ज़रा एक पल के लिए सोचिए। क्या हो अगर आपके घर के चारों तरफ खून के प्यासे खूंखार जिहादी खड़े हों और आपके सामने एक ही शर्त रखी जाए- “या तो चुपचाप इस्लाम कबूल कर लो, या फिर पूरे परिवार समेत अपनी गर्दन कटवा लो।”
एक आम इंसान ऐसी हालत में क्या करेगा? शायद डर के मारे घुटने टेक देगा? लेकिन इस दुनिया में एक ऐसी भी वीर और निडर कौम है, जिसने एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे इतिहास में 74 बार ऐसे ही भयंकर कत्लेआम सहे हैं।
जी हाँ, 74 बार नरसंहार (Genocide)!
इनकी बस्तियां जलाई गईं, औरतों को बाज़ारों में कौड़ियों के भाव नीलाम किया गया, छोटे-छोटे बच्चों के सामने उनके बापों के सिर काटे गए… लेकिन मजाल है जो इस कौम ने डर के मारे अपना धर्म छोड़ दिया हो!
आज हम बात कर रहे हैं इराक, सीरिया और तुर्की के पहाड़ों में बसने वाले उस महान ‘यजीदी समुदाय’ (Yazidi Community) की, जो असल में और कोई नहीं, बल्कि भगवान शिव के पुत्र भगवान ‘कार्तिकेय’ (मुरुगन) के ही बिछड़े हुए सनातनी वंशज हैं।
आज तक इस समुदाय ने सिर्फ बर्दाश्त किया है। लेकिन अब इस्लामिक कट्टरपंथियों के बीच रहते-रहते ये लोग अच्छी तरह समझ चुके हैं की अगर ज़िंदा रहना है और अपनी हज़ारों साल पुरानी सनातनी पहचान बचानी है, तो इन जिहादी मुल्कों के भरोसे नहीं रहा जा सकता।
बस इसी आग और गुस्से ने अब एक बहुत बड़े आंदोलन का रूप ले लिया है।
इराक और सीरिया के रेगिस्तानों के बीचों-बीच, इन्हीं यजीदियों ने अपने आराध्य देव भगवान कार्तिकेय के नाम पर अपना खुद का एक नया और स्वतंत्र देश- ‘कार्तिकस्तान’ (Karthikistan) बनाने का शंखनाद कर दिया है।
74 बार कत्लेआम और औरतों की नीलामी झेलकर भी नहीं झुके ये वीर यजीदी, इराक के रेगिस्तान से उठी भगवान कार्तिकेय के वंशजों की हुंकार
यजीदी वो लोग हैं जो सदियों से मध्य पूर्व (Middle East) के उन इलाकों में रह रहे हैं, जहां चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक मुल्क हैं।
ये लोग न तो कुरान को मानते हैं और न ही मक्का की तरफ मुंह करके नमाज़ पढ़ते हैं। ये लोग सूर्य देव की पूजा करते हैं, अग्नि में आहुति देते हैं और पुनर्जन्म पर विश्वास रखते हैं।
क्योंकि इनका कोई ‘एक पैगंबर’ या ‘किताब’ नहीं है (जैसा इब्राहीमी धर्मों में होता है), इसलिए आस-पास के मुल्कों ने इन्हें हमेशा ‘काफिर’ और ‘शैतान का पूजक’ बताकर इन पर ज़ुल्म किए।
इतिहास खंगाल कर देख लीजिए, ओटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) से लेकर आज के अल-कायदा और ISIS तक, जिसने भी इराक और सीरिया पर राज किया, उसका सबसे पहला टारगेट यही यजीदी कौम रही।
पूरी 74 बार इन पर इस नीयत से हमला किया गया की इनकी नस्ल ही धरती से मिटा दी जाए।
लेकिन सनातन का डीएनए इतनी आसानी से कहाँ मिटने वाला है! जब-जब इन्हें मारा गया, ये पहाड़ों में छिप गए, वहां घास-फूस खाकर ज़िंदा रहे, लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ा।
और आज जब हालात हद से बाहर हो गए हैं, तो इस समुदाय के लीडर्स ने साफ कह दिया है की “बहुत हुआ खून-खराबा, अब हमें अपने बच्चों का और खून नहीं बहाना। हमें अपना अलग राज चाहिए।”
‘कार्तिकस्तान’ की मांग असल में उसी दर्द का नतीजा है जो 74 बार इनके सीने में खंजर की तरह उतारा गया है।
मौत कबूल है पर इस्लाम नहीं, ISIS के खूंखार जिहादियों के बीच चट्टान बनकर खड़े यजीदी हिन्दुओं का वो खौफनाक इतिहास
सच कहूं तो 2014 से पहले दुनिया के बहुत कम लोग यजीदियों के बारे में जानते थे। लेकिन अगस्त 2014 में इराक के ‘सिंजार प्रांत’ (Sinjar) में ISIS के जिहादियों ने जो नंगा नाच किया, उसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।
सिंजार वो इलाका है जहां यजीदियों की सबसे घनी आबादी बसती थी। एक रात अचानक ISIS के खूंखार आतंकियों ने ट्रकों और हथियारों के साथ इस पूरे इलाके को चारों तरफ से घेर लिया।
जिहादियों के लाउडस्पीकरों से एक ही फरमान गूंज रहा था- “या तो इस्लाम कुबूल करो, या मरने के लिए तैयार हो जाओ।”
इसके बाद वहां जो हुआ, वो इंसानियत के माथे पर सबसे बड़ा कलंक है। जिन मर्दों और बुज़ुर्गों ने कलमा पढ़ने से साफ इनकार कर दिया, उन्हें जिहादियों ने एक कतार में खड़ा किया और अंधाधुंध गोलियों से भून डाला।
हज़ारों यजीदी मर्दों को सामूहिक कब्रों में ज़िंदा दफना दिया गया।
लेकिन सबसे खौफनाक और घिनौना मंज़र तो औरतों और बच्चियों के साथ हुआ। इन जिहादियों ने जवान यजीदी औरतों और 10-12 साल की छोटी-छोटी बच्चियों को उनके परिवारों से छीन लिया।
उन्हें जंजीरों में जकड़ कर ट्रकों में ठूंसा गया और रक्का (सीरिया) और मोसुल के ‘स्लेव मार्केट्स’ यानी गुलाम बाज़ारों में ले जाया गया।
भाई साहब, 21वीं सदी में… जी हां, आज के दौर में इन बच्चियों को सिगरेट के पैकेट और चंद रुपयों के भाव में जिहादियों के बीच नीलाम किया गया!
उन्हें ‘सबैया’ (दासी) बनाकर महीनों तक उनके साथ दुष्कर्म किया गया।
छोटे-छोटे यजीदी लड़कों को उनके माओं से छीनकर आतंकी ट्रेनिंग कैंपों में डाल दिया गया, ताकि उनका ब्रेनवाश करके उन्हें सुसाइड बॉम्बर (Suicide Bomber) बनाया जा सके।
सिंजार के उस नरसंहार में हज़ारों यजीदी मारे गए और करीब 5 लाख लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सिंजार के सूखे और तपते पहाड़ों पर बिना पानी के तड़प-तड़प कर मरने के लिए भागना पड़ा।
लेकिन इन सबके बावजूद, इस कौम की हिम्मत तो देखिए!
आईएसआईएस के खूंखार आतंकियों के चंगुल से जो भी यजीदी महिला या बच्ची अपनी जान बचाकर भागी, उसने दुनिया के सामने आकर सीना तानकर कहा- “उन्होंने मेरे शरीर को नोंचा, मेरे बाप-भाई को मार डाला, लेकिन वो मेरे धर्म को नहीं तोड़ पाए। मैं यजीदी पैदा हुई थी और यजीदी ही मरूँगी!”
यही वो चट्टान जैसी सनातनी आस्था है, जिसे आज तक कोई जिहादी तलवार काट नहीं पाई।
सूर्य पूजा, आरती, और तिलक, इराक के ‘लालिश मंदिर’ में आज भी चलती है शुद्ध सनातनी परंपरा
जब आप यजीदियों के रीति-रिवाज़ और उनकी मान्यताओं को गहराई से खंगालेंगे, तो सच मानिए, आप दंग रह जायेंगे।
आपको अहसास होगा की ये लोग कोई ‘विदेशी’ या अलग धर्म वाले नहीं हैं, बल्कि ये तो हमारे ही सनातन धर्म की वो प्राचीन और पवित्र शाखा हैं जो हज़ारों साल पहले मिडिल ईस्ट के रेगिस्तानों में कहीं बिछड़ गई थी।
इस्लामिक मुल्कों के बीचों-बीच रहते हुए भी इन्होंने अपने अंदर के ‘हिन्दू’ को कैसे ज़िंदा रखा है, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।
सबसे पहले बात करते हैं इनके आराध्य देव की। यजीदी लोग सबसे ज़्यादा ‘ताउस मेलेक’ की पूजा करते हैं, जिसे अंग्रेज़ी में ‘पीकॉक एंजेल’ (Peacock Angel) यानी ‘मोर वाले देवता’ कहा जाता है।
अब ज़रा अपना सनातनी दिमाग दौड़ाइए भाई! हमारे सनातन धर्म में मोर किस देवता का वाहन है? जी हां, भगवान शिव और माता पार्वती के शूरवीर पुत्र भगवान ‘कार्तिकेय’ का वाहन मोर ही तो है!
यजीदियों के ‘ताउस मेलेक’ असल में हमारे भगवान कार्तिकेय ही हैं। इसी वजह से यजीदी मोर को बहुत पवित्र मानते हैं।
अगर आपको अभी भी शक है, तो इराक के उत्तरी हिस्से में मौजूद यजीदियों के सबसे पवित्र ‘लालिश मंदिर’ (Lalish Temple) की वास्तुकला देख लीजिए।
जब आप इस मंदिर के मुख्य दरवाज़े पर जाएंगे, तो वहां आपको एक बड़े से काले सांप (Black Snake) की आकृति उकेरी हुई मिलेगी। सांप का शिव और कार्तिकेय से क्या नाता है, ये किसी सनातनी को बताने की ज़रूरत नहीं है।
लेकिन जो बात आपका दिमाग हिला देगी, वो मंदिर के अंदर की एक प्राचीन पेंटिंग है। इसी लालिश मंदिर की दीवारों पर एक ऐसी पेंटिंग बनी है जिसमें एक महिला बिल्कुल भारतीय अंदाज़ में ‘साड़ी’ पहने खड़ी है और उसके हाथों में आरती की थाली है!
क्या इराक या सीरिया के कल्चर में साड़ी का कोई काम है? बिल्कुल नहीं! यह सीधा सबूत है की इनकी जड़ें सीधा प्राचीन अखंड भारत से जुड़ी हुई हैं।
इतना ही नहीं, इनके बाकी सारे संस्कार शुद्ध हिन्दुओं वाले हैं। जैसे इब्राहीमी धर्म (इस्लाम/ईसाई) पुनर्जन्म को नहीं मानते, लेकिन यजीदी बिल्कुल हिन्दुओं की तरह ‘पुनर्जन्म’ के सिद्धांत में पक्का विश्वास रखते हैं।
इनका मानना है की आत्मा कभी मरती नहीं है। ये लोग आज भी अग्नि को बेहद पवित्र मानते हैं और बाकायदा हवन-पूजन करते हैं।
किसी भी शुभ काम से पहले ये लोग बिल्कुल हमारी ही तरह माथे पर ‘तिलक’ लगाते हैं और दिन में तीन बार सूर्य देव (Sun God) की तरफ मुंह करके प्रार्थना करते हैं।
अब आप ही बताइए, क्या इराक की ज़मीन पर चलती ये परंपराएं आपको अपनी नहीं लगतीं?
“हम भगवान शिव के अंश हैं और भारत हमारा असली घर है”, तमिलनाडु के मुरुगन मंदिर में फूट-फूट कर रो पड़े थे यजीदी नेता मिर्ज़ा इस्माइल
जब यजीदी समुदाय को यह अहसास हुआ की पूरी दुनिया के मानवाधिकार ठेकेदारों ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया है, तब उनकी नज़रों ने अपने असली ‘घर’ की तरफ देखा- और वो घर है हमारा भारत!
इस वैश्विक आंदोलन और ‘कार्तिकस्तान’ की मांग को पूरी दुनिया के सामने उठाने का बीड़ा उठाया है ‘येजीदी ह्यूमन राइट्स आर्गेनाइजेशन’ के निडर चेयरमैन मिर्ज़ा इस्माइल (Mirza Ismail) ने।
मिर्ज़ा इस्माइल वो शख्स हैं जिन्होंने अमेरिका से लेकर यूनाइटेड नेशन्स (UN) तक, हर दरवाज़े पर जाकर यजीदियों का दर्द दुनिया के सामने रखा है।
लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा और भावुक मोड़ तब आया जब वो कुछ साल पहले भारत की ज़मीन पर आए।
मिर्ज़ा इस्माइल और उनका डेलिगेशन जब भारत यात्रा पर था, तब वे दक्षिण भारत (तमिलनाडु) के एक प्राचीन ‘मुरुगन मंदिर’ (भगवान कार्तिकेय का मंदिर) में दर्शन के लिए पहुंचे।
मंदिर के अंदर का नज़ारा देखकर मिर्ज़ा इस्माइल और उनके साथी सन्न रह गए। जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, वहां शंख बजने लगा, मंत्रों का उच्चारण शुरू हुआ, पुजारियों ने अग्नि प्रज्वलित करके भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की भव्य आरती शुरू की…
और भगवान का वो विशाल मोर वाला स्वरूप सामने आया। यह सब देखकर मिर्ज़ा इस्माइल अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए और वहीं मंदिर के प्रांगण में फूट-फूट कर रो पड़े।
उन्हें अहसास हो गया की हज़ारों किलोमीटर दूर इराक की सूखी ज़मीन पर वे जिस ‘ताउस मेलेक’ के लिए 74 बार कट चुके हैं, वो आराध्य तो यहां भारत में पूरे शाही अंदाज़ में विराजमान हैं!
उस दिन मुरुगन भगवान के चरणों में माथा टेकने के बाद, मिर्ज़ा इस्माइल ने दुनिया के सामने डंके की चोट पर एक ऐतिहासिक ऐलान किया।
उन्होंने साफ-साफ कहा- “अब हमें कोई शक नहीं है। हम भगवान शिव और कार्तिकेय के ही वंशज हैं। हमारा मूल इराक या सीरिया नहीं है, भारत ही हमारा असली घर है और हम सनातन की ही संतान हैं!”
ये एक ऐसी कौम की अपनी खोई हुई ‘मां’ से पुकार थी, जो सदियों से अनाथों की तरह जिहादियों की तलवारें झेल रही थी।
मिर्ज़ा इस्माइल ने भारत के कई आध्यात्मिक गुरुओं (जैसे श्री श्री रविशंकर) से भी मुलाकात की और साफ शब्दों में कहा की यजीदी लोग भारत को अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी मानते हैं।
उनका यह भारत दौरा ही वो चिंगारी था, जिसने अब एक पूरी आग का रूप ले लिया है।
अब यजीदी समझ चुके हैं की अगर उन्हें अपनी यह हज़ारों साल पुरानी सनातनी विरासत बचानी है, तो उन्हें जिहादियों के इस समुद्र के बीच भगवान कार्तिकेय के नाम पर अपना एक अलग देश ठोक कर लेना ही होगा।
जिहादी मुल्कों के बीचों बीच बनेगा नया हिन्दू राष्ट्र ‘कार्तिकस्तान’, दुनिया भर से समर्थन मांग रहे इन शेरों का मास्टरप्लान
अब जब यजीदियों को अपनी असली जड़ों का पता चल चुका है, तो इन्होंने तय कर लिया है की अब और पीछे नहीं हटना।
74 नरसंहारों का दर्द सीने में दबाए इस कौम ने अब इंटरनेशनल जियोपॉलिटिक्स के मंच पर अपना तुरुप का इक्का चल दिया है।
इनका साफ मानना है की जब तक इराक, सीरिया या तुर्की जैसे इस्लामिक मुल्कों का इन पर राज रहेगा, तब तक ये कभी सुरक्षित नहीं रह सकते।
आज ISIS है, कल कोई और आ जाएगा और इन्हें फिर से काफिर बताकर काटना शुरू कर देगा।
इसलिए मिर्ज़ा इस्माइल और यजीदी लीडरशिप ने संयुक्त राष्ट्र (UN) से लेकर दुनिया के हर बड़े मंच पर अपनी आज़ादी का मास्टरप्लान रख दिया है।
इनका मास्टरप्लान बहुत सीधा और सटीक है- उत्तरी इराक के ‘सिंजार’ (Sinjar) पहाड़ों और ‘निनवे’ (Nineveh) प्रांत के उन इलाकों को मिलाकर एक स्वतंत्र और स्वायत्त (Autonomous) देश बनाया जाए, जहां यजीदियों की ऐतिहासिक ज़मीनें हैं।
और इस नए देश का नाम इन्होंने रखा है- ‘कार्तिकस्तान’ (Karthikistan).
यजीदी ये बात बहुत अच्छी तरह जानते हैं की सिर्फ अमेरिका या UN के भरोसे ये देश नहीं बन सकता। इसलिए उन्होंने सीधे तौर पर भारत सरकार और 140 करोड़ हिंदुस्तानियों से मदद की गुहार लगाई है।
इनका गणित एकदम क्लीयर है। अगर भारत जैसा महाबली देश आधिकारिक रूप से यजीदियों के इस ‘कार्तिकस्तान’ को अपना कूटनीतिक (Diplomatic) समर्थन दे दे, तो कार्तिकस्तान बनने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।
हमें खुलकर ‘कार्तिकस्तान’ की मांग का समर्थन करना चाहिए।
जब इस दुनिया में 50 से ज़्यादा इस्लामिक मुल्क हो सकते हैं, ईसाइयों के दर्जनों देश हो सकते हैं, तो भगवान कार्तिकेय के इन वंशजों के लिए एक सनातनी देश क्यों नहीं हो सकता?
बिल्कुल हो सकता है और होकर रहेगा!
