कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं जिन पर वक्त कितनी भी मरहम लगा ले, वो कभी भरते नहीं हैं। 1990 का वो खौफनाक दौर…
जब कश्मीर में रातों-रात मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से चीख-चीख कर ऐलान किया जा रहा था- “रालिव, गालिव, चालिव” (या तो हमारे धर्म में आ जाओ, या मरो, या फिर अपनी औरतों को यहीं छोड़कर वादी से भाग जाओ)। आज भी वो मंज़र याद करके रूह कांप जाती है।
लेकिन अब इतिहास एक बार फिर खुद को उसी खौफनाक मोड़ पर दोहरा रहा है। आज 30-36 साल बाद, जब हमें लग रहा था की कश्मीर बदल रहा है, जब ‘प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज’ (PM Rehabilitation Package) के नाम पर हमारे पंडित भाई वापस अपनी माटी की तरफ लौट रहे थे…
तब अचानक फिर से उसी खूनी दौर की आहट सुनाई देने लगी है। वादी में काम कर रहे करीब 7000 कश्मीरी पंडित कर्मचारियों पर आतंकियों ने फिर से बंदूक तान दी है। उनका फरमान सीधा और बेहद खौफनाक है- ‘नौकरी छोड़ो या मरो’ (Quit or Die)।
अब सवाल ये है की आख़िर कब तक?
क्या कश्मीरी पंडित हर 30 साल बाद अपना घर-बार छोड़कर रातों-रात भागने के लिए ही पैदा हुए हैं? कब तक हम सिर्फ एक ‘विक्टिम’ बनकर कैंडल मार्च निकालते रहेंगे?
1990 का वो खौफनाक मंजर फिर लौट आया, जब घाटी से गूंजता था काफिरों (कश्मीरी पंडितों) को भगाने का जिहादी फरमान

आप ज़रा ग्राउंड की हकीकत को समझिए भाई। जो 7000 कश्मीरी पंडित पीएम पैकेज के तहत वापस अपने घरों को गए थे, वो कोई शौक से नहीं गए थे।
उन्होंने हिम्मत दिखाई थी। उन्होंने चाहा था की अपनी पुरखों की ज़मीन पर फिर से सनातन का बीज बोया जाए। लेकिन उन बेचारे निहत्थे कर्मचारियों को क्या पता था की जिस सिस्टम के भरोसे वो वहां जा रहे हैं, वो सिस्टम अंदर से कितना खोखला है।
लेकिन आज हालात ये हो गए हैं की इन कर्मचारियों के दफ्तर जाने से लेकर बाज़ार में सब्ज़ी खरीदने तक… हर जगह मौत का साया मंडरा रहा है।
आतंकियों का वो सीधा फरमान हवा में तैर रहा है की “हम तुम्हें तुम्हारे घरों में, तुम्हारे दफ्तरों में घुसकर मारेंगे।”
ये वही जिहादी मानसिकता है जिसे न तो कश्मीर का विकास पच रहा है और न ही वहां किसी हिंदू का बसना।
इनका अल्टीमेटम एकदम साफ है.. या तो अपनी सरकारी नौकरी से तुरंत इस्तीफा दो और घाटी छोड़कर निकल जाओ, या फिर अपनी जान से हाथ धोने के लिए तैयार रहो।

7000 कश्मीरी पंडितों का प्राइवेट डेटा लीक करने वाले सिस्टम के अंदर बैठे जिहादी जयचंद कौन हैं
अब बात करते हैं उस चीज़ की जिसने पूरे देश के सुरक्षा तंत्र के होश उड़ा दिए हैं। ये सिर्फ कागज़ पर छपी कोई मामूली सी धमकी नहीं है।
जिस आतंकी संगठन ने ये खत भेजा है, वो ‘यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल’ (ULC) है। अब आप कहेंगे की ये ULC कौन है? तो भाई, ये कोई नया संगठन नहीं है, बल्कि उसी खूंखार लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक शैडो फ्रंट (मुखौटा) है।
जब इंटरनेशनल लेवल पर लश्कर पर बैन लगता है, तो ये नाम बदल कर अपना गंदा खेल चालू रखते हैं।
हैरानी की बात तो ये है की इस संगठन ने सिर्फ धमकी नहीं दी है, बल्कि इन 7000 कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का सबसे खुफिया और प्राइवेट डेटा ऑनलाइन लीक कर दिया है!
सोचिए ज़रा! आतंकियों के पास उन कर्मचारियों के पर्सनल मोबाइल नंबर, उनके घर के सटीक पते और यहाँ तक की उनकी गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन नंबर तक मौजूद हैं।
उन्होंने बाकायदा लिस्ट छाप कर बता दिया है की “हमें पता है तुम कहाँ रहते हो, किस गाड़ी से दफ्तर जाते हो और तुम्हारा नंबर क्या है।”
अब सवाल ये उठता है की इतना खुफिया सरकारी डेटा इन आतंकियों के हाथ लगा कैसे? बिना सिस्टम में बैठे किसी ‘गद्दार’ या ‘जयचंद’ के ये मुमकिन ही नहीं है यार!
सरकारी दफ्तरों की फाइलों में, सचिवालय के सर्वर में जो डेटा महफूज़ रहना चाहिए था, वो सीधे लश्कर के कमांडरों के पास पहुँच गया!
मतलब साफ है की सिस्टम के भीतर ही ऐसे दीमक बैठे हैं जो दिन में सरकार की तनख्वाह खाते हैं और रात में आतंकियों को हमारे पंडित भाइयों की लिस्ट सौंपते हैं।
और ये सिलसिला कोई एक दिन का नहीं है। ग्राउंड रिपोर्ट्स गवाह हैं की अगस्त की शुरुआत से लेकर 5 सितंबर तक, महज़ एक ही महीने के भीतर इन बेचारे कर्मचारियों को ये 5वीं धमकी मिली है।
अगस्त में इन्हें कहा गया की जम्मू शिफ्ट होने पर भी तुम बचोगे नहीं। 1 सितंबर को जब सरकार ने पंडितों को हथियार देने पर हल्का-सा विचार किया, तो तुरंत धमकी आ गई।
और अब 5 सितंबर को पूरी 7000 लोगों की लिस्ट और डेटा लीक कर दिया गया। क्या कर रही है हमारी इंटेलिजेंस? क्या कर रहा है जम्मू-कश्मीर पुलिस का साइबर सेल?
जब तक इन आस्तीन के सांपों को खोजकर बीच चौराहे पर उल्टा नहीं टांगा जाएगा, तब तक कोई भी कश्मीरी पंडित वहां सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता।
सरकार का ‘वर्क फ्रॉम होम’ वाला अजीबो-गरीब सुझाव और टारगेट किलिंग की खूनी ज़मीनी हकीकत
खैर, जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो हमारे प्रशासन ने क्या किया? उन्होंने ऐसा सॉल्यूशन निकाला जिसे सुनकर किसी को भी गुस्सा आ जाए।
प्रशासन ने इन डरे-सहमे कर्मचारियों को सलाह दी की भाई, आप ‘वर्क फ्रॉम होम’ (Work from Home) कर लो। या फिर किसी सुरक्षित रूट से आओ-जाओ, या किसी पुलिस छावनी में शिफ्ट हो जाओ।
मतलब हद है! ‘वर्क फ्रॉम होम’ कोई समाधान है क्या? ये तो सीधा-सीधा आतंकियों के आगे घुटने टेकना हुआ। आप तो खुद मान रहे हो की आप उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकते, इसलिए उन्हें घरों में छिपने को कह रहे हो।
आतंकियों का मक़सद तो यही है ना की हिंदू सड़कों पर न दिखे, उसके दफ्तर बंद हो जाएं और वो डर कर वापस भाग जाए। आप उन्हें ‘वर्क फ्रॉम होम’ देकर आतंकियों का ही आधा काम आसान कर रहे हो।
इससे किसी की जान तो शायद थोड़े दिन बच जाए, लेकिन क्या इससे कश्मीर में सामान्य ज़िंदगी बहाल हो पाएगी? बिल्कुल नहीं!
और ये धमकियां सिर्फ व्हाट्सएप या चिट्ठियों तक सीमित नहीं हैं भाई। ज़मीन पर तो बाकायदा खून बह रहा है। आपको याद ही होगा मई 2022 का वो दिन!
इसी पीएम पैकेज के तहत काम करने वाले राहुल भट को उनके ही सरकारी दफ्तर (बडगाम) के अंदर घुसकर आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था।
एक बेगुनाह आदमी, जो सिर्फ अपनी नौकरी कर रहा था, उसे सरेआम मार दिया गया। उस वक्त भी करीब 2000 कर्मचारियों ने रोते-रोते इस्तीफे की पेशकश की थी, सड़कों पर धरने दिए थे।
ये तो बस एक नाम है। अभी हाल ही की तो बात है, जून में अनंतनाग में अमरनाथ यात्रा की ड्यूटी पर तैनात एक बेचारे पुलिसकर्मी को टारगेट करके गोली मार दी गई।
जुलाई आते-आते कुलगाम के एक ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले दो गैर-कश्मीरी प्रवासी मज़दूरों को चुन-चुन कर मार डाला गया। इनका पैटर्न एकदम साफ है.. जो भी हिंदू या गैर-मुस्लिम वादी में बाहर से आकर बसेगा, उसे मार दिया जाएगा।
सवाल ये है की जब सिस्टम हर बार फेल हो रहा है, तो फिर इन 7000 कश्मीरी पंडितों के पास आखिर रास्ता क्या बचता है?
बहुत रो लिए सरकारों के आगे अब वक्त आ गया है की कश्मीरी पंडित खुद उठाएं हथियार और करें अपनी आत्मरक्षा
यहीं पर आकर अब हमें अपने गिरेबान में भी झांकना होगा। अब सबसे कड़वा सच सुनने का वक्त आ गया है। आखिर कब तक हम सिर्फ एक ‘विक्टिम’ (पीड़ित) बनकर रोते रहेंगे?
कब तक हम अपनी 1990 की दर्दभरी कहानियां सुनाकर दुनिया से सहानुभूति की भीख मांगते रहेंगे?
ये बात हमें अपने दिमाग में अच्छे से बैठा लेनी चाहिए की मोमबत्तियां जलाकर, कैंडल मार्च निकालकर या ट्विटर पर हैशटैग चलाकर कभी किसी की जान नहीं बचती।
कश्मीर कोई मुगलों की जागीर नहीं है और न ही ये किसी जिहादी के बाप की बपौती है। ये ‘कश्यप ऋषि’ की धरती है! इसका तो नाम ही महर्षि कश्यप के नाम पर पड़ा है।
ये वो पावन धरा है जिसे कश्मीरी सारस्वत ब्राह्मणों ने अपने तपोबल, अपने ज्ञान और अपनी संस्कृति से सींचा था।
लेकिन आज विडंबना देखिए! जिस धरती को ब्राह्मणों ने बसाया, आज उसी धरती से उनके अस्तित्व को हमेशा-हमेशा के लिए ‘विलुप्त’ करने का षड्यंत्र अपने अंतिम चरण में है।
ज़रा 1990 के उस खौफनाक मंज़र को पीछे मुड़कर देखिए और खुद से एक सवाल पूछिए। उस वक्त घाटी में करीब 2 लाख कश्मीरी पंडित रहा करते थे।
सोचिए, अगर उन 2 लाख में से महज़ 10 प्रतिशत… यानी सिर्फ 20 हज़ार पंडित युवाओं ने भी अपना घर-बार छोड़कर पलायन करने के बजाय, अपने हाथों में हथियार उठा लिए होते, तो क्या होता?
क्या किसी भी जिहादी बाप की औलाद में इतनी हिम्मत होती की वो मस्जिदों से खुलेआम तुम्हारे परिवार को धमकियां दे पाता? बिल्कुल नहीं!
अगर 20 हज़ार पंडितों ने गोलियों का जवाब गोलियों से दिया होता, तो ये जिहादी उसी दिन जड़ से खत्म हो गए होते और आज ये दिन नहीं देखना पड़ता।
अब ये ‘विक्टिम कार्ड’ फाड़कर फेंकने का समय आ गया है। सरकारों और पुलिस के भरोसे बैठे रहोगे तो मारे जाओगे। एक पुलिस वाला या एक फौजी 24 घंटे आपके घर के बेडरूम या आपके दफ्तर की कुर्सी के पीछे खड़ा होकर आपकी सुरक्षा नहीं कर सकता।
अगर आपको अपनी पुरखों की धरती पर रहना है, अगर आपको अपना अस्तित्व बचाना है, तो अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अब खुद उठानी होगी!
जब मौत सामने खड़ी हो और तुम्हें पता हो की ये आतंकी तुम्हें ज़िंदा छोड़ने वाले नहीं हैं, तो फिर पीठ दिखाकर बेबस होकर मरने से लाख गुना बेहतर है की सीना तान कर शेर की तरह लड़ते हुए मरो!
कम से कम अपनी माटी पर गिरते-गिरते दो-चार जिहादियों को उनके सही मुकाम..जहन्नुम तक पहुंचा कर तो मरो! अगर लड़ते हुए प्राण चले भी गए, तो इतिहास तुम्हें कायर नहीं, बल्कि योद्धा कहेगा!
