कौड़ियों के भाव मिली ज़मीन अब लालू परिवार को पड़ रही भारी, IRCTC टेंडर घोटाले में लालू यादव के परिवार पर चलेगा मनी लॉन्ड्रिंग का मुकदमा, लालू, राबड़ी, तेजस्वी समेत 9 लोगों पर आरोप तय

दोस्तों आम तौर पर लोगों के लिए पुरानी यादें बहुत सुहानी होती हैं। लेकिन बिहार के सबसे बड़े सियासी कुनबे यानी लालू यादव परिवार के साथ मामला थोड़ा अलग है।

इनके लिए 2004 से 2009 वाला जो यूपीए-1 सरकार का दौर था, वो एक ऐसा ‘फ्लैशबैक’ बन चुका है जो जब भी लौटकर आता है, तो अपने साथ सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) के समन लेकर आता है।

उस वक्त के रेल मंत्रालय वाले एल्बम से जब भी कोई पन्ना पलटता है, तो बिहार की राजनीति में एक नया भूचाल आ जाता है।

ताज़ा मामला भी कुछ ऐसा ही है। 10 सितंबर 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो लालू यादव के परिवार के लिए मुश्किलें तो साथ लाया ही है..

लेकिन ये तेजस्वी यादव की उस राजनीतिक रफ्तार के लिए एक बहुत बड़ा स्पीड-ब्रेकर साबित होने वाला है जिसे वो पिछले कुछ सालों से बड़ी मेहनत से बना रहे थे।

सालों पुराने बहुचर्चित ‘IRCTC टेंडर घोटाले’ में अब मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) का मुकदमा शुरू होने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

ये अब सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी या रैलियों में लगने वाले आरोप नहीं रह गए हैं, बल्कि कोर्ट की फाइलों में दर्ज़ वो पक्के सबूत बन चुके हैं, जिनका सामना अब लालू परिवार को कटघरे में खड़े होकर करना पड़ेगा।

राउज एवेन्यू कोर्ट का फैसला, मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के तहत लालू यादव के परिवार पर आरोप तय

अब ज़रा इस ताज़ा फैसले की एकदम ग्राउंड डिटेल में चलते हैं। 10 सितंबर 2026 की तारीख लालू परिवार के लिए कोई अच्छी खबर लेकर नहीं आई।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) के स्पेशल जज विशाल गोग्ने (Vishal Gogne) की अदालत में इस मामले की सुनवाई चल रही थी।

अदालत ने ईडी (ED) द्वारा पेश किए गए सबूतों और चार्जशीट का बारीकी से अध्ययन करने के बाद आदेश दिया की इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता आधार मौजूद हैं।

कोर्ट ने साफ कर दिया की इस केस में कुल 9 लोगों और कंपनियों पर ट्रायल (मुकदमा) चलेगा। अब सवाल ये है की ये 9 लोग हैं कौन? अदालत के आदेश के अनुसार, इस लिस्ट में सबसे ऊपर नाम है बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का।

उनके साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनके बेटे व बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भी आरोप तय कर दिए गए हैं।

परिवार के अलावा इस लिस्ट में लालू यादव के बेहद करीबी माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रेमचंद गुप्ता, उनकी पत्नी सरला गुप्ता, ‘सुजाता होटल्स प्राइवेट लिमिटेड’ और उसके दोनों मालिक यानी विनय कोचर और विजय कोचर का नाम भी शामिल है।

हालांकि, इसी अदालत ने थोड़ी राहत देते हुए 7 लोगों को इस मामले से बरी (Discharge) भी किया है, जिनमें लालू यादव के दामाद राहुल यादव का नाम प्रमुख है।

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है की अब 3 अक्टूबर 2026 को अदालत में इन सभी 9 आरोपियों के खिलाफ औपचारिक तौर पर आरोप (Formal charges) पढ़े जाएंगे, जिसके बाद से इस बहुचर्चित केस का बकायदा ट्रायल शुरू हो जाएगा।

होटलों का ठेका और IRCTC रेलवे का वो टेंडर जिसने आज तक नहीं छोड़ा लालू परिवार का पीछा

अब जो लोग इस केस की टाइमलाइन भूल गए हैं, उन्हें ज़रा फ्लैशबैक में लेकर चलते हैं की आखिर ये पूरा रायता फैला कहाँ से था।

कहानी शुरू होती है 2004 से, जब केंद्र में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार थी और लालू प्रसाद यादव देश के रेल मंत्री हुआ करते थे। भारतीय रेलवे के अधीन एक संस्था आती है IRCTC, जो रेलवे के खान-पान और टूरिज्म का काम देखती है।

उस वक्त रेलवे के पास दो बहुत ही शानदार और ऐतिहासिक हेरिटेज होटल हुआ करते थे- एक बीएनआर रांची (BNR Ranchi) और दूसरा बीएनआर पुरी (BNR Puri)।

रेलवे ने तय किया की इन दोनों होटलों के रखरखाव, संचालन और विकास का काम किसी प्राइवेट कंपनी को सौंप दिया जाए ताकि सर्विस बेहतर हो सके। इसके लिए बकायदा टेंडर (ठेका) निकाला गया।

अब यहीं से खेल में ‘जुगाड़’ की एंट्री होती है। आरोप है की टेंडर की शर्तों में बहुत ही स्मार्ट तरीके से ऐसी तब्दीलियां की गईं, नियम ऐसे मोड़े गए की कोई और कंपनी इस ठेके की रेस में टिक ही न पाए।

और आख़िरकार, बड़ी ही आसानी से इन दोनों होटलों का टेंडर ‘सुजाता होटल्स प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी को मिल गया।

इस कंपनी के मालिक वही विनय कोचर और विजय कोचर थे, जिनपर आज कोर्ट ने आरोप तय किए हैं।

कहने को तो यह एक सामान्य टेंडर प्रक्रिया थी, लेकिन सियासत और व्यापार के इस गठजोड़ में मुफ्त में तो कोई किसी को एक कप चाय नहीं पिलाता, यहाँ तो रेलवे के दो-दो हेरिटेज होटल सौंप दिए गए थे।

IRCTC टेंडर के बदले पटना की बेशकीमती ज़मीन हासिल करने का असली खेल

अगर टेंडर सिर्फ नियमों को मोड़कर दिया गया होता, तो शायद यह मामला इतना बड़ा नहीं बनता। लेकिन असली खेल तो इसके बदले में हुए लेन-देन में छिपा था।

जांच एजेंसियों के मुताबिक, सुजाता होटल्स को रेलवे के होटलों का ठेका मिलने के बदले में ‘घूस’ के तौर पर कोई सूटकेस भरकर कैश नहीं दिया गया था।

खेल ज़मीन का था, और वो भी कोई छोटी-मोटी ज़मीन नहीं। पटना के एकदम वीआईपी और प्राइम लोकेशन पर मौजूद 3 एकड़ की बेशकीमती ज़मीन इस डील का हिस्सा थी।

कोचर बंधुओं ने इस ज़मीन को औने-पौने दामों में एक कंपनी को बेच दिया। अब आप सोचेंगे की ज़मीन सीधे लालू परिवार के पास क्यों नहीं आई?

यहीं तो सारा ‘स्मार्ट वर्क’ हुआ था! ज़मीन सीधे लालू परिवार के किसी सदस्य के नाम पर ट्रांसफर नहीं की गई थी, क्योंकि इससे सीधा शक जाता।

इसके बजाय, यह ज़मीन ‘डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड’ (DMCPL) नाम की एक बेनामी कंपनी के नाम पर ट्रांसफर की गई।

और ये डिलाइट मार्केटिंग कंपनी किसकी थी? यह कंपनी किसी और की नहीं, बल्कि लालू यादव के उस वक्त के ‘राइट हैंड’ माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता की थी।

यानी कागज़ों पर खेल एकदम सेट था- होटल का टेंडर कोचर बंधुओं को मिला, और बदले में कोचर बंधुओं की वो 3 एकड़ ज़मीन सरला गुप्ता की डिलाइट मार्केटिंग के पास चली गई।

कागज़ों पर सब कुछ बिल्कुल सेट था। लेकिन सियासत में कोई भी अपनी घूस की ज़मीन किसी और के नाम पर हमेशा के लिए थोड़े ही छोड़ देता है!

2010 से 2014 के बीच, जब मामला थोड़ा ठंडा पड़ा, तब इस बेनामी ज़मीन की ‘घर वापसी’ का खेल शुरू हुआ। डिलाइट मार्केटिंग कंपनी के शेयर्स बेहद गुपचुप तरीके से, एकदम कौड़ियों के भाव पर राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के नाम ट्रांसफर कर दिए गए।

जैसे ही शेयर्स का यह ट्रांसफर पूरा हुआ और कंपनी राबड़ी देवी व तेजस्वी यादव के कंट्रोल में आई, वैसे ही इसका नाम बदल दिया गया।

‘डिलाइट मार्केटिंग’ अब आधिकारिक तौर पर ‘लारा प्रोजेक्ट्स’ (Lara Projects) बन गई। ‘लारा’ यानी लालू और राबड़ी! ज़रा इस पूरी क्रोनोलॉजी को समझिए…

टेंडर निकला रेलवे का, ठेका मिला कोचर बंधुओं को, कोचर बंधुओं ने ज़मीन दी सरला गुप्ता की कंपनी को, और आख़िरकार वो कंपनी शेयर्स के खेल के ज़रिए सीधे ‘लारा प्रोजेक्ट्स’ बनकर लालू परिवार की तिजोरी में समा गई।

यही वो सबसे बड़ा और पक्का सबूत था जिसे आधार बनाकर ED ने अपना मनी लॉन्ड्रिंग का केस खड़ा किया।

और क्योंकि राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव आज भी उस कंपनी (लारा प्रोजेक्ट्स) के मालिक हैं जिसके पास यह दागी ज़मीन है, तो वे सीधे तौर पर इस मनी लॉन्ड्रिंग के खेल में शामिल माने जाएंगे।

लालू के वकील ने बताया इसे “राजनीतिक बदले की साज़िश” तो जज साहब ने सुना दी एक तगड़ी फटकार

ज़ाहिर सी बात है, जब मामला इतना बड़ा हो और सामने पूरा का पूरा राजनीतिक कुनबा हो, तो कोर्ट में दलीलें भी उसी लेवल की दी जाती हैं।

जब राउज एवेन्यू कोर्ट में इस केस की सुनवाई चल रही थी, तो लालू परिवार के वकीलों ने वही पुरानी और जानी-पहचानी दलील अदालत के सामने रखी।

उन्होंने कहा की यह पूरी कार्रवाई महज़ ‘पॉलिटिकल वेंडेटा’ यानी राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से की जा रही है। वकीलों ने केस की ‘टाइमिंग’ पर सवाल उठाए और इसे सत्ता पक्ष का एक हथियार बताने की कोशिश की।

लेकिन स्पेशल जज विशाल गोग्ने की अदालत में ये सारी दलीलें धरी की धरी रह गईं। जज साहब ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए एक चुभती हुई टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा की कुछ सौदे तो एकदम “इन प्लेन साइट” (In plain sight) यानी सबकी आँखों के सामने हुए हैं। जब लेन-देन और शेयर्स का ट्रांसफर कागज़ों पर बिल्कुल साफ-साफ दिख रहा है, तो फिर इसमें राजनीतिक प्रतिशोध की बात कहाँ से आ गई?

और बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई। इस फैसले को लिखते हुए जज विशाल गोग्ने ने इंसान के लालच और सत्ता के खुले दुरुपयोग पर बहुत ही गहरी चोट की।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा की इस बात का “मज़बूत शक” है की लालू यादव ने तत्कालीन रेल मंत्री के पद पर रहते हुए अपनी ताक़त का बेजा इस्तेमाल किया, और राबड़ी देवी व तेजस्वी यादव ने उस पद के दुरुपयोग से हासिल हुई दागी संपत्ति का सीधा फायदा उठाया।

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