सोमवार की शाम है। शहर युद्ध में है, पर होटल का शटर पहले गिर रहा है। रसोई में चूल्हा ठंडा छोड़ दिया गया है। बच्चा पूछता है कि दूसरी रोटी कहाँ है। माँ कहती है, आज प्रधानमंत्री ने भी नहीं खाई।
सीमा पर उस शाम टैंक की आवाज है। बंदरगाह पर उस शाम जहाज की प्रतीक्षा है। दोनों आवाजें एक ही आदमी के कान में पड़ती हैं। वह आदमी बालकनी से नहीं बोलता। वह पहले अपने घर की थाली देखता है, फिर देश की थाली।
लाल बहादुर शास्त्री को युद्ध का नायक कम लोग मानते थे। कद छोटा था। स्वर धीमा था। कपड़े बार बार सिले जाते थे। नेहरू के बाद की दिल्ली उन्हें अंतरिम समझती थी। सीट संभालो। समय कटने दो। असली नेता बाद में आएगा।
समय ने उलटा फैसला सुनाया।
सन् 1965 की कहानी शोर की कहानी नहीं है। यह उस इनकार की कहानी है जो धीरे बोला गया और दूर तक चला। भारत कम खा लेगा। बोरे के भाव इज्जत नहीं बेचेगा। सीमा पर जो वार होगा, उसका उत्तर सिर्फ घाटी में नहीं दिया जाएगा।
वे कुर्सी से भी छोटे दिखते थे। धीरे बोलते थे। सत्ता उनके जीवन में पुरस्कार की तरह नहीं आई। कर्तव्य की तरह आई। चापलूसों का दरबार नहीं जमाया। बोलने से ज्यादा सुना। राजधानी शोर से प्यार करती है। इसलिए कई लोगों ने उनकी शांति को कायरता पढ़ लिया।
उस साल दो परीक्षाएँ एक साथ आईं। सन् 1962 के बाद क्या भारत फिर लड़ सकता है। और क्या कोई दूसरा देश गेहूँ के जहाज से भारत की रीढ़ नाप सकता है। शास्त्री ने दोनों का उत्तर एक ही मेज पर दिया। शांत। दृढ़। झुकने को तैयार नहीं।

जिसे कोई लड़ता हुआ नहीं मानता था
जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद जून 1964 में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। देश अभी चीन युद्ध के घाव के साथ जी रहा था। दाम बढ़ रहे थे। अनाज कम था। सेना फिर से खड़ी हो रही थी। जनता बेचैन थी।
नेहरू की कुर्सी खाली होते ही दिल्ली का सवाल सीधा था। अब कौन। कई नाम लंबे लगते थे। कई आवाजें तेज थीं। शास्त्री उन नामों में सबसे कम नाटकीय लगते थे। समझौते के उम्मीदवार। बीच के आदमी। जब तक असली नेता संभले, सीट संभाल लेने वाले।
शास्त्री उत्तर जैसे नहीं लगते थे। नाटे थे। विनम्र थे। दिखावे का स्वाद नहीं था। भाषा के महल नहीं जमाते थे। विश्वास जमाते थे। धीरे धीरे। उन लोगों से जो दशकों से उनकी सादगी देख रहे थे।
वे मुगलसराय के साधारण घर से आए थे। गरीबी उनके बचपन का माहौल थी, भाषण का विषय नहीं। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि ली और उसी को नाम बना लिया। जाति का बोझ पीछे छोड़ दिया। नाम छोटा रखा। जीवन भी छोटा रखा। पर भीतर जो रीढ़ थी, वह नाम से नहीं बनी थी। जेल से बनी थी।
आजादी की लड़ाई में बार बार जेल गए। नमक सत्याग्रह के दिनों से कांग्रेस के काम में रहे। मंच पर सिंह की तरह नहीं खड़े होते थे। पंक्ति में चलते थे। जो आदमी जुलूस में खो जाए, उसे राजधानी अक्सर भूल जाती है। शास्त्री उसी तरह के आदमी थे। जब तक काम न बोल दे, चेहरा नहीं बोलता था।
रेल दुर्घटना के बाद नैतिक जिम्मेदारी समझकर रेल मंत्री का पद छोड़ दिया था। आरियालुर की वह दुर्घटना उनके ऊपर नहीं थोपी गई थी। उन्होंने खुद उठा ली। परिवार को यह नहीं रहने दिया कि सत्ता कोई दावत है। फटे कपड़े सिलवाए जाते रहे। घर का खर्च साधारण रहा। ये आदतें सुर्खियाँ नहीं बनतीं। ये वह अधिकार बनाती हैं जो उधार नहीं लिया जा सकता।
गृह मंत्री के रूप में भी वे नरम छवि के मालिक रहे। कानून का शोर मचाने वाले गृह मंत्री नहीं थे। सुनने वाले थे। दिल्ली ऐसे चेहरे को शांत समझ लेती है। शांत को अक्सर निर्बल पढ़ लिया जाता है।
बैठकों में चतुर लोग उनका नाम लेकर मुस्कराते थे। नरम आदमी। भले आदमी। युद्ध का आदमी नहीं।
सन् 1962 की स्मृति उस मुस्कान के पीछे खड़ी थी। हिमालय में भारत पीछे हटा था। कृष्ण मेनन की छाया अभी मंत्रालयों में घूमती थी। सेना का आत्मविश्वास घायल था। देश जानना चाहता था कि अगली मार पर दिल्ली का हाथ काँपेगा या नहीं। ऐसे साल में छोटा कद अपने आप संदेह बन जाता है। लोग कद को चरित्र समझ बैठते हैं।
अप्रैल 1965 में कच्छ के रण में पहले ही एक परीक्षा आ चुकी थी। पाकिस्तान ने वहाँ भी जोर आजमाया। विश्व स्तर पर बातचीत और संघर्ष विराम की भाषा चली। कई पर्यवेक्षकों को लगा कि नया प्रधानमंत्री दबाव सह लेगा। झुक जाएगा। समय माँगेगा। कोई बड़ी रेखा नहीं खींचेगा।
पाकिस्तान के फील्ड मार्शल अयूब खाँ ने भी वही भूल की, ऐसा कहा जाता है। उन्होंने छोटे प्रधानमंत्री को देखा और छोटा देश समझ लिया। सन् 1962 से काँपते राष्ट्र को देखा और सोचा कि धक्का लगा तो भारत कश्मीर के अंदर ही सिमटा रहेगा। अयूब स्वयं सैनिक शासक थे। वर्दी का आदमी नागरिक धोती को हल्का तौलता है। वह तौल उस साल महँगा पड़ा।
शास्त्री को इस तरह पढ़ना सन् 1965 की पहली रणनीतिक भूल थी।
वे युद्ध के गीत नहीं गाते थे। नारेबाजी से कमरा नहीं गर्म करते थे। पर निर्णय की घड़ी में हिचक उनका स्वभाव नहीं था। जो आदमी जेल जा चुका हो, पद छोड़ चुका हो, और घर में भूख का स्वाद जानता हो, उसे डराने के औजार सीमित हो जाते हैं। पद का लोभ उसे बाँधता नहीं। प्रदर्शन की भूख उसे खींचती नहीं। तब सिर्फ काम रह जाता है।
कुछ नेता कमरा भरकर जीतते हैं। शास्त्री कमरे से घबराहट निकालकर जीतते थे। उन महीनों में साथ बैठे साथी बाद में वही गुण याद करते रहे। कुछ सवाल पूछा। रुके। फिर चुन लिया। चुनाव के बाद अगली विदेशी तार से फैसला नहीं डगमगाया।
सेना के कई अफसर बाद में यही कहते रहे कि सबसे छोटे आदमी ने सबसे बड़ा फैसला लिया। वह वाक्य युद्ध के मैदान में गढ़ा गया। उसकी नींव पहले ही पड़ चुकी थी। सादगी में। इस्तीफे में। चुप रहने की आदत में। और उस इनकार में कि देश का प्रधानमंत्री किसी और का लिखा हुआ छोटा आदमी बने।
जो लोग उन्हें सिर्फ अंतरिम नेता मानकर बैठे थे, उन्हें जल्दी ही दो मोर्चे दिखने वाले थे। एक सीमा पर। एक थाली पर। दोनों जगह शास्त्री ने वही बात कही जो उनके कद से मेल नहीं खाती थी। भारत लड़ेगा। भारत झुकेगा नहीं।

एक साथ दो युद्ध
सन् 1965 का भारत एक से ज्यादा दुश्मन से लड़ रहा था।
एक दुश्मन सीमा पार खड़ा था, कवच और योजना के साथ। दूसरा खेतों में था और खातों में। देश के बड़े हिस्से में मानसून असफल रहा। पपड़ी पड़ी धरती पर हल चल रहा था और फसल जवाब नहीं दे रही थी। अनाज दुर्लभ था। भारत पीएल-480 कार्यक्रम के तहत अमेरिकी गेहूँ पर निर्भर था। उन जहाजों में सिर्फ भोजन नहीं था। एक रस्सी थी।
कीमतें चढ़ चुकी थीं। अठारह महीनों में दाल और आटे की बात घर की शांति छीन रही थी। परिवार शाम की रोटी खींच रहे थे। बहुत से घरों में सवाल अच्छी फसल मनाने का नहीं था। सवाल यह था कि पिछले हफ्ते का अनाज अगले हफ्ते तक कैसे चले।
यही भारत शास्त्री को मिला था। एक गर्वीला गणराज्य, जिसे अभी भी रोटी माँगनी पड़ती थी।
सन् 1962 के बाद रक्षा पर ध्यान जाना स्वाभाविक था। सीमाओं पर छावनी चाहिए थी। गोला बारूद चाहिए था। पर पेट भी सेना जितना ही पुराना मोर्चा है। जो देश सिपाही खड़ा करे और गोदाम खाली छोड़े, वह आधी लड़ाई घर में हार जाता है। शास्त्री यह हिसाब जानते थे। इसलिए उनके महीने दो रजिस्टरों के बीच कटते थे। एक में सीमा की रिपोर्ट। दूसरे में अनाज का आँकड़ा।
बाजार में बात आटे और तेल की थी। राशनिंग की कतार लंबी थी। मंत्रालय में बात जहाजों और कोटे की थी। दोनों बातें एक ही डर की थीं। देश बड़ा भाषण लिख सकता है और फिर भी अनाज की कतार में खड़ा हो सकता है। शास्त्री उस कतार को जानते थे। वे अभाव के पास बड़े हुए थे। गरीबी का गीत नहीं गाते थे। अभाव को घुटने टेकने का कारण भी नहीं मानते थे।
खेतों का युद्ध शांत दिखता है। उसमें गोली की आवाज नहीं होती। सूखा धीरे आता है। पहले पत्ती मुरझाती है। फिर कुआँ नीचे जाता है। फिर थाली छोटी पड़ती है। तब तक अखबार अक्सर किसी और खबर में व्यस्त रहता है। सन् 1965 में वह शांत युद्ध पहले से चल रहा था। सीमा का युद्ध बाद में आकर उसी कमरे में बैठ गया।
सी. सुब्रमण्यम कृषि की तरफ देश का मुँह मोड़ने की कोशिश कर रहे थे। नए बीज। खाद। सिंचाई। वह लंबा काम था। उसका फल तुरंत नहीं आता। तत्काल जो संकट था वह गोदाम का था। आयातित गेहूँ के बिना लाखों थालियाँ अधूरी रह सकती थीं। प्रधानमंत्री के सामने दो घड़ियाँ एक साथ चल रही थीं। एक फसल की। एक मोर्चे की।
फिर पहला गोली वाला युद्ध कश्मीर में आया।
अगस्त 1965 में पाकिस्तान ने संघर्ष विराम रेखा पार सशस्त्र घुसपैठिए भेजे। योजना का नाम था ऑपरेशन जिब्राल्टर। विचार यह था कि घाटी के अंदर आग जले, विद्रोह उठे, और भारत पीछे धकेल दिया जाए। घुसपैठिए स्थानीय विद्रोही बनकर घुलने वाले थे। कश्मीर के लोगों से अपेक्षा थी कि वे उठ खड़े हों। योजना कागज पर चतुर लगती थी। जमीन पर वह चतुराई टूट गई।
विद्रोह योजना के हिसाब से नहीं उठा। भारतीय सेना और कश्मीर के लोगों ने लिखा हुआ किरदार नहीं निभाया। गाँवों ने कई जगह संदेह जताया। गश्त ने निशान पकड़े। जो आग अंदर से भड़कनी थी, वह बाहर से लाई हुई आग निकली। तब योजना का दूसरा चेहरा दिखने लगा। जब जनता साथ न दे, तो घुसपैठ को नियमित हमले का रूप देना पड़ता है।
दिल्ली में खबरें टुकड़ों में आ रही थीं। एक दिन घुसपैठ। दूसरे दिन मुठभेड़। तीसरे दिन यह आशंका कि यह छिटपुट घटना नहीं, सोची समझी मुहिम है। शास्त्री ने इसे पुलिस की स्थानीय गड़बड़ी नहीं माना। सीमा के पार बैठी नीयत माना।
देश उस समय दो खबरें एक साथ पढ़ रहा था। एक खबर मोर्चे की। दूसरी खबर मंडी की। रेडियो पर सैनिकों की बात भी थी और अनाज की कमी की बात भी। माँ रसोई में आटा नाप रही थी। बेटा नक्शे पर कश्मीर देख रहा था। एक घर में दो युद्ध इस तरह घुस आए।
शास्त्री का काम इन दोनों को अलग फाइल में बंद करना नहीं था। काम यह था कि देश समझे। सिपाही अकेला नहीं लड़ रहा। किसान अकेला नहीं बो रहा। नागरिक अकेला नहीं सह रहा। तीनों एक ही राष्ट्र के तीन हाथ हैं। यह विचार बाद में नारे में ढलना था। उस अगस्त में वह अभी सिर्फ दबाव था। दो तरफ से आने वाला दबाव।
तब पाकिस्तान ने दाँव बड़ा किया।
अखनूर की सड़क
1 सितंबर 1965 को पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया। मकसद कठोर और साफ था। अखनूर की ओर प्रहार। जम्मू को कश्मीर घाटी से जोड़ने वाली सड़क काट दो। वह सड़क टूटी तो घाटी अलग पड़ सकती थी।
पाकिस्तानी कवच आत्मविश्वास के साथ बढ़ा। उस कवच का बड़ा हिस्सा अमेरिका से मिला हुआ था। पैटन टैंक उसी आत्मविश्वास का चिह्न था। भारी। आधुनिक। चीरकर निकलने के लिए बना।
यह सीमा की छोटी झड़प नहीं थी। यह नक्शा बदलने की कोशिश थी, किसी देश की नस काटकर।
शास्त्री ने इसे स्थानीय समस्या नहीं माना। देश पर हमला माना।
पहले घंटों में मोर्चे की खबरें कठिन थीं। छम्ब-जौरियाँ पट्टी पर कवच और तोपें दबाव बना रही थीं। अखनूर गिरता तो घाटी का रास्ता खतरे में पड़ता। सेनाध्यक्ष हवाई सहायता चाहते थे। समय कम था। उस शाम की पारिवारिक स्मृति साफ है। सेवा प्रमुख रात के खाने के समय पहुँचे। उन्होंने कुछ मिनट माँगे, भारतीय वायुसेना के जाने का आदेश दिया, और बिना घबराहट दिखाए मेज पर लौट आए।
कुछ दिन भारत ने जम्मू के पश्चिम में रेखा थामी। अखनूर पर दबाव सच था। सिर्फ कश्मीर तक सीमित रक्षात्मक युद्ध हमलावर के अनुकूल होता। लड़ाई उसी जमीन पर रहती जिसे पाकिस्तान ने चुना था।
शास्त्री ने वह जाल ठुकरा दिया।
जब गेहूँ हथियार बन गया
जब बंदूकें बोल रही थीं, एक और दबाव कस रहा था।
युद्ध की खबर रेडियो से आती थी। गेहूँ की खबर बंदरगाह से आती थी। एक खबर में टैंक थे। दूसरी में जहाज। दोनों खबरें एक ही प्रधानमंत्री की मेज पर रखी जाती थीं। जो आदमी सिर्फ मोर्चा देखे, वह आधा युद्ध समझे। जो आदमी सिर्फ गोदाम देखे, वह आधी इज्जत समझे। शास्त्री दोनों देख रहे थे।
संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत को बेचैन करने के लिए सिपाही भेजने की जरूरत नहीं थी। उसके पास गेहूँ था। पीएल-480 के तहत अमेरिकी अनाज भारत के खाद्य तकिए का बड़ा हिस्सा बन चुका था। सूखे के साल में वह तकिया भाषणों से भारी था।
पीएल-480 का प्रभाव
पीएल-480 कोई युद्धकालीन आविष्कार नहीं था। सन् 1954 का अमेरिकी कानून था। अतिरिक्त अनाज बाहर भेजो। भूखे देशों को रियायती दर पर गेहूँ दो। कागज पर यह मदद लगती थी। व्यवहार में यह आदत बन गई। भारत उन वर्षों में सबसे बड़े प्राप्तकर्ताओं में रहा। जहाज आते रहे। गोदाम कुछ हद तक भरते रहे। देश ने साँस ली।
पर हर साँस की एक कीमत होती है। जब थाली नियमित रूप से बाहर से भरने लगे, तो भीतर का खेत उतना तेज नहीं दौड़ता। नीति निर्माता जानते थे कि आयात राहत है। वे यह भी भूलने लगे थे कि राहत नीति नहीं बननी चाहिए। पीएल-480 ने अकाल के दरवाजे कुछ समय के लिए रोके। उसने यह भी सिखा दिया कि दिल्ली की चिंता का एक हिस्सा वाशिंगटन की मेज पर सोता है।
रुपये में भुगतान की व्यवस्था ने इस संबंध को और गाढ़ा किया। अनाज आया। बदले में कुछ खाते भारत के भीतर ही घूमते रहे। दिखने में सुविधा थी। भीतर निर्भरता की जड़ फैलती रही। किसान मेहनत कर रहा था। मानसून धोखा दे रहा था। वैज्ञानिक नए बीज की बात कर रहे थे। फिर भी राष्ट्रीय हिसाब का बड़ा स्तंभ विदेशी गेहूँ बना रहा।
सन् 1965 का सूखा इस ढाँचे को नंगा कर गया। फसल गिरी। माँग बढ़ी। कीमतें चढ़ीं। जो तकिया वर्षों से आराम दे रहा था, वही तकिया अब रस्सी निकला। जॉनसन प्रशासन ने छोटी रस्सी की नीति अपनाई। पूरी खेप एक साथ नहीं। थोड़ा दो। देखो। फिर थोड़ा और दो। बातचीत के बाद दो। युद्ध के दिनों में यह नाप और सख्त लगने लगा।
भारत को यह महसूस हुआ कि भोजन अब सिर्फ भोजन नहीं रहा। वह कूटनीति का औजार है। शीत युद्ध की मेज पर दक्षिण एशिया शांत रहे, यह इच्छा गेहूँ के बोरे से बँध गई। सैन्य सहायता दोनों पक्षों को रोकी गई। वह रोक दोनों को लगी। गेहूँ वाला सवाल भारत को ज्यादा पास से छूता था। थाली को छूता था।
प्रभाव घर तक गया। शहर की राशन की दुकान पर कतार लंबी हुई। गाँव में आटे की डिबिया हल्की पड़ी। सरकार के लिए संदेश साफ था। विदेश नीति और खाद्य नीति अब दो अलग दफ्तर नहीं रहे। एक जहाज रुक जाए तो मोर्चे का मनोबल भी हिल सकता है। एक जहाज आ जाए तो दिल्ली राहत की साँस ले सकती है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की रीढ़ नापी जाती है।
पीएल-480 का सबसे गहरा असर आँकड़ों में नहीं था। आत्मचित्र में था। आजाद देश अपने गोदाम के लिए दूसरे देश के हस्ताक्षर का इंतजार करे, यह तस्वीर शास्त्री को चुभती थी। वे अमेरिका से शत्रुता का गीत नहीं गा रहे थे। वे यह नहीं कह रहे थे कि मदद लेना पाप है। वे यह कह रहे थे कि मदद इज्जत का भाव तय नहीं करेगी।
राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन का प्रशासन चाहता था कि भारत शांति की ओर ऐसे बढ़े जो शीत युद्ध की अमेरिकी रणनीति के अनुकूल हो। भोजन उस बातचीत का हिस्सा बन गया। जहाज धीमे किए जा सकते थे। कोटा बूँद बूँद छोड़ा जा सकता था। भूखे देश से यह अपेक्षा थी कि वह ज्यादा ध्यान से सुने।
भारत उस व्यवस्था में छिपी बेइज्जती जानता था। आजादी के लिए लड़ा गणराज्य याद कराया जा रहा था कि गोदाम कौन भरता है।
शास्त्री हिसाब समझते थे। अपमान भी समझते थे।
वे विदेशी गेहूँ को भारत की इज्जत तय नहीं करने देने वाले थे। भारतीय स्मृति में उनका रुख सीधा और अड़ियल है। देश भूख सह लेगा। झुकेगा नहीं। अमेरिका के आगे झुकने से इनकार।
यह इनकार नाटक नहीं था। सूखा सच था। कमी सच थी। खाली दुकानों का खतरा सच था। उस मौसम में साहस का एक स्वाद था। छूटे हुए भोजन का स्वाद।
दिल्ली का कोई गंभीर आदमी यह नहीं कहता था कि भारत रातोंरात जहाजों को मन से हटा सकता है। लाखों लोगों को अभी भी आयातित अनाज चाहिए था। बात दूसरी थी। जरूरत समर्पण नहीं होती। सरकार मदद ले सकती है और फिर भी मदद करने वाले को अपने युद्ध के लक्ष्य लिखने नहीं दे सकती। शास्त्री ने वह रेखा ऐसी स्थिरता से खींची जिसमें हाथ उठाने की जरूरत नहीं थी।
गेहूँ सिर्फ कूटनीतिक फाइल नहीं था। कानपुर के मिल मजदूर के घर का नाश्ता था। सूखे गाँव में विधवा की डिबिया का आखिरी आटा था। जब कोई विदेशी सरकार उस नाश्ते को ऐसी टोंटी समझे जिसे कस सको, तो अपमान किसी राजनयिक नोट से दूर तक जाता है। शास्त्री ने वह अपमान उन लोगों की ओर से महसूस किया जो साउथ ब्लॉक कभी नहीं देखते।
बंदरगाह पर खाली क्षितिज अपने आप एक संदेश बन जाता है। जहाज दिखाई दे तो मंत्रालय राहत की फाइल खोलता है। जहाज न दिखे तो अफवाह दौड़ती है। युद्ध के दिनों में अफवाह भी गोला होती है। लोग पूछते हैं कि लड़ रहे हैं तो खाएँगे क्या। शास्त्री जानते थे कि इस सवाल का उत्तर सिर्फ टन में नहीं दिया जा सकता। उत्तर इज्जत में भी देना पड़ता है।
कैबिनेट की मेज पर हिसाब कठिन था। सेना को गोला चाहिए। शहर को आटा चाहिए। किसान को बीज चाहिए। तीनों एक साथ माँग रहे थे। विदेशी गेहूँ इनमें से एक माँग को थाम सकता था। पर थामने की शर्त अगर युद्ध का रुख तय करने लगे, तो मदद मदद नहीं रहती। फिर वह लगाम बन जाती है। शास्त्री लगाम को हाथ में लेने वाले नहीं थे।
वे यह नाटक नहीं कर रहे थे कि भारत कल सुबह आत्मनिर्भर हो जाएगा। सी. सुब्रमण्यम उसी मौसम में लंबे हल की बात कर रहे थे। नया बीज। खाद। सिंचाई। वह उत्तर आने वाला था। पर सन् 1965 की रात का उत्तर अलग था। उस रात कहना था कि भूख से डरकर सीमा का नक्शा नहीं बिकेगा।
यही वह जगह है जहाँ गेहूँ हथियार बन गया। गोदाम में पड़ा अनाज निर्दोष होता है। नीति में बँधा अनाज हथियार हो सकता है। शास्त्री ने अनाज को ठुकराया नहीं। उन्होंने अनाज वाले हाथ को देश की गर्दन पर नहीं रखने दिया। फर्क छोटा लगता है। इतिहास में वही फर्क बड़ा पड़ता है।
सबसे छोटे प्रधानमंत्री का सबसे बड़ा फैसला
6 सितंबर 1965 को शास्त्री ने भारतीय सेना को पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने का अधिकार दिया।
वह वाक्य आज भी वजन रखता है। उस सुबह तक बहुतों को लगता था कि भारत वहीं लड़ेगा जहाँ पाकिस्तान ने लड़ने का मैदान चुना है, कश्मीर के अंदर और आस पास। शास्त्री ने युद्ध की ज्यामिति बदल दी।
दूसरी सीमा भी पार करो
भारतीय सेना की टुकड़ियाँ लाहौर की ओर बढ़ीं। एक और प्रहार सियालकोट की तरफ गया। ग्रैंड ट्रंक रोड, मैदान की पुरानी धमनी, फिर युद्ध की सड़क बन गई। टुकड़ियाँ इछोगिल नहर की ओर बढ़ीं, वह रक्षा खाई जो लाहौर के रास्तों की रखवाली करती थी। भारतीय सैनिक बाटापुर तक पहुँचे, उस बड़े शहर के किनारे।
भारत ने लाहौर नहीं लिया। यह साफ कहना जरूरी है। यह ऐसा निर्णायक युद्ध नहीं था जिसका अंत किसी विदेशी सचिवालय पर झंडे के साथ हो। यह प्रत्युत्तर आक्रमण था जिसने हमलावर को कठोर सच बताया। अगर तुम अखनूर पर वार करो, तो यह मत मानो कि तुम्हारे अपने शहर सोते रहेंगे।
ग्रैंड ट्रंक रोड पर धूल लंबी फिकी चादरों की तरह उठी। गाँव खाली हुए और फिर अफवाहों से भर गए। जैतूनी वर्दी में आदमी मील के पत्थर पार करते उस शहर की ओर बढ़े जो सदियों से भारतीय कल्पना में रहता है। वे नहर रेखा तक पहुँचे, बाहरी छोर तक। उन्होंने लाहौर की रोशनी और रेखा देखी। वह दृश्य युद्ध की राजनीति बदलने के लिए काफी था। वह कब्जा नहीं था। उपस्थिति थी। वहाँ उपस्थिति, जहाँ हमलावर ने अपने लिए सुरक्षा मान रखी थी।
सेना उस चुनाव को एक वाक्य में याद रखती है, जो अब भी मेसों और संस्मरणों में चलता है। सबसे छोटे आदमी का सबसे बड़ा फैसला।
बड़ा इसलिए था कि उसमें जोखिम था। लाहौर की तरफ मोर्चा खोलने से युद्ध फैल सकता था। अंतरराष्ट्रीय गुस्सा आ सकता था। उन शक्तियों का दबाव आ सकता था जिनके हाथ में हथियार भी थे और गेहूँ भी। शास्त्री ने जोखिम लिया। जो देश सिर्फ उसी जगह बचाव करे जहाँ उसे मुक्का लगे, उस जगह मुक्का पड़ता ही रहेगा।
पाकिस्तानी सेना ने पैटन टैंक जोर से चलाए। भीषण टैंक लड़ाई असल उत्तर के पास खेम करण में हुई, और बाद में सियालकोट क्षेत्र के फिल्लौरा और चाविंदा के आस पास।
असल उत्तर में पंजाब के खेत इस्पात के कब्रिस्तान बन गए। भारतीय इकाइयों ने जमीन का उपयोग किया, गन्ने का, नहरों का, और कसी हुई रक्षा स्थिति का। खूब प्रचारित पैटन वादा किए मुताबिक सरककर नहीं निकला। नष्ट अमेरिकी टैंक कीचड़ में पड़े थे। लोग उस जगह को पैटन नगर कहने लगे। नाम में कड़वाहट भी थी और गर्व भी।
चाविंदा में दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी टैंक लड़ाइयों में से एक देखी गई। कोई पक्ष परीकथा वाली जीत लेकर नहीं गया। दोनों पक्षों का खून बहा। कर्मी गर्मी और धुएँ में लड़े। जो मशीनें आधुनिक शक्ति के प्रतीक बनकर छापी गई थीं, कपास के खेतों में खंडहर हो गईं। पर राजनीतिक अर्थ पहले ही खिसक रहा था। पाकिस्तान ने युद्ध कश्मीर काटने के लिए शुरू किया था। भारत युद्ध को सीमा पार पंजाब के हृदय तक ले गया था।
आकाश में युवा भारतीय वायुसेना इस भूख के साथ उड़ी कि सन् 1962 आखिरी शब्द न रहे। जमीन पर पैदल सेना और कवच ने एक दूसरे की लय दिनों में सीखी, वर्षों में नहीं। कुछ भी साफ सुथरा नहीं था। युद्ध कभी नहीं होता। राष्ट्र की नस के लिए जो बात मायने रखती थी वह यह थी। भारत अब सिर्फ वार खाकर गिन नहीं रहा था।
एक तस्वीर किंवदंती बन गई। धोती में प्रधानमंत्री, एक कब्जा किए पाकिस्तानी टैंक पर खड़े। छाती पर पदकों की कतार नहीं। योद्धा राजा का वेश नहीं। सिर्फ एक छोटा आदमी टूटी मशीन पर, मानो कह रहा हो कि ताकत हमेशा उसी के पास नहीं होती जो ताकतवर दिखता है।
पहले अपना रसोईघर, फिर पूरा देश
सैन्य मोर्चा उस कहानी का आधा हिस्सा था जो शास्त्री देश को सुनाना चाहते थे।
वे मानते थे कि खाद्य मोर्चा सैन्य मोर्चे जितना ही जरूरी है। जवान खून देता है। किसान पसीना दे। नागरिक संयम दे।
वे वह उपदेश मैदान से शुरू नहीं किए। घर से शुरू किए।
सोमवार बिना रात के खाने के
पारिवारिक कहानी सीधी है और उसमें वह सच्चाई है जो सरकारी विज्ञप्तियों में अक्सर नहीं होती। शास्त्री ने ललिता शास्त्री से कहा कि एक समय का खाना न पकाएँ। वे देखना चाहते थे कि उनके अपने बच्चे भूख सह सकते हैं या नहीं, इससे पहले कि वे राष्ट्र से यह माँग करें।
बच्चे सह गए।
तब जाकर वे देश की ओर मुड़े।
रेडियो पर और सभाओं में लोगों के पास गए। नागरिकों से कहा कि हफ्ते में एक समय भोजन छोड़ दें ताकि दुर्लभ अनाज और चल सके। यह कर नहीं था। साझा इज्जत की परीक्षा थी। अगर सिपाही रात को नहर के पानी में खड़ा रह सकता है, तो घर एक शाम खाली थाली सह सकता है।
जवाब ने उन्हें प्रेम करने वालों को भी चौंकाया। परिवारों ने व्रत रखा। कई शहरों में साप्ताहिक व्रत की शाम रेस्तराँ बंद हो गए। होटल की रसोइयाँ कुछ घंटे अंधेरी रहीं। पड़ोसी एक दूसरे से, लगभग संकोच के साथ, पूछते कि क्या वे भी भोजन छोड़ेंगे। चलन स्मृति में शास्त्री व्रत बन गया। यह सब जगह एक जैसा नहीं था। कोई जन आंदोलन पूरा एक जैसा नहीं होता। पर इतना व्यापक था कि राष्ट्रीय चित्र बन गया। प्रधानमंत्री जिसने पहले अपना रसोईघर अंधेरा किया, फिर भूखे देश से साथ चलने को कहा।
रेडियो पर विचार सादा था। अनाज बचाओ। कमी बाँटो। युद्ध को यह बहाना मत बनने दो कि पेट भरे लोग ऐसे खाएँ जैसे कुछ बदला ही नहीं। नहर पर खड़ा जवान घर आकर नहीं पका सकता। फटे खेत का किसान बारिश नहीं गढ़ सकता। शहर का नागरिक एक छोटी बात कर सकता है। एक थाली खाली छोड़ दे ताकि देश का भंडार और चले, और इज्जत का एक दिखने वाला रूप बने।
जिस नेता ने बलिदान की घोषणा की और जिस नेता ने उसे चखा, दोनों में नैतिक फर्क है। शास्त्री वह फर्क समझते थे। वे हमेशा उसके पास रहे थे। मरम्मत किए कपड़े। दिखावे की भूख नहीं। ऐसा घर जो यह नाटक न करे कि युद्ध कहीं और हो रहा है।
उनके खाद्य और कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम लंबा उत्तर पहले से धकेल रहे थे। नए बीज। खाद। सिंचाई। कृषि आत्मनिर्भरता की ओर वह मोड़ जो बाद में हरित क्रांति को खिलाएगा। साप्ताहिक उपवास पूरी नीति नहीं था। बड़े संकल्प का तात्कालिक मानवीय चेहरा था। भारत कमर अभी कस ले ताकि हमेशा भिक्षा पात्र थामे न रहना पड़े।
सुब्रमण्यम जल्द वाशिंगटन भी जाएँगे, अनाज, योजनाओं और अगली फसल की बात करने। वह काम मायने रखता था। भारतीय घरों के अंदर का शांत काम भी मायने रखता था। नीति देश को वर्षों में खिलाती है। उदाहरण आत्मसम्मान को एक हफ्ते में खिलाता है। शास्त्री दोनों देते थे, और दूसरा पहले अपने घर में दिया।
हरित क्रांति के प्रभाव
शास्त्री वह फसल देखने तक नहीं रहे। फिर भी जो बीज उन्होंने प्राथमिकता में बोया, वह बाद के वर्षों में मैदान में उगा। हरित क्रांति कोई जादू नहीं थी। बेहतर बीज। रासायनिक खाद। नहर और नलकूप का पानी। खरीद का भरोसा। ये चार बातें जब एक साथ खेत में उतरीं, तो थाली बदलने लगी।
सबसे साफ प्रभाव गेहूँ पर दिखा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेत भरने लगे। देश जो जहाज की प्रतीक्षा करता था, वह धीरे धीरे अपने गोदाम की ओर देखने लगा। पीएल-480 वाली रस्सी ढीली पड़ी। यह शास्त्री की बाजी का लंबा फल था। भूख से डरकर झुकना नहीं। खेत को इतना मजबूत करना कि झुकने का कारण ही घट जाए।
दूसरा प्रभाव राजनीतिक था। किसान राष्ट्र की तस्वीर के किनारे से बीच में आया। जय किसान सिर्फ गाँव की तारीफ नहीं रह गया। वह नीति का तर्क बन गया। जब सिपाही सीमा पर खड़ा हो, तो उसके पीछे भरा खलिहान होना चाहिए। खाली खलिहान वाला देश लंबे युद्ध का बोझ नहीं उठा सकता। हरित क्रांति ने इस तर्क को अनाज के बोरे में बदल दिया।
तीसरा प्रभाव सामाजिक था, और वह मिश्रित था। जिनके पास पानी था, जमीन थी, और बाजार तक सड़क थी, वे आगे निकले। जिनके पास बारिश पर टिका खेत था, वे उतनी तेजी से नहीं निकले। पंजाब का गेहूँ और सूखे पठार का ज्वार एक ही कहानी नहीं बने। देश ने अकाल का पुराना डर काफी हद तक पीछे छोड़ा। पर क्षेत्रीय फासला बढ़ भी गया। समृद्धि सब गाँवों में एक जैसी नहीं उतरी।
चौथा प्रभाव धरती पर पड़ा। ज्यादा पानी खींचा गया। ज्यादा खाद डाली गई। एक फसल पर दांव बढ़ा। पैदावार उठी। मिट्टी और जलस्तर ने बाद में बिल भेजा। हरित क्रांति ने पेट भरा। उसने यह सबक भी छोड़ा कि पैदावार का हिसाब सिर्फ क्विंटल में पूरा नहीं होता। पानी और जमीन भी हिसाब माँगते हैं।
इन प्रभावों को शास्त्री के सिर पर पूरा का पूरा नहीं मढ़ा जा सकता। न इन्हें उनसे काटकर देखा जा सकता है। उन्होंने दिशा दी कि राष्ट्र की आजादी खेत से होकर जाती है। बाद की सरकारों ने उस दिशा पर दौड़ लगाई। कुछ जगह दौड़ शानदार रही। कुछ जगह दौड़ एकतरफा रही। इतिहास अक्सर ऐसा ही चलता है। अच्छा फैसला भी अधूरा फल देता है। बुरा फैसला सिर्फ राख देता है।
सन् 1965 की याद के लिए सबसे जरूरी प्रभाव यह है। भारत ने सीखा कि गेहूँ का जहाज नैतिक तर्क नहीं होना चाहिए। अपनी फसल ही सबसे बड़ी कूटनीति है। शास्त्री ने युद्ध के साल में यह बात घर की रसोई से शुरू की। हरित क्रांति ने उसे खेत में साबित करने की कोशिश की।
हरित क्रांति के पर्यावरणीय प्रभाव
नई किस्म का बीज प्यासा था। वह बारिश के भरोसे कम चलता था। नलकूप और नहर उसके साथ आए। पंजाब और हरियाणा के खेत हर साल दो फसल माँगने लगे। गेहूँ के बाद धान। धान के बाद फिर गेहूँ। पैदावार उठी। नीचे का पानी गिरा। जो जलस्तर पिता की पीढ़ी में कुएँ के पास था, बेटे की पीढ़ी में मशीन की गहराई माँगने लगा। पेट भरा। धरती की प्यास बढ़ी।
खाद ने रंग दिखाया। यूरिया और दूसरी रसायनों ने बालियों को मोटा किया। धीरे धीरे मिट्टी का अपना स्वाद घटने लगा। जीवांश कम हुआ। खेत को अब बिना थैली के भरोसा नहीं रहा। कीट आए तो दवाई आई। दवाई आई तो कीट और बदले। यह चक्र कागज पर विज्ञान लगता है। गाँव में यह खर्च और थकान बनता है। फसल बची। कीट मरे। साथ में वे जीव भी घटे जो खेत को संतुलन देते थे।
एक फसल पर दांव बढ़ने से विविधता घटी। बाजरा, ज्वार, दालें और बहुत सी देशी किस्में किनारे हुईं। जो अनाज सूखे में टिकता था, वह बाजार की दौड़ में पीछे रह गया। गोदाम गेहूँ से भरा। थाली कुछ हद तक एकरस हुई। जैव विविधता कोई कविता का शब्द नहीं है। वह बीज का खजाना है। खजाना घट जाए तो अगला सूखा और कठिन होता है।
नहर वाले कुछ इलाकों में दूसरी बीमारी आई। ज्यादा पानी रुक गया। जमीन नमकीन पड़ने लगी। कहीं हरियाली दिखी, कहीं सफेद परत। सिंचाई वरदान थी। बिना निकासी के वरदान घाव भी बन सकता था। पर्यावरण का बिल अक्सर फसल कटने के कई मौसम बाद आता है। इसलिए पहले दशक में सिर्फ सफलता दिखाई दी। दूसरे और तीसरे दशक में पानी, नमक और रसायन की बात तेज हुई।
पराली जलाने जैसा दृश्य बाद के वर्षों की कहानी है। वह भी उसी चक्र से जुड़ा। धान काटोगे, गेहूँ की जल्दी करोगे, तो खेत साफ करने का सबसे सस्ता तरीका आग बन जाता है। हवा भर जाती है। शहर खाँसता है। यह शास्त्री के समय का दृश्य नहीं था। यह उसी रास्ते का बाद का मोड़ था, जहाँ पैदावार की गति धरती की साँस से तेज चल पड़ी।
पानी का संकट सिर्फ गहराई का नहीं था। नलकूप बिजली और डीजल माँगता है। खेत अब वर्षा के अलावा तार और पंप पर भी टिकने लगा। सिंचाई की आजादी आई। ऊर्जा की भूख भी आई। गर्मी के महीने में जब जलस्तर और नीचे गया, तो पंप ज्यादा चला। ज्यादा चलने से पानी और गिरा। यह चक्र किसान की मेहनत से नहीं टूटता। यह चक्र फसल के चुनाव और पानी के हिसाब से टूटता है।
रसायन खेत तक नहीं रुकते। बारिश उन्हें नाली में ले जाती है। नाली उन्हें नहर और तालाब तक ले जाती है। मछली घटती है। कुएँ का स्वाद बदलता है। जो पानी बालियों को मोटा करे, वही पानी गाँव के प्याले में भी बैठ सकता है। यह असर धीरे आता है। इसलिए पहले साल लोग सिर्फ सुनहरी फसल देखते हैं। दसवें साल कोई पूछता है कि तालाब में पहले जैसी मछली कहाँ गई।
मिट्टी का शरीर भी बदला। बार बार एक ही फसल ने जड़ों का पुराना क्रम तोड़ा। दाल की फसल नाइट्रोजन लौटाती थी। जब दाल किनारे हुई, तो थैली ने वह काम संभाला। थैली ने पैदावार बचाई। मिट्टी की अपनी मरम्मत कमजोर पड़ी। केंचुए और सूक्ष्म जीव कम दिखे। खेत मशीन से साफ लगा। जीव से खाली भी लगा। उपजाऊ दिखना और उपजाऊ बने रहना एक बात नहीं है।
देशी बीज घटने का पर्यावरणीय अर्थ यह भी था कि सूखे और बीमारी के खिलाफ पुरानी समझ पतली हो गई। एक किस्म फैली तो एक बीमारी का दरवाजा भी चौड़ा हुआ। विविधता ढाल होती है। एकरूपता गति देती है। हरित क्रांति ने गति चुनी। ढाल बाद में याद आई।
इन असरों का अर्थ यह नहीं कि हरित क्रांति व्यर्थ थी। भूखे देश के लिए खाली खेत सबसे बड़ा पर्यावरणीय संकट होता है। जंगल कटना, पलायन, और अकाल भी धरती को तोड़ते हैं। सवाल विरोध का नहीं है। सवाल संतुलन का है। कितना अनाज। कितना पानी। कितनी एक फसल। कितनी मिट्टी बची रहे।
शास्त्री ने यह हिसाब पूरा लिखकर नहीं छोड़ा। उनके सामने तत्काल संकट थाली का था। उन्होंने खेत को राष्ट्र का मोर्चा बनाया। बाद की पीढ़ी का काम है कि मोर्चा जीतते हुए मैदान को घायल न कर दे। जय किसान तभी पूरा नारा है जब किसान की जमीन भी जीती रहे।
हरित क्रांति की सामाजिक लागत
देश का गोदाम भरा, यह राष्ट्रीय सफलता थी। गाँव का हर आँगन एक जैसा नहीं भरा, यह सामाजिक लागत थी। नई खेती पूँजी माँगती थी। बीज खरीदना था। खाद खरीदनी थी। पंप लगाना था। जिसके पास जमीन का पट्टा था, बैंक तक पहुँच थी, और नहर या नलकूप का पानी था, वह दौड़ में शामिल हुआ। जिसके पास ये तीन नहीं थे, वह किनारे देखता रहा।
छोटा किसान अक्सर कर्ज से खेत में उतरा। फसल अच्छी हुई तो कर्ज कुछ हल्का पड़ा। मौसम फिसला, कीट आए, या दाम नहीं मिला, तो कर्ज घर में बैठ गया। हरित क्रांति ने मेहनत को मशीन और थैली से बाँध दिया। स्वतंत्रता बढ़ी पैदावार में। निर्भरता बढ़ी बाजार और ऋण में। यह फर्क आँकड़ों की प्रेस विज्ञप्ति में कम दिखता है। गाँव की रात में ज्यादा दिखता है।
क्षेत्रीय फासला और गहरा हुआ। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश नीति के प्रकाश में आए। खरीदारी केंद्र पास थे। सड़क थी। बिजली थी। पठार, वर्षा क्षेत्र और पूर्वी गाँव उतनी तेजी से नहीं आए। एक भारत गेहूँ निर्यात की बात करने लगा। दूसरा भारत अभी भी वर्षा की बाट जोहता रहा। जय किसान का नारा दोनों पर लागू था। सरकारी मशीन अक्सर पहले वाले के पास ज्यादा देर रुकी।
गाँव के अंदर भी रेखाएँ तेज हुईं। बड़ा किसान ट्रैक्टर तक पहुँचा। बटाईदार और खेतिहर मजदूर उसी खेत में ज्यादा घंटे खड़े रहे। कुछ इलाकों में मजदूरी बढ़ी, क्योंकि दो फसल ने काम बढ़ा दिया। कुछ जगह भूमिहीन और पीछे रह गए, क्योंकि मशीन ने उनके दिन काट दिए। स्त्रियों का बोझ धान की रोपाई और छंटाई में बढ़ा। नाम नीति के दस्तावेज में कम आया। कमर के हिसाब में ज्यादा आया।
थाली का स्वाद भी बदला। गेहूँ और चावल आगे आए। बाजरा, कोदो, दाल की पुरानी आदत कई घरों में पीछे हट गई। शहर को सस्ता अनाज मिला। कुछ गाँवों की पोषण विविधता घटी। अकाल का डर कम हुआ। यह बड़ी राहत थी। पर राहत के साथ एकरस भोजन भी आया। सामाजिक लागत सिर्फ गरीबी की नहीं होती। आदत और स्वास्थ्य की भी होती है।
बाद के दशकों में कर्ज और संकट की जो चर्चा उठी, वह शास्त्री के डेस्क पर लिखी हुई कहानी नहीं थी। वह उसी रास्ते का लंबा मोड़ था। जब खेती व्यापार बन जाए, और व्यापार मौसम पर टिका रहे, तो घर का हिसाब काँपता है। इसे हरित क्रांति का अकेला पाप कहना अधूरा होगा। इसे अनदेखा करना भी अधूरा होगा।
शास्त्री ने किसान को राष्ट्र का सिपाही कहा था। सिपाही की इज्जत तभी पूरी होती है जब सिपाही का घर भी सुरक्षित रहे। सामाजिक लागत याद रखने का अर्थ सफलता को मिटाना नहीं है। अर्थ यह है कि जय किसान सब किसानों तक पहुँचे। सिर्फ उसी तक नहीं जिसके खेत में पहले से पानी था।
हरित क्रांति के वैकल्पिक समाधान
विकल्प का अर्थ पीछे मुड़ना नहीं है। सन् 1965 की खाली थाली की ओर लौटना कोई समाधान नहीं। विकल्प का अर्थ यह है कि भरा गोदाम रखते हुए खेत, पानी और छोटे किसान को भी बचाया जाए। शास्त्री ने आत्मनिर्भरता माँगी थी। आत्मनिर्भरता सिर्फ टन में नहीं होती। वह मिट्टी की सेहत में भी होती है।
- पहला हल फसल की टोकरी फैलाना है। सिर्फ गेहूँ और धान नहीं। बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो और दालें फिर मुख्य पंक्ति में आएँ। ये अनाज कम पानी पीते हैं। सूखे में टिकते हैं। थाली को एकरस नहीं रहने देते। गोदाम तभी सचमुच आजाद होता है जब उसमें एक ही बोरा न हो।
- दूसरा हल फसल चक्र वापस लाना है। गेहूँ के बाद फिर धान, धान के बाद फिर गेहूँ, यह दौड़ धरती थका देती है। बीच में दाल हो तो मिट्टी नाइट्रोजन लौटाती है। तिलहन हो तो तेल का जहाज भी कम चाहिए। विविधता कोई पुरानी सनक नहीं है। वह खेत की बीमा पॉलिसी है।
- तीसरा हल पानी बचाना है। हर खेत में बाढ़ जैसी सिंचाई जरूरी नहीं। बूँद सिंचाई। क्यारी का हिसाब। धान वाले इलाके में भी कम पानी वाली विधियाँ। पंजाब जैसे क्षेत्र में धान का रकबा घटाना साहस लगता है। पर नीचे गिरते जलस्तर के सामने पुराना साहस अब आदत बन चुका है। नया साहस पानी गिनना है।
- चौथा हल मिट्टी को फिर जीवित करना है। गोबर, फसल अवशेष, हरी खाद, और मिश्रित खेती रसायन की थैली की जगह नहीं ले सकते एक रात में। वे थैली की भूख घटा सकते हैं। केंचुआ और जीवांश लौटें तो खेत हर मौसम खाद माँगने वाला रोगी कम लगता है। यह कविता नहीं है। यह खर्च घटाने का हिसाब भी है।
- पाँचवाँ हल बाजार का है। किसान वही उगाता है जो खरीदा जाए। अगर सरकार और मंडी सिर्फ गेहूँ-चावल उठाएँ, तो भाषण में बाजरा कितना भी आए, खेत नहीं बदलेगा। दाल, मोटा अनाज और तिलहन की खरीद भी पक्की हो। दाम भी पक्का हो। जय किसान तभी चलता है जब किसान की उपज गोदाम तक पहुँचे, भाषण तक नहीं।
- छठा हल बीज की आजादी का है। वैज्ञानिक सुधार बंद करने की जरूरत नहीं। जरूरत यह है कि देशी किस्में संग्रह में रहें, और नया बीज एक ही कंपनी या एक ही थैली का बंधन न बने। प्रयोगशाला और किसान की पुरानी समझ साथ चलें तो ढाल भी रहे, गति भी रहे।
- सातवाँ हल क्षेत्र के हिसाब से नीति का है। पंजाब का हल और बुंदेलखंड का हल एक कागज पर नहीं लिखा जा सकता। जहाँ पानी है, वहाँ सावधानी से कमाई करो। जहाँ बारिश है, वहाँ उसी बारिश के अनाज को इज्जत दो। हरित क्रांति की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि उसने गेहूँ बढ़ाया। भूल यह थी कि एक नुस्खा पूरे देश पर चढ़ा दिया गया।
ये हल शास्त्री के डेस्क पर पूरे लिखे नहीं थे। उनके समय का प्रश्न भूख था। आज का प्रश्न यह है कि भरे पेट के साथ सूखी धरती तो नहीं छोड़ दी। वैकल्पिक समाधान शत्रुता नहीं है। वह उसी नारे की अगली पंक्ति है। जय जवान तब तक टिकता है जब सीमा सुरक्षित हो। जय किसान तब तक टिकता है जब खेत जीता रहे, किसान कर्ज में न डूबे, और थाली सिर्फ दो अनाजों की न रह जाए।
19 अक्टूबर 1965 को इलाहाबाद के पास उरुवा गाँव में, जो अब प्रयागराज है, शास्त्री ने देश को चार शब्द दिए जो युद्धविराम से आगे जीवित रहे।
जय जवान, जय किसान।
सिपाही को प्रणाम। किसान को प्रणाम।
उन्होंने बंदूक वाले आदमी को हल वाले आदमी से अलग नहीं किया। दोनों को एक राष्ट्रीय विचार में बाँधा। युद्ध में फँसा देश भाषण नहीं खा सकता। अनाज उगाने वाला देश तब तक आजाद नहीं रह सकता जब तक उसकी सीमाएँ टूट रही हों। जवान और किसान दो पोस्टर नहीं थे। एक ही कर्तव्य के दो हिस्से थे।
नारा इसलिए सादा लगा क्योंकि उसे चलना था। बच्चा दोहरा सके। सूखे खेत का किसान उसमें खुद को देख सके। खाई का सिपाही जान सके कि घर के मोर्चे ने उसका नाम लिया है।
चार शब्द। सजावट नहीं। यही शास्त्री की शैली थी। वे भाषा के स्मारक नहीं बनाते थे। खेत और सीमा के बीच एक समझौता बनाते थे।
उरुवा परेड मैदान नहीं था। गाँव था। जगह का चुनाव खुद संदेश था। प्रधानमंत्री वाक्य को दिल्ली के बंद हाल में नहीं रखे। वहाँ बोला जहाँ अनाज उगता है और जहाँ आदमी सेना के लिए घर छोड़ते हैं। उन जगहों पर दोनों जीवन पहले से एक दूसरे को जानते थे। शास्त्री ने उस रिश्ते को सार्वजनिक नाम दिया।
समय भी मायने रखता था। बंदूकें अभी हाल में कुछ शांत हुई थीं। गेहूँ वाला सवाल गया नहीं था। सूखा अभी धरती पर बैठा था। उस मौसम में सिर्फ सेना का सम्मान अधूरा होता। सिर्फ किसान का सम्मान भोला होता। शास्त्री ने दोनों को जोड़ा क्योंकि वे एक साथ दोनों युद्ध जी रहे थे।
दुनिया को युद्धविराम चाहिए, भारत को अपनी इज्जत
लड़ाई हमेशा नहीं चली। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा। संयुक्त राष्ट्र विराम चाहता था। अमेरिका और ब्रिटेन दोनों पक्षों को सैन्य आपूर्ति पहले ही रोक चुके थे। सोवियत संघ वार्ता की मेजबानी को तैयार हो रहा था।
सितंबर 1965 के अंत में युद्धविराम हुआ। भारत ने लाहौर नहीं लिया। पाकिस्तान ने कश्मीर नहीं काटा। नक्शा नहीं पलटा। जो पलटा वह कहानी थी जो भारत सन् 1962 के बाद खुद को सुनाता था।
तीन साल देश हिमालय में पीछे हटने की स्मृति के साथ जीया था। सन् 1965 में उसने दिखाया कि वार सह सकता है, अपना मोर्चा चुन सकता है, और जवाब दे सकता है। यह पूर्ण सैन्य विजय के बराबर नहीं है। फिर भी एक खास किस्म की नैतिक जीत है। वह जीत जो कहती है कि हमें चौंकाना नहीं सिखाया जाएगा।
विदेशी राजधानियाँ चाहती थीं कि नक्शा फिर जम जाए। बंदूकें शांत हों और गेहूँ की बातचीत उनके समय पर लौटे। भारत समय सारणी से पहले एक चीज चाहता था। युद्ध से माफी के स्वाद के बिना निकले। शास्त्री ने वह रेखा तब तक थामी जब तक कठिन साल में एक छोटा देश थाम सकता है। उन्होंने इज्जत को अंतहीन रक्त से एक नहीं माना। शांति को आज्ञाकारिता से भी एक नहीं माना।
वार्ता ताशकंद में हुई। 10 जनवरी 1966 को शास्त्री और राष्ट्रपति अयूब खाँ ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। सोवियत प्रधान अलेक्सी कोसिगिन मेजबान थे। दोनों पक्ष पहले की स्थितियों पर लौटने और बल की जगह बात से शांति खोजने पर राजी हुए। अगले दिन शास्त्री का निधन हो गया।
यही तथ्य है। इसे और अंधेरे रंग की जरूरत नहीं।
वे मंच ऐसे छोड़े जैसे उस पर आए थे। बिना शोर। समझौते पर तब बहस हुई, आज भी होती है। कुछ को लगा भारत ने कठिन जीती जमीन लौटा दी। शास्त्री ने उस चुनाव का बोझ वैसे ही उठाया जैसे हमले का बोझ उठाया था। वे सम्मानजनक विराम चाहते थे, ऐसा अंतहीन युद्ध नहीं जो अनाज और जवान दोनों को खा जाए।
वह नारा आज भी क्या कहता है
जय जवान, जय किसान युद्धकालीन पोस्टर नहीं रह गया। गणराज्य को देखने का एक ढंग बन गया।
यह कहता है कि राष्ट्रीय शक्ति सिर्फ इस्पात नहीं है। मिट्टी भी है। यह कहता है कि जो देश सिपाहियों की तारीफ करे और किसानों को भूल जाए, एक दिन दोनों को कमजोर पाएगा। यह कहता है कि बलिदान दूसरों के लिए लिखा भाषण नहीं है। उसकी शुरुआत उसी के घर से होती है जो माँग करता है।
छोटी बातें फिर देखिए। वे किसी मूर्ति से ज्यादा काम करती हैं।
साउथ ब्लॉक की धोती। वह छूटा भोजन जो पहले अपने बच्चों पर आजमाया गया, फिर अजनबियों से माँगा गया। वह आदेश जिससे न केवल विवादित घाटी की संघर्ष विराम रेखा पार हुई, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय सीमा भी जिसे हमलावर शांत रहने वाला मान बैठा था। भारत के सिर पर लटकता अमेरिकी गेहूँ, निर्भरता की याद की तरह। उस याद को नियति न मानने का इनकार।
भूखा राष्ट्र भी सीधी कमर रख सकता है। शास्त्री की यही बाजी थी।
उन्होंने यह नाटक नहीं किया कि टैंक खिलौने हैं। यह नाटक नहीं किया कि गोदाम भरे हैं। दोनों सच एक हाथ में रखे और फिर भी गरिमा चुनी।
वर्षों बाद खेत बदलेंगे। नया बीज, बेहतर पानी, और कठिन खेती आयातित अनाज की पकड़ ढीली करेगी। उस लंबी आजादी के कई लेखक थे। सी. सुब्रमण्यम उनमें से एक थे। वैज्ञानिक और किसान और थे। पर वह राजनीतिक साहस जिसने कहा कि हम अगली खेप के बदले आत्मसम्मान नहीं बेचेंगे, सन् 1965 में एक चेहरा रखता था। उस आदमी का चेहरा जिसे नजरअंदाज करना आसान लगता था।
दुनिया ऐसे नेता पसंद करती है जो फ्रेम भर दें। शास्त्री ने फ्रेम कभी नहीं भरा। उन्होंने जरूरत भरी।
जिस देश से कहा गया था कि वह बहुत कमजोर है, बहुत भूखा है, और बहुत बँटा हुआ है, उसने उनमें एक दूसरा स्वर पाया। नरम आवाज। कठोर रेखा। यश की भूख नहीं। अपमान की सहन नहीं।
यह मेल जोरदार देशभक्ति से दुर्लभ है।
आज भी धोती और कब्जा किए टैंक की तस्वीर एक तरह की शिक्षा देती है। युवा पाठक से कहती है कि साहस फिल्मी पोस्टर जैसा दिखे, यह जरूरी नहीं। वह उस आदमी जैसा दिख सकता है जो कम खाए, कम बोले, और फिर सेना की दिशा बदल दे। वह सोमवार की उस शाम जैसा दिख सकता है जब रेस्तराँ का शटर इसलिए गिरे कि प्रधानमंत्री ने शहर से मोर्चा याद रखने को कहा।
साउथ ब्लॉक में एक छोटा सा आदमी सादी धोती में बैठा है। गेहूँ के जहाज अभी भी रोके जा सकते हैं। पैटन टैंक चल चुके हैं। घर की रोटी पहले से पतली है।
वे अधिक आराम के साल का इंतजार नहीं करते। भरे खजाने का इंतजार नहीं करते। लंबे दिखने का इंतजार नहीं करते।
वे सेना से कहते हैं कि लड़ाई उस जगह से आगे ले चलो जिसे हमलावर ने चुना। अपने रसोईघर से कहते हैं कि एक समय अंधेरा कर दो। राष्ट्र से कहते हैं कि भूख आए तो बाँटी जाएगी, और इज्जत बोरे के भाव नहीं बिकेगी।
फिर इलाहाबाद के पास एक गाँव में वे देश को एक वाक्य देते हैं जिसे बिना फाइल और बिना पादटिप्पणी के उठाया जा सकता है।
जवान खड़ा है। किसान खड़ा है। वह नागरिक भी खड़ा है जिसने एक समय भोजन छोड़ा। छोटे प्रधानमंत्री ने बड़े देश को सीधा खड़ा होना इसी तरह सिखाया।
उरुवा की धूल अब भी उस नारे को याद रखती है। वहाँ कोई सैनिक परेड नहीं थी। कोई विदेशी झंडा नहीं गिराया गया। एक छोटा प्रधानमंत्री गाँव में खड़ा हुआ और देश को याद दिलाया कि सीमा और खेत एक परिवार हैं। जो सिर्फ जवान को जय कहे, वह आधा राष्ट्र देखता है। जो सिर्फ किसान को जय कहे, वह आधा संकट देखता है।
आज की थाली भरी हो सकती है। आज का गोदाम पुरानी तरह जहाज का मुँह नहीं जोहता। यह राहत शास्त्री के एक अकेले हस्ताक्षर से नहीं आई। पर उस साल का साहस बिना लिखा रह जाता, अगर उन्होंने भूख के सामने इज्जत सस्ती कर दी होती। इतिहास कभी कभी एक छूटे भोजन से मुड़ता है।
युवा पाठक उनकी तस्वीर में पदक नहीं खोजे। धोती खोजे। खाली थाली खोजे। लाहौर के किनारे तक गई हुई वह हिम्मत खोजे, जो शहर लेने का दावा नहीं करती, सिर्फ यह कहती है कि हमलावर अपने घर को सुरक्षित मत समझो।
सोमवार की वह शाम लौटकर नहीं आएगी। रेस्तराँ का शटर अब युद्ध के कारण नहीं गिरता। फिर भी सवाल वही है। जब दबाव बाहर से आए, तो देश थाली बचाएगा या रीढ़। शास्त्री ने रीढ़ चुनी। थाली बाद में खुद संभली।
जय जवान, जय किसान।
चार शब्द। कोई फाइल नहीं। कोई पादटिप्पणी नहीं। एक गाँव से निकले, पूरे देश में ठहर गए। छोटे आदमी ने बड़े देश को यही सिखाया। खड़े रहो। बाँट कर खाओ। झुको मत।
