हमें हमेशा बस एक ही तरह की घुट्टी पिलाई जाती है- “बेटा, दिन-रात एक करके पढ़ाई कर, खून-पसीना बहा, तब जाकर कहीं डॉक्टर बनेगा।”
हमारे देश का युवा इसी आस में अपनी जवानी के साल किताबों में सिर खपाकर निकाल देता है। 15-15 घंटे की पढ़ाई, नींद की गोलियां और डिप्रेशन… ये सब झेलकर एक आम लड़का या लड़की डॉक्टर बनने का सपना देखता है।
लेकिन आज के इस सिस्टम ने उस टैलेंट पर ऐसा वार किया है की वो देश का युवा आज सोचता है की इतनी सालों की मेहनत करके उसे आखिर मिल क्या रहा है?
आज का सिस्टम कह रहा है की भाई, तुझे पढ़ाई-वढ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है! एग्जाम हॉल में जा, आराम से सो जा, या फिर सारे सवालों के गलत जवाब टिक करके आ जा।
अगर तू एक खास कोटे से आता है, तो माइनस 40 नंबर लाने के बाद भी सरकार तुझे मेडिकल कॉलेज की सीट बाइज्ज़त थाली में सजाकर दे देगी।
आरक्षण के नाम पर एक खास वर्ग और कुछ जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी मलाई डकार रही हैं, और जिस बेचारे गरीब और असली पिछड़ी OBC जातियों को इस आरक्षण की ज़रूरत थी, वो आज भी सड़क पर धक्के खा रहा है।
देश के टैलेंट का सरेआम खात्मा और माइनस 40 नंबर लाने वालों के हाथ में मरीजों की जान
नीट-पीजी (NEET-PG) मेडिकल की दुनिया का वो एग्जाम है जिसे पास करने के बाद एक डॉक्टर स्पेशलिस्ट बनता है।
मतलब वो सर्जन बनता है, हार्ट का डॉक्टर बनता है, या दिमाग का इलाज करने वाला न्यूरोलॉजिस्ट बनता है। अब ज़रा हाल ही में हुए नीट-पीजी के उस तमाशे को देखिए जिसने पूरे एजुकेशन सिस्टम की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं।
प्रशासन ने मेडिकल की बची हुई सीटें भरने के नाम पर कट-ऑफ को इतना नीचे गिरा दिया की ‘जीरो परसेंटाइल’ (Zero Percentile) वालों को भी काउंसलिंग में बैठने का न्योता दे दिया गया।
अब इस जीरो परसेंटाइल का असली मतलब समझिए। इसका मतलब ये नहीं है की बच्चे को जीरो नंबर मिले हैं।
जीरो परसेंटाइल का सीधा सा मतलब ये हुआ की अगर कोई रिज़र्व केटेगरी का बच्चा परीक्षा में जाकर सो गया है, या उसने सारे के सारे सवालों के गलत जवाब टिक कर दिए हैं और उसका स्कोर माइनस 40 (-40) आया है, तो भी वो भाई साहब पास हैं!
और सरकार ने ये महापाप किया क्यों? बस इसलिए क्योंकि देश के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की करोड़ों की सीटें खाली पड़ी थीं।
प्राइवेट कॉलेजों के मालिकों को तो बस अपनी करोड़ों की फीस चाहिए थी, उन्हें टैलेंट से क्या लेना-देना!
तो सिस्टम ने जुगाड़ भिड़ाया और कटऑफ ही जीरो कर दिया, ताकि जो मठाधीश और अमीर SC/ST परिवारों के बच्चे हैं जिनके पास अथाह पैसा है, वो माइनस नंबर लाकर भी एडमिशन ले लें।
पीढ़ी दर पीढ़ी मलाई काट रहे हैं SC/ST और 75 साल बाद भी दर दर की ठोकरें खा रहा असली गरीब OBC
अब ज़रा बात कर लेते हैं इस तथाकथित ‘सामाजिक न्याय’ के ठेकेदारों की। जब भी आरक्षण पर सवाल उठता है, तो एक रटा-रटाया डायलॉग चिपका दिया जाता है की “सदियों से अत्याचार हुआ है, इसलिए आरक्षण तो मिलेगा।”
अरे भाई, अत्याचार हुआ था तो उसका फायदा किसे मिलना चाहिए? जो आज गरीब है, जो आज गांव में मज़दूरी कर रहा है, उसे ना! लेकिन हकीकत क्या है?
हकीकत ये है की SC/ST वर्ग के कुछ खास परिवार इस पूरे आरक्षण को अपनी बपौती समझ बैठे हैं।
जिनके बाप-दादा आज से 30 साल पहले आरक्षण लेकर IAS बन गए, IPS बन गए, बड़े डॉक्टर या मंत्री बन गए, वो आज भी बेशर्मी से अपने बच्चों को उसी कोटे से डॉक्टर और इंजीनियर बनवा रहे हैं।
जो दलित नेता आज ऑडी (Audi) और बीएमडब्ल्यू (BMW) गाड़ियों में घूम रहे हैं, जिनके पास करोड़ों की कोठियां हैं, उनके बच्चे भी माइनस 40 नंबर लाकर सीट डकार रहे हैं।
क्या इन्हें सच में आरक्षण की ज़रूरत है? SC/ST में आज तक क्रीमी लेयर (Creamy Layer) क्यों नहीं लागू किया गया?
और इस पूरे गंदे खेल में सबसे बड़ा धोखा किसके साथ हुआ है? देश की 50-55% आबादी वाले हमारे OBC के साथ!
भाईसाहब, गांव-देहात में जो असली पिछड़ा है- जो कुम्हार है, लुहार है, बढ़ई है, नाई है, जिसकी दिन की कमाई 200 रुपये भी नहीं है… उसे इस सिस्टम ने क्या दिया? ठेंगा!
SC/ST को तो नौकरियों में, प्रमोशन में, हर जगह फुल छूट मिल रही है, लेकिन हमारा वो गरीब OBC आज भी उसी भट्ठी में जल रहा है।
इन अमीर SC/ST परिवारों और कुछ दबंग जातियों ने इस कदर सिस्टम पर कब्ज़ा कर लिया है की गरीब पिछड़ा बच्चा आज कर्ज़े में डूब कर आत्महत्या करने को मजबूर है, लेकिन उसकी सीट ये मलाईखोर ले उड़ते हैं।
जब कोई गरीब पिछड़ा बच्चा अपने हक की बात करता है, तो ये मलाई खाने वाले उसे ‘दलित विरोधी’ बताकर चुप करा देते हैं।
लेकिन अब ये पाखंड और नहीं चलेगा। 75 साल बहुत होते हैं यार किसी भी मलाई को चाटने के लिए! जब एक गरीब पिछड़े की कोई आवाज़ नहीं सुन रहा, तो अब वक्त आ गया है की इस पूरे सिस्टम का ही ऑपरेशन किया जाए।
रोहिणी कमीशन की आरक्षण पर वो रिपोर्ट जिसे कुर्सी के लालची नेता हमेशा दबाना चाहते हैं
ज़रा इतिहास के पन्ने पलट कर देखिए। जब सालों पहले इस देश में आरक्षण की नींव रखी गई थी, तो बड़ी-बड़ी बातें कही गई थीं।
नेताओं ने माइक पर गला फाड़-फाड़ कर कहा था की जो समाज में सबसे पीछे छूट गए हैं, जो शोषित हैं, जिनके पास कोई साधन नहीं है… उन्हें आगे लाने के लिए ये कोटा सिस्टम बनाया जा रहा है।
बात तो बहुत अच्छी थी! सुनने में एकदम ऐसा लगता था जैसे अब इस देश से गरीबी और पिछड़ापन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
लेकिन आज, दशकों बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो सच्चाई इतनी खौफनाक और गंदी है की शर्म आ जाए।
आज ये आरक्षण किसी गरीब का सहारा नहीं है भाई, ये सिर्फ और सिर्फ नेताओं की कुर्सी बचाने और वोट बैंक को पक्का करने का एक शातिर हथियार बन चुका है।
अगर आपको लग रहा है की मैं हवा में बातें कर रहा हूँ, तो चलिए आज उस बम को फोड़ते हैं जिसे इस देश की सारी राजनीतिक पार्टियां ठंडे बस्ते में दबा कर रखना चाहती हैं।
गूगल करके देख लीजिए… साल 2017 में सरकार ने एक कमीशन बनाया था- ‘जस्टिस जी. रोहिणी कमीशन’ (G. Rohini Commission)।
इस कमीशन को एक बहुत ही सीधा सा काम दिया गया था। इसे पता लगाना था की केंद्र सरकार की नौकरियों और सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ के एडमिशन में जो 27% OBC आरक्षण (Quota) दिया जा रहा है, उसका फायदा आखिर मिल किसे रहा है?
क्या वाक़ई हर पिछड़ी जाति तक इसका फायदा पहुँच रहा है या दाल में कुछ काला है?
कमीशन ने 5-6 साल तक दिन-रात एक करके पूरा डेटा खंगाला। लाखों नौकरियों और एडमिशन का रिकॉर्ड चेक किया।
और जब उन्होंने अपनी रिपोर्ट बनाकर तैयार की, तो भाई साहब… देश के सारे नेताओं के पैरों तले ज़मीन खिसक गई!
इस रिपोर्ट में वो सच छुपा था जो अगर पब्लिक के सामने आ जाता, तो ये जो नेता ‘पिछड़ों के मसीहा’ बनकर घूमते हैं ना, जनता उनके कपड़े फाड़ देती।
यही वजह है की इस रिपोर्ट पर ऐसी कुंडली मार कर बैठा गया की आज तक इस पर कोई खुलकर बात ही नहीं करना चाहता।
आरक्षण के नाम पर सिर्फ चंद जातियों ने काटी मलाई और 37 प्रतिशत OBC जातियों को आज तक मिली है ZERO नौकरी
अब ज़रा दिल थाम कर वो आंकड़े सुनिए जो रोहिणी कमीशन ने अपनी रिसर्च में निकाले हैं। ये डेटा सुनकर आपका उस सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा जो दिन-रात ‘समानता’ का ढोंग रचता है।
हमारे देश की सेंट्रल लिस्ट (Central List) में OBC कैटेगरी के अंदर लगभग 2600 जातियां आती हैं।
कायदे से अगर आरक्षण का सिस्टम सही होता, तो इन 2600 जातियों को बराबर-बराबर फायदा मिलना चाहिए था।
लेकिन रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट चीख-चीख कर बताती है की इन 2600 जातियों में से 983 जातियां (यानी कुल OBC का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा) ऐसी हैं, जिन्हें आज तक… जी हां, ध्यान से सुनिए… आज तक सेंट्रल गवर्नमेंट की नौकरियों या एडमिशन में 0% (जीरो प्रतिशत) हिस्सेदारी मिली है!
मतलब ज़ीरो! इन 983 जातियों के एक भी बच्चे को ना तो कोई ढंग की सरकारी नौकरी मिली और ना ही किसी बड़े कॉलेज में एडमिशन नसीब हुआ।
इनके लिए आरक्षण का मतलब एक ऐसा सूखा कुआं है जिसमें झांकने पर सिर्फ अंधेरा दिखता है।
और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। रिपोर्ट ये भी बताती है की इसके अलावा जो 994 जातियां हैं, उन्हें भी कुल मिलाकर सिर्फ 2.68% फायदा मिला है।
मतलब अगर आप इन दोनों को मिला दें, तो OBC की लगभग 70 से 75 प्रतिशत जातियां ऐसी हैं जो आज भी उसी हालात में पड़ी हैं जहां वो दशकों पहले थीं। उनके नसीब में सिर्फ धक्के खाना लिखा है।
तो फिर सवाल ये उठता है कि भाई ये सारा का सारा कोटा, ये नौकरियां, ये मेडिकल और इंजीनियरिंग की सीटें आखिर जा कहां रही हैं? कौन डकार रहा है ये मलाई?
इसका जवाब भी उसी रिपोर्ट में है। OBC कोटे की 97% नौकरियों और सीटों पर महज़ 25% रसूखदार और ताकतवर जातियों ने कब्ज़ा जमाया हुआ है!
जी हां, सिर्फ 25 प्रतिशत दबंग और राजनीतिक रूप से मजबूत जातियों ने पूरी की पूरी थाली अपनी तरफ खींच ली है।
ज़रा सोचिए यार, ये कैसा भद्दा मज़ाक है! एक तरफ वो असली पिछड़ा युवा है जो गांव की धूल फांक रहा है, जिसके घर में आज भी ढंग से दो वक्त की रोटी नहीं बनती, जिसके पास ना तो पढ़ने के लिए अच्छी किताबें हैं और ना ही शहर जाकर कोचिंग करने का पैसा।
उस असली पिछड़े को तो सिस्टम ने लात मार कर बाहर कर दिया है।
और दूसरी तरफ वो रसूखदार लोग हैं, जिनके बाप-दादा बड़े अफसर बन चुके हैं, जो फॉर्च्यूनर (Fortuner) में घूमते हैं.. और जब एग्जाम का फॉर्म भरने की बारी आती है, तो वही रसूखदार लोग ‘पिछड़ा’ होने का सर्टिफिकेट लगाकर माइनस 40 कट-ऑफ वाली सीट भी अपनी जेब में डाल लेते हैं।
मतलब पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार इस कोटे का मज़ा लूट रहा है! दादा भी कोटे से अफसर बने, फिर बेटा भी कोटे से डॉक्टर बना और अब पोता भी माइनस नंबर लाकर कोटे से पीजी (PG) की सीट हथिया रहा है।
और वो बेचारा 37% असली OBC, जिसके नाम पर ये सारा आरक्षण का नाटक रचा गया था, वो आज भी नेताओं की रैलियों में सिर्फ झंडा उठाने और दरी बिछाने के काम आ रहा है।
क्या यही वो सामाजिक न्याय है जिसका सपना दिखाया गया था? क्या इसी के लिए देश के टैलेंट का सरेआम खात्मा किया जा रहा है?
जब एक OBC युवा खुद इस सिस्टम की हकीकत देखता है, तो उसे समझ में आ जाता है कि उसके नाम पर सिर्फ वोट मांगे जा रहे हैं, जबकि असल मलाई वो लोग खा रहे हैं जिन्हें अब किसी सहारे की कोई ज़रूरत ही नहीं है।
अब भीख नहीं बराबरी चाहिए, रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन की धधकती आग
अब देश के उस असली टैलेंट और गरीब पिछड़े (OBC) युवा का धैर्य जवाब दे गया है, जो बरसों से घुट-घुट कर जी रहा था।
आज के युवा को ये बात समझ आ गई है की आरक्षण किसी का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है। ये एक बैसाखी थी जिसे कुछ सालों के लिए दिया गया था, लेकिन कुछ मलाईखोर जातियों ने इसे अपनी जागीर समझ लिया।
इसी उबलते हुए गुस्से और फ्रस्ट्रेशन का नतीजा है ‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’ (Reservation Hatao Andolan). ये उस गरीब बच्चे का आंदोलन है जिसका हक एक अमीर SC/ST नेता का बेटा खा गया।
ये उस मेहनत करने वाले OBC का आंदोलन है जिसे रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट ने बता दिया की तुम्हारी थाली में तो 75 साल से ज़ीरो (0) परोसा जा रहा था।
अगर सरकार को सच में किसी की मदद करनी है, तो आरक्षण सिर्फ और सिर्फ आर्थिक आधार (गरीबी) पर दो। जो गरीब है, जिसके पास पढ़ने के पैसे नहीं हैं, सरकार उसकी फीस भरे, उसे मुफ्त किताबें दे, मुफ्त कोचिंग दे।
जब परीक्षा का रिज़ल्ट आए, तो वहां सिर्फ और सिर्फ ‘मेरिट’ (Merit) यानी टैलेंट बोलना चाहिए।
आप कब तक वोट बैंक के लालच में देश के टैलेंट का कत्ल करते रहेंगे? कब तक गरीब पिछड़ों को मूर्ख बनाकर कुछ गिनी-चुनी जातियों को मलाई खिलाते रहेंगे?
