कैंसर से तड़प कर मरती रही माँ लेकिन नहीं पिघला बांग्लादेश के जिहादियों का दिल, हिंदू संत ‘चिन्मय दास’ को अपनी माँ के आखिरी दर्शन से रोक कर दिखा दिया तारिक़ रहमान ने अपना असली दानवी चेहरा

जब कोई सिस्टम किसी एक धर्म से नफरत के नशे में अंधा होकर किसी माँ को तड़पते हुए मरने को छोड़ देता है, तो समझ जाइए की वहां इंसानियत मर चुकी है।

आज जो कुछ भी पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुआ है, उसने पूरी दुनिया के सामने वहां के सिस्टम का ऐसा घिनौना और दानवी चेहरा बेनकाब कर दिया है, जिसे सनातनी समाज शायद ही कभी भूल पाए।

ये जो ‘नए बांग्लादेश’ और ‘डेमोक्रेसी’ का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटा जा रहा है ना, आज उसका सबसे खौफनाक सच बाहर आ गया है।

एक बेगुनाह हिंदू संत को महज़ इसलिए अपनी मरती हुई माँ के आखिरी दर्शन नहीं करने दिए गए क्योंकि उसने अपने हिंदू भाइयों के हक के लिए आवाज़ उठाई थी।

इंसानियत का सरेआम कत्ल और एक तड़पती माँ की आह… क्या यही है प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान का ‘नया बांग्लादेश’

सच कहूं तो सत्ता का नशा इंसान को किस कदर अंधा और ज़ालिम बना देता है, ये कोई बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान से सीखे।

अभी कुछ महीने पहले ही ये लोग दुनिया भर के सामने बड़े-बड़े भाषण पेल रहे थे की हम बांग्लादेश में लोकतंत्र लाएंगे, सबको बराबर का हक देंगे।

लेकिन पर्दे के पीछे जो जिहादी और कट्टरपंथी खेल चल रहा है, उसने इंसानियत का सरेआम कत्ल कर दिया है।

ज़रा सोचिए, एक 71 साल की बूढ़ी माँ… जो स्टेज-4 के जानलेवा कैंसर से जूझ रही है, जिसकी सांसें कभी भी उखड़ सकती हैं, वो अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी-पड़ी सिर्फ एक ही रट लगाए हुए थी की “मुझे मेरे बेटे से मिलना है।”

लेकिन सत्ता के नशे में चूर तारिक़ रहमान की सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। क्या किसी हिंदू संत को उसकी मरती हुई माँ से मिलने से रोक देने से तुम्हारी कुर्सी और मजबूत हो जाएगी?

क्या एक बेबस बूढ़ी औरत के आंसुओं से तुम्हारा ये ‘नया बांग्लादेश’ ताकतवर बन जाएगा?

हकीकत तो ये है भाई की इन सफेदपोश नेताओं के सीने में हिंदुओं के लिए सिर्फ और सिर्फ ज़हर भरा है।

जो प्रधानमंत्री दुनिया भर के कैमरों के सामने आकर मानवाधिकार की लंबी-लंबी डींगें हांकता है, आज उसी की पुलिस और प्रशासन ने एक हिंदू संत के साथ वो सुलूक किया है जो शायद कोई खूंखार आतंकियों के साथ भी न करे।

बाबा मरने से पहले मेरे बेटे से मिला दो… अस्पताल के बिस्तर से रोती रही माँ लेकिन जिहादी पीएम तारिक़ ने कर दी अर्ज़ी ख़ारिज

इस दर्दनाक कहानी का हर एक पन्ना आंसुओं से भीगा हुआ है। हम बात कर रहे हैं संत चिन्मय कृष्ण दास की माँ, संध्या रानी धर (Sandhya Rani Dhar) की।

71 साल की संध्या रानी चटगांव (Chattogram) के ‘माँ-ओ-शिशु अस्पताल’ के आईसीयू (ICU) में अपनी ज़िंदगी की आखिरी जंग लड़ रही थीं। कैंसर ने उनके शरीर को पूरी तरह से खोखला कर दिया था और डॉक्टर भी जवाब दे चुके थे।

उस माँ को पता था की उसकी ज़िन्दगी की लौ कभी भी बुझ सकती है, इसलिए वो मरने से पहले एक बार अपने बेटे को देखना चाहती थी।

इसी के चलते संध्या रानी ने अस्पताल के बिस्तर से कांपती हुई आवाज़ में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान को “बाबा” (यानी पिता तुल्य) कहकर गुहार लगायी।

वो रोते-रोते कह रही थीं- “बाबा, मेरे पास अब बिल्कुल वक़्त नहीं बचा है। मैं जा रही हूँ… बस मरने से पहले मेरे बेटे चिन्मय को एक बार मुझसे मिला दो।”

यार, एक मरती हुई माँ जब किसी को ‘बाबा’ कहकर कोई भीख मांगती है ना, तो दुश्मन का भी दिल पसीज जाता है। चिन्मय दास के वकीलों ने और उनके परिवार ने प्रशासन के सामने कई बार पैरोल (Parole) की अर्जी लगाई।

मिन्नतें कीं कि सिर्फ कुछ घंटों के लिए, भारी पुलिस कस्टडी में ही सही, लेकिन बेटे को माँ का चेहरा देख लेने दो।

लेकिन तारिक़ रहमान के जल्लाद प्रशासन ने क्या किया? उन्होंने बड़ी ही बेरहमी और बेशर्मी से इस अर्जी को कूड़े में फेंक दिया। प्रशासन ने जानबूझकर मामले को लटकाए रखा, कागज़ी कार्रवाई का बहाना बनाया और फिर सीधा-सीधा पैरोल देने से मना कर दिया।

ये कोई कानूनी मजबूरी नहीं थी दोस्त, ये एक क्रूर और नीच साज़िश थी। ये जिहादी सिस्टम चिन्मय दास को तड़पाना चाहता था।

वो उन्हें ये अहसास दिलाना चाहते थे की अगर तुमने बांग्लादेश में हिंदुओं के हक की आवाज़ उठाई, तो हम तुम्हें तुम्हारी मरती हुई माँ के आखिरी दर्शन तक नहीं नसीब होने देंगे।

जीते जी एक झलक नहीं देखने दी, और माँ की मौत के बाद जख्म में नमक लगाने के लिए दिया महज़ 5 घंटे का समय

इंसानियत इतनी भी नीच हो सकती है, ये किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। 10 सितंबर 2026 की वो सुबह… जब एक माँ अपनी आंखों में बेटे का चेहरा देखने की तड़प लिए हुए, घुट-घुट कर इस दुनिया से हमेशा के लिए चली गई।

चटगांव के ‘श्री पुंडरीक धाम’ आश्रम में जब संध्या रानी की बेजान देह पहुंची, तो वहां का माहौल ऐसा था की पत्थर भी रो पड़े। हर किसी की आंख में आंसू थे और ज़ुबान पर एक ही सवाल था की क्या सच में सिस्टम इतना ज़ालिम हो सकता है?

लेकिन असली क्रूरता का नंगा नाच तो इसके बाद शुरू हुआ। जब माँ मर गई, उनके प्राण निकल गए, तब जाकर इस तारिक़ रहमान के ज़ालिम प्रशासन ने अपनी झूठी ‘दरियादिली’ दिखाने का ड्रामा रचा।

चटगांव के डीसी ने चिता जलाने और अंतिम संस्कार के लिए चिन्मय दास को महज़ 5 घंटे की पैरोल दी। मतलब सोचिए ज़रा! जब माँ ज़िंदा थी, तड़प रही थी, भीख मांग रही थी, तब तुम्हारे कानों पर जूं नहीं रेंगी।

और जब वो आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं, तब तुम 5 घंटे का झुनझुना थमा कर दुनिया को दिखा रहे हो की तुम कितने ‘दयालु’ हो? अरे लानत है तुम जिहादियों पर!

भारी पुलिस फोर्स के बीच जब चिन्मय दास को वहां लाया गया और उन्होंने अपनी माँ का बेजान चेहरा देखा, तो वो फफक-फफक कर रो पड़े।

एक संत, जिसने दुनिया की मोह-माया छोड़ दी हो, वो एक बच्चे की तरह बिलख रहा था। अपनी माँ के शव के पास उनका वो टूट कर गिर जाना किसी का भी कलेजा चीरने के लिए काफी था।

उन्होंने असहनीय पीड़ा के साथ अपनी माँ का अंतिम-संस्कार किया।

और जैसे ही वो 5 घंटे खत्म हुए, प्रशासन के जल्लादों ने उन्हें वापस उठाया और किसी जानवर की तरह जेल की वैन में ठूंसकर फिर से उसी कालकोठरी में फेंक दिया।

एक बेटे से उसकी माँ की चिता की राख ठंडी होने से पहले ही विदाई ले ली गई।

हिंदुओं के नरसंहार पर आवाज़ उठाना बना सबसे बड़ा गुनाह, आखिर किस बात की सज़ा काट रहे हैं संत चिन्मय दास

अब यहां सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की आखिर संत चिन्मय कृष्ण दास जेल में क्यों हैं? क्या उन्होंने कोई खून किया है? क्या वो किसी आतंकी संगठन के सरगना हैं? नहीं भाई, बिल्कुल नहीं!

वो तो बांग्लादेश की ‘सम्मिलित सनातनी जागरण जोट’ (Sammilita Sanatani Jagaran Jote) के प्रवक्ता और हिंदू समाज के एक बहुत ही सम्मानित संत हैं।

तो फिर उन्हें खूंखार अपराधियों की तरह जेल में क्यों सड़ाया जा रहा है? हकीकत ये है की जब शेख हसीना की सरकार गिरी और पूरे बांग्लादेश में जिहादियों ने हिंदुओं का कत्लेआम (Genocide) शुरू कर दिया था, तब ये संत चुप नहीं बैठा।

जब जिहादी हिंदुओं के घर जला रहे थे, मंदिरों को तोड़ रहे थे और बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूट रहे थे, तब इसी चिन्मय दास ने हजारों हिंदुओं को डर से बाहर निकाला और सड़कों पर उतार दिया।

इन्होंने जिहादियों की आंखों में आंखें डालक कहा की “हम इस देश के नागरिक हैं और हम अपने हक के लिए लड़ेंगे।”

बस, यही वो आवाज़ थी जिसने तारिक़ रहमान और उनके पालतू कट्टरपंथियों की रातों की नींद उड़ा दी। ये बर्दाश्त ही नहीं कर पाए की एक हिंदू संत उनके जिहादी सिस्टम के सामने सीना तान कर खड़ा कैसे हो गया!

इसी बात से बुरी तरह चिढ़कर, इन जिहादियों ने चिन्मय दास पर ‘राष्ट्रीय ध्वज के अपमान’ और ‘देशद्रोह’ (Sedition) का बिल्कुल फर्जी और मनगढ़ंत केस थोप दिया।

कोई सबूत नहीं, कोई गवाह नहीं, बस एक साज़िश के तहत उन्हें उठाया और जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया। आज चिन्मय दास को जो सज़ा मिल रही है, वो किसी जुर्म की सज़ा नहीं है दोस्त।

वो सज़ा है बांग्लादेश में ‘हिंदू होने’ की। वो सज़ा है अपनी गर्दन न झुकाने की।

जमात-ए-इस्लामी और जिहादियों के इशारे पर नाच रही है बांग्लादेश सरकार, तारिक़ रहमान का असली दानवी चेहरा आ गया दुनिया के सामने

अब ज़रा इस पूरे खेल के पीछे छिपे असली चेहरों और उनकी साज़िश को समझिए। आपको क्या लगता है की एक संत को पैरोल ना देना सिर्फ किसी पुलिस वाले या जेलर का फैसला था?

बिल्कुल नहीं! ये आदेश सीधे ऊपर से आए थे। दुनिया को दिखाने के लिए भले ही ये सरकारें लोकतंत्र का चोला पहन लें, लेकिन पर्दे के पीछे असली डोर बीएनपी (BNP) के नेता और मौजूदा प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान और उनके कट्टरपंथी आकाओं के हाथ में है।

ये सरकार असल में जमात-ए-इस्लामी और उन जिहादी ताकतों के इशारों पर नाच रही है, जिनका इकलौता मकसद बांग्लादेश को पूरी तरह से ‘हिंदू-मुक्त’ (Hindu-mukt) करना है।

जब चिन्मय दास ने हिंदुओं को एकजुट किया, तो इन कट्टरपंथियों की ज़मीन खिसकने लगी। उन्हें लगा की अगर हिंदू ऐसे ही जाग गए, तो उनका जिहादी एजेंडा फेल हो जाएगा।

इसलिए चिन्मय दास को पैरोल ना देना तारिक़ रहमान और उनके जल्लादों का बांग्लादेश के हर एक हिंदू को दिया गया एक बहुत ही खौफनाक संदेश था।

वो चिन्मय दास को अंदर से तोड़ना चाहते थे, उन्हें रुलाना चाहते थे, ताकि बाकी हिंदू खौफ खाकर अपने घरों में दुबक जाएं।

आतंकी उमर खालिद के लिए रोने वाला सेक्युलर इकोसिस्टम आज मुँह में दही जमा के क्यों बैठा है?

दुनिया भर का वो ‘सेक्युलर और मानवाधिकार वाला गैंग’ आज कहाँ मुंह छुपाए बैठा है?

हमारे यहाँ जब दिल्ली दंगों के आरोपी और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल ‘उमर खालिद’ की माँ की सिर्फ तबीयत खराब होती है या सर्जरी होनी होती है, तो उसे तुरंत 3 दिन की अंतरिम बेल मिल जाती है।

उसके लिए बड़े-बड़े लिबरल वकील आधी रात को कोर्ट खुलवा लेते हैं। पूरा इकोसिस्टम उसके मानवाधिकार के लिए रोने लगता है।

लेकिन आज जब पड़ोस में एक बेगुनाह हिंदू संत को उसकी मरती हुई माँ से नहीं मिलने दिया गया, जब एक माँ तड़प-तड़प कर मर गई… तो इन सबके मुंह में दही क्यों जम गया है?

क्या इनकी इंसानियत की बैटरी सिर्फ उमर खालिद जैसे लोगों के लिए ही चार्ज होती है? जब हिंदुओं के मानवाधिकार की बात आती है, तो ये सारे ‘सेक्युलर’ अंधे, बहरे और गूंगे क्यों हो जाते हैं?

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