं। 2014, 2017 और फिर 2019… जब पूरे उत्तर प्रदेश की जनता ने समाजवादी पार्टी का सूपड़ा साफ कर दिया था, जब आपको समझ नहीं आ रहा था की अपनी डूबती हुई लुटिया को कैसे बचाया जाए, तब आप ही दौड़े-दौड़े उसी चौधरी खानदान की चौखट पर गए थे ना?
तब तो आपको जयंत चौधरी ‘रुपया’ और ‘सोना’ लग रहे थे! जब आपको पश्चिमी यूपी में अपनी रैलियों में भीड़ जुटानी होती है, तब आपको जाटों और किसानों का वोट चाहिए होता है।
लेकिन जब वही जयंत चौधरी अपने समाज के सम्मान, उनके स्वाभिमान और उनके हक़ के लिए कोई स्वतंत्र फैसला लेते हैं, तो वो अचानक आपकी नज़रों में ‘चवन्नी’ हो जाते हैं?
ये आपकी राजनीति की वो अवसरवादी नीयत है जिसे आज पूरा किसान समाज बहुत करीब से देख रहा है। आपको लगता है की आप विरासत में मिली कुर्सी पर बैठकर किसी भी ज़मीनी नेता का अपमान कर देंगे और पब्लिक तालियां पीटेगी?
अखिलेश जी, जयंत चौधरी को वो कुर्सी विरासत में थाली में सजाकर नहीं मिली है। उन्होंने ज़मीन पर पसीना बहाया है, लाठियां खाई हैं।
जबकि आपकी हकीकत क्या है? आपको तो मुख्यमंत्री की कुर्सी भी पिताजी से एकदम रेडीमेड मिली थी।
हिन्दुओं को रुलाने वाले आज़म खान को गृहमंत्री बनाने का अखिलेश का सपना और जाटों को नीचा दिखाने की जुर्रत
अब ज़रा समाजवादी पार्टी की तुष्टिकरण वाली राजनीति का चेहरा देखिए। एक तरफ अखिलेश यादव उस चौधरी खानदान के वारिस को ‘चवन्नी’ बता रहे हैं, जिसने उनके पिता को जीवनदान दिया था।
और दूसरी तरफ देखिए की ये लोग किसे अपना भगवान मानकर उसके सजदे में सिर झुका रहे हैं!
अभी हाल ही की बात है, अगस्त 2026 में समाजवादी पार्टी के बड़े नेता और अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव जेल में बंद आज़म खान से मिलने जाते हैं।
और इसके बाद सपा की तरफ से सरेआम जो ऐलान किया जाता है, उसने पूरे पश्चिमी यूपी और हिन्दू समाज की रगों में आग लगा दी है।
सपा खुलेआम कह रही है की 2027 में अगर समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, तो जेल के ताले टूटेंगे और आज़म खान को सीधा उत्तर प्रदेश का गृह मंत्री (Home Minister) बनाया जाएगा!
ज़रा सोचिए इस खौफनाक सपने के बारे में! आज़म खान… वो इंसान जिस पर लूट, डकैती, कब्ज़े, और भ्रष्टाचार के अनगिनत संगीन मुकदमे दर्ज हैं।
वो आज़म खान, जिसके राज में रामपुर और पूरे पश्चिमी यूपी में हिन्दुओं और किसानों को खून के आंसू रुलाया गया। आपको याद है ना वो दौर?
जब आज़म खान की भैंसें चोरी हो जाती थीं, तो पूरी की पूरी यूपी पुलिस उन्हें ढूंढने में लगा दी जाती थी।
लेकिन उसी राज में जब किसी गरीब किसान का ट्रैक्टर चोरी होता था या किसी हिन्दू की ज़मीन पर कब्ज़ा होता था, तो थाने में उसकी एफआईआर (FIR) तक लिखने वाला कोई नहीं होता था।
रामपुर में दलितों और किसानों की ज़मीनें हड़प कर अपनी यूनिवर्सिटी की बाउंड्री में मिला लेने वाले उस ‘ज़ालिम खान’ को अखिलेश यादव यूपी का गृह मंत्री बनाना चाहते हैं?
मतलब, जिस आदमी ने कानून की धज्जियां उड़ाईं, उसे आप पुलिस और कानून व्यवस्था का मुखिया बना देंगे?
ये सीधे-सीधे पश्चिमी यूपी के जाटों, राजपूतों और पूरे हिन्दू समाज को नीचा दिखाने की जुर्रत है।
आप एक तरफ किसानों के सर्वमान्य नेता जयंत चौधरी को सरेआम ‘चवन्नी’ कहकर ज़लील करते हैं, और दूसरी तरफ हिन्दुओं को रुलाने वाले एक सज़ायाफ्ता नेता को गृह मंत्री की कुर्सी का ख्वाब दिखाते हैं। यही है आपका समाजवाद?
चवन्नी वाले घमंड और आज़म खान के प्रेम में अखिलेश ने मार ली अपने पैर में कुल्हाड़ी, अब 2027 में साइकिल का पहिया निकलना तय
अखिलेश यादव ने जोश-जोश में जो ‘चवन्नी’ वाला डायलॉग मारा है ना, वो दरअसल उनकी राजनीति की सबसे बड़ी और आत्मघाती भूल साबित होने वाली है।
2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसका ऐसा भयंकर नुकसान होने वाला है, जिसकी भरपाई ये अगले दस साल तक नहीं कर पाएंगे।
सबसे पहला और बड़ा नुकसान तो इनके उसी ‘पीडीए’ (PDA) और जाट-मुस्लिम समीकरण का होगा, जिसके दम पर ये हवा में उड़ रहे थे।
पश्चिमी यूपी में 100 से ज्यादा विधानसभा सीटें आती हैं और यहाँ की हवा दिल्ली से लेकर लखनऊ तक का राजनीतिक मौसम तय करती है।
यहाँ चुनाव जीतने के लिए सिर्फ एम-वाय (MY) यानी मुस्लिम और यादव वोट बैंक काफी नहीं है। जब तक किसान, जाट और गुर्जर समाज का आशीर्वाद न मिले, यहाँ कोई अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाता।
पिछले चुनावों में जब सपा ने यहाँ से कुछ सीटें निकाली थीं, तो वो जयंत चौधरी की आरएलडी (RLD) का ही इंजन था जिसने अखिलेश की साइकिल को पश्चिमी यूपी की उबड़-खाबड़ सड़कों पर खींचा था।
अब जब वही इंजन छिन गया है और ऊपर से आपने उसी समाज की पगड़ी उछाल दी, तो लिख कर ले लीजिए की अब इस इलाके में साइकिल का पहिया पूरी तरह से कीचड़ में धंसने वाला है।
दूसरा सबसे बड़ा झटका जो अखिलेश को लगेगा, वो है किसान वोटों का पूरी तरह से एनडीए (NDA) की तरफ शिफ्ट हो जाना।
जयंत चौधरी आज एनडीए का मज़बूत हिस्सा हैं। पहले शायद कुछ जाट या किसान वोटर ऐसे रहे होंगे जिनके मन में सपा के लिए थोड़ी बहुत सॉफ्ट कॉर्नर (नरमी) बची हो, लेकिन जयंत को ‘चवन्नी’ कहने के बाद वो बची-खुची गुंजाइश भी हमेशा के लिए राख हो गई है।
अब यह चुनाव किसी पार्टी या वादों का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘जाट स्वाभिमान’ का चुनाव बन गया है। पूरा का पूरा जाट और किसान वोट अब एनडीए के खाते में जाएगा।
मुज़फ्फरनगर से लेकर बागपत और शामली से लेकर मथुरा तक, समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को अब बूथों पर सन्नाटा ही नज़र आएगा।
कुल मिलाकर कहानी ये है की अखिलेश यादव ने अपने खोखले अहंकार से 2027 के चुनाव में पश्चिमी यूपी का दरवाज़ा अपने लिए हमेशा के लिए बंद कर लिया है।
पश्चिमी यूपी के किसानों ने उठा लिया है लट्ठ, चुनाव में समाजवादी पार्टी को दिखाई जाएगी असली राजनीतिक ताकत
अखिलेश जी, आप मुगालते में मत रहिएगा। पश्चिमी यूपी के किसानों ने अब अपनी चौपालों पर लट्ठ पर तेल पिलाना शुरू कर दिया है।
ये लट्ठ हिंसा के लिए नहीं, बल्कि उस राजनीतिक चोट के लिए है जो चुनाव के दिन ईवीएम (EVM) के बटन पर पड़ेगी।
आप आइएगा पश्चिमी यूपी के गांवों में वोट मांगने। आप लाइएगा अपने उसी ‘ज़ालिम खान’ का पोस्टर जिसे आप गृह मंत्री बनाना चाहते हैं। जब आप यहाँ की पगडंडियों पर आएंगे, तो आपको हर चौपाल पर वो लट्ठ और दरवाज़ों पर लटकते हुए ताले आपका इंतज़ार करते मिलेंगे।
जो समाज मौत के मुंह में फंसे एक अनजान मुलायम सिंह को अपना सकता है, वो समाज एहसान फरामोशों को उनकी असली जगह दिखाना भी बहुत अच्छी तरह जानता है।
2027 का चुनाव चौधरी खानदान के अपमान और आपके इस असीमित अहंकार का हिसाब चुकाने का दिन होगा।
