हमारे देश के सिस्टम का उसूल बड़ा ही अजीब है। जो समाज देश की रीढ़ है, जो सच में ज़मीन पर पसीना बहा रहा है, राजनीति के इस ‘आरक्षण वाले केक’ की वजह से उसी का हिस्सा सबसे पहले और सबसे बेरहमी से काटा जाता है।
हम बात कर रहे हैं हमारे ओबीसी (OBC) समाज की, जो आबादी में सबसे बड़ा होने के बावजूद हमेशा सिस्टम के सौतेलेपन का शिकार होता आया है।
अब यूपी के उन चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों का ही गणित देख लीजिए। सुप्रीम कोर्ट कहता है की आरक्षण की लक्ष्मण रेखा 50% से ऊपर नहीं जा सकती..
लेकिन हमारे सरकारी बाबुओं ने ऐसी जादुई छड़ी घुमाई की 100 में से लगभग 92 सीटें (91.76%) एक झटके में बाँट दीं और मेरिट को उठाकर ताखे पर रख दिया।
इस पूरी सरकारी बंदरबांट में अगर किसी को मुफ्त की मलाई मिली, तो वो था SC/ST वर्ग, और अगर किसी का सबसे ज़्यादा हक़ मारा गया, तो वो था हमारा असली पिछड़ा यानी OBC वर्ग।
लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे गर्व करने वाली बात पता है क्या है? जिस समाज का हक़ सरेआम लूटा गया, उसने कोई ‘विक्टिम कार्ड’ खेला।
आज का OBC युवा रोने-धोने के बजाय चुपचाप अपनी किताबों में सिर खपाकर मेरिट की राह पर चल पड़ा है।
सिस्टम का जादुई गणित जहां 50 प्रतिशत आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट वाली लक्ष्मण रेखा भी हो गई पार
ये पूरा खेल शुरू होता है यूपी के चार मेडिकल कॉलेजों से। अंबेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर के इन मेडिकल कॉलेजों को ‘स्पेशल कंपोनेंट प्लान’ (SCP) के तहत बनाया गया था।
अब ये SCP क्या बला है? दरअसल, यह एक ऐसा फंड होता है जो मुख्य रूप से अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए तय किया जाता है। अब सिस्टम ने सोचा कि भई, जब बिल्डिंग इस फंड से बनी है, तो एडमिशन में भी कुछ ‘स्पेशल’ होना चाहिए।
बस फिर क्या था! इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने जो 50% आरक्षण की अधिकतम सीमा तय की थी, उसे चुपके से साइड में रखा गया और इन चारों कॉलेजों की एमबीबीएस (MBBS) सीटों पर 91.76% का आरक्षण चिपका दिया गया।
SC/ST को मिला छप्पर फाड़ कोटा और OBC की झोली में आई कटौती, फिर भी इस मेहनती समाज ने नहीं किया कोई रोना-धोना
अब ज़रा इस 91.76% वाले जादुई कोटे का अंदरूनी बंटवारा देखिए, क्योंकि असली खेल तो यहीं छुपा है।
इस बंपर सेल में SC/ST वर्ग को कुल मिलाकर 78.82 प्रतिशत सीटें मिली हैं। और सामान्य वर्ग (General) के लिए 100 में से सिर्फ 8 सीटें रखी गयी हैं।
और जब बारी आई OBC वर्ग की..
नियम और संविधान के हिसाब से ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण मिलना चाहिए, है ना? लेकिन इस स्पेशल गणित में ओबीसी की झोली में आई सिर्फ 12.95% सीटें!
मतलब सीधे-सीधे ओबीसी के हक़ का लगभग 14% हिस्सा हवा हो गया। जो ओबीसी समाज देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है, उसे इस भारी भरकम आरक्षण की आड़ में चुपचाप किनारे कर दिया गया।
अब अगर ये 14% कट वाली बात किसी और समुदाय के साथ हुई होती, तो ज़रा सोचिए क्या होता? अब तक देश के दो-चार बड़े हाईवे जाम हो चुके होते।
टीवी डिबेट्स में रोना धोना चल रहा होता। ट्विटर पर ‘लोकतंत्र खतरे में है’ और ‘हमारे साथ भेदभाव हो रहा है’ वाले विक्टिम कार्ड की पूरी की पूरी फैक्ट्री चालू हो गई होती।
लेकिन कमाल की बात देखिए! ओबीसी समाज ने ना तो कोई बस जलाई, ना कोई रोना-धोना किया और ना ही सड़कों पर उतरकर किसी से अपना हक़ मांगने की भीख मांगी।
उन्होंने इस कटौती को बहुत ही साइलेंट तरीके से लिया। उन्हें समझ आ गया की इस ‘कोटा पॉलिटिक्स’ में उलझने से अच्छा है की अपनी पढ़ाई पर फोकस किया जाए।
आज का ओबीसी युवा ये बात बहुत अच्छी तरह जान चुका है की रोने से सीटें नहीं मिलेंगी, बल्कि कट-ऑफ़ को बीट करने से मिलेंगी।
इसलिए वो बिना कोई बवाल काटे, शांति से मेरिट की लाइन में खड़ा होकर अपना रास्ता खुद बना रहा है।
अदालत में खायी हुई सरकारी कसम कैसे एक साल में हवा हो गयी और अब अफसर ढूंढ रहे हैं जवाब
अब आप सोच रहे होंगे की क्या इस 91.76% वाले चमत्कार को किसी ने कोर्ट में चुनौती नहीं दी? बिल्कुल दी! पिछले साल (2025) जब ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के सामने पहुंचा (जस्टिस पंकज भाटिया की अदालत में), तो जज साहब भी हैरान रह गए।
उन्होंने तुरंत इंदिरा साहनी जजमेंट का हवाला देते हुए इस असंवैधानिक आरक्षण को रद्द कर दिया।
लेकिन यहाँ सिस्टम ने अपनी सबसे बड़ी गुगली फेंकी। सरकार की तरफ से कोर्ट में एक बहुत ही ‘इमोशनल अपील’ डाली गई।
कहा गया, “बच्चों के एडमिशन हो चुके हैं। अगर अब सीटें छीनी गईं, तो बच्चे भयंकर डिप्रेशन में चले जाएंगे। उनका पूरा एक साल बर्बाद हो जाएगा।”
जज साहब का भी दिल पसीज गया। उन्होंने पूछा की भई आगे का क्या प्लान है? तब सरकार ने बाकायदा एक लिखित हलफनामा (Written Undertaking) कोर्ट में जमा किया की, “आप इस साल (2025) एडमिशन होने दीजिए। हम वादा करते हैं की अगले सत्र (2026-27) से हम इस गलती को सुधार लेंगे और नियम के मुताबिक कोटे को 50% के अंदर ले आएंगे।”
लेकिन कहते हैं ना की सरकारी वादे अक्सर फाइलों की धूल में गुम हो जाते हैं। इस साल (सितंबर 2026) जब नीट की काउंसलिंग शुरू हुई, तो कोर्ट में खाई हुई वो कसम, वो लिखित हलफनामा… सब चुपचाप कूड़ेदान में डाल दिया गया और फिर से वही 91.76% वाला आरक्षण थोप दिया गया!
इसे सीधे शब्दों में कहें तो यह कोर्ट की सरेआम अवमानना (Contempt of Court) है। जब यह मामला दोबारा हाई कोर्ट की डबल बेंच के पास पहुंचा, तो कोर्ट का पारा सातवें आसमान पर था।
और मज़े की बात देखिए, सरकार की तरफ से कोई वकील ढंग का जवाब देने के लिए कोर्ट में खड़ा ही नहीं हुआ! आखिरकार, कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए सीधे चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव (Principal Secretary) को ही तलब कर लिया है की “भाईसाहब, आप ही आकर समझा दीजिए की कोर्ट को दिए गए वादे एक साल में हवा कैसे हो जाते हैं!”
‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ की कानूनी लड़ाई और मलाईदार तबके को बाहर करने की उठती जोरदार मांग
खैर, सिस्टम की इस मनमानी को कोई तो चुनौती देने वाला चाहिए था! जब आम छात्र इस 91% के भारी-भरकम और गैर-कानूनी आरक्षण के बोझ तले दबने लगे, तब मैदान में उतरी ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ (Youth for Equality) नाम की संस्था।
मेरिट के हक की आवाज़ उठाने वाली इस संस्था और प्रभावित NEET छात्रों ने सीधे हाई कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) ठोक दी।
इस मुद्दे पर आवाज़ उठाते हुए डॉ. नेहा दास ने बोला की किसी एक कॉलेज में 91.76% आरक्षण थोप देने का मतलब है की आप उन रिज़र्व्ड छात्रों को बाकी समाज से पूरी तरह अलग-थलग कर रहे हैं।
ये कोई सामाजिक न्याय नहीं है, ये तो आज़ादी से पहले वाले अंग्रेजों के उस ‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ की याद दिलाता है, जहाँ एक खास वर्ग के अलावा किसी और की एंट्री ही बैन थी।
‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ आरक्षण व्यवस्था में तत्काल रिफॉर्म्स की एक बहुत ही लॉजिकल मांग कर रही है। उनका कहना है की आज आरक्षण के नाम पर जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मलाई खाई जा रही है, उसे रोकना होगा।
जो जातियां या परिवार एक बार आरक्षण का पूरा फायदा उठाकर अफसर बन चुके हैं, उन्हें इस लिस्ट से बाहर क्यों नहीं किया जाता?
विक्टिम कार्ड खेलकर रेस जीतने वालों के लिए एक तगड़ा सबक बन रहा है मेरिट के दम पर लड़ता ओबीसी समाज
सच कहूं तो, आज हमारे देश में ‘आरक्षण’ सामाजिक न्याय (Social Justice) का हथियार कम, और कुछ गिने-चुने लोगों के लिए एक वीआईपी प्रिविलेज (VIP Privilege) ज़्यादा बन गया है।
आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो सारा का सारा हक, सारा का सारा फंड और 78.82% तक का कोटा डकारने के बाद भी सुबह-शाम ‘शोषण’ का विक्टिम कार्ड खेलते नज़र आते हैं।
उन्हें लगता है की सदियों पुराने शोषण का रोना रोकर वो आज के इस कॉम्पिटिटिव दौर में भी बिना मेहनत के रेस जीत लेंगे।
लेकिन उन्हें आज के ओबीसी समाज से एक बहुत तगड़ा सबक लेना चाहिए। ओबीसी वर्ग ने भी तो इतिहास में संघर्ष किया है!
और आज भी जब सिस्टम ने उनका 14% हक काट लिया, तो उन्होंने क्या किया? क्या वो सड़कों पर हंगामा करने आये? क्या उन्होंने कोर्ट के बाहर धरने दिए? बिल्कुल नहीं!
ओबीसी वर्ग ने बहुत पहले ही ‘क्रीमी लेयर’ के कांसेप्ट को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया था। वो जानते हैं की समाज का जो तबका मज़बूत हो गया है, उसे खुद पीछे हटकर अपने ही गरीब भाइयों को मौका देना चाहिए।
जो लोग हर बात पर विक्टिम कार्ड निकालकर बैठ जाते हैं, उन्हें ये बात समझनी होगी की दुनिया बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है। अब नौकरियां या कॉलेज की सीटें ‘रोने’ से नहीं मिलेंगी।
अगर ओबीसी का युवा अपनी घटी हुई सीटों का रोना रोने के बजाय अपनी किताबों से दोस्ती कर सकता है, अगर वो 12% कोटे के भरोसे बैठने के बजाय 100% मेरिट पर दांव लगा सकता है, तो बाकी लोग ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
सिस्टम भले ही अपने जादुई गणित से 50% की लिमिट को 91% तक खींच ले। सरकारें भले ही कोर्ट में हलफनामे देकर मुकर जाएं।
लेकिन आख़िरकार इस देश का भविष्य वो युवा ही लिखेगा, जो कोटा पॉलिटिक्स के शोर-शराबे से दूर खुद को ‘मेरिट’ की भट्टी में तपा रहा है।
क्योंकि इतिहास गवाह है, सिस्टम आपको शॉर्टकट तो दे सकता है, लेकिन असली इज़्ज़त और मुकाम सिर्फ और सिर्फ पसीना बहाने वालों को ही मिलता है।
