चाणक्य-नीति भी बन जाती घाव, जब सत्ता चल देती गलत दांव Episode 1: ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की आड़ में अपनों के ही भरोसे का खात्मा, SC/ST Act को संजीवनी देकर कैसे बीजेपी ने खुद ही तोड़ दी अखंड हिन्दू समाज की एकता

याद रखिए:
राजनीति सच में शतरंज की ही एक बिसात है। यहाँ आप कितनी भी बड़ी ‘चाणक्य-नीति’ क्यों न लगा लें, कभी-कभी सत्ता का अति-आत्मविश्वास और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की सनक आपसे एक ऐसा गलत दांव चलवा देती है, जिसका घाव सालों-साल नहीं भरता।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) को देश की सबसे कैडर-बेस्ड और अनुशासित पार्टी माना जाता है। 2014 के बाद से इस पार्टी ने एक बहुत बड़ा सपना बुना था – ‘अखंड हिन्दुत्व’ का सपना।

एक ऐसी विशाल छतरी, जिसके नीचे सवर्ण, दलित, पिछड़ा, आदिवासी… सब अपने जातिगत मतभेद भुलाकर सिर्फ ‘हिन्दू’ के रूप में खड़े हों। सुनने में यह थ्योरी बहुत ही शानदार और ऐतिहासिक लगती है।

लेकिन, जब हम इस थ्योरी का ज़मीनी पोस्टमॉर्टम करते हैं, तो एक बहुत ही कड़वा सच सामने आता है।

सच्चाई ये है कि ‘सब हिन्दू एक हैं’ का नारा देने वाली पार्टी, ज़मीन पर उसी ‘जातिगत तुष्टिकरण’ (Social Engineering) के भंवर में फंस कर रह गई, जिसका वो खुद विरोध करती थी।

एक पल रुककर सोचिए:
आप राजनीति में दो नावों की सवारी नहीं कर सकते। आप एक तरफ लोगों को ‘हिन्दू’ कहकर एक करना चाहते हैं, और दूसरी तरफ कानूनों और योजनाओं में उन्हें जातियों के खांचे में बांटकर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देते हैं। दोनों नावें एक साथ कब तक चलेंगी?

बीजेपी के इतिहास का सबसे बड़ा ‘पॉलिटिकल सेल्फ-गोल’ वो दांव था जहाँ एक दलित वोटबैंक को साधने की हड़बड़ाहट में पार्टी ने अपने ही सबसे वफादार ‘कोर वोटर’ (मध्यम वर्ग और जनरल वर्ग) की पीठ में खंजर घोंप दिया था।

वो कोर वोटर, जो दशकों से हर मुश्किल में पार्टी के लिए ढाल बनकर खड़ा था, उसे एहसास हुआ कि सत्ता की इस बिसात पर वो महज़ एक बलि का बकरा है।

आज हम बात कर रहे हैं SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और 2018 के उस राजनीतिक घटनाक्रम की, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।

ये कहानी है BJP की उस गलती की, जिसने न्यायपालिका के एक बेहद तार्किक फैसले को सिर्फ और सिर्फ अपने चुनावी गणित के लिए रौंद दिया। आइए, इस पूरी क्रोनोलॉजी को शुरू से समझते हैं।

इस एपिसोड के 9 पड़ाव

01 20 मार्च 2018 सुप्रीम कोर्ट का फैसला: तुरंत गिरफ्तारी पर रोक, अग्रिम जमानत का रास्ता
02 2 अप्रैल 2018 हिंसक भारत बंद, 11 से ज्यादा मौतें, वोटबैंक का खौफ
03 अगस्त 2018 संसद में संशोधन: सेक्शन 18A, सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा
04 केस फाइल विष्णु तिवारी: 20 साल जेल, फिर भी बेगुनाह
05 2026 अजीत भारती: राष्ट्रवादी पत्रकार पर भी वही तलवार
06 मध्य प्रदेश शिवराज का बयान: कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता
07 6 सितंबर 2018 सपाक्स और सवर्ण-पिछड़ा भारत बंद, गांवों में नो-एंट्री
08 11 दिसंबर 2018 MP, राजस्थान, छत्तीसगढ़: NOTA और कोर वोटर का बदला
09 2019 से 2024 ना माया मिली ना राम: दलित वोट भी नहीं अटका, दरार रह गई

1. जब सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया SC/ST Act का कानूनी आतंकवाद

20 मार्च 2018 का वो ऐतिहासिक फैसला जिसने पूरे सिस्टम को दिखाया था आईना

भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली। यहीं 20 मार्च 2018 को वो फैसला आया, जिसे बाद में संसद ने पलट दिया।

अगर आपको इस पूरे राजनीतिक बवंडर की जड़ तक पहुंचना है, तो हमें कैलेंडर के पन्ने पलटकर 20 मार्च 2018 पर जाना होगा।

यह वो दिन था जब देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने सालों से चले आ रहे एक ‘कानूनी आतंकवाद’ की कमर तोड़ कर रख दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में एक मामला पहुंचा था, जिसे कानूनी भाषा में ‘डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य’ केस कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के दो बेहद काबिल और अनुभवी जजों – जस्टिस ए.के. गोयल और जस्टिस यू.यू. ललित की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

मामला ये था कि SC/ST एक्ट का इस्तेमाल समाज के दबे-कुचले लोगों को न्याय दिलाने के बजाय, अब आपसी दुश्मनी निकालने, ज़मीनें हड़पने, और सरकारी दफ्तरों में अपने सीनियर्स को ब्लैकमेल करने के लिए एक ‘हथियार’ की तरह होने लगा था।

अदालत कोई हवा में तो फैसले लेती नहीं। जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित ने बाकायदा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पक्के आंकड़े मंगवाए। और जब वो आंकड़े सुप्रीम कोर्ट की टेबल पर खुले, तो सिस्टम की आंखें खुली की खुली रह गईं।

आंकड़े बोलते हैं · NCRB 2015

15-16% 75%+
दर्ज मामलों में पुलिस की शुरुआती जांच में ही ‘झूठे’ साबित हुए केस ट्रायल तक पहुंचे मामलों में आरोपी बरी हो गए

ज़रा इस बात की गंभीरता को समझिए। 75 प्रतिशत मामलों में सज़ा न हो पाना ये साबित कर रहा था कि या तो केस पूरी तरह से फर्जी और मनगढ़ंत थे, या फिर कानून का इस्तेमाल निर्दोषों को फंसाने के लिए किया गया था।

इस डरावने डेटा को देखकर जजों ने एक बहुत ही तार्किक और संविधान-सम्मत सवाल पूछा। भारत का संविधान हर नागरिक को अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत ‘जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी’ का मौलिक अधिकार देता है। तो फिर महज़ एक झूठी शिकायत के आधार पर किसी भी निर्दोष व्यक्ति को बिना जांच के सीधे जेल में कैसे ठूंसा जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने कानून को खत्म नहीं किया, जैसा कि बाद में नेताओं ने अफवाह फैलाई। कोर्ट ने सिर्फ उस कानून के अंदर घुसे ‘आतंक’ को खत्म किया। 20 मार्च 2018 को जजों ने तीन बहुत ही शानदार और पारदर्शी आदेश दिए।

कोर्ट के तीन आदेश, साफ भाषा में

क्या बदला फैसले का मतलब
FIR के बाद गिरफ्तारी SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज होते ही अब ‘तुरंत गिरफ्तारी’ (Automatic Arrest) नहीं होगी।
शुरुआती जांच गिरफ्तारी से पहले कम से कम DSP रैंक का अधिकारी प्रारंभिक जांच करेगा कि शिकायत सच है या किसी को फंसाने की साजिश। सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी के लिए विभाग के उच्च अधिकारी की अनुमति जरूरी।
अग्रिम जमानत अदालत ने इस कानून में ‘अग्रिम जमानत’ (Anticipatory Bail) का रास्ता खोल दिया। निर्दोष गिरफ्तारी से पहले कोर्ट जा सकता है।
याद रखिए:
न्याय के सिद्धांत (Innocent until proven guilty) के हिसाब से यह एक मास्टरपीस फैसला था। यह फैसला किसी भी जाति के खिलाफ नहीं था। बल्कि यह उन हजारों-लाखों मासूम लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा का कवच था, जिन्हें महज ब्लैकमेलिंग के लिए बरसों तक सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता था।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही साफ शब्दों में अपने जजमेंट में लिखा कि यह एक्ट सामाजिक न्याय के लिए बनाया गया था, न कि बदला लेने या समाज में खौफ पैदा करने के लिए।

देश के हर आम नागरिक ने इस फैसले का खुले दिल से स्वागत किया। उसे लगा कि चलो, आखिरकार देश की न्यायपालिका ने उनकी वो पीड़ा समझ ली, जिसे कोई भी नेता अपने वोटबैंक खिसकने के डर से छूने तक की हिम्मत नहीं करता था। ऐसा लगा जैसे सालों बाद एक बहुत बड़ा कानूनी नासूर ठीक हो गया हो।

लेकिन… इस देश की विडंबना ही यही है कि जब भी न्यायपालिका समाज को सुधारने की कोशिश करती है, तो कुर्सी के भूखे नेताओं को अपना वोटबैंक खिसकता हुआ नज़र आने लगता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक और न्यायपूर्ण फैसले की स्याही अभी ठीक से सूखी भी नहीं थी कि देश में एक ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया गया, जिसने दिल्ली की सत्ता को घुटनों पर ला दिया।


2. अप्रैल 2018 का हिंसक ‘भारत बंद’ और सत्ता का खौफ

जब वोटबैंक खिसकने के डर से घुटनों पर आ गई BJP सरकार

2 अप्रैल 2018 का भारत बंद। सड़कों पर नारे, भीड़ और वो नैरेटिव कि ‘एक्ट खत्म हो गया’

फैसले के कुछ ही दिनों बाद एक बहुत ही सुनियोजित नैरेटिव सेट किया गया। विपक्षी नेताओं, खासकर राहुल गाँधी ने अपने भाषणों से दलित समाज के बीच ये अफवाह फैलाई कि “सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट खत्म कर दिया है” और “अब अगला नंबर आरक्षण का है।”

बिना यह समझे कि कोर्ट ने एक्ट खत्म नहीं किया, बल्कि सिर्फ फर्जी मुकदमों पर लगाम लगाई है, दलित संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को देशव्यापी ‘भारत बंद’ का ऐलान कर दिया।

और फिर उस दिन जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। 2 अप्रैल का वो ‘भारत बंद’ कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं था – सड़कें जंग के मैदान में तब्दील हो गईं। मध्य प्रदेश का ग्वालियर-चंबल संभाग, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई इलाके इस भयंकर हिंसा का केंद्र बन गए।

फाइल से:
2 अप्रैल 2018: ट्रेनें रोकी गईं, बसें फूंकी गईं और सरेआम गोलियां चलीं।
इस खौफनाक हिंसा में 11 से ज्यादा लोगों की जान चली गई।
2019 का लोकसभा चुनाव सिर पर था। बीजेपी हाईकमान के पसीने छूटने लगे।

अब ज़रा दिल्ली में बैठी सत्ता की मानसिकता को समझिए। 2018 का साल चल रहा था और 2019 का लोकसभा चुनाव सिर पर खड़ा था। बीजेपी हाईकमान के पसीने छूटने लगे। पार्टी को लगा कि अगर दलित समाज इसी तरह सड़कों पर रहा, तो मायावती (BSP) और कांग्रेस इसे एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बना लेंगे।

‘बीजेपी दलित विरोधी है’ – यह ठप्पा लगने का खौफ सत्ता के गलियारों में इस कदर हावी हो गया कि पार्टी का पूरा का पूरा चाणक्य-तंत्र हिल गया।

दबाव सिर्फ विपक्ष से नहीं था। एनडीए (NDA) के भीतर बैठे दलित नेताओं ने भी सरकार की नाक में दम कर दिया। रामविलास पासवान (LJP) और रामदास अठावले जैसे सहयोगियों ने सीधे तौर पर सरकार को अल्टीमेटम दे दिया।

पासवान की पार्टी ने तो बाकायदा 9 अगस्त की डेडलाइन तय कर दी कि अगर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं पलटा, तो वो बड़ा आंदोलन करेंगे।

याद रखिए:
जो पार्टी 282 सीटों के पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का दावा करती थी, वो महज एक वोटबैंक के छिटकने के डर से पूरी तरह घुटनों पर आ गई।
एक पल रुककर सोचिए:
जब किसी फैसले से हिंसा भड़कती है, तो एक मजबूत सरकार का काम क्या होता है? जनता के बीच जाकर भ्रम दूर करना, ये समझाना कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून खत्म नहीं किया है। बीजेपी ने संवाद का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने शॉर्टकट चुना – तुष्टिकरण का रास्ता।

यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब किसी फैसले से हिंसा भड़कती है, तो एक मज़बूत सरकार का काम क्या होता है? उसका काम होता है जनता के बीच जाकर भ्रम को दूर करना, उन्हें समझाना कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून खत्म नहीं किया है।

लेकिन बीजेपी ने ऐसा कुछ नहीं किया। संवाद करने या सच बताने के बजाय, उन्होंने वो रास्ता चुना जो शॉर्टकट था – ‘तुष्टिकरण’ (Appeasement) का रास्ता।


3. संसद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने वाला BJP का वो आत्मघाती कदम

SC/ST एक्ट में संशोधन करके कैसे अपने ही कोर वोटर को छोड़ा लावारिस और गहरी कर दी हिन्दू जातियों की दूरी

संसद का मानसून सत्र, अगस्त 2018। यहीं वो संशोधन पास हुआ जिसने सेक्शन 18A जोड़ दिया।

सियासत में जब आप डर कर फैसले लेते हैं, तो अक्सर आप कुल्हाड़ी पर पैर मारते हैं। बीजेपी ने ठीक यही किया।

2019 के चुनावों की वैतरणी पार करने और दलित वोटरों को खुश करने की जल्दबाज़ी में मोदी सरकार ने अगस्त 2018 के मानसून सत्र में एक ऐसा बिल पेश किया, जिसने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया।

सरकार ने संसद में ‘SC/ST (Prevention of Atrocities) Amendment Bill, 2018’ पेश किया। इस बिल का इकलौता मक़सद सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक और न्यायपूर्ण फैसले को पलटना था।

ज़रा इस संशोधन की क्रूरता को समझिए। सरकार ने इस कानून में बाकायदा एक नया ‘सेक्शन 18A’ (Section 18A) जोड़ दिया।

सुप्रीम कोर्ट, 20 मार्च 2018 संशोधन बिल, अगस्त 2018
FIR के बाद तुरंत गिरफ्तारी नहीं। सेक्शन 18A: प्रारंभिक जांच की जरूरत खत्म।
DSP स्तर की प्रारंभिक जांच जरूरी। FIR हुई तो तुरंत गिरफ्तारी।
सरकारी कर्मचारी के लिए विभागीय अनुमति। सीनियर अफसर से परमिशन की जरूरत नहीं।
अग्रिम जमानत का रास्ता खुला। CrPC की धारा 438 इस एक्ट पर लागू नहीं।
आधार: NCRB डेटा और अनुच्छेद 21। आधार: चुनावी गणित और वोटबैंक का डर।

मतलब, अगर आप पर केस हो गया, तो आप गिरफ्तारी से बचने के लिए कोर्ट जाकर जमानत भी नहीं मांग सकते। आपको पहले जेल जाना ही होगा।

एक पल रुककर सोचिए:
एक ऐसी पार्टी जो दशकों से कांग्रेस पर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का आरोप लगाती आई थी, क्या उसने दलित वोटबैंक के लिए सामान्य वर्ग और मिडिल क्लास के खिलाफ ठीक वैसा ही तुष्टिकरण नहीं किया?

यह एक आत्मघाती कदम था। सरकार ने एक झटके में सुप्रीम कोर्ट की उस पूरी रिसर्च, NCRB के आंकड़ों और न्याय के मूल सिद्धांतों को सिर्फ और सिर्फ अपने ‘पॉलिटिकल कैलकुलेशन’ के लिए रौंद दिया।

इस बिल के पास होते ही बीजेपी के उस मिडिल क्लास हिन्दू वोटर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई, जो राम मंदिर, धारा 370 और हिन्दुत्व के नाम पर अपना तन-मन-धन बीजेपी पर लुटाता था। उस वोटर को अचानक एहसास हुआ कि पार्टी के लिए उसकी अहमियत बस एक ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (Taken for granted) मशीन से ज़्यादा कुछ नहीं है।

जो पार्टी ‘न्याय’ का ढिंढोरा पीटती थी, उसने एक ऐसे कानून को फिर से कैसे थोप दिया जिसका खुल्लम-खुल्ला दुरुपयोग निजी दुश्मनी निकालने, ज़मीनें हड़पने और ब्लैकमेल करने के लिए हो रहा था?

इस एक बिल ने बीजेपी के लिए वो खाई खोद दी, जिसमें गिरने से उसे कोई नहीं बचा पाया। सरकार को लगा था कि बिल पास होते ही मामला शांत हो जाएगा, लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने जो चिंगारी लगाई है, वो मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे उनके सबसे मज़बूत गढ़ों में दावानल (जंगल की आग) बनने वाली है।


4. SC/ST Act का हथियार और मासूमों की चीखें

विष्णु तिवारी का वो डरावना सच जो पूरे सिस्टम को आईना दिखाता है

विष्णु तिवारी। साल 2000 में फंसाया गया। 20 साल बाद हाईकोर्ट ने बरी किया। परिवार तब तक खत्म हो चुका था।

अगर आप जानना चाहते हैं कि ‘तुरंत गिरफ्तारी’ और बिना अग्रिम जमानत वाले इस कानून की कीमत एक निर्दोष इंसान को कैसे चुकानी पड़ती है, तो उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले के ‘विष्णु तिवारी’ (Vishnu Tiwari) का केस पढ़ लीजिए। भारत के न्यायिक इतिहास का यह वो काला पन्ना है, जिसे पढ़कर किसी का भी कलेजा कांप जाएगा।

केस फाइल: विष्णु तिवारी · ललितपुर, उत्तर प्रदेश
साल 2000 में गिरफ्तारी, उम्र 23 वर्ष
आरोप दुष्कर्म + SC/ST एक्ट। वजह: छोटी सी जमीनी रंजिश
सजा निचली अदालत ने उम्रकैद
जेल 20 साल। पिता और दोनों भाइयों की मौत, अंतिम संस्कार पर पेरोल तक नहीं
सच्चाई 2021: इलाहाबाद हाईकोर्ट (जस्टिस कौशल जयेंद्र ठाकर और जस्टिस गौतम चौधरी)
निष्कर्ष कोई सबूत नहीं। मेडिकल रिपोर्ट में खरोंच तक नहीं। महिला के पति और ससुर की झूठी कहानी
नतीजा 43 साल की उम्र में आगरा सेंट्रल जेल से रिहाई। न परिवार, न घर, न जवानी
एक पल रुककर सोचिए:
अगर उस वक्त शुरुआती जांच और अग्रिम जमानत का तार्किक नियम होता, तो क्या विष्णु की जिंदगी के 20 साल यूं बर्बाद होते?

मुआवजा ऐंठने का गोरखधंधा और हाईकोर्ट्स की तीखी टिप्पणियां

यह सिर्फ एक विष्णु तिवारी की कहानी नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार के थानों में ऐसे हजारों केस धूल फांक रहे हैं।

इस कानून का दुरुपयोग सिर्फ ‘निजी दुश्मनी’ निकालने के लिए नहीं हो रहा है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा ‘आर्थिक गोरखधंधा’ (Financial Racket) बन चुका है।

दरअसल, सरकारी नियमों के तहत SC/ST एक्ट में केस दर्ज होते ही या चार्जशीट दाखिल होते ही कथित पीड़ित को सरकार की तरफ से लाखों रुपये का ‘मुआवजा’ (Compensation) मिलता है। इस आर्थिक लालच ने गांव-गांव में एक नया सिंडिकेट पैदा कर दिया है। लोग जानबूझकर झूठी FIR लिखवाते हैं, सवर्ण या OBC वर्ग के व्यक्ति को जेल भिजवाते हैं, सरकार से लाखों का मुआवजा ऐंठते हैं, और फिर कुछ सालों बाद कोर्ट में ‘समझौता’ कर लेते हैं।

देश की अदालतें भी इस गोरखधंधे को देखकर बेबस और परेशान हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कई बार अपने जजमेंट्स में इस बात को डंके की चोट पर माना है कि SC/ST एक्ट का इस्तेमाल न्याय के लिए कम और ‘जमीन हड़पने’, ‘झूठे मामलों में फंसाने’ और ‘सरकारी मुआवजा ऐंठने’ के एक हथियार के रूप में ज्यादा हो रहा है।

लेकिन अदालतें भी क्या करें? जब देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में बैठी सरकार ने ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर इस कानून की धार को इतना अंधा कर दिया हो कि जज के हाथ भी बंध जाएं, तो इंसाफ कैसे होगा?


5. जब अपनों पर ही चलने लगा ‘कानूनी आतंकवाद’ का चाबुक

अजीत भारती का ताजा मामला और सत्ता की मौन स्वीकृति

अजीत भारती। अगस्त-सितंबर 2026: नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद वाले प्रकरण में SC/ST एक्ट के तहत FIR

अगर आपको लग रहा है कि इस क्रूर कानून का शिकार सिर्फ विष्णु तिवारी जैसे गांव के आम, गरीब और बेसहारा लोग हो रहे हैं, तो आप बहुत बड़े मुगालते में हैं। सियासत का यह भस्मासुर अब उन लोगों को भी निगलने लगा है, जो सालों से ‘हिन्दुत्व’ की विचारधारा के लिए ढाल बनकर खड़े रहे हैं।

केस फाइल: अजीत भारती · 2026 · राष्ट्रवादी पत्रकार भी नहीं बचा
घटना नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद पर YouTube प्रसारण की टिप्पणियां
कार्रवाई दिल्ली में सीधे SC/ST एक्ट के तहत FIR
अड़चन 2018 के सेक्शन 18A ने अग्रिम जमानत का रास्ता बंद कर दिया था
अदालत निचली अदालत से दिल्ली हाईकोर्ट तक धक्के। निचली अदालत: धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत का प्रावधान ही नहीं

जब एक आम आदमी का भरोसा टूटता है

विष्णु तिवारी और अजीत भारती जैसे केस और अदालतों की ये टिप्पणियां महज कुछ पन्नों के दस्तावेज नहीं हैं। ये उस मिडिल क्लास वोटर की रोजमर्रा की जिंदगी का डर हैं, जिसने 2014 में बहुत उम्मीदों के साथ बीजेपी को सत्ता के शिखर पर बिठाया था।

ज़रा एक आम जनरल/OBC किसान, एक स्कूल टीचर, या एक डॉक्टर की मनोदशा को समझिए। उसे पता है कि वो चाहे कितनी भी ईमानदारी से अपनी जिंदगी जी ले, लेकिन मोहल्ले या गांव का कोई भी रसूखदार व्यक्ति किसी को मोहरा बनाकर उस पर SC/ST एक्ट का फर्जी मुकदमा ठोक सकता है।

और केस होते ही पुलिस उसे कॉलर से पकड़कर घसीटते हुए जेल ले जाएगी। उसे जमानत तक मांगने का हक नहीं होगा। उसका पूरा करियर, समाज में उसकी इज्जत, सब कुछ पलक झपकते ही खाक हो जाएगा।

याद रखिए:
जब ये डर जमीन पर फैलने लगा और बीजेपी के नेताओं ने वोटबैंक की खातिर इस अन्याय पर आंखें मूंद लीं, तब जाकर इस ‘कोर वोटर’ के सब्र का बांध टूटा। उसे समझ में आ गया कि जिस ‘अखंड हिन्दू’ समाज का सपना उसे दिखाया जा रहा था, वो महज एक छलावा है। जब FIR लिखी जाती है, तब पुलिस ‘हिन्दू’ नहीं देखती, तब वो सिर्फ ये देखती है कि शिकायत करने वाले और आरोपी की जाति क्या है।

इसी घुटन और गुस्से ने मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में एक ऐसे विद्रोह को जन्म दिया, जिसकी कल्पना शायद बीजेपी के बड़े-बड़े चाणक्यों ने भी नहीं की थी।


6. ‘कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता…’

सत्ता की बेहोसी में BJP ने कैसे भड़काई अपने ही घर में आग

शिवराज सिंह चौहान। 2016 का AJAKS अधिवेशन वाला स्वर 2018 में सवर्ण युवाओं के जेहन में ताजा हो गया।

राजनीति में शब्दों के बाण कभी-कभी गोलियों से ज्यादा गहरा घाव देते हैं। मध्य प्रदेश में सवर्ण हिन्दुओं का गुस्सा महज SC/ST एक्ट के संशोधन तक सीमित नहीं था। इसके पीछे कई सालों की टीस थी, जिसे प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक अति-उत्साही बयान ने नासूर बना दिया था।

दरअसल, दलित वोटबैंक को लुभाने के लिए 2016 में ही शिवराज सिंह चौहान ने अजाक्स (AJAKS – अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ) के एक बड़े अधिवेशन में दहाड़ते हुए कहा था –

“कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता।”

ज़रा इस बयान की टोन पर गौर कीजिए। एक मुख्यमंत्री, जिसे पूरे प्रदेश ने सिर आंखों पर बिठाया हो, जो खुद को प्रदेश का ‘मामा’ कहता हो, वो अपने ही प्रदेश के अनारक्षित वर्ग को ‘माई का लाल’ कहकर खुलेआम चुनौती दे रहा था।

जब 2018 में केंद्र सरकार ने SC/ST एक्ट को फिर से क्रूर बना दिया, तो मध्य प्रदेश के सवर्ण हिन्दू युवाओं, किसानों और कर्मचारियों के ज़हन में शिवराज सिंह का वही पुराना बयान ताज़ा हो गया।

एक आम वोटर को लगने लगा कि बीजेपी की सरकारें अब सिर्फ और सिर्फ ‘तुष्टिकरण’ की अंधी दौड़ में शामिल हो गई हैं। कांग्रेस और बीजेपी में उन्हें कोई फर्क नज़र नहीं आ रहा था।

मिडिल क्लास हिन्दू वर्ग को यह साफ़ मैसेज मिल गया था कि सत्ता के नशे में चूर नेताओं को उनकी कोई परवाह नहीं है, क्योंकि नेताओं ने मान लिया है कि सवर्णों की तो ‘मज़बूरी’ है बीजेपी को वोट देना। इसी ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ वाली मानसिकता ने मध्य प्रदेश की ज़मीन पर एक ऐतिहासिक विद्रोह को जन्म दिया।


7. सपाक्स (SAPAKS) का उदय और 6 सितंबर का वो ‘भारत बंद’

BJP की गलती से और ज्यादा बंटे हिन्दू

सपाक्स का प्रदर्शन। बैनर साफ है: पदोन्नति में आरक्षण बंद करो। यह महज कर्मचारी संगठन नहीं रह गया था।

जब राजनीतिक पार्टियां आपका साथ छोड़ देती हैं, तो समाज खुद अपना नेतृत्व खड़ा कर लेता है। मध्य प्रदेश में ठीक यही हुआ।

राज्य में पदोन्नति में आरक्षण (Reservation in promotion) और SC/ST एक्ट के दुरुपयोग के खिलाफ सवर्णों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सरकारी कर्मचारियों ने मिलकर एक संस्था बनाई थी – ‘सपाक्स’ (SAPAKS – सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक समाज)।

अगस्त 2018 के बाद यह महज़ एक कर्मचारी संगठन नहीं रह गया। यह मध्य प्रदेश के करोड़ों सवर्णों और OBC वर्ग के गुस्से का सबसे बड़ा राजनीतिक मंच बन गया। और इसने हिन्दुओं के बीच की जातिगत दूरी को और बड़ा दिया।

देखते ही देखते ग्वालियर-चंबल, मालवा-निमाड़ और विंध्य रीजन में सपाक्स की आंधी चलने लगी। रिटायर्ड IAS अधिकारी हीरालाल त्रिवेदी के नेतृत्व में सपाक्स ने गांव-गांव में रैलियां शुरू कर दीं।

और फिर आया 6 सितंबर 2018 का दिन। दलित संगठनों के 2 अप्रैल के बंद के जवाब में सवर्ण और पिछड़ा वर्ग संगठनों ने SC/ST एक्ट में हुए संशोधन के खिलाफ 6 सितंबर को देशव्यापी ‘भारत बंद’ का आह्वान किया।

यह बंद बिना किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन के बुलाया गया था। फिर भी मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्से पूरी तरह ठप हो गए। बाज़ार बंद रहे, लोग सड़कों पर उतरे।

याद रखिए:
यह बीजेपी के अपने ही ‘कोर वोटर’ का अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा शक्ति-प्रदर्शन था। सामान्य वर्ग ने साफ कर दिया था कि अगर तुम हमारे अस्तित्व को नकारोगे, तो हम तुम्हारी सत्ता की जड़ें खोद देंगे।

काले झंडे, गांवों में नो-एंट्री और ‘कोर वोटर’ का खुला विद्रोह

ज़मीनी हकीकत से कटे हुए बीजेपी नेताओं को जब तक इस गुस्से का एहसास हुआ, तब तक पानी सिर से ऊपर जा चुका था। चुनाव प्रचार के लिए जब बीजेपी के नेता और मंत्री गांवों में जाने लगे, तो उनका स्वागत फूल-मालाओं से नहीं, बल्कि गालियों और काले झंडों से हुआ।

उस दौर की ग्राउंड रिपोर्ट्स और वीडियो आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं। मध्य प्रदेश में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गहलोत और प्रदेश के कई कद्दावर मंत्रियों को सवर्ण युवाओं ने गांवों में घुसने तक नहीं दिया। गाड़ियों के सामने लेटकर युवाओं ने काले झंडे दिखाए और ‘SC/ST एक्ट वापस लो’ के नारे लगाए।

सबसे खौफनाक मंज़र तो वो था जब मध्य प्रदेश और राजस्थान के हजारों गांवों के बाहर लोगों ने बड़े-बड़े बैनर और बोर्ड लगा दिए। इन बोर्ड्स पर साफ़ अक्षरों में लिखा था –

“यह सवर्णों का गांव है, यहां नेताओं का प्रवेश वर्जित है। कृपया वोट मांग कर हमें शर्मिंदा ना करें।”

राजनीतिक विश्लेषक हैरान थे। जिस ग्वालियर-चंबल इलाके को RSS और जनसंघ की सबसे पुरानी और मज़बूत प्रयोगशाला माना जाता था, आज उसी प्रयोगशाला में बीजेपी के खिलाफ बगावत के शोले भड़क रहे थे।

लोगों ने एक नया नारा गढ़ा था – “नोटा (NOTA) दबाएंगे, तुम्हें तुम्हारी औकात बताएंगे।”

यह बगावत किसी दूसरी पार्टी (कांग्रेस) को जिताने के लिए नहीं थी। यह बगावत उस अहंकार को तोड़ने के लिए थी, जिसने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की आड़ में अपनों को ही बेगाना कर दिया था।

कोर वोटर ने तय कर लिया था कि वो बीजेपी को हराने के लिए अपना वोट कांग्रेस को भले ही ना दे, लेकिन वो बीजेपी को जिताने के लिए पोलिंग बूथ तक भी नहीं जाएगा।

2018 की पूरी टाइमलाइन: एक साल में सत्ता कैसे हिली – पूरी घटनाक्रम एक नज़र में

तारीख क्या हुआ
20 मार्च 2018 सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – तुरंत गिरफ्तारी पर रोक, अग्रिम जमानत का रास्ता खुला।
2 अप्रैल 2018 दलित संगठनों का हिंसक ‘भारत बंद’ – 11 से ज्यादा लोगों की मौत, ट्रेनें-बसें फूंकी गईं।
9 अगस्त 2018 रामविलास पासवान (LJP) की डेडलाइन – फैसला पलटो, वरना आंदोलन।
अगस्त 2018 SC/ST Amendment Bill, 2018 संसद में पास। सेक्शन 18A जोड़ा गया।
6 सितंबर 2018 सवर्ण-पिछड़ा वर्ग का बिना पार्टी समर्थन वाला भारत बंद। सपाक्स आंदोलन चरम पर।
11 दिसंबर 2018 मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभा नतीजे – तीनों राज्यों में बीजेपी सत्ता से बाहर।

8. NOTA का बटन और तीन राज्यों में सत्ता का वनवास

जब कोर हिन्दू वोटर ने घर बैठकर BJP को चखाया हार का स्वाद

सियासत में अक्सर कहा जाता है कि जनता की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है। नेताओं को लगता है कि चुनाव आते-आते लोग अपना गुस्सा भूल जाएंगे, दो-चार भावुक भाषण देंगे और पब्लिक फिर से उनके चुनाव चिह्न पर मोहर लगा देगी।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के 2018 के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी के रणनीतिकारों को बिल्कुल यही मुगालता था। उन्हें लगा कि सपाक्स (SAPAKS) का आंदोलन और लोगों का गुस्सा महज़ पानी का बुलबुला है, जो वोटिंग के दिन तक फूट जाएगा।

लेकिन जब 11 दिसंबर 2018 को चुनाव आयोग ने EVM के नतीजे खोले, तो दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठे सत्ता के बड़े-बड़े चाणक्यों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बीजेपी अपने वो तीनों मज़बूत गढ़ हार चुकी थी, जिन्हें उसका अभेद्य किला माना जाता था।

इन तीन राज्यों की हार कोई सामान्य एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) नहीं थी। यह एक ‘कोर वोटर’ का अपनी ही पार्टी से लिया गया एक सर्जिकल बदला था।

अगर आप चुनाव आयोग के प्योर डेटा का एनालिसिस करेंगे, तो आपको समझ आएगा कि बीजेपी को कांग्रेस ने नहीं हराया था, बल्कि बीजेपी को खुद उसके उस मिडिल क्लास वोटर ने हराया था, जिसने इस बार कमल का बटन दबाने से साफ़ इंकार कर दिया था।

आंकड़े बोलते हैं · चुनाव आयोग, मध्य प्रदेश 2018

0.1% 5.42 लाख+ 22-24
BJP और कांग्रेस के वोट शेयर का अंतर। फिर भी सीटों में BJP पीछे, 15 साल बाद सत्ता से बाहर मध्य प्रदेश में लगभग 1.4% लोगों ने NOTA दबाया सीटें जहाँ BJP की हार का मार्जिन वहाँ पड़े NOTA वोटों से भी कम था

ग्वालियर-चंबल और मालवा-निमाड़ – जहाँ SC/ST एक्ट और सवर्ण आंदोलन (सपाक्स) की आग सबसे ज़्यादा भड़की थी – वहाँ कई कद्दावर मंत्रियों की लुटिया डूब गई। ग्वालियर दक्षिण, सुवासरा, राजनगर और नेपानगर जैसी दर्ज़नों सीटों पर बीजेपी महज़ कुछ सौ या हज़ार वोटों से हारी, जबकि वहाँ NOTA में 2 से 3 हज़ार वोट पड़े थे।

फाइल से:
शीशे की तरह साफ था: सामान्य हिन्दू वोटर कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहता था, इसलिए उसने कांग्रेस का बटन नहीं दबाया।
लेकिन वो बीजेपी को सबक सिखाने की कसम खा चुका था, इसलिए उसने EVM में आखिरी बटन (NOTA) दबाकर अपनी भड़ास निकाली।
जो वोटर बूथ तक नहीं गया, वो चुपचाप घर बैठ गया। बीजेपी के पक्ष का वोटिंग प्रतिशत अपने आप गिर गया।

राजस्थान में भी बिल्कुल यही कहानी दोहराई गई। वहां भी राजपूतों ने “वसुंधरा तेरी खैर नहीं” का नारा लगाकर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया था। छत्तीसगढ़ में तो रमन सिंह की 15 साल पुरानी सरकार ऐसी उखड़ी कि बीजेपी 90 में से महज़ 15 सीटों पर सिमट कर रह गई।

याद रखिए:
इन तीनों राज्यों में हार ने बीजेपी हाईकमान को एक बहुत ही क्रूर हकीकत से रूबरू कराया – आप अपने परमानेंट और वफादार वोटर को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ नहीं ले सकते। आप उसे राष्ट्रवाद का अफीम चटाकर उसकी पीठ में छुरा नहीं घोंप सकते। जब आप अपनों का साथ छोड़कर नए वोटबैंक के पीछे भागते हैं, तो आपका अपना ही कैडर घर बैठ जाता है और आपकी सत्ता की ज़मीन दरक जाती है।

9. ना माया मिली ना राम

दलित वोटबैंक को खुश करने के चक्कर में बीजेपी ने कैसे हमेशा के लिए चटका दी ‘हिन्दू एकता’ की नींव

BJP सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा, सामान्य हिन्दू वर्ग की गालियां खाईं, काले झंडे झेले, NOTA का प्रहार सहा और तीन राज्यों की सत्ता गवां दी।

ये सब किसलिए किया गया था? सिर्फ इसलिए ना ताकि दलित वोटबैंक खुश हो जाए और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ आ खड़ा हो?

तो सवाल ये है कि क्या इतना सब करने के बाद बीजेपी को वो दलित वोटबैंक मिला? जवाब है – “नहीं”!

याद रखिए:
इसे ही कहते हैं “ना माया मिली ना राम।” बीजेपी ने SC/ST Act को भले ही कितना भी मजबूत कर दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि बहुजन समाज ने कभी भी बीजेपी को पूरी तरह से अपना नहीं माना। दलित वोटर हमेशा बीजेपी को शक की नजर से ही देखता रहा है।

इसका सबसे ताज़ा और बड़ा सबूत हमने 2024 के लोकसभा चुनावों में देखा। विपक्ष ने महज़ एक हवा उड़ाई कि “बीजेपी 400 पार जाकर संविधान बदल देगी और आरक्षण खत्म कर देगी।” और देखते ही देखते दलित वोटरों का एक बहुत बड़ा तबका समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन (INDIA Bloc) की तरफ शिफ्ट हो गया।

आंकड़े बोलते हैं · लोकसभा सीटें

303 240 63 सीटें
2019 में BJP की सीटें 2024 में BJP की सीटें 2019 से 2024 के बीच गिरावट

और दूसरी तरफ क्या हुआ? दूसरी तरफ बीजेपी ने अपने उस सवर्ण, मध्यम वर्ग और OBC वोटर के मन में एक ऐसी परमानेंट दरार डाल दी, जो आज 2026 तक नहीं भर पाई है।

इस वर्ग को आज भी लगता है कि जब बात ‘सामाजिक न्याय’ की आती है, तो बीजेपी भी बिल्कुल कांग्रेस, सपा या बसपा की तरह ही व्यवहार करती है। ‘हिन्दू एकता’ का जो नारा मंचों से दिया जाता है, वो कानून की किताबों और थानों की चौखट पर जाकर जातियों के दलदल में डूब जाता है।


आखिर में एक बात

एक बात साफ़ है कि राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग ज़रूरी होती है, लेकिन उसकी भी एक हद होती है। आप नए दोस्त बनाने के चक्कर में अपने सगे और पुराने वफादारों को घर से बाहर नहीं निकाल सकते।

अखंड हिन्दू समाज बनाने के लिए जातियों को मिटाना पड़ता है, कानूनों को पारदर्शी बनाना पड़ता है, ना कि जातियों को खुश करने के लिए कानूनों को हथियार बनाकर समाज को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना पड़ता है।

बीजेपी के चाणक्यों ने 2018 में जो दांव चला था, उसने शायद उन्हें कुछ तात्कालिक चुनावी फायदे दे भी दिए हों, लेकिन लॉन्ग-टर्म में उन्होंने अपनी उसी वैचारिक नींव को खोखला कर दिया है, जिस पर ‘हिन्दुत्व’ की पूरी इमारत खड़ी थी।

पाठक के लिए तीन सवाल

  1. क्या ‘अखंड हिन्दू’ का नारा थाने की चौखट तक टिकता है, या FIR लिखते ही जाति ही बचती है?
  2. अगर NCRB खुद कह रहा था कि अधिकांश मुकदमे ट्रायल में टूट जाते हैं, तो न्याय का कवच क्यों उतार दिया गया?
  3. नए वोटबैंक के पीछे भागकर पुराने ढाल को तोड़ देने की कीमत पार्टी आज भी चुका रही है। क्या यह कीमत समझी गई?

श्रृंखला जारी रहेगी..

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