इस देश का सिस्टम इतना सड़ चुका है की कभी-कभी लगता है जैसे पूरी की पूरी मशीनरी सिर्फ एक खास वर्ग को कुचलने के लिए ही डिज़ाइन की गई हो।
अंदर तक झकझोर देने वाली बात ये है की जिस देश में संविधान एक है, संसद एक है, वहां आरक्षण के नाम पर दो-दो क्रूर कानून कैसे चल सकते हैं?
सरकार के पास OBC वर्ग पर क्रीमी लेयर थोपने और उनका हक़ मारने के लिए तो रॉकेट वाली स्पीड है, लेकिन जब बात आती है की भाई ज़रा SC और ST के मलाईखोरों पर भी तो क्रीमी लेयर लगाओ…
तो अचानक इस पूरे सिस्टम को लकवा मार जाता है। सत्ता की टांगें क्यों कांपने लगती हैं।
एक देश में आरक्षण के दो क्रूर कानून, जहां OBC का गला घोंटा जा रहा, और SC/ST के रसूखदारों को परोसी जा रही मलाई
कभी ठंडे दिमाग से इस सिस्टम का दोगलापन देखिएगा। ये कैसा नियम है भाई, जहां एक गरीब OBC किसान, एक स्कूल टीचर या बैंक में काम करने वाले क्लर्क का बेटा महज़ 8 लाख रुपये सालाना की लिमिट पार करते ही रातों-रात ‘अमीर’ घोषित हो जाता है?
सिस्टम कहता है की “तुम तो संपन्न हो गए, अब तुम्हें आरक्षण नहीं मिलेगा, जाओ पिछड़े वर्ग की लाइन से बाहर निकलो!”
लेकिन उसी देश में, ठीक उसी सिस्टम के अंदर… एक करोड़पति SC या ST का नेता, कोई बड़ा आईएएस (IAS) अफसर, या हज़ारों एकड़ ज़मीन का मालिक मठाधीश- उसका बच्चा विदेश में पढ़ता है, मर्सिडीज़ गाड़ियों में घूमता है, ब्रांडेड कपड़े पहनता है। पर जब वो भारत लौटकर किसी सरकारी नौकरी की परीक्षा का फॉर्म भरता है, तो सिस्टम उसे गले लगा लेता है।
वहां कोई नहीं पूछता की तुम्हारे पिताजी की सैलरी क्या है! वहां कोई 8 लाख का फंदा नहीं है। उसे बिना किसी शर्त के मज़े से आरक्षण की पूरी मलाई परोसी जाती है।
क्या बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण इसलिए बनाया था? आरक्षण तो उन कमज़ोरों, उन दबे-कुचलों के लिए था जिन्हें समाज में बराबरी का हक़ नहीं मिला।
लेकिन आज इस सिस्टम ने क्रीमी लेयर का चाबुक सिर्फ और सिर्फ OBC की पीठ लाल करने के लिए रख छोड़ा है। ये कोई सामाजिक न्याय नहीं है।
एक गरीब को तुम अमीर बताकर बाहर कर रहे हो और एक अरबपति को गरीब बताकर कुर्सी दे रहे हो। इस सौतेलेपन का हिसाब कौन देगा?
11 मार्च के ऐतिहासिक फैसले को कुचलने की साज़िश और 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने जा रहा OBC वर्ग के हक़ का क़त्ल
अगर आपको लग रहा है की सरकार की नीयत OBC को लेकर साफ है, तो ज़रा हाल ही में हुए इस सुप्रीम कोर्ट वाले खेल को समझ लीजिए। आपको सब शीशे की तरह साफ दिखने लगेगा।
इसी साल, 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने OBC युवाओं के पक्ष में एक बहुत ही ज़बरदस्त और ऐतिहासिक फैसला दिया था।
बरसों से एक गंदा नियम चल रहा था 2004 का, जिसके तहत अगर किसी OBC बच्चे के माता-पिता पब्लिक सेक्टर (PSU) या प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते हैं, तो उनकी ‘सैलरी’ (वेतन) को जोड़कर उन्हें 8 लाख वाली क्रीमी लेयर से बाहर कर दिया जाता था।
11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस घटिया नियम को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया की भाई, सिर्फ ‘सैलरी’ के आधार पर तुम इन बच्चों को क्रीमी लेयर बताकर आरक्षण से बाहर नहीं फेंक सकते।
जैसे ही ये फैसला OBC के हक़ में आया, मानों प्रसाशन के पेट में भयंकर मरोड़ उठने लगे। उन्हें लगा की अरे, ये OBC वाले तो नौकरियां ले जाएंगे!
कायदे से सरकार को ये फैसला तुरंत लागू करना चाहिए था। लेकिन सरकार ने क्या किया? जिस प्रसाशन को SC/ST के मुद्दों पर सांप सूंघ जाता है, उसी प्रसाशन ने इस OBC वाले फैसले को कुचलने के लिए रॉकेट वाली स्पीड दिखाई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता रातों-रात वापस सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए।
और अब जो होने जा रहा है, वो OBC युवाओं के भविष्य का सबसे बड़ा क़त्ल है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से साफ कह दिया है की “हमें नई क्रीमी लेयर पॉलिसी बनाने के लिए पूरे 2 साल का वक़्त चाहिए।”
मतलब समझ रहे हैं आप? 2 साल का वक़्त मांगकर सरकार इस मामले को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है।
इतना ही नहीं, सरकार ने कोर्ट से कहा है की UPSC (CSE 2025) से पास हुए जो 958 कैंडिडेट्स की लिस्ट आई है, हमें उस पर ये नया फैसला लागू नहीं करना है! हमें पुराने (OBC विरोधी) नियम से ही पोस्टिंग करने की इजाज़त दे दो, वरना सिस्टम में बवाल मच जाएगा।
खैर, अब सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है की इसी 1 सितंबर 2026 को दोपहर 3:30 बजे एक ‘स्पेशल बेंच’ बैठेगी। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की ये बेंच सरकार की इस चालाकी भरी याचिका पर सुनवाई करेगी।
ज़रा सोचिए उन 958 UPSC पास करने वाले युवाओं पर क्या बीत रही होगी! उन्होंने दिन-रात एक करके देश का सबसे कठिन एग्ज़ाम पास किया, और ये सिस्टम 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर उनका हक़ मारने की वकालत करेगा।
सरकार सिर्फ और सिर्फ OBC को क्रीमी लेयर के फंदे में फंसाए रखने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा SC/ST पर भी लगाओ क्रीमी लेयर तो रातों-रात प्रसाशन को मार गया लकवा और कैबिनेट ने कर दिया इसे ख़ारिज
अगर आप सिस्टम के दोगलेपन का सबसे भयंकर रूप देखना चाहते हैं, तो अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों वाली बेंच का वो फैसला याद कर लीजिए जिसने पूरे देश में बवाल मचा दिया था।
कोटे में कोटा (Sub-categorization) वाले उस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने डंके की चोट पर एक बहुत ही तार्किक और सच्ची बात कही थी।
जजों ने साफ-साफ टिप्पणी की थी की “अब वक्त आ गया है की SC और ST वर्ग में भी क्रीमी लेयर लागू होनी चाहिए, ताकि जो लोग सदियों से मलाई खा रहे हैं उन्हें बाहर किया जाए और जो सच में उस वर्ग के मज़दूर या मेहतर हैं, उन्हें उनका असली हक़ मिल सके।”
भाईसाहब, जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के जजों के मुंह से SC/ST के लिए ‘क्रीमी लेयर’ शब्द निकला, मानों पूरे देश के राजनीतिक सिस्टम को लकवा मार गया!
रातों-रात दलित संगठनों ने बवाल काटना शुरू कर दिया। भारत बंद की धमकियां आने लगीं। और हमारी सरकार का रिस्पांस क्या था? आप जानकर अपना सिर पीट लेंगे।
जिस सरकार के पास OBC का हक़ छीनने के लिए, 11 मार्च के फैसले को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की ‘रॉकेट स्पीड’ है… उसी सरकार ने SC/ST क्रीमी लेयर की बात उठते ही रातों-रात कैबिनेट की मीटिंग बुला ली!
और कैबिनेट से बाकायदा प्रस्ताव पास करके ऐलान कर दिया गया की “हम SC और ST में क्रीमी लेयर कभी लागू नहीं करेंगे, सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कह ले!”
क्या समझे आप? इसे कहते हैं वोटबैंक का खौफ! इसे कहते हैं सिस्टम का असली लकवा! SC और ST समाज की ज़रा सी नाराज़गी से इन सरकारों के हाथ-पांव फूल जाते हैं, इनकी सत्ता की कुर्सी डोलने लगती है।
सुप्रीम कोर्ट की बात को ये एक झटके में रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं। लेकिन वही सुप्रीम कोर्ट जब OBC को क्रीमी लेयर से राहत देता है, तो ये उसे लागू करने के बजाय 2 साल तक लटकाने की साज़िश रचते हैं।
ये दोगलापन नहीं तो और क्या है? मतलब एक वर्ग से तुम इतना डरते हो की उनकी मलाई छिनने नहीं दोगे, और दूसरे वर्ग (OBC) को तुमने लावारिस समझ रखा है की इसके गले में जो चाहे फंदा डाल दो, ये बेचारे कुछ नहीं बोलेंगे!
8 लाख कमाने वाला OBC अमीर हो गया और SC/ST का करोड़पति भी गरीब है, इस सौतेलेपन का असली कारण क्या है
अब ज़रा इस ‘क्रीमी लेयर’ नाम के उस 8 लाख वाले फंदे की चीरफाड़ करते हैं जिसने देश के करोड़ों OBC युवाओं की ज़िंदगी नर्क बना दी है।
सरकार ने नियम बना दिया की अगर किसी OBC परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपये से ज़्यादा है, तो वो क्रीमी लेयर (Creamy Layer) में आएगा और उसे आरक्षण नहीं मिलेगा।
सुनने में 8 लाख बहुत बड़ा अमाउंट लगता है, लेकिन ज़रा आज की महंगाई और ज़मीनी हकीकत तो देखिए यार!
आज के टाइम में एक मामूली सरकारी स्कूल का टीचर, बैंक का एक छोटा सा क्लर्क, या थाने में खड़ा एक हेड कांस्टेबल भी साल का 8 लाख रुपये आराम से कमा लेता है।
क्या वो इंसान अंबानी या अडानी बन गया? क्या उसके पास कोई चार्टर्ड प्लेन आ गया? बिल्कुल नहीं! वो बेचारा आज भी ईएमआई (EMI) भर-भर के अपनी आधी ज़िंदगी गुज़ार देता है।
लेकिन ये जालिम सिस्टम उस मिडिल क्लास OBC पिता के बच्चे को कॉलर से पकड़ कर आरक्षण की लाइन से बाहर निकाल देता है।
और दूसरी तरफ देखिए इस देश का मज़ाक। SC/ST वर्ग के वो नेता, वो आईएएस अफसर, जिनकी पीढ़ियां पिछले 40 सालों से सत्ता की मलाई चाट रही हैं। जिनके पास हज़ारों करोड़ की बेनामी संपत्तियां हैं, दिल्ली से लेकर मुंबई तक जिनके बंगले हैं।
लेकिन उसके लिए हमारा सिस्टम अँधा हो जाता है। क्यों? क्योंकि वो SC/ST है, और वहां कोई 8 लाख का क्रीमी लेयर नहीं चलता! उसे गरीब और ‘पिछड़ा’ मानकर आरक्षण का पूरा फायदा दे दिया जाता है।
अरे भाई, इस मलाईखोरी का सबसे बड़ा नुकसान तो खुद उसी SC/ST वर्ग के असली गरीब को हो रहा है।
जो बेचारा मोची है, जो आज भी नाली साफ कर रहा है, जो गांव में मज़दूरी कर रहा है… उसका हक़ तो उसके ही वर्ग के ये अमीर रसूखदार खा रहे हैं।
लेकिन सरकार को उस गरीब दलित की कोई परवाह नहीं है। सरकार को तो उन मलाईखोरों का वोट चाहिए जो पूरे समाज का ठेका लेकर बैठे हैं।
इसीलिए सरकार वोटबैंक के लिए इन अमीरों पर हाथ डालने से कांपती है, और अपनी सारी भड़ास OBC युवाओं की गर्दन मरोड़ कर निकालती है।
पब्लिक सेक्टर और बैंकों में नौकरी करने वाले OBC परिवारों के खिलाफ ब्यूरोक्रेसी का गंदा खेल
अगर आप सोच रहे हैं की ये सिर्फ नेताओं का खेल है, तो आप इस देश की बाबूशाही को बहुत कम आंक रहे हैं।
नेताओं से ज़्यादा खौफनाक खेल तो इस देश के वो ब्यूरोक्रेट्स खेल रहे हैं जो नहीं चाहते की कोई भी OBC युवा उनके बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठे।
इस बात को समझने के लिए आपको 1993 के उस आदेश में जाना होगा जब मंडल कमीशन लागू हुआ था।
उस वक़्त नियम बना था की पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU), बैंकों और इंश्योरेंस कंपनियों में काम करने वाले OBC कर्मचारियों के पदों को सरकारी ग्रुप ए (Group A) और ग्रुप बी (Group B) के ‘समतुल्य’ (Equivalence) किया जाएगा।
इसका मतलब था की ये तय किया जाएगा की बैंक का कौन सा पद सरकारी अधिकारी के बराबर है, ताकि उसी हिसाब से क्रीमी लेयर तय हो।
लेकिन भाईसाहब, इस देश की बाबूशाही ने क्या किया? दशकों बीत गए, लेकिन उन्होंने जानबूझकर ये ‘समतुल्य’ वाला नियम ठीक से लागू ही नहीं होने दिया!
इस देरी और बदमाशी का नतीजा कौन भुगत रहा है? इसका नतीजा आज BSNL, रेलवे, या किसी बैंक में काम करने वाला वो साधारण OBC कर्मचारी भुगत रहा है जो ग्रुप सी (Group C) या क्लर्क लेवल का काम करता है।
ब्यूरोक्रेसी ने ऐसा गंदा जाल बुना की इन छोटे कर्मचारियों की महज़ ‘सैलरी’ को जोड़कर उन्हें 8 लाख वाली क्रीमी लेयर की लिस्ट में डाल दिया गया।
बाप बेचारा बैंक में फाइलें ढो रहा है, और उसके बेटे को सिस्टम कहता है की “तुम तो क्रीमी लेयर हो, तुम अधिकारी बनने के लायक नहीं, जनरल में जाकर मरो!”
OBC बंटा हुआ है, और SC/ST वोटबैंक से डरता है प्रसाशन, इसीलिए पिछड़ों की पीठ में घोंपा जा रहा खंजर
अब सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल- आखिर ऐसा क्यों है की सरकारें और ये सिस्टम OBC के साथ कोई भी गंदा खेल खेल कर आसानी से निकल जाते हैं?
इसका जवाब छिपा है इस देश के OBC वर्ग में जो कभी एक होकर वोट नहीं डालता। यादव, कुर्मी, जाट, गुर्जर, मौर्य, तेली, लोहार, कुम्हार… सब अपनी-अपनी जातियों में बंटे हुए हैं।
नेता को पता है की OBC नाम का कोई वोटबैंक है ही नहीं। सरकार को मालूम है की अगर OBC कोटे पर कैंची चलाएंगे, उनका हक़ छीनेंगे, तो ये लोग ज़्यादा से ज़्यादा क्या करेंगे? ट्विटर या फेसबुक पर दो-चार पोस्ट लिखकर रोएंगे।
इसीलिए OBC को इस देश में एकदम लावारिस छोड़ दिया गया है।
लेकिन ज़रा दूसरी तरफ SC/ST समाज को देखिए। वो सब एकजुट हैं। वो अपने हक़ के लिए एकदम आक्रामक हैं। अगर सरकार उनके हक़ की तरफ आंख उठाकर भी देखती है, तो वो पूरे देश में हाहाकार मचा देते हैं। सरकारें उसी वोटबैंक को खोने से डरती है।
नेताओं को पता है की अगर SC/ST के क्रीमी लेयर पर हाथ डाला, तो कुर्सी के पाये हिल जाएंगे।
इसी डर और खौफ की वजह से सरकार SC/ST के मलाईखोरों पर हाथ डालने से कांपती है, और अपनी सारी राजनीतिक भड़ास OBC युवाओं पर निकालती है।
