भारत का वो गुमनाम वैज्ञानिक जिसने बनाया दुनिया का सबसे पहला ‘हवाई जहाज़’, पारे की शक्ति और ऋग्वेद के मंत्रों से अमेरिका से सालों पहले ‘मरुत्सखा’ विमान बनाने वाले सनातनी विद्वान ‘शिवकर बापूजी तलपड़े’

आपको याद होगा जनरल नॉलेज की क्लास में हमेशा एक सवाल आता था- “दुनिया के सबसे पहले हवाई जहाज़ का आविष्कार किसने किया था?”

और हम सब बिना सोचे-समझे, आंखें बंद करके जवाब लिख देते थे- “अमेरिका के राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) ने।” और हमें पूरे नंबर भी मिल जाते थे!

लेकिन सच कहूं तो इससे बड़ा झूठ इतिहास के पन्नों में शायद ही कोई और लिखा गया हो। अमेरिका के राइट ब्रदर्स ने 1903 में जो टीन का डब्बा उड़ाकर दुनिया भर में अपना नाम चमका लिया ना, उससे पूरे 8 साल पहले…

जी हां, एकदम सही सुना आपने, पूरे 8 साल पहले 1895 में हमारे ही देश के एक सनातनी विद्वान ने बंबई की चौपाटी पर दुनिया का पहला हवाई जहाज़ उड़ा कर अंग्रेजों और उनके सो-कॉल्ड ‘मॉडर्न साइंस’ को ठेंगा दिखा दिया था।

लेकिन क्या उस महान हिंदुस्तानी का नाम हमें कभी किसी स्कूल या किताब में बताया गया? नहीं!

क्योंकि हमारे इतिहास को लिखने वाले उन गोरों को यह बात कभी पची ही नहीं की एक ‘गुलाम’ हिंदुस्तानी ने वेदों के मंत्र पढ़कर वो कारनामा कर दिखाया था, जिसके बारे में पश्चिमी दुनिया के वैज्ञानिक उस वक्त सिर्फ सपने देखा करते थे।

आज वक्त आ गया है उस महान सनातनी वैज्ञानिक ‘शिवकर बापूजी तलपड़े’ की कहानी दुनिया के सामने रखने का।

कौन थे शिवकर बापूजी तलपड़े जिन्होंने विदेशी तकनीक को ठुकराकर हमारे वेदों के ज्ञान से बनाया था पहला विमान

बात 1864 की है। मुंबई के चीरा बाज़ार इलाके में एक संपन्न ‘पठारे प्रभु’ (Pathare Prabhu) परिवार में एक बच्चे का जन्म होता है, जिसका नाम रखा गया शिवकर बापूजी तलपड़े।

घर का माहौल अच्छा था तो पढ़ाई-लिखाई भी बढ़िया मिली। बचपन से ही ये बंदा एकदम तेज़-तर्रार था। आगे चलकर उन्होंने मुंबई के मशहूर ‘जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स’ (JJ School of Arts) में एडमिशन भी ले लिया।

लेकिन यार, उस इंसान का दिल उन अंग्रेजों की अंग्रेजी किताबों और पश्चिमी थ्योरी में कभी लगा ही नहीं। उनका दिमाग तो हमेशा वेदों, उपनिषदों और संस्कृत के श्लोकों में अटका रहता था।

उसी दौरान शिवकर जी पर स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज की बातों का गहरा असर हुआ।

कहते हैं की स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपनी किताब ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ में साफ-साफ लिखा था की हमारे वेदों में हवाई जहाज़ (विमान) बनाने की पूरी की पूरी विद्या और फॉर्मूले मौजूद हैं।

बस, यहीं से बापूजी तलपड़े जी के दिमाग की बत्ती जली! उन्होंने ठान लिया की इन अंग्रेजों की खोखली साइंस को तो मैं अपने सनातन विज्ञान से ही मात दूंगा।

उन्होंने विदेशी किताबों को उठाकर साइड में रखा और सीधे महर्षि भारद्वाज के लिखे पन्नों की तरफ लौट पड़े।

उन्होंने कसम खा ली थी कि वो दुनिया को ये साबित करके रहेंगे की हमारे वेद कोई सिर्फ पूजा-पाठ या कर्मकांड की किताबें नहीं हैं, बल्कि वो प्योर साइंस और इंजीनियरिंग के ग्रन्थ हैं।

महर्षि भारद्वाज का वैमानिक शास्त्र और पारे की वो रहस्यमयी वैदिक शक्ति जिसने लोहे के ढांचे में फूंकी थी उड़ने की जान

अब आता है इस कहानी का सबसे गज़ब और रोंगटे खड़े कर देने वाला हिस्सा। जब बापूजी तलपड़े ने विमान बनाने का काम शुरू किया, तो उन्होंने यूरोप का कोई इंजन कॉपी नहीं किया, न ही बाहर से कोई विदेशी पुर्ज़ा मंगवाया।

उनका पूरा का पूरा ब्लूप्रिंट हमारे प्राचीन ग्रंथों से निकला था।

उन्होंने महर्षि भारद्वाज के लिखे ‘वैमानिक शास्त्र’ और ऋग्वेद के मंत्रों को डिकोड करना शुरू किया। आज के जो सो-कॉल्ड लिबरल और नास्तिक लोग हमारे वेदों का मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें पता होना चाहिए की महर्षि भारद्वाज ने हज़ारों साल पहले ही आठ अलग-अलग तरह के विमानों का डिज़ाइन लिख दिया था!

तलपड़े जी ने उसी शास्त्र से एक ऐसी तकनीक निकाली जिसे सुनकर आज के नासा (NASA) वाले भी अपना सिर खुजाने लगें।

उन्होंने ‘मर्करी आयन इंजन’ (Mercury Ion Engine) का कॉन्सेप्ट इस्तेमाल किया! जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना।

वैदिक साइंस कहती है की अगर पारे (Liquid Mercury/पारद) को एक खास तरीके से सौर ऊर्जा (Solar energy) के साथ रिएक्ट करवाया जाए और उसे गर्म किया जाए, तो उसमें से भयंकर थ्रस्ट (Thrust) यानी एक ज़बरदस्त धक्का पैदा होता है।

इसी थ्रस्ट की ताकत से कोई भी भारी लोहे या लकड़ी का ढांचा गुरुत्वाकर्षण (Gravity) को चीरकर हवा में उठ सकता है।

आज का मॉडर्न एविएशन विज्ञान भी इस बात को मानता है की पारे से बनी गैस में बहुत ताकत होती है। तलपड़े जी ने बिना किसी फैंसी लैब या करोड़ों की मशीनरी के, सिर्फ अपने वैदिक ज्ञान और देसी जुगाड़ के दम पर उस पारे वाली तकनीक को सच कर दिखाया।

उन्होंने बांस, लकड़ी और कुछ खास धातुओं को मिलाकर एक ढांचा तैयार किया, बीच में वो पारद वाला इंजन सेट किया और अपने उस ऐतिहासिक हवाई जहाज़ को नाम दिया- ‘मरुत्सखा’।

मरुत्सखा अब पूरी तरह से तैयार था। एक हिंदुस्तानी ने अपनी मेहनत और सनातन धर्म के ज्ञान से वो मशीन तैयार कर ली थी, जो इतिहास की पूरी दिशा बदलने वाली थी।

अब बस उस दिन का इंतज़ार था जब मुंबई की चौपाटी पर आसमान नापने का असली खेल होने वाला था!

पंद्रह सौ फीट की ऊंचाई और राजाओं की गवाही, जब मरुत्सखा विमान ने आसमान में गाड़ दिया था सनातन का झंडा

साल था 1895… दिन और तारीख तो इतिहास की किताबों ने चालाकी से गायब कर दिए, लेकिन मुंबई की चौपाटी का वो नज़ारा वहां मौजूद लोगों के ज़हन में हमेशा के लिए छप गया।

बापूजी तलपड़े ने अपने गुरुओं को याद किया, वेदों के मंत्र बुदबुदाए और उस पारद इंजन को स्टार्ट कर दिया। और फिर जो हुआ, उसने पूरी दुनिया की साइंस के होश उड़ा दिए!

देखते ही देखते वो मरुत्सखा विमान ज़मीन छोड़कर हवा में उठने लगा। बिना किसी पायलट (Unmanned) के वो स्वदेशी जहाज़ आसमान को चीरते हुए ऊपर जा रहा था।

सौ-दो सौ फीट नहीं भाईसाहब… पुरानी रिपोर्ट्स गवाही देती हैं की तलपड़े जी का वो विमान पूरे 1500 फ़ीट की ऊंचाई तक पहुंच गया था!

ज़रा तुलना तो कीजिए! 1903 में जिस राइट ब्रदर्स के ‘कमाल’ का पूरी दुनिया ढिंढोरा पीटती है ना, उनका वो टीन का डब्बा मुश्किल से 120 फीट की दूरी तक गया था और सिर्फ 12 सेकंड हवा में टिका था।

और हमारे तलपड़े जी का मरुत्सखा 1895 में ही 1500 फीट ऊपर उड़ रहा था और कई मिनटों तक हवा में स्थिर रहा।

और ये कोई हवा-हवाई बात नहीं है की किसी ने कह दिया और हमने मान लिया। इस ऐतिहासिक घटना को देखने के लिए वहां कोई ऐरे-गैरे लोग नहीं खड़े थे।

इस उड़ान के गवाहों में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़, देश के मशहूर और सम्मानित जज महादेव गोविंद रानाडे और मुंबई के जाने-माने व्यापारी लालजी नारायण जैसी हस्तियां मौजूद थीं।

इन सबने अपनी आंखों से एक हिंदुस्तानी के सपने को आसमान में उड़ान भरते देखा था। लग रहा था की अब भारत के दिन फिरने वाले हैं।

कांप उठी थी ब्रिटिश हुकूमत और फिर रची गई वेदों के इस सबसे बड़े चमत्कार को चोरी करने की खौफनाक साज़िश

लेकिन एक बात हमेशा याद रखना दोस्त, जब भी कोई सनातनी या हिंदुस्तानी अपने दम पर कुछ बड़ा करता है, तो सबसे ज़्यादा दर्द उन विदेशी ताकतों को ही होता है जो हमें हमेशा अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती हैं।

जब अंग्रेज़ अधिकारियों ने चौपाटी पर उस उड़ते हुए जहाज़ को देखा, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई! उन्हें लगा की भाई, ये तो गज़ब हो गया।

जो हिंदुस्तानी बिना हमारी किसी मॉडर्न साइंस की डिग्री के, सिर्फ अपनी पुरानी किताबों (वेदों) को पढ़कर हवाई जहाज़ उड़ा सकता है… वो कल को इन्हीं जहाज़ों में बम भरकर हमारे ऊपर भी तो गिरा सकता है!

अंग्रेज़ों को समझ आ गया था की अगर इस शिवकर बापूजी तलपड़े को नहीं रोका गया, तो इनकी सत्ता बहुत जल्दी उखड़ जाएगी। बस, यहीं से शुरू हुआ उस महान वैज्ञानिक को बर्बाद करने का एक खौफनाक खेल।

तलपड़े जी को इस जहाज़ के आगे के रिसर्च के लिए बहुत पैसों की ज़रूरत थी। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ उन्हें फंडिंग दे रहे थे।

लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने तुरंत महाराजा पर भयंकर दबाव डाला, उन्हें डराया-धमकाया और तलपड़े जी को मिलने वाली पाई-पाई की फंडिंग रुकवा दी।

पैसे का जुगाड़ ना हो पाने के कारण तलपड़े जी अपने रिसर्च को आगे नहीं बढ़ा पाए। वो कर्ज़ के दलदल में धंसते चले गए। रही-सही कसर किस्मत ने पूरी कर दी, जब उनकी पत्नी का अचानक देहांत हो गया।

वो पूरी तरह टूट गए। जो इंसान पूरी दुनिया को उड़ने का सपना दिखा रहा था, वो इंसान अपने ही देश में एकदम अकेला और गुमनाम पड़ गया।

और फिर 1916 में, गरीबी, कर्ज़ और निराशा के अंधेरे में भारत के इस सबसे महान वैज्ञानिक ने खामोशी से अपनी आंखें हमेशा के लिए मूंद लीं।

अपनी ही ज़मीन पर गुमनाम हो गए तलपड़े, पर आज वक्त आ गया है सनातन के इस सच्चे सपूत को उसका हक दिलाने का

तलपड़े जी तो चले गए, लेकिन अंग्रेज़ों की नीचता अभी बाकी थी। उन्हें उस तकनीक से बहुत डर लगता था जो तलपड़े जी ने महर्षि भारद्वाज के ग्रंथों से निकाली थी।

जैसे ही बापूजी तलपड़े का निधन हुआ, अंग्रेज़ों की एक चालाक कंपनी ‘रैली ब्रदर्स’ (Ralli Brothers) के लोग गिद्धों की तरह उनके घर पहुंच गए।

इन गोरे लोगों ने तलपड़े जी के दुखी और कर्ज़ में डूबे रिश्तेदारों को चंद रुपयों का लालच दिया, उन्हें धोखे में रखा और उस ‘मरुत्सखा’ जहाज़ का पूरा का पूरा ढांचा, उनके बनाए गए वैदिक डिज़ाइन और सारे के सारे नोट्स ज़ब्त कर लिए।

वो सारा बेशकीमती खज़ाना चुपचाप पानी के जहाज़ में लादकर लंदन भेज दिया गया। सब कुछ हमेशा के लिए गायब कर दिया गया।

अब ज़रा क्रोनोलॉजी समझिए भाई! 1895 में हमारा विमान उड़ता है, अंग्रेज़ हमारे डिज़ाइन चोरी करके ले जाते हैं, और कुछ ही सालों बाद 1903 में अमेरिका के राइट ब्रदर्स अचानक से दुनिया का ‘पहला’ हवाई जहाज़ उड़ाने का दावा कर देते हैं।

क्या ये महज़ एक इत्तेफ़ाक़ था?

खैर, आज ये हमारी ज़िम्मेदारी है की हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को राइट ब्रदर्स का वो झूठा पाठ रटाने के बजाय, बापूजी तलपड़े की कहानी सुनाएं।

उन्हें बताएं की Aviation का असली उस्ताद यूरोप या अमेरिका में नहीं, बल्कि हमारे भारत में पैदा हुआ था!

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