जब भी बात सनातन धर्म की ताकत और हमारे देवी-देवताओं के चमत्कारों की आती है, तो आज के कुछ सो-कॉल्ड ‘पढ़े-लिखे’ लोग इसे अंधविश्वास कहकर उड़ाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन क्या हो जब चमत्कार का सबूत कोई हिंदुस्तानी नहीं, बल्कि वो अंग्रेज खुद दे गए हों, जो कभी हिन्दू भगवानों में मानते ही नहीं थे?
आज मैं आपको एक ऐसी सच्ची घटना बताने जा रहा हूँ, जो महज़ डेढ़ सौ साल पुरानी है, जिसके पक्के सबूत आज भी मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले के सरकारी गजेटियर और वहाँ खड़े एक भव्य शिव मंदिर के पत्थरों पर लिखे हुए हैं।
ये कहानी है उस चमत्कार की जब सात समंदर पार अफ़ग़ानिस्तान की रणभूमि में एक अंग्रेज की जान बचाने के लिए खुद महाकाल अपनी बाघ की खाल और त्रिशूल लेकर उतर आए थे!
कहानी शुरू होती है मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र से। आज से करीब 150 साल पहले आगर-मालवा (Agar Malwa) में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की एक बहुत बड़ी सैन्य छावनी (Cantonment) हुआ करती थी।
बड़े-बड़े अंग्रेज अफसर अपनी पत्नियों के साथ यहाँ की कोठियों में ऐशो-आराम की जिंदगी जीते थे। इन्ही में से एक बड़ा अफसर था- लेफ्टिनेंट कर्नल सी. मार्टिन (Lt. Col. C. Martin).
1879 का अफगान युद्ध और खूंखार पठानों के बीच फंसा एक बेबस अंग्रेज अफसर
साल आया 1879। ये वो वक़्त था जब ब्रिटिश साम्राज्य और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ‘द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध’ (Second Anglo-Afghan War) छिड़ गया।
इसी दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल सी. मार्टिन को भी ऊपर से हुक्म आया की अपनी बटालियन तैयार करो और तुरंत अफ़ग़ानिस्तान के मोर्चे पर निकलो।
ड्यूटी तो ड्यूटी थी! कर्नल मार्टिन अपनी पत्नी लेडी मार्टिन को आगर-मालवा की उसी छावनी में छोड़कर, अपनी पलटन के साथ अफ़ग़ानिस्तान के उस खूनी युद्ध में कूद पड़ा।
शुरुआत में सब कुछ ठीक था। कर्नल मार्टिन वहां से लगातार अपनी पत्नी को खत (Letters) लिखता था की वो सुरक्षित है और जल्द ही यह युद्ध जीतकर वापस लौट आएगा।
लेकिन फिर अचानक हालात बिगड़ गए। अफ़ग़ानिस्तान के उन बीहड़ पहाड़ों और घाटियों में युद्ध ने इतना भयंकर और खौफनाक रूप ले लिया की ब्रिटिश फौजें बुरी तरह घिर गईं।
उधर से कर्नल मार्टिन की चिट्ठियां आना बिल्कुल बंद हो गईं। एक हफ्ता गुज़रा, दो हफ्ते गुज़रे, महीने बीतने लगे… लेकिन कोई खत नहीं आया।
लेडी मार्टिन की रातों की नींद उड़ चुकी थी। खौफ और घबराहट ने उन्हें जकड़ लिया था। उन्हें लगने लगा था की खूंखार अफ़ग़ान पठानों ने उनके पति को मार डाला है और वो कभी ज़िंदा लौटकर नहीं आएंगे।
जब एक खस्ताहाल शिव मंदिर में रोई अंग्रेज पत्नी और पुजारियों ने बताया महाकाल की शरण का रास्ता
कहते हैं ना की जब इंसान के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, जब विज्ञान, ताकत और गुरूर सब घुटने टेक देते हैं… तब सिर्फ एक ही दरवाज़ा बचता है, और वो है ईश्वर का दरवाज़ा!
एक दिन लेडी मार्टिन हताशा और दुख में डूबी हुई, अपना घोड़ा दौड़ाते हुए आगर-मालवा की बाणगंगा (Banganga) नदी के किनारे-किनारे बेतहाशा गुज़र रही थीं।
उनके दिमाग में सिर्फ अपने पति की मौत का डर घूम रहा था। तभी अचानक उनके कानों में एक रूह को सुकून देने वाली आवाज़ पड़ी। यह आवाज़ घंटियों, शंख और वेदों के मंत्रों की थी!
लेडी मार्टिन ने अपना घोड़ा रोका। वो आवाज़ की दिशा में बढ़ीं, तो देखा की नदी के किनारे एक बहुत ही पुराना, जर्जर और खस्ताहाल सा शिव मंदिर है। यह आगर-मालवा का प्राचीन ‘बैजनाथ महादेव मंदिर’ था।
ना जाने उस अंग्रेज औरत को क्या महसूस हुआ की वो बिना कुछ सोचे-समझे उस हिंदू मंदिर के अंदर चली गईं। अंदर शिवलिंग के सामने कुछ पुजारी रुद्राभिषेक कर रहे थे।
लेडी मार्टिन एक आम बेबस औरत की तरह उन पुजारियों के सामने फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने रोते हुए उन पुजारियों को अपने पति के गायब होने और अफ़ग़ानिस्तान के खूनी युद्ध की पूरी कहानी बताई।
तब उन पुजारियों ने उस अंग्रेज पत्नी से जो कहा, वो इतिहास बन गया।
पुजारियों ने कहा- “मेमसाब! आप गलत जगह नहीं आई हैं। यह बैजनाथ महादेव का दरबार है। हमारे शिव, कालों के भी काल ‘महाकाल’ हैं। वो मृत्यु को भी मात दे सकते हैं। अगर वो चाह लें, तो यमराज को भी खाली हाथ लौटना पड़ता है। आप उनकी शरण में आइए, महादेव आपके पति को मौत के मुंह से भी सुरक्षित वापस खींच लाएंगे।”
वो पूछ बैठीं, “मुझे क्या करना होगा?”
पुजारियों ने उन्हें बताया की आपको भगवान शिव का ‘लघु-रुद्री अनुष्ठान’ करना होगा और 11 दिनों तक लगातार ‘ॐ नमः शिवाय’ के महामंत्र का जाप करना होगा।
अब सोचिए दोस्त! वो 1879 का दौर था। एक कट्टर ईसाई अंग्रेज महिला, जो चर्च जाती थी, आज वो महादेव के शिवलिंग के सामने अपना सिर झुकाने जा रही थी। चमत्कार की असल पटकथा तो यहीं से लिखी जानी शुरू हो गई थी!
ओम नमः शिवाय का वो 11 दिन का अनुष्ठान जिसने सात समंदर पार रणभूमि में ला दिया भूचाल
लेडी मार्टिन ने उस खस्ताहाल मंदिर के ठंडे फर्श पर बैठकर भगवान शिव का ‘लघु-रुद्री अनुष्ठान’ शुरू कर दिया। उनके हाथ में संकल्प का जल था और सामने बैठे थे साक्षात महाकाल!
उन्होंने अपने आंसुओं के बीच महादेव के शिवलिंग के सामने हाथ जोड़कर एक बहुत ही बड़ी मन्नत (संकल्प) मांगी। उन्होंने कहा-
“हे ईश्वर! मुझे नहीं पता की मेरे पति कहाँ हैं और किस हाल में हैं। लेकिन अगर आपने मेरे पति को उस खूनी युद्ध से ज़िंदा वापस मेरे पास भेज दिया, तो मैं इस जर्जर मंदिर का शानदार जीर्णोद्धार करवाऊंगी। इस मंदिर को एक भव्य रूप दूंगी।”
और फिर शुरू हुआ वो 11 दिन का महा-तप! लेडी मार्टिन ने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया। वो हर दिन मंदिर आतीं और ज़मीन पर बैठकर पुजारियों के साथ ‘ॐ नमः शिवाय’ के महामंत्र का जाप करतीं।
लगातार 11 दिनों तक उस अंग्रेज पत्नी के होठों से निकलने वाला ‘ॐ नमः शिवाय’ के उस मंत्र ने सात समंदर पार अफ़ग़ानिस्तान की रणभूमि में एक ऐसा भूचाल ला दिया, जिसे देखकर दुनिया की सारी साइंस और मिलिट्री टैक्टिक्स धरी की धरी रह गईं।
मौत बनकर टूटे थे दुश्मन और तभी बाघ की खाल पहनकर त्रिशूल लिए उतर गए साक्षात शिव
जहाँ लेडी मार्टिन का अनुष्ठान अपने चरम पर पहुँच रहा था, वहीं अफ़ग़ानिस्तान की बीहड़ और पथरीली घाटियों में कर्नल मार्टिन की ज़िंदगी अपनी आख़िरी सांसें गिन रही थी।
हालात इतने भयंकर हो चुके थे की कर्नल मार्टिन और उनके बचे-खुचे ब्रिटिश सैनिक पूरी तरह से घिर चुके थे। अंग्रेजों के हथियार जवाब दे चुके थे, गोलियां खत्म हो गई थीं और राशन का कोई नामोनिशान नहीं था।
कर्नल मार्टिन ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे समझ आ गया था की अब उसका अंत निश्चित है। उसे अपनी पत्नी लेडी मार्टिन का चेहरा याद आने लगा।
खूंखार अफगान सैनिक कर्नल मार्टिन और उसकी पलटन को काटने के लिए बिल्कुल उन पर टूट ही पड़े थे… कि तभी! तभी रणभूमि के ठीक बीचों-बीच एक रोंगटे खड़े कर देने वाला चमत्कार हुआ..
अफ़ग़ानिस्तान के उस खूनी मैदान में अचानक कहीं से भारत का एक ‘अघोरी योगी’ प्रकट हो गया! भाईसाहब, कर्नल मार्टिन ने बाद में जो नज़ारा अपनी चिट्ठी में बयान किया, वो सुनकर किसी भी सनातनी की आँखों से आंसू आ जायेंगे।
मार्टिन ने देखा की उस योगी के सिर पर लंबी-लंबी जटाएं थीं। उसके गठीले शरीर पर कपड़ों की जगह एक बाघ की खाल लिपटी हुई थी। और उसके हाथों में एक भयंकर, चमकता हुआ विशाल त्रिशूल था!
वो त्रिशूल धारी योगी कर्नल मार्टिन और उन खूंखार पठानों के बीच एक चट्टान की तरह खड़ा हो गया। उन पठानों ने जैसे ही उस योगी को देखा, उनके हाथ-पैर सुन्न पड़ गए।
जो पठान कुछ सेकंड पहले अंग्रेजों को काटने आ रहे थे, वो उस त्रिशूल वाले योगी का खौफनाक रौद्र रूप देखकर अपनी तलवारें वहीं फेंककर दुम दबाकर पहाड़ियों की तरफ भाग खड़े हुए।
कर्नल मार्टिन ज़मीन पर गिरा हुआ ये सब देख रहा था। उसका दिमाग सुन्न था की आख़िर ये इंसान है कौन? तभी वो बाघ की खाल वाला योगी धीरे-धीरे कर्नल मार्टिन के पास आया।
उसने मार्टिन की तरफ देखा और एक बहुत ही शांत लेकिन गूंजती हुई आवाज़ में कहा-
“तुम घबराओ मत! मैं यहाँ तुम्हारी जान बचाने आया हूँ। मैं तुम्हारी पत्नी की सच्ची प्रार्थनाओं और उसके अनुष्ठान से बहुत प्रसन्न हूँ!”
इतना बोलकर वो त्रिशूल धारी योगी पलक झपकते ही उस युद्ध के मैदान से ऐसे गायब हो गया, जैसे वहां कभी था ही नहीं! कर्नल मार्टिन की साँसें उखड़ी हुई थीं, वो सदमे में था की आख़िर अफ़ग़ानिस्तान के इस अनजान और खूंखार इलाके में भारत का कोई योगी अचानक प्रकट होकर उसकी जान कैसे बचा सकता है?
11वें दिन आया वो खत जिसे पढ़कर अंग्रेज पत्नी के पैरों तले खिसक गई ज़मीन
यहां लेडी मार्टिन का वो कठोर ‘लघु-रुद्री अनुष्ठान’ अपने 11वें और आख़िरी दिन में प्रवेश कर चुका था। लेडी मार्टिन मंदिर के फर्श पर बैठी पूरे मन से पूर्णाहूति दे रही थीं।
और भाई, चमत्कार देखिए! जैसे ही अनुष्ठान पूरा हुआ और पुजारियों ने आख़िरी मंत्र पढ़ा, वैसे ही मंदिर के बाहर घोड़े की टापों की तेज़ आवाज़ गूंजी।
एक ब्रिटिश मैसेंजर अपना घोड़ा दौड़ाता हुआ सीधा मंदिर के दरवाज़े पर आकर रुका। उसने लेडी मार्टिन को देखा और भागता हुआ उनके पास गया।
उसने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और लेडी मार्टिन के कांपते हुए हाथों में रख दिया।
खत में कर्नल मार्टिन ने लिखा था- “हम चारों तरफ से खूंखार अफगान पठानों से घिर गए थे और हमारी मौत पक्की थी।
लेकिन तभी रणभूमि में ना जाने कहाँ से एक अघोरी योगी प्रकट हो गया। उसके शरीर पर बाघ की खाल थी और हाथ में एक भयंकर त्रिशूल था।
उसने अपना त्रिशूल घुमाकर दुश्मनों में ऐसा खौफ पैदा किया की सारे अफगान सैनिक मैदान छोड़कर भाग गए। और जाते-जाते उस महान योगी ने मुझसे कहा की ‘मैं तुम्हारी पत्नी की सच्ची प्रार्थनाओं से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए यहाँ तुम्हारी जान बचाने आया हूँ!'”
लेडी मार्टिन वहीं मंदिर के फर्श पर धड़ाम से बैठ गईं। लेकिन सबसे बड़ा भूचाल तो तब आया जब उन्होंने खत में लिखी वो तारीख और वक़्त देखा!
जिस दिन और जिस समय अफ़ग़ानिस्तान की उस खूनी रणभूमि में वो त्रिशूल धारी योगी कर्नल मार्टिन की जान बचा रहा था… वो बिल्कुल वही दिन और वही समय था जब भारत के आगर-मालवा में लेडी मार्टिन रो-रोकर महादेव के शिवलिंग के सामने अपने पति की जान की भीख मांग रही थीं।
ये साक्षात शिव का वो चमत्कार था जिसने साबित कर दिया था की अगर भक्त की पुकार में सच्चाई हो, तो महाकाल सात समंदर पार भी मौत का रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं!
शिव की भक्ति में अंग्रेजों ने खुद अपनी जेब से खड़ा कर दिया शिव का ये भव्य मंदिर
कुछ हफ़्तों बाद जब अफ़ग़ान युद्ध शांत हुआ, तो कर्नल सी. मार्टिन सही-सलामत भारत वापस लौट आया। आगर-मालवा की छावनी में जब पति-पत्नी का मिलन हुआ, तो दोनों फूट-फूट कर रोए।
लेडी मार्टिन अपने पति का हाथ पकड़कर सीधा उसी बाणगंगा नदी के किनारे वाले बैजनाथ महादेव मंदिर ले गईं।
जब कर्नल मार्टिन ने मंदिर के अंदर जाकर भगवान शिव की मूर्ति और शिवलिंग को देखा, तो वो सन्न रह गया। यह वही बाघ की खाल, वही त्रिशूल और वही रौद्र रूप था जिसने अफ़ग़ानिस्तान में उसकी जान बचाई थी!
जो अंग्रेज कल तक अपनी मिलिट्री की ताकत और अपने हथियारों पर घमंड करते थे, वो आज भारत के उस छोटे से जर्जर शिव मंदिर में ज़मीन पर घुटनों के बल बैठकर रो रहे थे।
लेडी मार्टिन ने 11 दिन के अनुष्ठान के वक़्त महादेव से जो मन्नत मांगी थी, अब उसे पूरा करने का वक़्त आ गया था। साल था 1883। कर्नल मार्टिन और उनकी पत्नी ने अपनी जीवन भर की कमाई निकाली।
उस ज़माने में उन्होंने अपनी जेब से पूरे 15,000 रुपये दान किए! (आज के हिसाब से सोचेंगे तो ये रकम कई करोड़ रुपयों के बराबर बैठेगी)।
उन्होंने उस खस्ताहाल मंदिर की मरम्मत कराई और भगवान शिव का एक बेहद विशाल, भव्य और शानदार मंदिर खड़ा करवा दिया, जिसे आज हम और आप ‘बैजनाथ महादेव मंदिर’ के नाम से जानते हैं।
आज भी उस भव्य बैजनाथ महादेव मंदिर की दीवार पर एक बड़ा सा पत्थर (शिलालेख) खड़ा है। उस पत्थर पर साफ़-साफ़ अक्षरों में लेफ्टिनेंट कर्नल सी. मार्टिन और लेडी मार्टिन का नाम गुदा हुआ है और 1883 में उनके द्वारा इस मंदिर के निर्माण की पूरी गवाही लिखी हुई है।
जब भी जिंदगी में लगे की सब कुछ खत्म हो गया है, तो आगर-मालवा के इस अंग्रेज दंपत्ति की कहानी याद कर लेना… क्योंकि जब तक महाकाल का त्रिशूल तुम्हारे साथ है, दुनिया की कोई ताकत तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकती!
हर हर महादेव! जय श्री महाकाल!
