इस देश में अगर किसी के साथ सबसे बड़ा और सबसे भद्दा धोखा हुआ है, तो वो है इस देश का OBC वर्ग।
आप सड़कों पर निकल जाइए या किसी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे छात्र के कमरे में झांक लीजिए, आपको OBC युवाओं की आंखों में एक अजीब सी बेबसी और गुस्सा दिखाई देगा।
और ये गुस्सा बेवजह नहीं है भाई! जब दिन-रात एक करके, खून-पसीना बहाकर पढ़ाई करने के बाद भी आपको पता चले की आपके हक़ की थाली में कोई और मज़े से हाथ साफ़ कर रहा है, तो दिमाग तो खराब होगा ही ना!
नेता लोग चुनाव आते ही खुद को ‘पिछड़ों का मसीहा’ बताने लगते हैं, बड़ी-बड़ी रैलियां करते हैं, लेकिन हकीकत ये है की आज़ादी के इतने सालों बाद भी असली पिछड़े वर्ग को आरक्षण के नाम पर सिर्फ एक खाली कटोरा थमाया गया है।
एक तरफ जहां SC/ST का कोटा एकदम सुरक्षित हैं, वहीं OBC कैटेगरी को सिस्टम ने एक ऐसा ‘कचरा डिब्बा’ या ‘मुफ्त की धर्मशाला’ बनाकर छोड़ दिया है, जिसमें जब मन करे नयी-नयी जातियां घुसा दी जाती हैं।
आइए, आज इस पूरी राजनीति और सिस्टम के उस काले सच के छिलके उतारते हैं।
SC/ST वर्ग में जातियों की संख्या वैसी की वैसी, लेकिन OBC को बना दिया 2600 से ज्यादा जातियों से भरा ट्रेन का डब्बा
अगर आपको समझना है की देश के असली पिछड़ा वर्ग के साथ कितना गंदा खेल खेला गया है, तो आपको OBC कोटे की तुलना SC (अनुसूचित जाति) और ST (अनुसूचित जनजाति) कोटे से करनी होगी।
आप डेटा उठाकर देख लीजिए, आज पूरे देश में SC कैटेगरी के अंदर लगभग 1,200 जातियां हैं (जिनका 15% कोटा फिक्स है) और ST कैटेगरी में लगभग 700 जातियां हैं (जिनका 7.5% कोटा है)।
अब सबसे बड़ा खेल समझिए। SC और ST की जो ये लिस्ट है ना, वो एकदम एक अभेद्य किले की तरह सुरक्षित है। वहां किसी भी नई जाति की एंट्री होना लगभग नामुमकिन के बराबर है।
संविधान के पन्ने पलट कर देखिए भाई, अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST लिस्ट में कोई नई जाति तभी जोड़ी जा सकती है जब संसद में बाकायदा बिल पास हो और उस पर राष्ट्रपति की मुहर लगे।
ये प्रक्रिया इतनी लंबी और कठिन है की इसे पार करना लोहे के चने चबाने जैसा है। उनकी थाली, उनका वीआईपी कमरा एकदम सेफ है। वहां कोई नई दबंग जाति आकर उनका हक़ नहीं मार सकती।
लेकिन दूसरी तरफ OBC का क्या हाल है? संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत राज्य सरकारों और ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ (NCBC) को ये अधिकार दे दिया गया की वो अपने हिसाब से जातियों को OBC लिस्ट में जोड़ सकते हैं।
OBC कोटा आज क्या बन गया है? ये मुंबई की लोकल ट्रेन का वो खचाखच भरा ‘जनरल डिब्बा’ बन गया है, जिसमें पैर रखने की जगह नहीं है, लेकिन स्टेशन पर खड़ा हर नया आदमी उसी डिब्बे में घुसने के लिए धक्का-मुक्की कर रहा है।
नेताओं ने OBC कोटे को एक ‘मुफ्त की सराय’ बनाकर रख दिया।
1990 में जब मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण लागू हुआ था, तब OBC की लिस्ट में लगभग 1,250 जातियां शामिल थीं।
लेकिन आज की तारीख (2026) में जानते हैं ये आंकड़ा कहां पहुँच गया है? आज केंद्र सरकार की OBC सूची में जातियों का आंकड़ा 2,633 को पार कर चुका है!
और अगर इसमें राज्य सरकारों की सूचियों को भी मिला लें, तो भाईसाहब ये आंकड़ा 3000 से भी ऊपर निकल जाता है।
27 फीसदी आरक्षण के नाम पर देश के करोड़ों असली पिछड़ा OBC वर्ग युवाओं को कैसे थमा दिया गया झुनझुना
OBC में नई जातियां कैसे जुड़ती हैं? इसके लिए कोई बहुत बड़ा सर्वे नहीं होता। होता बस ये है की चुनाव से छह महीने पहले कोई दबंग, ज़मींदार या ताकतवर जाति सड़कों पर उतरती है।
वो ट्रेनें फूंकते हैं, हाइवे जाम करते हैं, और सरकार को वोट न देने की धमकी देते हैं।
फिर क्या? वोट खिसकने के डर से कांपती हुई सरकारें रातों-रात कैबिनेट मीटिंग बुलाती हैं और उस ताकतवर जाति को उठाकर 27% वाले OBC डिब्बे में ठूंस देती हैं।
अरे भाई, जब वो जाति पहले से ही ज़मीन, जायदाद और पैसे से मज़बूत है, तो वो ‘पिछड़ी’ कैसे हो गई? लेकिन नेताओं को इससे क्या मतलब?
उन्हें तो बस चुनाव जीतना है। और इस पूरी सौदेबाज़ी में मरता कौन है? मरता है वो असली अति-पिछड़ा युवा, जिसके पास ना तो ट्रेनें फूंकने की ताकत है और ना ही हाइवे जाम करने की।
वो बस अपनी टूटी खाट पर बैठकर रोहिणी आयोग की रिपोर्ट देखता है और अपनी किस्मत को कोसता है।
ज़रा 1990 के उस दौर को याद कीजिए जब वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन लागू किया था। उस समय देश के करोड़ों गरीब, दबे-कुचले और सदियों से हाशिए पर पड़े OBC वर्ग के लोगों ने सोचा था की अब उनके भी दिन बदलेंगे।
उन्हें लगा था की 27 फीसदी आरक्षण उनके बच्चों को भी सरकारी दफ्तरों, क्लर्क की कुर्सी और अफ़सरी तक ले जाएगा। लेकिन आज, तीन दशक बाद 27 प्रतिशत का यह कोटा किसी हक़ से ज़्यादा एक क्रूर मज़ाक बन चुका है।
कोटा वही 27 प्रतिशत है, लेकिन उसे खाने वालों की भीड़ दोगुनी से भी ज़्यादा हो चुकी है। हर दिन, हर महीने, हर चुनाव से पहले इस 27 फीसदी के छोटे से डिब्बे में नई जातियों को ठूंसा जा रहा है।
ये न्याय नहीं है, ये देश के असली और अति-पिछड़े युवाओं की सरेआम हकमारी है, जिसे ‘वोटबैंक’ की चाशनी में लपेट कर बेचा जा रहा है।
983 OBC जातियों को आज तक नहीं मिली चपरासी की भी नौकरी, असली पिछड़े वर्ग के हक़ से खुलेआम सेंधमारी
ज़रा ‘जस्टिस जी. रोहिणी आयोग’ (Justice G. Rohini Commission) की उस सनसनीखेज रिपोर्ट पर नज़र डालिए, जिसे हमारी सरकारें जानबूझकर फाइलों के नीचे दबाकर बैठी हैं।
अक्टूबर 2017 में केंद्र सरकार ने OBC के अंदर आरक्षण के बंटवारे की जांच के लिए इस आयोग का गठन किया था।
इस आयोग ने पिछले कुछ सालों में हुई 1 लाख 30 हज़ार (1.3 Lakh) से ज़्यादा केंद्रीय नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में एडमिशंस का पूरा डेटा खंगाला। जब रिपोर्ट सामने आई, तो उसने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी।
रिपोर्ट का डेटा बता रहा है की OBC कोटे में शामिल 2600 जातियों में से 983 जातियां (यानी लगभग 37% जातियां) ऐसी हैं, जिन्हें आज तक… जी हाँ, आज तक… केंद्र सरकार की नौकरियों में 0% हिस्सा मिला है!
मतलब इन 983 जातियों के एक भी युवा को आज तक सिस्टम में कोई चपरासी की नौकरी भी नहीं मिली। एडमिशंस में इनका हिस्सा ज़ीरो है!
तो फिर ये 27% की मलाई खा कौन रहा है? आयोग की रिपोर्ट ने इस काले सच का भी पर्दाफाश कर दिया। रिपोर्ट कहती है की OBC कोटे का 97% फायदा सिर्फ 25% दबंग और ताकतवर जातियों ने लूट लिया है।
और हद तो तब हो जाती है जब पता चलता है की कुल नौकरियों का 25% हिस्सा तो केवल टॉप की 10 जातियों की जेब में चला गया है।
मतलब जो गांव-देहात का गरीब नाई है, जो मिट्टी के बर्तन बनाने वाला कुम्हार है, जो लोहे को पीटकर अपना पेट पालने वाला लोहार है, जो बढ़ई है, जो निषाद और मल्लाह है…
ऐसे असली अति-पिछड़े समाज की 994 उप-जातियों को कुल मिलाकर मात्र 2.68% नौकरियां नसीब हुई हैं! इन बेचारी जातियों को तो पता भी नहीं है की रिज़र्वेशन किस चिड़िया का नाम है।
सरकार और सिस्टम ने इन्हें सिर्फ ‘OBC’ का झुनझुना थमाकर किनारे कर दिया है, ताकि इनके नाम पर राजनीति चमकती रहे और पीछे के दरवाज़े से मलाई कोई और काटता रहे।
ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं दोस्त, ये उन करोड़ों युवाओं के सपनों की कब्र हैं जो सालों से बंद कमरों में किताबें रट रहे हैं, लेकिन जब रिज़ल्ट आता है तो उन्हें पता चलता है की उनकी सीट तो वो ताकतवर लोग ले गए जिन्हें सिस्टम ने जबरन OBC की धर्मशाला में एंट्री दे दी थी।
बिना किसी शर्त के SC/ST ले रहे आरक्षण का पूरा मज़ा और OBC युवाओं की गर्दन पर घोंट दिया क्रीमी लेयर का फंदा
अगर आपको लगता है की सिर्फ 2600 जातियों की दमघोंटू भीड़ ही OBC का इकलौता दर्द है, तो ज़रा ठहरिए।
सिस्टम ने एक और ऐसा लीगल फंदा तैयार किया है जो सिर्फ और सिर्फ OBC युवाओं की गर्दन पर लटकता है, और इस फंदे का नाम है- ‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer)।
यह इस देश के आरक्षण सिस्टम का वो सबसे बड़ा पाखंड है जिस पर कोई भी तथाकथित ‘दलित-पिछड़ा चिंतक’ बात नहीं करना चाहता।
ज़रा SC और ST कोटे के नियमों को देखिए। वहां ‘क्रीमी लेयर’ जैसी कोई चिड़िया है ही नहीं!
अगर SC या ST वर्ग का कोई व्यक्ति पढ़-लिख कर IAS या IPS अफसर बन जाए, कोई बड़ा नेता या कैबिनेट मंत्री बन जाए, या फिर करोड़ों का बिज़नेस खड़ा करके महलों में रहने लगे…
तब भी उसके बच्चों को आरक्षण का पूरा-पूरा 100% फायदा मिलेगा। वो बच्चे मज़े से उसी कोटे में एडमिशन लेंगे और नौकरी भी पाएंगे।
वहां कोई ये नहीं पूछेगा की बाबूजी, आप तो करोड़पति हो गए, अब आपको आरक्षण की क्या ज़रूरत है?
लेकिन जैसे ही बात OBC की आती है, सिस्टम के सारे नियम, सारा ज्ञान और सारा न्याय जाग जाता है! सिस्टम कहता है की भाई, अगर कोई OBC परिवार साल का 8 लाख रुपये कमा लेता है, तो वो ‘क्रीमी लेयर’ में आ गया। अब उसके बच्चों को आरक्षण नहीं मिलेगा।
ज़रा दिमाग पर ज़ोर डालिए! आज 2026 के महंगाई वाले दौर में 8 लाख रुपये सालाना का मतलब क्या होता है?
आज के समय में एक मामूली दर्ज़ी, एक पंचर बनाने वाला, एक छोटा दुकानदार या कोई ग्रेड-सी का कर्मचारी भी दिन-रात खून-पसीना एक करके साल का 8-9 लाख रुपया जोड़ लेता है ताकि उसके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ सकें।
लेकिन सिस्टम उसे क्या सिला देता है? सिस्टम उसे OBC कोटे से लात मारकर बाहर निकाल देता है।
मतलब ये की अगर एक अति-पिछड़ा आदमी दिन-रात मेहनत करके अपनी गरीबी से बाहर निकलने की थोड़ी सी भी कोशिश करे, तो सिस्टम उसे तुरंत सज़ा दे देता है की “बेटा, तुमने 8 लाख से ज़्यादा कमा लिए, अब तुम्हारा रिज़र्वेशन खत्म!”
दूसरी तरफ, किसी मंत्री या IAS के बेटे को बिना किसी शर्त के आरक्षण की मलाई परोसी जा रही है।
क्रीमी लेयर का ये नियम OBC युवाओं को सामाजिक रूप से ऊपर उठने से रोकने की सबसे बड़ी साज़िश है।
ये सीधे तौर पर ये मैसेज दे रहा है की अगर तुम OBC हो, तो तुम्हें ज़िंदगी भर गरीब, अनपढ़ और भिखारी ही बनकर रहना पड़ेगा, तभी हम तुम्हें रिज़र्वेशन देंगे। थोड़ा सा भी पढ़-लिख कर मिडिल क्लास बने, तो तुम्हारा पत्ता साफ़!
और सिस्टम का दोगलापन यहीं खत्म नहीं होता। एक और बहुत बड़ा और खामोश घोटाला चल रहा है, जिसका नाम है NFS यानी ‘None Found Suitable’ (कोई योग्य नहीं पाया गया)।
रोहिणी आयोग और कई RTI में ये चौंकाने वाला सच सामने आया है की जब कोई असली OBC का बच्चा इंटरव्यू या फाइनल लिस्ट तक पहुँच भी जाता है, तो वहां बैठे दबंग मानसिकता वाले अधिकारी उसकी फाइल पर ‘NFS’ का ठप्पा मार देते हैं।
वो लिख देते हैं की “हमें इस पोस्ट के लिए कोई भी योग्य OBC कैंडिडेट नहीं मिला।” और फिर उस खाली बची सीट को चुपचाप बैकडोर से किसी चहीती जाती को दे दिया जाता है।
मतलब, अगर आप लड़कर वहां तक पहुँच भी गए, तो सिस्टम आपको किसी न किसी बहाने से लात मारकर बाहर निकाल ही देगा।
पिछड़े OBC वर्ग के युवाओं के हक़ की सरेआम हो रही लूट, और इनके मसीहा बने बैठे हैं मौन
अब सवाल ये उठता है की वो नेता कहां हैं जो चुनाव आते ही खुद को ‘पिछड़ों का मसीहा’ बताने लगते हैं? जो सामाजिक न्याय के नाम पर बड़ी-बड़ी रैलियां करते हैं?
आज जब OBC वर्ग में ठूस ठूस के नयी जातियां भरी जा रही और 983 जातियों को एक भी नौकरी नहीं मिली, तो इन तथाकथित मसीहाओं के मुंह में दही क्यों जम गया है?
सच्चाई ये है दोस्त, की ये नेता भी उसी SC/ST वोटबैंक के ठेकेदार हैं जो आरक्षण की असली मलाई चाट रहे हैं। अगर इन्होंने मुंह खोला, तो उनका वो वोटबैंक खिसक जाएगा।
वक्त आ गया है की देश का OBC वर्ग अपनी आंखों पर बंधी पट्टी को खोले। अगर आज तुम अपने हक़ के लिए नहीं लड़े, अगर आज तुमने अपने ही नेताओं से सवाल नहीं पूछे, तो लिखकर रख लो… आने वाले 10 सालों में इस 27% के डिब्बे में 2600 की जगह 5000 जातियां ठूंस दी जाएंगी।
तब तुम लोग आपस में ही 0.1% नौकरी के लिए लड़ोगे और दूसरी तरफ SC/ST वाले सारा आरक्षण डकार के तुम्हारे ऊपर हसेंगे।
