आजकल की दलित राजनीति में ‘मसीहा’ बनना कितना आसान हो गया है ना? कंधे पर एक नीले रंग का गमछा डाल लो, मंच पर चढ़कर बड़ी-बड़ी और लच्छेदार बातें कर दो, कैमरे के सामने उंगली उठाकर दहाड़ने की एक्टिंग कर लो, और बस… रातों-रात आप एक पूरे दलित समाज के ठेकेदार बन जाते हैं।
जनता, जो स्वभाव से भोली होती है, वो भी इन नारों और भाषणों के तिलिस्म में फंस जाती है। उसे लगने लगता है की चलो, कोई तो है जो हमारी आवाज़ उठाएगा।
लेकिन जब इस सियासी ‘कांच के महल’ पर हकीकत का पत्थर पड़ता है, तो जो सच सामने आता है वो किसी भी सच्चे इंसान की आँखें खोलने के लिए काफी होता है।
यूपी के नगीना से सांसद और खुद को बाबासाहेब का सबसे बड़ा सिपाही बताने वाले चंद्रशेखर आज़ाद (रावण) के साथ आजकल बिल्कुल यही हो रहा है।
इस पूरे बवाल को समझने के लिए आपको पहले महर्षि वाल्मीकि के वंशजों, यानी हमारे ‘वाल्मीकि समाज’ के इतिहास और उनके गौरव को समझना होगा।
वाल्मीकि समाज कोई आम समाज नहीं है। ये सनातन धर्म के वो सच्चे रक्षक हैं, जिन्होंने इतिहास के सबसे काले दौर में भी अपनी संस्कृति, अपने धर्म और अपनी मिट्टी से गद्दारी नहीं की। मुगलों और आक्रांताओं के ज़ुल्म सहे, लेकिन अपना धर्म नहीं बदला।
जिस समाज के आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण रचकर पूरी दुनिया को भगवान राम के आदर्शों से वाकिफ कराया, आज उसी महान समाज की अनदेखी करके सिर्फ जाटव समाज की पैरवी करके कुछ नेता खुद को ‘दलितों का मसीहा’ घोषित कर रहे हैं।
स्विट्जरलैंड से अपनी पीएचडी (PhD) की पढ़ाई कर रही डॉ. रोहिणी घावरी ने भारत वापस लौटते ही चंद्रशेखर आज़ाद के इस ‘बहुजन एकता’ वाले गुब्बारे में ऐसी सुई चुभोई है की अब इसकी पूरी हवा निकल चुकी है।
रोहिणी ने जो सवाल उठाए हैं, उन्होंने पूरे देश के सामने चंद्रशेखर आज़ाद की सिलेक्टिव और जाटव राजनीति को शीशे की तरह साफ़ कर दिया है।
दलित मसीहा की न्याय प्रणाली में जाटव जाति का फिल्टर, और रोहिणी घावरी जैसी वाल्मीकि बेटी का सिर्फ तिरस्कार

ज़रा सोचिए, जब कोई नेता मंच से चिल्लाता है की “मैं हर शोषित, हर वंचित और हर दलित की आवाज़ हूँ”, तो क्या उस आवाज़ के पीछे कोई ‘जाति का फिल्टर’ लगा होता है?
क्या न्याय देने से पहले यह पूछा जाता है की “तुम्हारी जाति क्या है?” एक आम इंसान कहेगा की नहीं, न्याय तो सबके लिए बराबर होता है।
लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी की डिक्शनरी में शायद न्याय की परिभाषा कुछ और ही है।
उनके लिए दलितों की आवाज़ उठाने का मतलब है ‘जाटवों’ की आवाज़ उठाना, उन्हें दूसरी ‘वाल्मीकि’ जैसी पिछड़ी जातियों से कोई लेना देना नहीं!
रोहिणी घावरी ने मीडिया के सामने आकर सच बोला है, उसने दलित राजनीति के इस पूरे इकोसिस्टम को बेनकाब कर दिया है।
रोहिणी ने बिल्कुल सटीक पॉइंट पकड़ा- नीशू आज़ाद का मामला। आप सबने देखा होगा की पिछले कुछ दिनों से चंद्रशेखर आज़ाद 14 साल की बच्ची नीशू आज़ाद को न्याय दिलाने के लिए आसमान सिर पर उठाए हुए हैं।
वो सड़कों पर उतर रहे हैं, थानों के चक्कर काट रहे हैं, धरने दे रहे हैं और सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं।
लेकिन रोहिणी घावरी ने यहाँ एक ऐसा सवाल दाग दिया जिसका जवाब देते हुए आज़ाद और उनके समर्थकों के पसीने छूट रहे हैं। रोहिणी पूछ रही हैं की चंद्रशेखर नीशू आज़ाद के लिए इतने उग्र क्यों हो गए? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि नीशू आज़ाद उनके अपने ‘जाटव समाज’ से आती है?
यहाँ एक भयंकर कॉन्ट्रास्ट (Contrast) देखने को मिलता है। जब बात जाटव समाज की बेटी (नीशू आज़ाद) की आती है, तो चंद्रशेखर तुरंत ‘मसीहा’ का चोला पहनकर सड़क पर उतर आते हैं। उनका खून खौलने लगता है।
लेकिन वहीं दूसरी तरफ, जब महर्षि वाल्मीकि के वंशज यानी वाल्मीकि समाज की एक पढ़ी-लिखी, होनहार बेटी (रोहिणी घावरी) अपने साथ हुए भयानक धोखे और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाती है, न्याय मांगती है… तो यही मसीहा अचानक से मौन व्रत क्यों धारण कर लेते हैं?
क्या बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान में कहीं यह लिखा है की न्याय पाने का हक़ सिर्फ जाटव समाज की बेटियों को है और वाल्मीकि समाज की बेटियों को नहीं?
रोहिणी ने कैमरे के सामने बिलखते हुए पूछा की “क्या मैं इस समाज की बेटी नहीं हूँ? क्या मैं दलित नहीं हूँ? फिर मेरे साथ सौतेला व्यवहार क्यों?”
यह कोई मामूली सवाल नहीं है दोस्त। यह उस ‘जातिवादी राजनीति’ के मुँह पर एक तमाचा है, जो बहुजन के नाम पर वोट तो सबसे मांगती है, लेकिन जब हक़, न्याय और सम्मान देने की बारी आती है, तो सारा फायदा सिर्फ एक ख़ास जाति (जाटव समाज) की झोली में डाल दिया जाता है।
अगर आप बाबासाहेब के सच्चे अनुयायी होने का दम भरते हैं, तो आपको पता होना चाहिए की बाबासाहेब ने हमेशा महिलाओं के सम्मान और समानता की लड़ाई लड़ी थी।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा था की फलां जाति की महिला का सम्मान करो और दूसरी का शोषण कर लो। रोहिणी घावरी के इस एक सवाल ने साबित कर दिया है की चंद्रशेखर आज़ाद पूरे दलित समाज के नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी जाति के नेता बनकर रह गए हैं।
वाल्मीकि समाज के लिए उनके पास सिर्फ खोखले नारे हैं, जबकि हकीकत में वो उनके लिए न्याय के दरवाज़े बंद कर चुके हैं।
स्विट्जरलैंड का रिटर्न टिकट और शादी का झांसा, दलित मसीहा ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ के एक वाल्मीकि बेटी के खिलाफ किए गए कुकर्मों का काला-चिट्ठा

जब मंच पर खड़े होकर कोई नेता बड़ी-बड़ी कसमें खाता है, तो पब्लिक को लगता है की इससे बड़ा त्यागी और संत तो दुनिया में कोई है ही नहीं।
लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे इस ‘क्रांतिकारी चोले’ का असली रंग क्या है, यह जब सामने आता है, तो इंसान का राजनीति से ही भरोसा उठ जाता है।
डॉ. रोहिणी घावरी, एक दलित बेटी, जो महर्षि वाल्मीकि के समाज से आती है, अपनी मेहनत और लगन से स्विट्जरलैंड जैसे देश में जाकर अपनी पीएचडी (PhD) की पढ़ाई कर रही है। वह पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा है।
लेकिन इसी बेटी के साथ चंद्रशेखर आज़ाद ने जो किया, वह किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है।
रोहिणी का सीधा और बेहद गंभीर आरोप है की आज़ाद ने उन्हें शादी का झांसा दिया और एक साथ रहने के नाम पर उनका भयानक शारीरिक और मानसिक शोषण किया।
सबसे बड़ा खुलासा तो रोहिणी ने यह किया की आज़ाद उन्हें अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ाने और अपने ‘बैकअप प्लान’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे।
रोहिणी के मुताबिक, चंद्रशेखर उन्हें एक सीढ़ी की तरह यूज़ कर रहे थे, ताकि अगर कल को भारत की राजनीति में उनका सिक्का न चले, तो वो स्विट्जरलैंड में जाकर आराम से सेटल हो सकें।
मतलब, देश के दलितों को सड़कों पर लाठियां खाने के लिए छोड़ दो, और खुद विदेश में बसने का जुगाड़ सेट कर लो!
और इस पूरे धोखे का सबसे घिनौना हिस्सा तब सामने आया जब रोहिणी को यह पता चला की जो आज़ाद उनके साथ शादी के सपने बुन रहे हैं, वो तो पहले से ही शादीशुदा हैं।
एक पढ़ी-लिखी और अपने पैरों पर खड़ी महिला को प्यार और शादी के नाम पर इस तरह से छलना, क्या यह बाबासाहेब के आदर्श हैं?
क्या इसी सम्मान की बात आज़ाद अपने भाषणों में करते हैं? दूसरों की बेटियों के लिए न्याय का झंडा उठाने वाले चंद्रशेखर को जब रोहिणी ने आईना दिखाया और न्याय मांगा, तो वो बीच रास्ते में ही उसे तड़पता छोड़कर भाग खड़े हुए।
यह कहानी सिर्फ एक धोखे की नहीं है, यह उस खोखले आदर्शवाद की कहानी है जिसे ‘दलित उद्धार’ के नाम पर बेचा जा रहा है।
महर्षि वाल्मीकि के वंशजों से महज़ वोट बैंक का रिश्ता, क्या आज़ाद समाज पार्टी सिर्फ जाटवों की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है?
इस पूरे ड्रामे ने एक बहुत ही गहरे और चुभने वाले सवाल को जन्म दे दिया है। आज़ाद समाज पार्टी और पूरी भीम आर्मी का जो स्ट्रक्चर है, उसमें वाल्मीकि समाज की असली हैसियत क्या है?
मंचों से ‘बहुजन एकता’ और ‘जय भीम’ के नारे लगाना बहुत आसान है, लेकिन धरातल पर हकीकत यह है की यह ‘बहुजन’ शब्द सिर्फ और सिर्फ जाटव समाज के विकास और सत्ता की सीढ़ी बनकर रह गया है।
ज़रा ईमानदारी से बताइए… जब कोई धरना-प्रदर्शन होता है, तो लाठियां खाने के लिए किसे आगे किया जाता है? जब रैलियों में भीड़ बढ़ानी होती है, तो ट्रकों में भरकर किसे लाया जाता है?
जब दरी बिछाने और नारे लगाने की बारी आती है, तो महर्षि वाल्मीकि के वंशजों को सबसे आगे खड़ा कर दिया जाता है।
लेकिन जैसे ही बात सत्ता में हिस्सेदारी की आती है, टिकट बांटने की आती है, या फिर किसी बड़े मंच पर कब्ज़ा जमाने की आती है, तो सारा का सारा मलाईदार फायदा सिर्फ जाटव समाज के नेताओं की झोली में क्यों गिर जाता है?
क्या आज़ाद समाज पार्टी कोई राजनीतिक दल है या सिर्फ जाटवों की एक ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’, जहाँ बाकी दलित जातियों को बिना सैलरी के मज़दूर समझ लिया गया है?
वाल्मीकि समाज वो समाज है जो सनातन धर्म का सबसे बड़ा और सच्चा रक्षक रहा है। यह वो समाज है जिसने कभी अपनी खुद्दारी से समझौता नहीं किया। लेकिन आज उसी समाज को चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नेता सिर्फ एक ‘वोट डालने वाली मशीन’ समझ रहे हैं।
रोहिणी घावरी ने एयरपोर्ट पर आते ही जो कहा, वो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो चुका है। उन्होंने डंके की चोट पर कहा की-
“चंद्रशेखर को खुद को ‘बहुजन नेता’ या ‘दलितों का मसीहा’ कहना तुरंत बंद कर देना चाहिए। वो सिर्फ और सिर्फ अपनी जाति, यानी जाटव समाज के नेता हैं। वो पूरे दलित समाज का ठेका लेना छोड़ दें।”
रोहिणी का यह गुस्सा सिर्फ एक महिला का गुस्सा नहीं है, यह पूरे वाल्मीकि समाज के अंदर दशकों से सुलग रही उस आग का गुबार है, जिसे हमेशा ‘एकता’ के नाम पर दबा दिया जाता था।
जब भी वाल्मीकि समाज ने अपने हक़ की आवाज़ उठानी चाही, उन्हें यह कहकर चुप करा दिया गया की “इससे बहुजन एकता टूट जाएगी।”
अरे भाई! कैसी एकता? जहाँ न्याय सिर्फ जाटवों को मिले, सत्ता सिर्फ जाटवों को मिले, और वाल्मीकि समाज की बेटियों का शोषण करके उन्हें सड़कों पर रोने के लिए छोड़ दिया जाए… ऐसी खोखली एकता से वाल्मीकि समाज को क्या हासिल हो रहा है?
दिल्ली एयरपोर्ट पर हुआ असली खेला, जब वाल्मीकि बेटी के सम्मान में कोई ‘दलित मसीहा’ नहीं, बल्कि उतरे दक्ष चौधरी और करणी सेना के अम्मू
डॉ. रोहिणी घावरी जब अपनी पढ़ाई पूरी करके स्विट्जरलैंड से भारत लौटीं, तो उनके दिल में आंसुओं का समंदर और सिस्टम से लड़ने की आग थी।
कायदे से तो इस दलित बेटी के स्वागत और न्याय के लिए खुद को दलितों का ठेकेदार कहने वाली ‘भीम आर्मी’ की पूरी फौज को एयरपोर्ट पर खड़ा होना चाहिए था।
नीले झंडे लहराने चाहिए थे। लेकिन वहां सन्नाटा था। क्यों? क्योंकि आज़ाद और उनकी फौज को पता था की यह बेटी न्याय मांगने आई है, और कठघरे में खुद उनका अपना ‘मसीहा’ खड़ा है।
जब वाल्मीकि समाज की इस बेटी को अपनों ने बीच मंझधार में छोड़ दिया, तब सनातन धर्म के सच्चे रक्षकों ने आगे बढ़कर उसके सम्मान की ढाल बनने का फैसला किया।
रोहिणी को रिसीव करने, उनके आंसू पोंछने और उन्हें न्याय की लड़ाई में हर कदम साथ देने का भरोसा दिलाने के लिए वहां कोई और नहीं, बल्कि दक्ष चौधरी, अक्कू पंडित और राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरजपाल सिंह अम्मू पहुंचे।
यह कोई छोटी घटना नहीं है दोस्त! ज़रा इस बात की गहराई और इसके पीछे छिपे तंज को समझिए। चंद्रशेखर आज़ाद और उनके इकोसिस्टम ने सालों तक मंचों से चीख-चीख कर जिन लोगों को ‘मनुवादी’ और ‘दलित विरोधी’ कहकर गालियां दीं, आज महर्षि वाल्मीकि के वंशज की एक बेटी की इज़्ज़त बचाने के लिए वही सनातनी चेहरे ढाल बनकर खड़े हैं।
और जो आज़ाद दिन-रात ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए खुद को दलितों का रक्षक बताते हैं, वो आज दिल्ली की सड़कों से गायब हैं।
जब एक वाल्मीकि समाज की होनहार बेटी पर मुसीबत आई, तो जाटव समाज की राजनीति करने वाले मसीहा मुंह फेर कर छिप गए, लेकिन सनातन धर्म के झंडाबरदारों ने उसे गले लगा लिया।
दक्ष चौधरी और अम्मू का वहां पहुंचना बता रहा है की वाल्मीकि समाज कभी अकेला नहीं था और न ही कभी रहेगा। सनातनियों का यह समर्थन आज़ाद के उस ‘काले प्रोपेगेंडा’ का अंत है, जो समाज को जातियों में बांटकर अपनी कुर्सी चमकाता है।
अब वाल्मीकि समाज के युवा पूछ रहे हैं की जब हमारे समाज की बेटी के सम्मान को कुचला जा रहा था, तब तुम्हारे नीले गमछे वाले मसीहा कहां छिप कर बैठे थे?
जो इंसान अपने ही समाज की एक बेटी की इज़्ज़त नहीं कर सका, जिसने अपनी बैकअप प्लान के लिए एक वाल्मीकि बेटी का करियर और ज़िन्दगी दांव पर लगा दी, वो संसद में बैठकर देश के 25 करोड़ दलितों का क्या खाक भला करेगा?
रोहिणी घावरी की यह लड़ाई अब सिर्फ एक कोर्ट केस नहीं है, यह दलित राजनीति के नाम पर चल रही उस दुकान पर लगा सबसे बड़ा ताला है, जहां न्याय का तराजू सिर्फ जाटव समाज की तरफ झुका रहता था।
