बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 6: भगवान राम का अस्तित्व नकारने की गलती और विकास के नाम पर राम सेतु तोड़ने की जिद, कांग्रेस के आत्मघाती फैसले जिन्होंने बहुसंख्यक समाज को बीजेपी के हवाले करके सौंप दी सत्ता की चाबी

शुरू करने से पहले, खुद से पूछिए

अगर कोई सरकार आपके घर के आराध्य देव को अदालत में ‘काल्पनिक’ लिख दे, तो क्या आप उसे छोटी राजनीतिक गलती मानेंगे?

अगर विकास के नाम पर आपके सामने पांच सुरक्षित रास्ते हों और सरकार जानबूझकर उसी रास्ते पर अड़ जाए जो आस्था को चीरता है, तो क्या आप उसे विकास कहेंगे?

यह एपिसोड इन्हीं दो सवालों के इर्द-गिर्द है। तथ्य वही हैं। अंदाज़ सिर्फ इतना बदला है कि आप घटना को महसूस कर सकें, सिर्फ पढ़कर निकल न जाएं।

इस एपिसोड में आप क्या पढ़ने वाले हैं

पूरा लेख उसी कहानी को रखता है जो पहले थी। फर्क इतना है कि हर मोड़ पर आप ठहर सकें, सबूत देख सकें और दोहरे मापदंड को टेबल पर रखकर तुलना कर सकें।

क्रम विषय उपशीर्षक
01 सेल्फ-गोल की असल कहानी हिंदू वोटर की लक्ष्मण रेखा और वो हलफनामा जिसने आस्था को मिथक बना दिया
02 सेतुसमुद्रम और अलाइनमेंट 6 चंद घंटों का सफर बचाने के नाम पर राम सेतु तोड़ने का प्लान
03 नासा, पत्थर और विज्ञान सैटेलाइट तस्वीरें और भूगर्भीय साक्ष्य जिन्हें रद्दी की टोकरी में फेंका गया
04 नौसेना और पचौरी कमेटी आर्थिक फायदे वाले नैरेटिव की सरकारी पोल
05 12 सितम्बर 2007 सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम को काल्पनिक बताने वाला मनहूस दिन
06 स्वामी, सड़क और मंदिर कानूनी लड़ाई और रामेश्वरम रामसेतु रक्षा मंच का देशव्यापी आंदोलन
07 करुणानिधि बनाम मोदी ज़हरीले बोल, चुप्पी और वो पलटवार जिसने नैरेटिव बदल दिया
08 दो दिन का डैमेज कंट्रोल हलफनामा वापसी और दो छोटे अफसरों को बलि का बकरा बनाना
09 शाहबानो वाला दोहरा चेहरा अल्पसंख्यक भावनाओं के लिए संविधान, हिंदुओं के भगवान के लिए स्टाम्प पेपर
10 कागज़ वापस, घाव बाकी साइलेंट हिंदू वोटर का जागना और सत्ता की चाबी का स्थायी हस्तांतरण

कहानी का नक्शा · 2002 से 2007 तक के फैसले

समय क्या हुआ
2002 नासा की सैटेलाइट इमेजरी में धनुषकोडी और मन्नार द्वीप के बीच पानी के नीचे सीधा पुल साफ दिखता है।
यूपीए काल सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट आता है। 5-6 अलाइनमेंट उपलब्ध। टी.आर. बालू ‘अलाइनमेंट 6’ चुनते हैं, जो राम सेतु को चीरता है।
आंदोलन शुरू आडवाणी तालिबान-बामियान वाली तुलना करते हैं। जोशी थोरियम वाले आर्थिक खेल की पोल खोलते हैं। साधु-संत और पर्यावरणविद चेताते हैं।
विशेषज्ञ रिपोर्ट भारतीय नौसेना-कोस्ट गार्ड कहते हैं बड़े जहाज नहीं निकल सकते। पचौरी कमेटी अलाइनमेंट 6 को आर्थिक और इकोलॉजिकल दोनों पैमानों पर Unviable बताती है।
12 सितम्बर 2007 एएसआई, संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी के मंत्रालय के अधीन, सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करता है: राम ऐतिहासिक नहीं, प्रमाण नहीं।
14 सितम्बर 2007 दो दिन बाद हलफनामा वापस। एच.आर. भारद्वाज कहते हैं राम हिमालय की तरह सत्य हैं। दो एएसआई अधिकारियों को सस्पेंड किया जाता है।
कोर्ट और सड़क सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर अंतरिम रोक। रामेश्वरम रामसेतु रक्षा मंच का देशव्यापी चक्का जाम। करुणानिधि का बयान। मोदी का पलटवार।

1. जादुई छड़ी नहीं, विपक्ष के सेल्फ-गोल

चुनावी विश्लेषकों की उस धारणा के खिलाफ तर्क कि बीजेपी को हराना नामुमकिन है।

चुनावी विश्लेषक अक्सर कहते हैं कि बीजेपी तो एक अजेय मशीन बन गई है, उसे हराना नामुमकिन है! लेकिन सच कहूं? इसमें बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है।

ज़मीनी हकीकत ये है कि बीजेपी के पास चुनाव जीतने की कोई जादुई छड़ी नहीं है। बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उनका अपना कैडर नहीं, बल्कि सत्ता के नशे में चूर वो विपक्ष है, जो बार-बार अपने ही पैरों पर ऐसी कुल्हाड़ी मारता है कि आम जनता खुद-ब-खुद खिंचकर बीजेपी की झोली में जा गिरती है।

ज़रा इस बात को गहराई से समझिए। दशकों तक इस देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज ने कांग्रेस को छप्पर फाड़ कर वोट दिया था। हिंदू वोटर स्वभाव से बहुत सहिष्णु होता है।

उसे आपकी छोटी-मोटी राजनीतिक गलतियों से इतना फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हर इंसान की, हर समाज की एक ‘लक्ष्मण रेखा’ होती है।

जब कोई राजनीतिक दल सत्ता में अंधा होकर उस लक्ष्मण रेखा को लांघने की जुर्रत करता है, तब जो ज्वालामुखी फटता है, वो अच्छे-अच्छों का राजनीतिक इतिहास मिट्टी में मिला देता है।

सोचिए ज़रा

सहिष्णु वोटर माफ कर देता है भ्रष्टाचार की एक गलती, महंगाई की एक लहर, गठबंधन की एक मजबूरी। वह माफ नहीं करता उस क्षण को जब आप उसके भगवान के होने पर ही सवाल खड़ा कर दें। यही इस एपिसोड की कुंजी है।

कांग्रेस ने ठीक यही महा-पाप किया था। यूपीए (UPA) सरकार के दौरान इन्होंने न केवल करोड़ों हिंदुओं की आस्था के परम केंद्र ‘राम सेतु’ पर बुलडोज़र चलाने की साजिश रची, बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में एक सरकारी हलफनामा देकर डंके की चोट पर कह दिया कि ‘भगवान राम तो कभी पैदा ही नहीं हुए’।

ज़रा सोचिए! जिस राम के नाम से इस देश के आम आदमी की सुबह होती है, जिस राम के नाम पर इस देश की रग-रग धड़कती है, उसे ही इस इकोसिस्टम ने एक ‘मिथक’ (Myth) बता दिया।

ये वो ऐतिहासिक और आत्मघाती ‘सेल्फ-गोल’ था, जिसने हिंदू समाज की आंखें हमेशा के लिए खोल दीं। जनता को समझ में आ गया कि जो लोग अपने वोटबैंक और राजनीतिक फायदे के लिए हमारे भगवान के अस्तित्व को ही बेच सकते हैं, वो हमारे सगे कभी नहीं हो सकते।

बीजेपी को इस गुस्से को भुनाने के लिए कोई एक्स्ट्रा मेहनत नहीं करनी पड़ी। कांग्रेस ने खुद ही स्टाम्प पेपर पर साइन करके खुद को हिंदू-विरोधी साबित कर दिया था, और यहीं से शुरू हुआ बहुसंख्यक समाज का वो पलायन, जिसने विपक्ष को ऐसे पटखनी दी कि वो आज तक उठ नहीं पाए।

इस हिस्से से तीन बातें जेहन में रखिए

  1. बीजेपी को जादुई छड़ी नहीं, विपक्ष की बार-बार दोहराई गई लक्ष्मण-रेखा वाली गलती मिली।
  2. हिंदू वोटर छोटी गलतियां सहता रहा। आस्था के केंद्र राम सेतु और राम के अस्तित्व पर वार सह नहीं सका।
  3. 12 सितम्बर 2007 का सरकारी हलफनामा वह स्टाम्प पेपर बना, जिसने पलायन को स्थायी दिशा दे दी।

2. सेतुसमुद्रम: विकास की कहानी, अलाइनमेंट की नीयत

कांग्रेस का वो सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट, जहां चंद घंटों का सफर बचाने के लिए बनाया गया राम सेतु के विध्वंस का प्लान – लेख का केंद्रीय आरोप।

आखिर ये पूरा बवाल शुरू कहां से हुआ? यूपीए सरकार एक बहुत बड़ा समुद्री प्रोजेक्ट लेकर आई थी – ‘सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट’ (SSCP)। इस प्रोजेक्ट का मोटा-मोटा मकसद ये था कि मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) और पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) के बीच समुद्र को गहरा करके एक रास्ता बनाया जाए।

तर्क ये दिया गया कि इससे भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच जाने वाले जहाजों को श्रीलंका का लंबा चक्कर नहीं काटना पड़ेगा और उनका कुछ घंटों का सफर और ईंधन बच जाएगा।

मानचित्र: पीली रेखा मौजूद लंबा समुद्री चक्कर दिखाती है। लाल बिंदीदार रेखा प्रस्तावित सेतुसमुद्रम नहर है, जो राम सेतु वाले इलाके से गुजरती है।

सुनने में तो ये ‘विकास’ की बहुत अच्छी कहानी लगती है, लेकिन असली खेल इसके अलाइनमेंट (Alignment) में छिपा था। भाई, समुद्र में रास्ता बनाने के लिए सरकार के पास एक-दो नहीं, बल्कि 5 से 6 अलग-अलग रूट (Alignments) मौजूद थे।

कई रूट ऐसे थे जो राम सेतु को बिल्कुल नहीं छूते थे। लेकिन कांग्रेस और उनकी सहयोगी पार्टी डीएमके (DMK) की नीयत में जो खोट था, वो यहीं से खुलकर सामने आ गया।

तत्कालीन जहाजरानी मंत्री (Shipping Minister) टी.आर. बालू, जो डीएमके से थे, उन्होंने जानबूझकर और बड़ी ही जिद के साथ ‘अलाइनमेंट 6’ को चुना।

अब आप पूछेंगे कि इस ‘अलाइनमेंट 6’ में ऐसा क्या खास था? खास ये था कि यह रूट सीधे एडम्स ब्रिज यानी हमारे पवित्र राम सेतु को चीरता हुआ जाता था!

मतलब आपके पास रास्ता बगल से निकालने का पूरा विकल्प है, लेकिन आप जिद पर अड़े हैं कि नहीं, हम तो राम सेतु को ही तोड़ेंगे

विकल्प थे। चुना गया वही रास्ता जो आस्था को काटता था

सवाल सरकारी दावा जमीनी बात
मकसद पूर्व-पश्चिम तट का सफर छोटा करना, ईंधन बचाना 5-6 अलाइनमेंट मौजूद थे। कई राम सेतु को छूते ही नहीं थे।
चुना गया रूट अलाइनमेंट 6 सीधे एडम्स ब्रिज यानी राम सेतु को चीरता हुआ जाता था।
कौन अड़ा विकास और शिपिंग सुविधा जहाजरानी मंत्री टी.आर. बालू (डीएमके) की जिद, गठबंधन धर्म।
चेतावनी प्रोजेक्ट जरूरी है समुद्री पर्यावरणविद: ब्लास्ट से मन्नार का इकोसिस्टम तबाह, मछुआरों की रोज़ी छिनेगी। साधु-संत: यह प्रभु राम की निशानी है।

तालिका लेख में दिए तथ्यों का सार है। नया दावा नहीं, वही पंक्तियां एक नजर में।

पर्यावरणविदों (Marine Ecologists) ने गला फाड़-फाड़ कर चेतावनी दी कि अगर यहां डायनामाइट लगाकर ब्लास्ट किया गया, तो मन्नार की खाड़ी का पूरा इकोसिस्टम तबाह हो जाएगा, मछुआरों की रोज़ी-रोटी छिन जाएगी।

देश भर के साधु-संतों ने हाथ जोड़कर मिन्नतें कीं कि प्रभु, यह हमारे आराध्य भगवान श्री राम की निशानी है, इसे मत उजाड़ो।

लेकिन यूपीए सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। गठबंधन धर्म निभाने की मजबूरी के आगे कांग्रेस ने आस्था पर बुलडोज़र चलाने का पूरा मन बना लिया था।

लेकिन कांग्रेस शायद यह भूल गई थी कि देश में मुख्य विपक्ष के रूप में एक ऐसी पार्टी बैठी है, जिसकी पूरी की पूरी राजनीतिक नींव ही भगवान राम के नाम पर रखी गई है।

जैसे ही टी.आर. बालू और यूपीए सरकार ने राम सेतु को तोड़ने वाले ‘अलाइनमेंट 6’ को हरी झंडी दिखाई, भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत कांग्रेस की इस हिंदू-विरोधी नब्ज़ को पकड़ लिया।

सबसे बड़ा, तीखा और ऐतिहासिक बयान आया राम जन्मभूमि आंदोलन के पुरोधा लालकृष्ण आडवाणी जी की तरफ से। आडवाणी जी ने कांग्रेस के इस महा-पाप की तुलना सीधे तौर पर खूंखार आतंकी संगठन ‘तालिबान’ से कर दी।

उन्होंने मीडिया और जनता के सामने गरजते हुए कहा कि:

“जिस तरह से अफगानिस्तान में तालिबान ने तोपों से बामियान के बुद्ध की ऐतिहासिक मूर्तियों को उड़ा दिया था, ठीक उसी तरह सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार हिंदुओं की आस्था के सबसे बड़े प्रतीक ‘राम सेतु’ पर डायनामाइट लगाने जा रही है।”
– लालकृष्ण आडवाणी

ज़रा सोचिए, ये कितना मारक बयान था! आडवाणी जी ने जनता के दिमाग में यह बात बिल्कुल साफ कर दी कि जो सरकार अपनी ही सांस्कृतिक धरोहर और भगवान की निशानी को नष्ट करे, उसकी मानसिकता और एक आतंकी संगठन की मानसिकता में कोई फर्क नहीं है।

साथ ही, बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने इस प्रोजेक्ट के पीछे के आर्थिक और वैज्ञानिक घोटाले की पोल खोल दी।

उन्होंने डंके की चोट पर कहा कि विकास और जहाज़ों का रास्ता छोटा करने का तर्क महज़ एक छलावा है, असली खेल मन्नार की खाड़ी में मौजूद बहुमूल्य ‘थोरियम’ को विदेशी कंपनियों के हाथों नीलाम करने का है।

पाठक से एक सवाल: अगर विकास ही मकसद था, तो राम सेतु से बचकर निकलने वाले अलाइनमेंट क्यों छोड़ दिए गए? इस एक सवाल का जवाब सरकार के पास कभी साफ नहीं आया।

3. नासा की तस्वीरें और वो पत्थर जो रेत से पुराने निकले

नासा की सैटेलाइट तस्वीरें और भूगर्भीय साक्ष्य जिन्हें दरकिनार करके कांग्रेस ने हिंदू आस्था पर बुलडोज़र चलाने की ठानी।

इस इकोसिस्टम का सबसे बड़ा पाखंड ये था कि ये लोग राम सेतु को तोड़ने के पीछे ‘विज्ञान’ का बहाना दे रहे थे। इनका कहना था कि राम सेतु कोई इंसानों का बनाया हुआ पुल नहीं है, बल्कि ये तो बस समुद्र के नीचे रेत और पत्थरों का एक प्राकृतिक टीला है।

लेकिन इनका ये सफेद झूठ तब सरेआम बेनकाब हो गया जब दुनिया की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) के सबूत सामने आ गए।

2002 में ही नासा की सैटेलाइट इमेजरी से खींची गई कुछ तस्वीरें पूरी दुनिया में वायरल हो गई थीं। इन स्पेस तस्वीरों में भारत के धनुषकोडी (Dhanushkodi) और श्रीलंका के मन्नार द्वीप के बीच पानी के ठीक नीचे एक बिल्कुल सीधा और रहस्यमयी पुल साफ-साफ दिख रहा था।

अंतरिक्ष से दिखती श्रृंखला: बाएं धनुषकोडी का सिरा, दाहिने मन्नार द्वीप की ओर बढ़ता पत्थरों और शोल्स का सीधा पुल। इनसेट में पूरा भारत-श्रीलंका फ्रेम।

जब दुनिया भर के भूगर्भशास्त्रियों ने इसकी जांच की, तो वो हैरान रह गए। उन्होंने बताया कि इस पुल में इस्तेमाल किए गए पत्थर आस-पास की रेत से भी कई हजारों साल पुराने हैं!

मतलब साफ था – रेत बाद में जमा हुई है, लेकिन वो पत्थर कहीं और से लाकर वहां एक लाइन में बिछाए गए थे। विज्ञान खुद चीख-चीख कर कह रहा था कि यह मैन-मेड (इंसानों द्वारा निर्मित) है और इसकी संरचना बिल्कुल वैसी ही है जैसी वाल्मीकि रामायण में लिखी है।

लेकिन यूपीए सरकार ने नासा और जियोलॉजिकल सर्वे के इन सारे पक्के सबूतों को सीधे रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

कांग्रेस को ना विज्ञान की परवाह थी, ना राष्ट्र की संपत्ति की और ना ही हिंदुओं की आस्था की। उन्हें तो बस किसी भी कीमत पर उस पुल को नेस्तनाबूद करना था।

सबूत की पर्ची · सरकार ने क्या अनसुना किया

  • नासा 2002: सैटेलाइट इमेजरी में धनुषकोडी और मन्नार के बीच सीधी जलमग्न श्रृंखला।
  • भूगर्भ जांच: पुल के पत्थर आस-पास की रेत से हजारों साल पुराने। रेत बाद में जमा हुई, पत्थर पहले बिछाए गए।
  • संरचना: वाल्मीकि रामायण के वर्णन से मेल खाती बताई गई। सरकार ने इन साक्ष्यों को दरकिनार किया।

4. नौसेना बोली नहीं, पचौरी कमेटी बोली घाटा

नौसेना की रिपोर्ट और पचौरी कमेटी का सच, जिसने प्रोजेक्ट के आर्थिक फायदे वाले नैरेटिव की पोल खोल दी।

जब आस्था और विज्ञान दोनों तर्कों को कुचल दिया गया, तो कांग्रेस ने अपना आखिरी कार्ड फेंका – ‘अर्थव्यवस्था’। पूरे देश में ये नैरेटिव फैलाया गया कि भाई, राम सेतु टूटने दो, इससे देश का करोड़ों का फायदा होगा, व्यापार बढ़ेगा और बड़े-बड़े जहाज़ आसानी से गुजरेंगे।

लेकिन कांग्रेस की किस्मत ही खराब थी, क्योंकि उनके इस तर्क की धज्जियां किसी और ने नहीं, बल्कि खुद सरकारी कमेटियों और भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने ही उड़ा दीं!

भारतीय नौसेना और कोस्ट गार्ड के एक्सपर्ट्स ने जब इस प्रोजेक्ट की फीजिबिलिटी रिपोर्ट बनाई, तो उनके माथे पर पसीना आ गया।

उन्होंने साफ-साफ सरकार को बता दिया कि पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) का इलाका ऐसा है कि वहां आप चाहे जितना भी खुदाई कर लें, समुद्र को इतना गहरा कर ही नहीं सकते कि वहां से 30,000 टन या उससे बड़े जहाज़ गुजर सकें।

मतलब, दुनिया भर के जो बड़े-बड़े कार्गो जहाज़ हैं, वो तो इस चैनल से निकल ही नहीं पाएंगे! और अगर बड़े जहाज़ नहीं निकलेंगे, तो फिर कौन सा व्यापार और कैसा फायदा? सिर्फ छोटे जहाज़ों के लिए करोड़ों हिंदुओं की आस्था का कत्ल क्यों किया जा रहा है?

बाद में जब बवाल बढ़ा तो सरकार ने डॉ. आर.के. पचौरी (R.K. Pachauri) की अध्यक्षता में एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई। इस पचौरी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में डंके की चोट पर लिख दिया कि सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट ‘अलाइनमेंट 6’ (यानी राम सेतु वाले रूट) पर आर्थिक और इकोलॉजिकल दोनों ही पैमानों पर पूरी तरह ‘Unviable’ है।

मतलब यह प्रोजेक्ट सरासर घाटे का सौदा है और इससे पर्यावरण का ऐसा विनाश होगा जिसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती।

आवाज़ क्या कहा सरकार ने क्या किया
भारतीय नौसेना और कोस्ट गार्ड पाक जलडमरूमध्य को इतना गहरा नहीं किया जा सकता कि 30,000 टन या उससे बड़े जहाज़ निकल सकें। आर्थिक फायदे का नैरेटिव चलता रहा।
पचौरी कमेटी अलाइनमेंट 6 आर्थिक और इकोलॉजिकल दोनों पैमानों पर Unviable। जिद नहीं टूटी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया।
पर्यावरणविद ब्लास्ट से मन्नार का इकोसिस्टम तबाह, मछुआरे बेरोजगार। कानों पर जूं नहीं रेंगी।
साधु-संत और रामभक्त यह भगवान राम की निशानी है, इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करो। हलफनामे में राम को ऐतिहासिक प्रमाण से खारिज कर दिया गया।

चारों दिशाओं से एक ही सलाह आ रही थी: रुकिए। सरकार एक ही दिशा में भागी: तोड़िए।

अब ज़रा सोचिए यार! जब नेवी कह रही है कि बड़े जहाज़ नहीं निकल सकते, जब एक्सपर्ट कमेटी कह रही है कि ये घाटे का सौदा है, जब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ये इकोलॉजिकल सुसाइड है, और जब देश का हिंदू समाज हाथ जोड़कर कह रहा है कि ये हमारी आस्था है…

तो फिर आखिर ऐसी कौन सी जिद थी, ऐसा कौन सा नशा था जिसके चलते कांग्रेस और यूपीए सरकार इस पुल पर डायनामाइट लगाने के लिए अंधी हो चुकी थी?

यही वो जिद थी, जिसने खुद अपने हाथों से बीजेपी के लिए सत्ता का वो रेड कारपेट बिछा दिया, जिस पर चलकर बीजेपी ने पूरे विपक्ष को ही इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया।

इस हिस्से से तीन बातें जेहन में रखिए

  1. विकास का तर्क अलाइनमेंट 6 पर टिका था, जबकि वैकल्पिक रूट राम सेतु को छूते नहीं थे।
  2. नौसेना ने बड़ा जहाज़ असंभव बताया। पचौरी कमेटी ने प्रोजेक्ट Unviable लिखा।
  3. आस्था, विज्ञान और अर्थशास्त्र तीनों एक तरफ थे। जिद दूसरी तरफ।

5. 12 सितम्बर 2007: अदालत में राम को मिथक लिख दिया गया

वह मनहूस दिन जब यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम को ही बता दिया काल्पनिक।

जब नेवी, पर्यावरणविदों और NASA के तमाम सबूतों को दरकिनार करके यूपीए सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही, तो मामला देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर जा पहुंचा।

देश भर के साधु-संतों, हिंदू संगठनों और कई राष्ट्रभक्त वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि राम सेतु कोई सामान्य ढांचा नहीं है, इसे तो ‘राष्ट्रीय स्मारक’ (National Monument) घोषित किया जाना चाहिए और इस पर चल रहे प्रोजेक्ट पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।

यहीं पर कांग्रेस और उनके इकोसिस्टम ने वो आत्मघाती कदम उठाया, जिसने भारत के राजनीतिक इतिहास को हमेशा के लिए पलट कर रख दिया।

12 सितम्बर 2007 का वो मनहूस दिन, जिसे भारतीय राजनीति के इतिहास में बहुसंख्यक समाज के सबसे बड़े अपमान के तौर पर याद रखा जाएगा।

तत्कालीन संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी (Ambika Soni) के मंत्रालय के अधीन काम करने वाले ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ (ASI) ने यूपीए सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल किया।

“वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस प्राचीन भारतीय साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ जरूर हैं, लेकिन इन्हें ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता। भगवान राम, रामायण के अन्य पात्रों या राम सेतु के ऐतिहासिक होने का कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है।”
– यूपीए सरकार का एएसआई हलफनामा, सुप्रीम कोर्ट, 12 सितम्बर 2007

सोचिए ज़रा! जिस राम को इस देश का बच्चा-बच्चा पूजता है, जिस राम का नाम इस देश में जन्म से लेकर इंसान की अंतिम यात्रा (राम नाम सत्य है) तक गूंजता है, जिस राम के बिना भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती…

उसी राम को भारत की ही चुनी हुई सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक ‘छलावा’, एक ‘काल्पनिक चरित्र’ और एक ‘मिथक’ (Myth) घोषित कर दिया था।

ये उस वामपंथी मानसिकता का चरम अहंकार था, जो भारत में रहकर, भारत का अन्न खाकर, भारत के ही आराध्य देव को विदेशी और मैकाले के चश्मे से देखती थी।

इन्हें लगा कि हिंदू समाज तो बंटा हुआ है, वो क्या ही कर लेगा! ये भूल गए कि आप राजनीतिक भ्रष्टाचार करेंगे तो जनता शायद एक बार को माफ कर दे, लेकिन जब आप सीधे उसके भगवान के अस्तित्व को ही झूठा साबित करने पर उतर आएंगे, तो वो आपको ऐसा सबक सिखाएगी जो आपकी आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।

तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसे “हिंदू आस्था पर बर्बर हमला” करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने भगवान राम के अस्तित्व को नकारने की कोशिश की और राम सेतु को छुआ, तो भाजपा “राम जन्मभूमि जैसा देशव्यापी आंदोलन” शुरू करेगी।

उन्होंने संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि “भगवान राम सिर्फ आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और राष्ट्र-पुरुष हैं।”

पाठक से एक सवाल: क्या कोई सरकार, किसी अदालत में, किसी और आराध्य को इसी भाषा में ‘अप्रमाणित’ लिखने की हिम्मत करती? अगर उत्तर नहीं है, तो यह हलफनामा सिर्फ कानूनी कागज़ नहीं था। यह संदेश था।

6. कोर्ट में एक शेर, सड़क पर करोड़ों रामभक्त

सुब्रमण्यम स्वामी की कानूनी लड़ाई और रामेश्वरम रामसेतु रक्षा मंच का वो देशव्यापी आंदोलन जिसने कांग्रेस की नींद उड़ा दी।

कांग्रेस को लगा था कि हलफनामा देकर वो केस जीत जाएंगे और राम सेतु को डायनामाइट से उड़ा देंगे। लेकिन उनका पाला उन लोगों से पड़ा था जो धर्म के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा सकते थे।

सुप्रीम कोर्ट के अंदर सरकार के इस महा-पाप के खिलाफ अगर कोई एक शेर की तरह अकेला खड़ा था, तो वो थे डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी (Dr. Subramanian Swamy)।

डॉ. स्वामी ने कोर्टरूम के अंदर सरकार के हर झूठे तर्क की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने नासा की सैटेलाइट तस्वीरें, भूगर्भीय रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्य सुप्रीम कोर्ट के जजों के सामने ऐसे रखे कि सरकार के वकीलों के पसीने छूट गए।

यह सुब्रमण्यम स्वामी की ही अथक कानूनी लड़ाई का नतीजा था कि सुप्रीम कोर्ट ने राम सेतु को तोड़ने पर अंतरिम रोक (Stay Order) लगा दी और सरकार के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया।

लेकिन लड़ाई सिर्फ कोर्टरूम के अंदर नहीं लड़ी जा रही थी। बाहर सड़कों पर ऐसा लावा उबल रहा था जिसकी तपिश सीधे 10 जनपथ तक पहुंच रही थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), विश्व हिंदू परिषद (VHP) और देश भर के अखाड़ों के साधु-संतों ने मिलकर ‘रामेश्वरम रामसेतु रक्षा मंच’ का गठन कर दिया था।

पूरे देश में ऐसा जबरदस्त आंदोलन शुरू हुआ जो 1990 के राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद देश ने कभी नहीं देखा था। रामेश्वरम से लेकर दिल्ली की सड़कों तक करोड़ों रामभक्त उतर आए।

पूरे देश में अभूतपूर्व चक्का जाम किया गया। हाईवे रुक गए, ट्रेनें रुक गईं। रामेश्वरम में राम सेतु के पास लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी।

पहली बार कांग्रेस के रणनीतिकारों को एहसास हुआ कि उन्होंने एक सोते हुए शेर के मुंह में हाथ डाल दिया है। जो ‘साइलेंट हिंदू वोटर’ कल तक अपनी रोज़ी-रोटी में उलझा रहता था, वो आज अपनी आस्था के अपमान पर आग बबूला होकर सड़कों पर आ चुका था।

आंदोलन दो मोर्चों पर चला क्या हुआ
अंदर सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका, सबूत और सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक।
बाहर रामेश्वरम रामसेतु रक्षा मंच, आरएसएस, वीएचपी, अखाड़े, चक्का जाम, रामेश्वरम की भीड़।
नतीजा 1990 के बाद पहली बार आस्था के अपमान ने साइलेंट वोटर को सड़क पर उतार दिया।

7. करुणानिधि के बोल, कांग्रेस की चुप्पी, मोदी का वार

सनातनी आक्रोश के बीच बीजेपी और मोदी जी का वो प्रचंड पलटवार जिसने कांग्रेस का कर दिया बंटाधार।

देश भर में मचे इस हाहाकार के बीच आग में घी डालने का काम किया यूपीए गठबंधन की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी डीएमके (DMK) के मुखिया और तत्कालीन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने।

जब देश का हिंदू समाज अपने भगवान के अस्तित्व को नकारने पर आहत था, तब करुणानिधि ने एक ऐसा भद्दा, घटिया और ज़हरीला बयान दिया, जिसे सुनकर किसी का भी खून खौल उठे।

“राम कौन था? क्या राम कोई इंजीनियर था? उसने कौन से इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी जो उसने समंदर पर पुल बना दिया?”
– एम. करुणानिधि, तत्कालीन मुख्यमंत्री, तमिलनाडु

ज़रा इस बेशर्मी का स्तर देखिए! करोड़ों लोगों के आराध्य देव का खुलेआम मज़ाक उड़ाया जा रहा था। और सबसे ज़्यादा शर्मनाक बात क्या थी?

दिल्ली में बैठी कांग्रेस पार्टी, सोनिया गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरफ से इस भद्दे बयान पर एक शब्द भी निंदा का नहीं निकला। पिन-ड्रॉप साइलेंस! सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें अपना गठबंधन बचाना था, अपनी सत्ता बचानी थी।

और ठीक इसी जगह पर बीजेपी ने अपना वो प्रचंड राजनीतिक और वैचारिक पलटवार किया जिसने कांग्रेस को पूरे देश के सामने बेनकाब करके रख दिया।

बीजेपी ने इस मुद्दे को सिर्फ एक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सड़क से लेकर संसद तक एक महासंग्राम में बदल दिया।

लालकृष्ण आडवाणी जी ने मोर्चा संभाला और सीधे सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की आंखों में आंखें डालकर अल्टीमेटम दे दिया।

आडवाणी जी ने डंके की चोट पर कहा कि यूपीए सरकार का हलफनामा और करुणानिधि का बयान करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर सीधा हमला है, और सरकार को तुरंत बिना किसी शर्त के देश से माफी मांगनी चाहिए।

राजनाथ सिंह, रविशंकर प्रसाद और बीजेपी के तमाम प्रवक्ताओं ने टीवी डिबेट्स से लेकर रैलियों तक कांग्रेस की धज्जियां उड़ा कर रख दीं।

फिर इस पूरे विवाद में एंट्री हुई गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की। मोदी जी ने अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज़ में सीधा कांग्रेस आलाकमान को ललकारते हुए कहा:

“आज कांग्रेस भगवान राम के होने का सबूत मांग रही है, कल को ये लोग कहेंगे कि महाभारत भी झूठी है। जो लोग खुद इटली के चश्मे से भारत को देखते हैं, वो हमें राम का वजूद सिखाएंगे?”
– नरेंद्र मोदी, तत्कालीन मुख्यमंत्री, गुजरात

मोदी जी ने चेतावनी दी कि अगर कांग्रेस ने राम सेतु पर हाथ डाला, तो इस देश का सनातनी समाज कांग्रेस के राजनीतिक वजूद को हमेशा के लिए राख में मिला देगा।

बीजेपी ने बहुत ही आक्रामकता और सलीके से पूरे बहुसंख्यक समाज को एक सीधा सा मैसेज दिया – “देख लो! यही है इस सेक्युलरिज्म का असली चेहरा। आपके भगवान को काल्पनिक बता रहे हैं, उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं, और आपके वोट से सत्ता में बैठे कांग्रेसी नेता चुपचाप तमाशा देख रहे हैं।”

बीजेपी ने खुद को साबित कर दिया कि जब सनातनी आस्था पर कोई संकट आएगा, तो वो इकलौती पार्टी है जो बिना किसी वोटबैंक की परवाह किए सीना तानकर खड़ी होगी।

इस पूरी घटना ने आम हिंदू वोटर के दिमाग में एक बात पत्थर की लकीर की तरह खींच दी – कि कांग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की पार्टी है और बीजेपी ही उनके स्वाभिमान की इकलौती रक्षक है।

कांग्रेस ने खुद ही वो सेल्फ-गोल कर दिया था, जिसने पूरे के पूरे सनातनी वोटबैंक को हमेशा के लिए बीजेपी के पाले में धकेलना शुरू कर दिया।

एक ही हफ्ते के दो चेहरे

मोर्चा क्या बोला / क्या किया संदेश जो वोटर तक गया
करुणानिधि राम इंजीनियर था? किस कॉलेज से पढ़ा? आराध्य का मज़ाक।
कांग्रेस उच्च कमान पिन-ड्रॉप साइलेंस। एक शब्द निंदा का नहीं। गठबंधन सत्ता से बड़ा, आस्था से बड़ा।
आडवाणी तालिबान-बामियान वाली तुलना। बिना शर्त माफी मांगो। यह विकास नहीं, धरोहर तोड़ना है।
राजनाथ सिंह बर्बर हमला। राम जन्मभूमि जैसा आंदोलन। सोनी का इस्तीफा। राम राष्ट्र-पुरुष हैं, सिर्फ आस्था नहीं।
नरेंद्र मोदी कल महाभारत भी झूठी कहोगे। इटली के चश्मे से राम मत सिखाओ। सनातनी समाज वजूद मिटा देगा।

8. दो दिन में घुटने, दो अफसर बलि के बकरे

बैकफुट पर आई घबराई हुई कांग्रेस का डैमेज कंट्रोल।

जब पूरे देश में रामसेतु रक्षा मंच के झंडे तले लाखों सनातनी सड़कों पर उतर आए, और दूसरी तरफ बीजेपी ने सड़क से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर कांग्रेस की बखिया उधेड़नी शुरू की, तो दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भयंकर हड़कंप मच गया।

कांग्रेस के रणनीतिकारों और 10 जनपथ को ये बात बहुत अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि उन्होंने एक बहुत बड़ी राजनीतिक मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है।

उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, उनका वो फिक्स वोटबैंक ताश के पत्तों की तरह ढहता हुआ नज़र आ रहा था जो दशकों से कांग्रेस के साथ था।

डर और फजीहत का आलम ये था कि वो सरकार जो 12 सितम्बर को पूरे घमंड के साथ राम को काल्पनिक बता रही थी, उसे मात्र दो दिन बाद ही घुटनों के बल आना पड़ा।

14 सितम्बर 2007 को, चौतरफा दबाव और बीजेपी के उग्र विरोध के आगे झुकते हुए, यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपना वो विवादित और शर्मनाक हलफनामा वापस ले लिया।

डैमेज कंट्रोल के लिए तत्कालीन कानून मंत्री एच.आर. भारद्वाज (H.R. Bhardwaj) को मीडिया के सामने भेजा गया।

“भगवान राम हिमालय की तरह सत्य हैं, और उनके अस्तित्व पर कोई सवाल नहीं उठ सकता।”
– एच.आर. भारद्वाज, कानून मंत्री · 14 सितम्बर 2007

लेकिन भाई, आग लग चुकी थी और उसे बुझाना इतना आसान नहीं था। कांग्रेस को अपनी राजनीतिक चमड़ी बचाने के लिए किसी न किसी को तो ‘बलि का बकरा’ बनाना ही था।

तो उन्होंने क्या किया? उन्होंने अपनी संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी से दिखावे के लिए इस्तीफे की पेशकश करवाई, जिसे (ज़ाहिर तौर पर) नामंजूर कर दिया गया।

और सारा का सारा ठीकरा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दो छोटे अधिकारियों पर फोड़ दिया गया। एएसआई के तत्कालीन निदेशक सी. दोरजी (C. Dorji) और एक अन्य अधिकारी को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया।

सरकार ने जनता को ये बेवकूफ बनाने की कोशिश की कि ये हलफनामा तो अधिकारियों ने गलती से टाइप कर दिया था! मतलब ज़रा इस लचर और बेहूदे झूठ को देखिए।

क्या देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में कोई सरकारी हलफनामा बिना किसी मंत्री की मंज़ूरी, बिना कानून मंत्रालय की जांच और बिना टॉप लेवल की सहमति के दायर हो सकता है? बिल्कुल नहीं!

ये सब कुछ एक सोची-समझी साजिश थी, लेकिन जब दांव उल्टा पड़ गया, तो बेचारे दो अफसरों की नौकरी खाकर कांग्रेस ने अपने हाथ धो लिए।

तारीख सरकार का चेहरा अर्थ
12 सितम्बर 2007 एएसआई हलफनामा: राम ऐतिहासिक नहीं, प्रमाण नहीं। घमंड। आस्था को मिथक बनाना।
13 सितम्बर 2007 देशव्यापी गुस्सा, बीजेपी का हमला, सड़क गरम। छत्ता बिंध चुका था।
14 सितम्बर 2007 हलफनामा वापस। भारद्वाज: राम हिमालय जैसे सत्य। घुटने। शब्द बदले, घाव नहीं।
डैमेज कंट्रोल सोनी का दिखावटी इस्तीफा नामंजूर। सी. दोरजी समेत दो अफसर सस्पेंड। मंत्री बचे, अफसर कट गए।

कागज़ 48 घंटे में लौट आया। विश्वास उनतालीस साल में नहीं लौटता।

पाठक से एक सवाल: सुप्रीम कोर्ट का हलफनामा क्या वाकई किसी निदेशक की टाइपिंग की गलती हो सकता है? अगर आपका उत्तर नहीं है, तो बलि का बकरा कौन था और असली दस्तखत कहां थे, यह सवाल खुद खुल जाता है।

9. शाहबानो वाली याद: एक संविधान, दो तराजू

तुष्टिकरण का वो दोहरा चेहरा जहां अल्पसंख्यकों की भावनाओं के लिए संविधान बदला गया और हिंदुओं के भगवान को ही झुठला दिया।

इस पूरी घटना ने कांग्रेस के सेक्युलरिज्म (Pseudo-secularism) की सबसे खौफनाक सच्चाई को सबके सामने रख दिया। इस देश के हिंदू समाज ने एक बहुत ही ताकतवर तुलना की।

लोगों को याद आया कि जब इसी कांग्रेस पार्टी के राज में ‘शाहबानो केस’ (Shah Bano Case) हुआ था, और सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला के हक में फैसला सुनाया था, तो कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रातों-रात देश का संविधान ही बदल दिया था!

ज़रा सोचिए इस दोहरे मापदंड को! जब किसी अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं की बात आती है, तो ये पार्टियां कोर्ट के फैसलों को पलट देती हैं, संविधान में संशोधन कर देती हैं, और उनके आगे घुटने टेक देती हैं।

लेकिन जब इसी देश के बहुसंख्यक यानी करोड़ों हिंदुओं की आस्था की बात आई, तो बिना एक सेकंड की हिचकिचाहट के इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में स्टाम्प पेपर पर लिखकर दे दिया कि ‘भगवान राम एक मिथक हैं’।

यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी। हिंदू समाज को पहली बार इतनी गहराई से यह महसूस हुआ कि इस सेक्युलर सिस्टम में उनके भगवान, उनकी आस्था और उनके स्वाभिमान की कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है।

पैमाना शाहबानो प्रसंग राम सेतु / राम का हलफनामा
अदालत क्या कह रही थी सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला के हक में फैसला दिया। साधु-संत और याचिकाकर्ता राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक बनाने की गुहार लगा रहे थे।
सरकार की प्रतिक्रिया कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए संविधान संशोधन। कोर्ट का फैसला प्रभावी रूप से पलट दिया गया। सरकार ने खुद अदालत में लिख दिया कि राम ऐतिहासिक नहीं। आस्था को मिथक करार दिया।
किसकी भावना भारी पड़ी अल्पसंख्यक धार्मिक दबाव। गठबंधन धर्म और डीएमके की जिद। बहुसंख्यक आस्था तराजू में नहीं बैठी।
संदेश जो घर पहुंचा भावनाएं संशोधन तक ले जा सकती हैं। करोड़ों के आराध्य की कीमत स्टाम्प पेपर जितनी भी नहीं।

तुलना लेख की मूल दलील है: एक ही पार्टी, दो अलग तराजू, एक ही सेक्युलर दावा।

10. कागज़ लौटा, चाबी चली गई

दिलों के घाव ने कैसे बहुसंख्यक समाज को कांग्रेस से जोड़कर हमेशा के लिए बीजेपी की झोली में डाल दिया – लेख का निष्कर्ष।

राजनीति में एक कहावत है कि आप लिए गए फैसले तो वापस ले सकते हैं, लेकिन उन फैसलों से जनता के दिलों में जो घाव होते हैं, वो कभी नहीं भरते।

कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से कागज़ का हलफनामा तो वापस ले लिया, प्रोजेक्ट को भी ठंडे बस्ते में डालना पड़ा, लेकिन करोड़ों सनातनियों के दिलों में अविश्वास की जो दरार पड़ी, उसने भारतीय राजनीति का भूगोल ही बदल कर रख दिया।

इस एक हलफनामे ने दशकों से सोए हुए उस ‘साइलेंट हिंदू वोटर’ को झकझोर कर जगा दिया, जो पहले जाति, क्षेत्र और छोटे-मोटे मुद्दों में बंटा हुआ था।

उसे एक झटके में यह समझ आ गया कि जो राजनीतिक दल सत्ता की मलाई और गठबंधन की मजबूरी के लिए उनके आराध्य देव को ही नीलाम कर दे, वो दल कभी भी हिंदुओं का हितैषी नहीं हो सकता।

और ठीक इसी वैक्यूम को भरने के लिए खड़ी थी बीजेपी। इस पूरे बवाल के दौरान बीजेपी ने जिस आक्रामकता, जिस सलीके और जिस समर्पण के साथ सनातन आस्था की पैरवी की, उसने आम हिंदू वोटर के दिल में एक पक्की जगह बना ली।

हिंदू समाज को बीजेपी के रूप में एक ऐसा स्वाभाविक और सशक्त विकल्प दिखा, जिसे राम का नाम लेने में शर्म नहीं आती थी। जिसे राम सेतु को बचाने के लिए सड़कों पर डंडे खाने में परहेज़ नहीं था।

यहीं से उस ऐतिहासिक ध्रुवीकरण की नींव पड़ी, जिसने कांग्रेस के उस मजबूत वोटबैंक को हमेशा-हमेशा के लिए उनसे छिटका दिया।

लोग अक्सर कहते हैं कि बीजेपी ने कोई बहुत बड़ा चमत्कार कर दिया, कोई जादू कर दिया जो पूरा का पूरा बहुसंख्यक समाज उनके पीछे आकर खड़ा हो गया। लेकिन सच तो ये है कि बीजेपी को कोई जादू नहीं करना पड़ा।

बीजेपी ने बस इस देश की सनातन आत्मा का सम्मान किया और सही समय पर सही आवाज़ उठाई। असली ‘क्रेडिट’ तो सत्ता के नशे में चूर उस विपक्ष को जाता है, जिसने अपने ही अहंकार में अंधी होकर राम सेतु पर बुलडोज़र चलाने की ठानी और भगवान राम के अस्तित्व को नकारने की हिमाकत की।

जब तक विपक्ष अपनी इस हिंदू-विरोधी और एक-तरफा सेक्युलर राजनीति को नहीं छोड़ेगा, जब तक वो बहुसंख्यक समाज की आस्था का अपमान करता रहेगा, तब तक उसे किसी और दुश्मन की ज़रूरत नहीं है।

वो खुद ही अपने ‘सेल्फ-गोल्स’ और अपने ही फैलाए हुए रायते से बीजेपी के लिए सत्ता की वो पक्की और शानदार रेड कारपेट बिछाते रहेंगे, जिस पर चलकर बीजेपी लगातार जीत की दावत उड़ाती रहेगी।

इस हिस्से से तीन बातें जेहन में रखिए

  1. हलफनामा वापस हुआ, प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में गया, दो अफसर कट गए। घाव नहीं भरा।
  2. साइलेंट हिंदू वोटर जाति-क्षेत्र से ऊपर उठकर आस्था के अपमान को याद रखने लगा।
  3. बीजेपी ने जादू नहीं किया। विपक्ष ने खुद रेड कारपेट बिछाया। श्रृंखला का मूल सूत्र यहीं पूरा होता है।

एपिसोड का आखिरी सवाल, आपके लिए

अगर राम सेतु पर वैकल्पिक रूट थे, नासा की तस्वीरें थीं, नौसेना की मनाही थी, पचौरी कमेटी का घाटे वाला प्रमाणपत्र था, और फिर भी सरकार ने 12 सितम्बर को राम को काल्पनिक लिख दिया, तो क्या यह विकास की जिद थी या आस्था तोड़ने की जिद?

और अगर दो दिन बाद वही सरकार राम को हिमालय बताने लगे, तो आपको किस बयान पर विश्वास करना चाहिए: स्टाम्प पेपर वाले पर, या घबराहट वाले पर?

अगला एपिसोड उसी श्रृंखला का अगला सेल्फ-गोल उठाएगा। यह एपिसोड इतना याद रखिए: सत्ता की चाबी अक्सर विपक्ष की जेब से खुद खिसकती है।

श्रृंखला जारी है..

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