हमारे देश की सियासत भी बिल्कुल किसी बॉलीवुड की मसालेदार फिल्म जैसी है। यहाँ पब्लिक को वो बोरिंग ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ या डेटा नहीं चाहिए होता की कितनी सड़कें बनीं या कितने अस्पताल खुले।
यहाँ तो बस फुल-ऑन ड्रामा, इमोशन और वादों का एक ऐसा जमावड़ा चाहिए जिसमें बहकर लोग वोटिंग मशीन का बटन दबा आएं।
‘काम बोलता है’- ये डायलॉग पोस्टरों पर लिखा हुआ और नेताओं के मुंह से सुनने में कितना अच्छा लगता है ना? लगता है जैसे देश सच में बदल गया है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत एकदम उलट है बॉस। कड़वा है, पर सच यही है की हिंदुस्तान में चुनाव कभी ‘काम’ के दम पर नहीं लड़े जाते, ये सिर्फ और सिर्फ ‘सेंटिमेंट्स’ (भावनाओं) की लहर पर जीते जाते हैं।
अब आप खुद सोचिए, अगर वाकई इस देश में जनता सिर्फ काम देखकर, विकास को देखकर और अपना जीवन स्तर सुधरने को देखकर वोट देती, तो कुछ नेता तो ताउम्र चुनाव ही नहीं हारते।
और इसका सबसे बड़ा, सबसे क्लासिक उदाहरण अगर कोई है, तो वो है दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित।
एक ऐसी महिला जिसने लगातार 15 साल (1998 से 2013 तक) दिल्ली की सत्ता संभाली और एक दम तोड़ते हुए प्रदूषण में घुटते शहर को दुनिया के सबसे मॉडर्न शहरों की लिस्ट में लाकर खड़ा कर दिया।
लेकिन जब सियासत में ‘इमोशनल ड्रामे’ और ‘क्रांति’ की आंधी आई, तो जनता ने उस 15 साल के विकास को ऐसे भुला दिया, जैसे वो कभी था ही नहीं।
धुएं और जाम में घुटती पुरानी दिल्ली को जब मिली एक विजनरी नेता जिसने राजधानी को मेट्रो और फ्लाईओवरों का शहर बना दिया

जो लोग आज शानदार दिल्ली मेट्रो में बैठकर रील स्क्रॉल करते हुए सफर करते हैं, या जो अपनी गाड़ियों से बिना रेड लाइट पर रुके फ्लाईओवरों के ऊपर से गुज़र जाते हैं, उन्हें शायद 1998 से पहले वाली वो ‘पुरानी दिल्ली’ याद नहीं होगी।
जो 90 के दशक वाले लोग हैं, वो मेरी बात से तुरंत कनेक्ट कर पाएंगे।
कैसी थी 1998 की दिल्ली? गर्मियों के दिन होते थे और 10-10 घंटे की बत्ती गुल रहना आम बात थी। लोग छतों पर हाथ वाले पंखे झलते हुए रातें काटते थे।
सड़कों पर वो खटारा ‘रेड लाइन’ बसें और काले धुएं का गुबार छोड़ते डीजल वाले ऑटो दौड़ते थे। ऐसा लगता था जैसे पूरी दिल्ली एक बड़ा सा ‘गैस चैंबर’ बन चुकी है।
आप घर से सफेद शर्ट पहनकर निकलिए, ऑफिस पहुँचते-पहुँचते कॉलर काली हो जाती थी। और वो भयंकर ट्रैफिक जाम?
भाईसाहब, आईटीओ (ITO) या आश्रम चौक पर गाड़ियां ऐसे रेंगती थीं जैसे कोई बैलगाड़ी चल रही हो। घंटों-घंटों लोग उसी जाम में और उसी धुएं में घुटते रहते थे।
लेकिन फिर इस शहर को एक ऐसा ‘विजनरी’ नेता मिला जिसने सिर्फ कागज़ों पर नहीं, बल्कि सच में ज़मीन पर पसीना बहाया।
शीला दीक्षित ने कुर्सी संभालते ही सबसे पहले दिल्ली के इस जाम और धुएं वाले कलंक को मिटाने की ठानी। उन्होंने पूरी दिल्ली को ‘फ्लाईओवरों का शहर’ बना दिया।
एक-दो नहीं बॉस, उनके राज में पूरी दिल्ली के अंदर 70 से ज्यादा फ्लाईओवर्स और अंडरपास का जाल बिछाया गया। आज आप एम्स (AIIMS) से लेकर धौला कुआं तक जो फर्राटे भरते हैं ना, वो उन्हीं की दूरदृष्टि का नतीजा है।
और दिल्ली मेट्रो का वो सपना? भले ही दिल्ली मेट्रो की प्लानिंग किसी और कागज़ पर शुरू हुई हो, लेकिन उस पहले पिलर के खड़े होने से लेकर, ज़मीन के नीचे सुरंगे खोदने और पूरी दिल्ली-एनसीआर (NCR) में मेट्रो की ब्लू, रेड और येलो लाइनों का जो अभूतपूर्व जाल बिछा, वो शीला जी के उन्हीं 15 सालों के राज में मुमकिन हुआ।
उन्होंने दिल्ली वालों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट में एक ऐसा ‘क्लास’ दिया जो सीधे लंदन या न्यूयॉर्क को टक्कर देता था।

अब ज़रा प्रदूषण वाले उस ऐतिहासिक प्रहार की बात कर लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कह तो दिया था की डीजल वाली बसों को बंद करो, लेकिन उसे ज़मीन पर उतारने का कलेजा किसी नेता में नहीं था क्योंकि इसमें बहुत बड़ा ‘ट्रांसपोर्ट माफिया’ और वोट बैंक जुड़ा हुआ था।
लेकिन शीला दीक्षित पीछे नहीं हटीं। उन्होंने रातों-रात दिल्ली के पूरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को डीजल से उखाड़ फेंका और ‘CNG’ (सीएनजी) पर शिफ्ट कर दिया। ये दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे सफल क्लीन-फ्यूल ट्रांजिशन था।
हरियाली की बात करें, तो 1998 में जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, तब दिल्ली का ‘ग्रीन कवर’ (पेड़-पौधों वाला हिस्सा) मात्र 4 प्रतिशत के आसपास था।
जब 2013 में वो कुर्सी से उतरीं, तो उन्होंने इसी दिल्ली को लगभग 20 प्रतिशत तक हरा-भरा कर दिया था। बिजली का प्राइवेटाइज़ेशन करके ‘लोड-शेडिंग’ (पावर कट) के उस डरावने दौर को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। ये होता है असली ‘रिपोर्ट कार्ड’।
मिरांडा हाउस के गलियारों से लेकर कन्नौज और फिर दिल्ली के तख्त तक, एक सादगी पसंद ‘मां’ शीला दीक्षित का सफर

अब ज़रा इस ‘आयरन लेडी’ के पीछे छुपी उस सादगी पसंद महिला की कहानी भी जान लीजिए, जो राजनीति के इस कीचड़ में भी एक दम बेदाग और सलीके वाली छवि लेकर चलती थीं।
शीला दीक्षित कोई रातों-रात पैदा हुई नेता नहीं थीं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सबसे प्रतिष्ठित ‘मिरांडा हाउस’ कॉलेज से पढ़ाई की थी।
उनकी शादी विनोद दीक्षित से हुई, जो एक बहुत बड़े और सम्मानित ब्यूरोक्रेट थे। उनके ससुर उमाशंकर दीक्षित खुद नेहरू-गांधी परिवार के बेहद करीबी और बड़े नेता थे।
लेकिन शीला जी ने अपनी पहचान किसी के नाम के साये में नहीं बनाई। ये 1984 का दौर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पारखी नज़र इस पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई महिला पर पड़ी।
उन्होंने ही पहली बार शीला जी के हुनर को पहचाना और उन्हें उत्तर प्रदेश के कन्नौज से चुनाव मैदान में उतार दिया। वहां से जीतकर वो सीधे केंद्र में मंत्री बनीं और फिर जो दिल्ली की राजनीति में उन्होंने कदम रखा, तो इतिहास ही बदल कर रख दिया।
सियासत में अक्सर होता है की जब कोई 15 साल तक लगातार सत्ता के शिखर पर बैठता है, तो उसके अंदर घमंड और वीआईपी (VIP) कल्चर कूट-कूट कर भर जाता है।
लेकिन शीला दीक्षित के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था। पत्रकारों और उनके साथ काम करने वाले अधिकारियों के बीच उनकी सादगी के अनगिनत किस्से आज भी मशहूर हैं।
सोचिए, दिल्ली की सबसे ताकतवर महिला मुख्यमंत्री! पुराना किला रोड वाले उस बड़े से सरकारी बंगले में रहती थीं। लेकिन उनके अंदर एक ‘मां’ वाला वो देसी और प्यारा स्वभाव कभी नहीं गया।
अक्सर ऐसा होता था की जब वो अपने बंगले के किसी कमरे से उठकर बाहर निकलती थीं, तो खुद अपने हाथों से पंखे और लाइट के स्विच बंद कर देती थीं।
अगर किसी ने टोक दिया की “मैडम, आप मुख्यमंत्री हैं, ये काम तो नौकर कर देंगे”, तो उनका सीधा सा जवाब होता था- “अरे भाई, ये फालतू लाइटें नहीं जलनी चाहिए, अगर मैं बिजली नहीं बचाऊंगी तो फिर कौन बचाएगा?”
ये महज़ एक लाइट का स्विच बंद करना नहीं था दोस्तों, ये एक लीडर का अपनी स्टेट के संसाधनों को लेकर वो केयरिंग रवैया था जो सिर्फ एक ‘मां’ के अंदर हो सकता है।
वो दिल्ली को एक राज्य की तरह नहीं, बल्कि अपने घर की तरह चलाती थीं।
जब विकास के ठोस रिपोर्ट कार्ड पर भारी पड़ गया ‘आंदोलन’ का इमोशनल ड्रामा, और हवा में लहराई गई 370 पन्नों की बेबुनियाद फाइल

खैर… काम कितना भी अच्छा हो, लेकिन हमारी जनता को बीच-बीच में थोड़ा मसाला और ‘क्रांति’ का तड़का चाहिए ही होता है।
15 साल तक शानदार फ्लाईओवर्स पर गाड़ियां दौड़ाने और AC मेट्रो के मज़े लेने के बाद, दिल्ली की पब्लिक को लगने लगा की यार अब ज़िंदगी थोड़ी बोरिंग हो रही है, चलो कोई ‘बदलाव’ लाते हैं।
ये 2012 और 2013 का वो दौर था जब दिल्ली की सड़कों पर ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ और अन्ना आंदोलन का ज़बरदस्त इमोशनल ड्रामा चल रहा था।
एक तरफ 15 साल की सत्ता से उपजी वो नेचुरल ‘एंटी-इन्कम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) थी, और दूसरी तरफ अन्ना हज़ारे के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति में एंट्री मारने वाले कुछ नए और ‘क्रांतिकारी’ चेहरे!
इन नए-नवेले क्रांतिकारियों को बहुत अच्छे से पता था की अगर शीला दीक्षित के ‘काम’ और ‘विकास’ पर चुनाव लड़ा गया, तो ये लोग अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाएंगे।
इसलिए इन्होंने विकास की बात ही नहीं की। इन्होंने सीधा जनता के ‘सेंटिमेंट्स’ यानी भावनाओं की वो नस दबाई, जो हिंदुस्तान में हमेशा काम करती है।
अचानक से शहर भर में बस एक ही नरेटिव सेट कर दिया गया- ‘भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार और सिर्फ भ्रष्टाचार!’ पानी के टैंकर से लेकर बिजली के मीटरों तक… हर चीज़ को एक महा-घोटाला बताकर टीवी चैनलों पर ऐसा भौकाल काटा गया की पब्लिक सच में इस ‘ईमानदारी की सुनामी’ में बह गई।
आपको वो नज़ारे तो याद ही होंगे! टीवी डिबेट्स में और जंतर-मंतर के मंच पर गले में मफलर लपेटकर अरविंद केजरीवाल जी आते थे और हवा में एक मोटी सी ‘370 पन्नों की फाइल’ लहराते थे।
चिल्ला-चिल्ला कर कैमरे पर दावा किया जाता था की “इस 370 पन्नों की फाइल में शीला दीक्षित के खिलाफ पक्के सबूत हैं! बस हमारी सरकार आ जाने दीजिए, सबसे पहला काम शीला दीक्षित को जेल भेजने का होगा!”
भाईसाहब, ये कोई राजनीतिक कैम्पेन नहीं था, ये एक ऐसा गज़ब का साइकोलॉजिकल खेल (Psychological game) था जिसने दिल्ली की जनता को सम्मोहित कर दिया।
विकास के उस ठोस रिपोर्ट कार्ड की जगह इस ‘370 पन्नों की फाइल’ वाली माया ने ले ली। और नतीजा? 15 साल तक दिल्ली का चेहरा बदलने वाली वो ‘आधुनिक दिल्ली की निर्माता’ भावनाओं के इस बवंडर में चुनाव हार गईं।
कुर्सी मिलते ही रातों-रात रद्दी हो गई वो फाइल और विरोध करने वाले ही बाद में गले लगकर पक्की दोस्ती की कसमें खाने लगे
अब इसके बाद जो हुआ, वो भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा मज़ाक था। दिल्ली की जनता ने भावनाओं के सैलाब में बहकर उन मफलर वाले ‘क्रांतिकारियों’ (आम आदमी पार्टी) को सत्ता की चाबी तो सौंप दी।
सबको लगा की बस अब तो कल सुबह-सुबह पुलिस की गाड़ी पुराना किला रोड जाएगी और शीला जी को हथकड़ियां लग जाएंगी।
लेकिन मेरे दोस्त, 2013 में सत्ता में आने के बाद और फिर 2015 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के बाद, पूरे 10 सालों तक उस हवा में लहराई गई ‘370 पन्नों की फाइल’ का क्या हुआ?
अदालतों के रिकॉर्ड्स खंगाल लीजिए, आपको पता चलेगा की वो फाइल अचानक से हवा में किसी कपूर की तरह उड़ गई!
10 साल से ज्यादा सत्ता में रहने के बावजूद, पूरी सरकारी मशीनरी और जांच एजेंसियां हाथ में होने के बावजूद, ये नए ‘ईमानदार’ नेता शीला दीक्षित के खिलाफ एक भी कोर्ट में, एक भी रुपये का घोटाला साबित नहीं कर पाए।
और सियासत का यू-टर्न तो देखिए! कल तक जो लोग शीला दीक्षित और कांग्रेस को देश की सबसे भ्रष्ट पार्टी बताते हुए कहते थे की “हम तो जी आम आदमी हैं, कभी राजनीति में नहीं आएंगे, किसी से गठबंधन नहीं करेंगे”, वही लोग जब खुद भ्रष्टाचार के दलदल में धंसने लगे, तो अपनी कुर्सी और वजूद बचाने के लिए उसी कांग्रेस पार्टी के गले लग गए।
2024 के लोकसभा चुनावों में जब ‘I.N.D.I.A ब्लॉक’ बना, तो मंच पर वही लोग कांग्रेस के नेताओं का हाथ पकड़कर पक्की दोस्ती की कसमें खा रहे थे।
इस पूरे ड्रामे के बाद दिल्ली की पब्लिक को एहसास हो गया की सेंटिमेंट और ‘फ्री’ वाले वादों की इस आंधी में उन्होंने एक ऐसे विजनरी नेता को खो दिया, जो बातें कम और काम ज्यादा करती थी।
आज की राजनीति के लिए सबसे बड़ा सबक है शीला दीक्षित का वो 15 साल का शानदार राज जिसे लोग आज टॉर्च लेकर ढूंढते हैं
अगर आप आज के राजनीतिक माहौल को देखें, तो भारत के इतिहास में किसी भी राज्य की सबसे लंबे समय तक (लगातार 15 साल) मुख्यमंत्री रहने वाली इस महिला नेता का रिकॉर्ड तोड़ना आज के नेताओं के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है।
आज के दौर में दिल्ली की सत्ता एक बार फिर बदल चुकी है और 2026 में दिल्ली की कुर्सी पर बीजेपी की एक नई महिला मुख्यमंत्री ‘रेखा गुप्ता’ काबिज़ हैं।
आज जो ये नई सत्ता और नई मुख्यमंत्री दिल्ली के तख्त पर बैठी हैं, उनके कंधों पर बहुत भारी ज़िम्मेदारी है। रेखा गुप्ता जी और आज के तमाम राजनेताओं को शीला दीक्षित के उस 15 साल वाले विज़न से एक बहुत बड़ा सबक सीखना चाहिए।
सबक ये है की सिर्फ नारों, जुमलों, टीवी विज्ञापनों और विरोधियों पर कीचड़ उछालने से शहर नहीं बदलते। आप एक या दो चुनाव तो ‘भावनात्मक लहर’ पर जीत सकते हैं, लेकिन अगर आपको इतिहास में एक ‘संस्थापक’ या ‘निर्माता’ के तौर पर याद रखा जाना है, तो आपको ज़मीन पर उतरकर पसीना बहाना होगा।
अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा, आपको सड़कें सुधारनी होंगी, प्रदूषण और गंदी नदियों को ठीक करना होगा, और आपको वो विकास करना होगा जो जनता को अपनी आँखों से दिखाई दे।
दिल्ली वालों ने 15 साल का वो ‘स्वर्ण काल’ देखा है और वो अनजाने में ही सही, हर नई सरकार की तुलना शीला दीक्षित के उसी रिपोर्ट कार्ड से करते हैं।
अंत बस इसी एक कड़वे लेकिन सौ टके के सच के साथ करूंगा… “काम बोलता है”, यह सुनने में चाहे जितना भी फिल्मी और अच्छा मुहावरा लगे, लेकिन हकीकत यही है की हमारे देश में आज भी चुनाव भावनाओं और वादों के जाल से ही जीते जाते हैं।
जनता अक्सर ‘काम’ को भूलकर ‘क्रांति’ के नारों में बह जाती है। लेकिन, जब चुनाव खत्म हो जाते हैं, जब वो वादों और दावों का धुंआ छंटता है, और जब इंसान घर से निकलकर ट्रैफिक जाम में फंसता है… तब उसे न कोई भाषण याद आता है और न कोई फाइल।
तब उसे याद आती है तो बस शीला दीक्षित जैसी दिल्ली की ‘असली आर्किटेक्ट’, जिसने इस शहर को सच में एक ‘राजधानी’ होने का गौरव दिया था।
