इस एपिसोड में आप पढ़ेंगे
- 2011 का Prevention of Communal and Targeted Violence Bill आखिर था क्या, और इसमें ‘ग्रुप’ बनाम ‘अन्य’ का जहर कहां छिपा था।
- NAC यानी सोनिया गांधी की प्राइवेट मंडली ने कानून मंत्रालय को दरकिनार कर मसौदा कैसे लिखा।
- अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और तब के गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ड्राफ्ट को संसद, NIC और राज्यों तक कैसे ध्वस्त किया।
- कानून कूड़ेदान में गया, लेकिन तीर निकल चुका था। 2014 की सुनामी की एक बड़ी नींव यहीं पड़ी।
मिथक तोड़कर शुरू करते हैं
बीजेपी कोई अमर संजीवनी पीकर नहीं आई। अजेयता का मिथक विपक्ष ने खुद पालपोसकर खड़ा किया।
आप बड़े-बड़े अखबारों के एडिटोरियल पढ़ लो। वहां बैठे ज्ञानी लोग दिन-रात यही साबित करने में लगे रहते हैं कि बीजेपी कोई ऐसी सुपरनैचुरल मशीन बन गई है जिसे हराना नामुमकिन है।
कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि अमित शाह और मोदी जी के पास चुनाव जीतने का कोई ऐसा अचूक और गुप्त फॉर्मूला है जो किसी को नहीं पता।
लेकिन ग्राउंड की हकीकत एकदम अलग है। बीजेपी या कोई भी दूसरी पार्टी अमर संजीवनी बूटी पीकर नहीं आई है जो हार ही न सके।
अगर आप ध्यान से भारत की राजनीति का इतिहास खंगालेंगे, तो आपको समझ आएगा कि बीजेपी की आज जो बंपर सत्ता है, जो उनका अजेय होने का मिथक है, उसकी असल नींव खुद विपक्ष ने रखी है।
बीजेपी इसलिए नहीं जीतती कि वो कभी हार ही नहीं सकती, बल्कि इसलिए जीतती है क्योंकि हमारा विपक्ष (खासकर कांग्रेस) मुस्लिम तुष्टिकरण की दौड़ में ऐसे-ऐसे सेल्फ-गोल दागता है कि बहुसंख्यक यानी हिन्दू समाज खुद-ब-खुद बीजेपी के झंडे के नीचे आकर खड़ा हो जाता है।
जब विपक्ष बार-बार देश के हिन्दुओं के खिलाफ कोई कानून बनाएगा, उन्हें सताएगा, तो वो समाज जाएगा कहां? जाहिर सी बात है, वो उसी पार्टी को वोट देगा जो कम से कम उन्हें इंसान तो समझे!
एक पल रुककर खुद से पूछिए
अगर कोई पार्टी आपके वोट तो मांगे, लेकिन कानून बनाते वक्त आपको जन्म से मुजरिम मान ले, तो आप अगले चुनाव में क्या करेंगे?
यही सवाल 2011 के बाद करोड़ों हिन्दुओं के मन में बैठ गया। बाकी कहानी उसी सवाल की है।
जब हम कांग्रेस के सेल्फ-गोल और राजनीतिक भूलों की बात करते हैं, तो साल 2011 के उस खौफनाक काले कानून का जिक्र करना सबसे जरूरी हो जाता है, जिसने आजाद भारत के इतिहास में पहली बार हिन्दुओं को अपनी ही जमीन पर दूसरे दर्जे का नागरिक (Second-class citizen) बनाने की पूरी कानूनी पटकथा लिख दी थी।
1. Prevention of Communal and Targeted Violence Bill, 2011
वो एकतरफा बिल जिससे कांग्रेस ने खुद अपना जनाधार मिटाया

जरा 2011 के उस दौर को याद कीजिए। केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA-2 (कांग्रेस) की सरकार थी। 2009 का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के दरबारियों और दिल्ली में बैठे उनके सलाहकारों का अहंकार सातवें आसमान पर था।
उन्हें लगने लगा था कि हिन्दू समाज तो जातियों में बंटा हुआ है, ये कभी एक होकर वोट नहीं डाल सकते। इसलिए सत्ता में हमेशा बने रहने का सिर्फ एक ही शॉर्टकट है: देश के 10-15 प्रतिशत अल्पसंख्यक (खासकर मुस्लिम) वोटबैंक को अपनी मुट्ठी में कर लो।
और इस वोटबैंक को मुट्ठी में करने की कीमत क्या थी? कीमत थी देश के 80 प्रतिशत हिन्दुओं के मान, सम्मान और कानूनी हक की बलि चढ़ाना।
इसी अंधी सोच से जन्म हुआ उस ड्रैकोनियन ड्राफ्ट का, जिसे नाम दिया गया: Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill, 2011। हिंदी में: साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक, 2011।
याद रखिए, ये कोई मामूली बिल नहीं थाअगर ये कानून संसद से पास होकर लागू हो जाता, तो आज भारत के हिन्दू समाज की हालत वैसी ही होती जैसी पाकिस्तान या बांग्लादेश में वहां के अल्पसंख्यक हिन्दुओं की है।
ये एक ऐसा लीगल टूलकिट था जिसे जानबूझकर इस तरह से ड्राफ्ट किया गया था कि देश के किसी भी कोने में कोई भी दंगा हो, आगजनी हो, या खून-खराबा हो, उसका सीधा और इकलौता जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यक (हिन्दू) समाज को ही ठहराया जाए।
आप कल्पना करके देखिए उस भयानक सोच की। कांग्रेस का लाया यह ड्राफ्ट साफ-साफ कहता था कि इस देश में अल्पसंख्यक कभी कोई दंगा शुरू कर ही नहीं सकता।
अगर किसी दंगे में एक अल्पसंख्यक भीड़ हथियारों के साथ हिन्दुओं की बस्ती जला दे, तो भी कानून के सामने अल्पसंख्यक हमेशा पीड़ित (Victim) ही माना जाता और हिन्दू हमेशा मुजरिम (Aggressor)।
सेक्युलरिज्म का ऐसा मजाक दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में नहीं देखा गया
कांग्रेस और उनके रणनीतिकारों को लगा था कि इस बिल को लाकर वो अल्पसंख्यकों के मसीहा बन जाएंगे और सत्ता की चाबी हमेशा के लिए उनकी जेब में आ जाएगी।
लेकिन उन्हें इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वो जिस आग से खेल रहे हैं, वो खुद उनके पूरे राजनीतिक साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी।
इस बिल ने वो कर दिखाया जो संघ (RSS) और विश्व हिन्दू परिषद (VHP) दशकों की मेहनत के बाद भी पूरी तरह नहीं कर पाए थे।
इस बिल के खौफ और कांग्रेस की इस खुली गद्दारी ने जातियों में बंटे हुए उस आम हिन्दू को झकझोर कर रख दिया। उसे समझ में आ गया कि अगर वो आज एकजुट नहीं हुआ, तो कल उसे उसके ही देश में पैदाइशी दंगाई घोषित कर दिया जाएगा।
इसी बिल से पैदा हुए भयंकर जन-आक्रोश ने हिन्दुओं के अंदर वो राजनीतिक चेतना जगाई, जिसने कांग्रेस को सत्ता से ऐसा उखाड़ फेंका कि वो आज तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई है।
और दूसरी तरफ, बीजेपी ने बहुत ही सलीके से बहुसंख्यक समाज की इस पीड़ा और गुस्से को आवाज दी, जिससे उसने हिन्दुओं को अपने पाले में कर दिया और 2014 की वो सुनामी ला दी जिसने देश का पूरा इतिहास बदल कर रख दिया।
2. संसद नहीं, सोनिया गांधी की प्राइवेट मंडली ने लिखा ये बिल

यार, किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून बनने की एक तय और पारदर्शी प्रक्रिया होती है। जनता अपने सांसद चुनकर भेजती है, वो संसद में बैठते हैं।
देश का कानून मंत्रालय (Law Ministry) किसी समस्या पर रिसर्च करता है, कानूनी एक्सपर्ट्स से राय लेता है, फिर उस ड्राफ्ट को संसद के पटल पर रखा जाता है। वहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस होती है, कमियां निकाली जाती हैं, और तब जाकर कोई ड्राफ्ट देश का कानून बनता है।
लेकिन 2011 में जब यह कम्युनल वायलेंस बिल लाया जा रहा था, तब इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सरेआम धज्जियां उड़ा दी गई थीं।
सबसे बड़ी हैरानी ये हैआजाद भारत के सबसे संवेदनशील और खतरनाक कानून का मसौदा देश के कानून मंत्रालय ने नहीं बनाया था। इसे देश के चुने हुए सांसदों ने नहीं लिखा था।
इसे बनाया था दिल्ली में बैठने वाली एक प्राइवेट मंडली ने, जिसे उस वक्त राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC – National Advisory Council) कहा जाता था।
NAC: वो सुपर-कैबिनेट जिसका संविधान में नाम तक नहीं था
अब जो युवा आज की राजनीति देखते हैं, उन्हें शायद इस NAC के बारे में पूरी जानकारी न हो। यूपीए के दस सालों के राज में यह NAC असल में एक सुपर-कैबिनेट या एक्स्ट्रा-कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी की तरह काम करती थी।
इसके पास कोई संवैधानिक अधिकार नहीं था, लेकिन इसकी ताकत देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट से भी सौ गुना ज्यादा थी। और इस NAC की चेयरपर्सन कौन थीं? सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष, सोनिया गांधी।
मनमोहन सिंह जी की सरकार तो बस एक रबर स्टाम्प थी भाई! असली फैसले इसी NAC की बैठकों में होते थे। जब कांग्रेस को लगा कि उन्हें मुस्लिम वोटबैंक को हमेशा के लिए अपनी जेब में डालना है, तो उन्होंने इस कम्युनल वायलेंस बिल का ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी इसी NAC को सौंप दी।
देश का कानून लिखने बैठे वो चेहरे
अब जरा इस ड्राफ्टिंग कमेटी के चेहरों पर गौर कीजिए। अगर आप इनका बैकग्राउंड देख लेंगे, तो आपको समझ आ जाएगा कि इस बिल में इतना भयानक हिन्दू-विरोधी जहर क्यों भरा हुआ था।
सोनिया गांधी जी के नेतृत्व वाली इस कमेटी में कानून के बड़े-बड़े निष्पक्ष ज्ञाता नहीं बैठे थे, बल्कि इसमें वामपंथी (Left-liberal) ईकोसिस्टम के वो पोस्टर बॉय और एनजीओ वाले बैठे थे, जिनका दिन ही हिन्दू-विरोध से शुरू होता है और उसी पर खत्म होता है।
| नाम | लेख में दर्ज पृष्ठभूमि |
|---|---|
| हर्ष मंदर | पूर्व आईएएस। रिटायरमेंट के बाद अर्बन-नक्सल ईकोसिस्टम के बड़े पैरोकार बताए गए। |
| तीस्ता सीतलवाड़ | गुजरात दंगों के नाम पर विदेशी फंडिंग, फर्जी गवाह और मोदी-हिन्दू समाज को निशाना बनाने का लंबा अभियान। |
| फराह नकवी | FCRA पर पलने वाले NGO गिरोह से जुड़ी, भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असहिष्णु साबित करने वाला नेटवर्क। |
| शबनम हाशमी | उसी NGO ईकोसिस्टम की सदस्य। |
| राम पुनियानी | उसी मंडली के विचारक चेहरे। |
| जॉन दयाल | FCRA-NGO नेटवर्क से जुड़े सदस्य। |
तीस्ता सीतलवाड़ का नाम तो पूरा देश जानता है, जिन्होंने गुजरात दंगों के नाम पर सालों-साल विदेशी फंडिंग डकारी, फर्जी गवाह बनाए और अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ एक ही मकसद में लगा दी कि किसी तरह मोदी जी और हिन्दू समाज को जेल में डाल दिया जाए।
हर्ष मंदर वो पूर्व आईएएस अफसर हैं, जो रिटायरमेंट के बाद अर्बन-नक्सल ईकोसिस्टम के सबसे बड़े पैरोकार बन गए। ये वही लोग हैं जो आतंकियों के एनकाउंटर होने पर तो मानवाधिकार का झंडा लेकर आधी रात को सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं, लेकिन जब कश्मीर में हिन्दुओं का कत्लेआम होता है, तो इनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता।
शबनम हाशमी, जॉन दयाल और फराह नकवी… ये सब विदेशी फंडिंग (FCRA) पर पलने वाले एनजीओ गिरोह के वो सदस्य रहे हैं, जिनकी पूरी की पूरी दुकानदारी ही भारत और हिन्दू समाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असहिष्णु (Intolerant) साबित करने पर चलती है।
अब आप खुद ठंडे दिमाग से सोचिए। जब देश का कानून बनाने की जिम्मेदारी आप ऐसे लोगों के हाथों में सौंप देंगे, जिनके मन में बहुसंख्यक समाज के प्रति इतनी गहरी नफरत भरी हो, तो वो कैसा कानून बनाएंगे? क्या वो कोई निष्पक्ष कानून बनाएंगे? बिल्कुल नहीं!
दंगे रोकना नहीं, राष्ट्रवादी संगठनों को दंगाई घोषित करना था टार्गेट
इस मंडली का मकसद देश में दंगे रोकना था ही नहीं। इनका असली मकसद एक ऐसा कानूनी टूलकिट तैयार करना था, जिससे भविष्य में देश के किसी भी कोने में अगर कोई दंगा हो, तो उसका ठीकरा सीधे तौर पर बहुसंख्यक समाज (हिन्दुओं) और राष्ट्रवादी संगठनों (जैसे RSS, VHP) के सिर पर फोड़ा जा सके।
3. ‘ग्रुप’ बनाम ‘अन्य’: पैदाइशी दंगाई की परिभाषा
ये लोग जानते थे कि राजनीतिक रूप से वो हिन्दुओं की एकता को नहीं तोड़ पा रहे हैं, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा कानून ही पास करवा दिया जाए जो सीधे तौर पर हिन्दू को दंगाई घोषित कर दे।
NAC के इन सो-कॉल्ड बुद्धिजीवियों ने महीनों तक बंद कमरों में बैठकर इस बिल का जो ड्राफ्ट तैयार किया, उसने भारत के संविधान, समानता के अधिकार (Right to Equality) और न्यायपालिका की मूल भावना की ही हत्या कर दी थी। उन्होंने इसमें ऐसे-ऐसे खौफनाक और जहरीले क्लॉज डाल दिए, जिन्हें पढ़कर आज भी यकीन नहीं होता है।
आप कोई भी कानून उठाकर देख लीजिए, चाहे वो हत्या का कानून (IPC 302) हो या चोरी का। कानून की नजरों में अपराध करने वाला अपराधी होता है, चाहे उसका नाम रमेश हो या रहीम।
न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी इसीलिए बंधी होती है ताकि वो धर्म या जाति देखकर न्याय न करे। लेकिन यूपीए सरकार की NAC मंडली ने इस कम्युनल वायलेंस बिल 2011 के ड्राफ्ट में न्याय की उस देवी की आंखों से पट्टी नोचकर, वहां मुस्लिम तुष्टिकरण का चश्मा पहना दिया था।
जब इस बिल का ड्राफ्ट सामने आया, तो देश के नामी वकीलों और कानूनविदों ने अपना सिर पकड़ लिया। इस ड्राफ्ट के चैप्टर-1 के क्लॉज 3 में भारत की पूरी 120 करोड़ की आबादी को बहुत ही शातिर तरीके से दो हिस्सों में बांट दिया गया था।
| ग्रुप (Group) | अन्य (Others) |
|---|---|
| धार्मिक अल्पसंख्यक: मुस्लिम, ईसाई आदि। | सवर्ण और आम बहुसंख्यक हिन्दू समाज। |
| भाषाई अल्पसंख्यक। | ग्रुप से बाहर निकाल दिए गए। |
| SC / ST वर्ग। | डिफ़ॉल्ट रूप से हमलावर माने गए। |
| बिल की नजर में सिर्फ यही पीड़ित हो सकते थे। | कटने-मरने के बाद भी पीड़ित का दर्जा नहीं। |
अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या दिक्कत है? दिक्कत इसके बाद वाले क्लॉज में थी, जो भारत के इतिहास का सबसे भयंकर कानून था।
बिल में साफ-साफ शब्दों में लिखा गया था कि सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा (Communal and Targeted Violence) केवल और केवल तभी मानी जाएगी, जब यह हिंसा किसी ग्रुप के खिलाफ की गई हो।
इस एक लाइन का सीधा सच – इस देश में अल्पसंख्यक ही दंगे का शिकार (Victim) हो सकता है। हिन्दू कभी पीड़ित हो ही नहीं सकता।
बिल की नजरों में अगर कोई दंगा होता है, तो उसका मुजरिम डिफ़ॉल्ट रूप से हिन्दू ही माना जाएगा।
ग्राउंड पर इसका मतलब क्या निकलता
इसे एक ग्राउंड के उदाहरण से समझते हैं। तीन दृश्य सामने रखिए और खुद फैसला कीजिए कि ये कानून न्याय था या टूलकिट।
दृश्य 1 · गोधरा जैसा कांड
मान लीजिए एक अल्पसंख्यक भीड़ ट्रेन के डिब्बे में बैठे 59 निहत्थे हिन्दुओं को जिंदा जला दे।
कांग्रेस का यह बिल कहता था कि ये सांप्रदायिक हिंसा नहीं है, क्योंकि मरने वाले ग्रुप (अल्पसंख्यक) का हिस्सा नहीं थे।
दृश्य 2 · कश्मीरी पंडित
मान लीजिए कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों (हिन्दुओं) का नरसंहार हो जाए, उन्हें उनके घरों से निकाल दिया जाए।
इस बिल के हिसाब से वो सांप्रदायिक हिंसा नहीं मानी जाएगी, क्योंकि कश्मीरी पंडित वहां अल्पसंख्यक होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दू हैं, और हिन्दू कभी पीड़ित नहीं हो सकता।
दृश्य 3 · आत्मरक्षा का जवाब – लेकिन अगर उसी दंगे में पलटकर किसी हिन्दू ने आत्मरक्षा में पत्थर भी उठा लिया, तो तुरंत उस पर यह खौफनाक कम्युनल वायलेंस एक्ट थोप दिया जाएगा, क्योंकि उसने एक ग्रुप (अल्पसंख्यक) पर हमला किया है।
मतलब: अपने ही देश में, अपनी ही जमीन पर कटने-मरने के बावजूद आप न्याय नहीं मांग सकते थे। आपको चुपचाप मरना था, क्योंकि आपकी पहचान एक हिन्दू की थी।
हेट प्रोपेगेंडा और पुलिस को बांधने वाला जुगाड़
जहर सिर्फ यहीं तक नहीं था। बिल की धारा 7 और धारा 8 में हेट प्रोपेगेंडा (नफरती भाषण) का प्रावधान था।
इसके तहत अगर कोई अल्पसंख्यक नेता सरेआम मंच से खड़े होकर हिन्दू धर्म की देवी-देवताओं को भद्दी गालियां दे, या 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो वाला बयान दे, तो उस पर इस कड़े कानून के तहत कोई कार्रवाई नहीं होती।
लेकिन अगर कोई हिन्दू नेता या आम आदमी पलटकर उसका जवाब दे दे, तो उसे तुरंत बिना किसी बेल के सीधे जेल की काल कोठरी में सड़ा दिया जाता।
और सबसे शातिर दिमाग तो पुलिस और प्रशासन को कंट्रोल करने में लगाया गया था। बिल में यह प्रावधान ठूंस दिया गया कि अगर कहीं दंगा भड़कता है, तो वहां के डीएम, एसपी और पुलिस अधिकारियों को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानकर उन पर क्रिमिनल केस चलाया जाएगा, यदि वे ग्रुप (अल्पसंख्यकों) की रक्षा करने में नाकाम रहते हैं।
पुलिस वाले की मजबूरी सोचिए
अगर किसी इलाके में दो समुदायों के बीच दंगा हो रहा है, तो एक पुलिस अफसर अपनी नौकरी और खुद को इस खौफनाक कानून से बचाने के लिए क्या करेगा?
वो बिना जांच-पड़ताल किए सीधे वहां रहने वाले हिन्दुओं को गिरफ्तार कर लेगा, ताकि वो सरकार को दिखा सके कि देखो मैंने ग्रुप को बचा लिया।
पुलिस के हाथ पूरी तरह से बांधकर उन्हें अल्पसंख्यकों की प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड बनाने का यह एक लीगल टूलकिट था।
दोस्त, अंग्रेजों के जमाने में एक क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट आया था, जिसमें कुछ भारतीय जातियों को पैदा होते ही क्रिमिनल मान लिया जाता था।
कांग्रेस यूपीए-2 में बिल्कुल वैसा ही कानून लेकर आई थी, जो पूरे के पूरे हिन्दू समाज को जन्म के आधार पर पैदाइशी दंगाई और क्रिमिनल घोषित कर रहा था।
इस बिल ने कांग्रेस के तथाकथित सेक्युलरिज्म का नकाब पूरी तरह नोच कर फेंक दिया था। हिन्दू समाज को समझ आ गया था कि कांग्रेस उनके वोट तो चाहती है, लेकिन बदले में उन्हें सेकंड क्लास गुलाम नागरिक बनाकर रखना चाहती है।
| संविधान क्या कहता है | 2011 का बिल क्या कहता था |
|---|---|
| आर्टिकल 14: कानून के समक्ष समानता। | जन्म और धर्म देखकर एक को पीड़ित, दूसरे को हमलावर। |
| आर्टिकल 15: धर्म, जाति, जन्म स्थान पर भेदभाव वर्जित। | ग्रुप बनाम अन्य की धार्मिक-सामाजिक दीवार। |
| अपराध व्यक्ति करता है, समुदाय नहीं। | अल्पसंख्यक डिफ़ॉल्ट पीड़ित, हिन्दू डिफ़ॉल्ट मुजरिम। |
| लॉ एंड ऑर्डर राज्य का विषय। | केंद्र आर्टिकल 355 से राज्य सरकार को बाईपास कर सकता। |
4. अरुण जेटली का कानूनी प्रहार
हिन्दुओं की आवाज बनकर बीजेपी ने उधेड़ दी बखिया

जब सोनिया गांधी की NAC मंडली ने इस जहरीले ड्राफ्ट को तैयार करके पब्लिक डोमेन में रखा, तो उन्हें लगा था कि वो इसे अपने सेक्युलरिज्म के चमकीले कागज में लपेटकर आसानी से पास करवा लेंगे।
लेकिन वो भूल गए थे कि सामने विपक्ष में एक ऐसी पार्टी बैठी थी, जो कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच में उन्हें दिन में तारे दिखाने की कुव्वत रखती थी।
भारतीय जनता पार्टी को तुरंत समझ आ गया कि यह कोई मामूली बिल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हिन्दू समाज के वजूद को मिटाने और देश को बांटने का एक खौफनाक टूलकिट है।
बीजेपी ने इस मुद्दे को सिर्फ एक राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे करोड़ों हिन्दुओं के स्वाभिमान और जीवन-रक्षा की लड़ाई बना दिया।
और इस लड़ाई में बीजेपी की तरफ से मोर्चा संभाला देश के दो सबसे प्रखर, तार्किक और कद्दावर नेताओं ने: अरुण जेटली और सुषमा स्वराज।
TADA और POTA से भी भयानक, जेटली का तर्क
अरुण जेटली सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वो देश के सबसे बड़े और तेज-तर्रार वकीलों में से एक थे। कानून की बारीकियों को वो जिस तरह उधेड़ते थे, उसके आगे अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते थे।
जब जेटली जी ने इस कम्युनल वायलेंस बिल का ड्राफ्ट पढ़ा, तो उन्होंने इसकी ऐसी लीगल चीरफाड़ की, जिसने कांग्रेस और उनके ड्राफ्टरों को बेनकाब करके रख दिया।
अरुण जेटली ने डंके की चोट पर अपने लेखों और भाषणों में इस बिल को TADA (टाडा) और POTA (पोटा) से भी ज्यादा खतरनाक और ड्रैकोनियन कानून करार दिया।
जेटली जी का तर्क एकदम अचूक था। उन्होंने देश को बताया कि टाडा या पोटा जैसे सख्त आतंकवाद-रोधी कानूनों में भी अपराधी का धर्म देखकर सजा तय नहीं होती थी।
वहां आतंकवादी आतंकवादी होता था, चाहे वो किसी भी धर्म का हो। लेकिन यूपीए का यह बिल दुनिया का इकलौता ऐसा कानून बनने जा रहा था, जो अपराध से नहीं, बल्कि अपराधी के जन्म और धर्म से तय होता।
जेटली जी ने सीधे भारत के संविधान का हवाला देते हुए सरकार की ईंट से ईंट बजा दी। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान आर्टिकल 14 (कानून के समक्ष समानता) और आर्टिकल 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) की गारंटी देता है।
कोई भी लोकतांत्रिक सरकार ऐसा कानून कैसे बना सकती है जो पैदा होते ही एक नागरिक को पीड़ित और दूसरे को हमलावर मान ले?
जेटली जी ने साफ कर दिया कि यह बिल असंवैधानिक है और अगर इसे पास किया गया, तो यह सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर एक मिनट भी नहीं टिक पाएगा। उनके इन तीखे लीगल प्रहारों ने कांग्रेस के बड़े-बड़े वकीलों (जैसे कपिल सिब्बल और चिदंबरम) की बोलती बंद कर दी थी।
लेकिन असली धमाका तो तब हुआ, जब देश की संसद से बाहर एक बहुत बड़े और शक्तिशाली मंच पर इस बिल की धज्जियां उड़ाई गईं।
5. सुषमा स्वराज: यह देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक देगा

तारीख थी 10 सितम्बर 2011। दिल्ली में नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल (NIC – राष्ट्रीय एकता परिषद) की एक बहुत बड़ी और अहम बैठक चल रही थी।
इस बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, गृह मंत्री पी. चिदंबरम सहित देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री और बड़े नेता मौजूद थे।
इसी मंच पर बीजेपी की तरफ से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज खड़ी हुईं। सुषमा जी जब बोलती थीं, तो पिन-ड्रॉप साइलेंस हो जाता था।
उस दिन सुषमा स्वराज ने बिना किसी लाग-लपेट के, सीधे सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की आंखों में आंखें डालकर वो कड़वा सच बोला, जिसने पूरे देश के हिन्दुओं को झकझोर कर जगा दिया।
“यह बिल देश में एकता नहीं लाएगा, बल्कि यह देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक देगा!”
– सुषमा स्वराज, NIC बैठक, 10 सितम्बर 2011
सुषमा स्वराज का तर्क इतना मारक था कि सरकार के पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने कहा:
अपराध और अपराधी का कोई धर्म नहीं होता। दंगाई सिर्फ दंगाई होता है। लेकिन आपका यह बिल मानकर चलता है कि इस देश में बहुसंख्यक समाज हमेशा दंगाई है और अल्पसंख्यक हमेशा पीड़ित। क्या बहुसंख्यक समाज दंगे में नहीं मरता? क्या गोधरा में जो लोग जलाए गए, वो बहुसंख्यक नहीं थे? अगर आप कानून को धर्म के चश्मे से देखेंगे, तो आप इस देश को बांट देंगे।
उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यह बिल बहुसंख्यक समाज के मन में एक गहरा असुरक्षा का भाव और गुस्सा भर देगा। जब एक आम हिन्दू को लगेगा कि सरकार और कानून उसे जन्म से ही मुजरिम मान रहे हैं, तो वो कभी इस सिस्टम पर भरोसा नहीं करेगा।
सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के इस दोतरफा और भयंकर प्रहार ने कांग्रेस के उस खौफनाक एजेंडे को नेशनल मीडिया की हेडलाइंस में ला खड़ा किया।
जो कांग्रेस सोच रही थी कि वो चुपचाप इस बिल को पास करवाकर अपना वोटबैंक पक्का कर लेगी, वो अचानक से डिफेंसिव मोड में आ गई।
विपक्ष का यह भयंकर रायता अब सड़कों पर फैल चुका था। और इसी फैले हुए रायते ने बीजेपी के उस सबसे बड़े और आक्रामक चेहरे के लिए मंच तैयार कर दिया, जिसने इस बिल के खिलाफ ऐसी राजनीतिक सुनामी ला दी, जिसमें यूपीए सरकार तिनके की तरह उड़ गई और हिन्दू एकतरफा की तरफ आ गए।
6. जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोर्चा संभाला

संसद के अंदर और मीडिया में अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने इस ड्राफ्ट की धज्जियां तो उड़ा दी थीं, लेकिन इस बिल को पूरी तरह से मिटाने के लिए जमीन पर एक ऐसे जननायक की जरूरत थी, जिसकी आवाज सीधे आम आदमी और पूरे देश के हिन्दुओं के दिलों तक पहुंचे।
और यहीं पर एंट्री होती है उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री और देश की राजनीति के उभरते हुए सबसे बड़े चेहरे, नरेंद्र मोदी की।
नरेंद्र मोदी बहुत अच्छी तरह जानते थे कि कांग्रेस और उनका यह इकोसिस्टम किस हद तक गिर सकता है। गोधरा कांड के बाद सालों तक इन्हीं एनजीओ वालों और तीस्ता सीतलवाड़ जैसी गैंग ने मोदी जी को फंसाने के लिए क्या-क्या प्रपंच नहीं रचे थे!
मोदी जी को इस बिल की रग-रग का पता था। उन्हें मालूम था कि अगर यह कानून बन गया, तो ये अर्बन-नक्सल हर गली-मोहल्ले में फर्जी दंगे करवाकर सीधे तौर पर राष्ट्रवादी नेताओं और आम हिन्दुओं को जेल में सड़ा देंगे।
इसलिए मोदी जी ने इस बिल के खिलाफ जो मोर्चा खोला, उसने कांग्रेस के रणनीतिकारों के छक्के छुड़ा दिए। मोदी जी ने सिर्फ हिन्दू भावनाओं की ही बात नहीं की, बल्कि उन्होंने इस बिल की एक ऐसी दुखती रग पर वार किया, जिससे पूरी यूपीए सरकार औंधे मुंह गिर पड़ी।
मोदी जी ने डंके की चोट पर कहा कि यह कम्युनल वायलेंस बिल सिर्फ हिन्दुओं के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) की हत्या है।
संविधान की वो चालाकी समझिए – हमारे देश के संविधान के हिसाब से लॉ एंड ऑर्डर राज्य सरकार का विषय होता है।
लेकिन कांग्रेस की NAC मंडली ने इस बिल में एक ऐसा प्रावधान ठूंस दिया था कि अगर किसी राज्य में सांप्रदायिक हिंसा (यानी बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यक पर हमला) होती है, तो केंद्र सरकार सीधे आर्टिकल 355 का इस्तेमाल करके राज्य सरकार को बाईपास कर सकती है और वहां अपनी फोर्स भेजकर सब कुछ अपने कब्जे में ले सकती है।
मतलब साफ था। अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार है और किसी राज्य में (जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश या यूपी में) गैर-कांग्रेसी सरकार है, तो विपक्ष के पाले हुए एनजीओ वहां छोटा सा दंगा भड़काएंगे, और केंद्र सरकार तुरंत उस दंगे का बहाना बनाकर वहां की चुनी हुई राज्य सरकार के अधिकार छीन लेगी।
नरेंद्र मोदी ने इस पॉइंट को इतनी जबरदस्त तरीके से पकड़ा कि कांग्रेस के होश उड़ गए। 2011 से लेकर 2013 तक जब भी कांग्रेस इस बिल को पिछले दरवाजे से पास कराने की कोशिश करती, मोदी जी सामने आकर चट्टान की तरह खड़े हो जाते।
मुख्यमंत्रियों की एकजुटता वाला मास्टरस्ट्रोक
दिसंबर 2013 का वो वाकया इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। चुनाव सिर पर थे और कांग्रेस अपने मुस्लिम वोटबैंक को पक्का करने के लिए इस बिल को शीतकालीन सत्र में पास कराने की फिराक में थी।
तब 5 दिसंबर 2013 को नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को एक बेहद सख्त और कड़क चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी में मोदी जी के शब्द इतने धारदार थे कि पूरी दिल्ली की सत्ता हिल गई।
“यह बिल ill-conceived, poorly drafted and a recipe for disaster है। यह समाज को जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि समाज को बांटने और वोटबैंक की राजनीति के लिए लाया जा रहा है। अगर कोई कानून अपराध को धर्म के चश्मे से देखेगा, तो वह देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेल देगा।”
– नरेंद्र मोदी, पत्र से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, 5 दिसंबर 2013
लेकिन मोदी जी यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपनी राजनीतिक चाणक्य नीति का वो मास्टरस्ट्रोक चला, जिसकी काट 10 जनपथ के पास नहीं थी। मोदी जी ने इस लड़ाई को सिर्फ बीजेपी बनाम कांग्रेस नहीं रहने दिया, बल्कि इसे राज्यों के अधिकार बनाम केंद्र की तानाशाही में बदल दिया।
नरेंद्र मोदी ने बाकायदा तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, ओडिशा के नवीन पटनायक और मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान सहित कई मुख्यमंत्रियों को चिट्ठियां लिखीं।
उन्होंने सबको चेताया कि अगर आज हम इस बिल का विरोध नहीं करेंगे, तो कल को केंद्र सरकार तुम्हारे राज्यों में भी दंगे का बहाना बनाकर तुम्हारी सत्ता हथिया लेगी।
यह दांव इतना अचूक था कि कांग्रेस पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गई।
ममता बनर्जी और जयललिता जैसी नेत्रियों ने, जो हमेशा अपने राज्यों के अधिकारों के लिए लड़ती थीं, तुरंत इस बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यहां तक कि समाजवादी पार्टी (SP) और वामपंथी दलों को भी मजबूरन संघीय ढांचे के नाम पर इस बिल की भाषा का विरोध करना पड़ा।
कांग्रेस जो ये सोच कर बैठी थी कि वो अल्पसंख्यकों की मसीहा बन जाएगी, वो अचानक संसद के अंदर और बाहर बिल्कुल अकेली खड़ी थी।
मोदी जी की उस रणनीति ने सोनिया गांधी की NAC मंडली के उस पूरे खौफनाक टूलकिट की हवा निकाल दी थी। जो बिल हिन्दुओं को पैदाइशी दंगाई बनाने के लिए लाया गया था, मोदी जी ने उसे कांग्रेस के गले की वो फांस बना दिया जिसे न वो उगल पा रहे थे और न निगल पा रहे थे।
7. भारी फजीहत के बाद कूड़ेदान में गया वो बिल
संसद के अंदर अरुण जेटली और सुषमा स्वराज की दहाड़ और बाहर नरेंद्र मोदी की उस आक्रामक रणनीति ने कांग्रेस के इस बिल की हवा निकाल दी थी।
लेकिन कांग्रेस इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। जब उन्हें लगा कि उनका असली ड्राफ्ट बहुत ज्यादा विवादों में आ गया है, तो उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले (फरवरी 2014 में) इस बिल को थोड़े बदले हुए रूप में राज्यसभा में पास कराने की आखिरी और हताश कोशिश की।
लेकिन तब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था। 5 फरवरी 2014 का वो दिन कांग्रेस के इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन बन गया।
तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जैसे ही राज्यसभा में इस बिल को पेश करने की कोशिश की, संसद के अंदर ऐसा हंगामा बरपा कि यूपीए सरकार के पसीने छूट गए।
अरुण जेटली ने राज्यसभा में खड़े होकर सीधे तौर पर कहा कि संसद के पास यह कानून बनाने का कोई अधिकार ही नहीं है, क्योंकि यह सीधे राज्यों के अधिकार क्षेत्र (लॉ एंड ऑर्डर) में दखल देता है।
कांग्रेस को लगा था कि वो अपने सहयोगियों के दम पर इसे पास करा लेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी की उस चिट्ठी वाली रणनीति ने ऐसा कमाल दिखाया कि मायावती की बसपा, मुलायम सिंह की सपा और ममता बनर्जी की टीएमसी से लेकर वामपंथियों तक ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया।
राज्यसभा में यूपीए सरकार को ऐसी भयंकर मुंह की खानी पड़ी कि डिप्टी चेयरमैन पी.जे. कुरियन को इस बिल को पेश करने से ही रोक देना पड़ा।
आखिरकार, भारी फजीहत और चुनाव में होने वाले भयंकर नुकसान के डर से कांग्रेस को अपना यह खौफनाक कम्युनल वायलेंस बिल हमेशा-हमेशा के लिए कूड़ेदान में डालना पड़ा।
| तारीख | क्या हुआ |
|---|---|
| 2011 | NAC ने बिल का ड्राफ्ट पब्लिक डोमेन में रखा। ग्रुप बनाम अन्य की परिभाषा सामने आई। |
| 10 सितम्बर 2011 | NIC बैठक। सुषमा स्वराज ने गृहयुद्ध की चेतावनी दी। |
| 2011-2013 | जेटली की कानूनी चीरफाड़। मोदी संघीय ढांचे के तर्क से राज्यों को जोड़ते रहे। |
| 5 दिसंबर 2013 | मोदी का पत्र मनमोहन सिंह को। मुख्यमंत्रियों को चिट्ठियां। |
| 5 फरवरी 2014 | शिंदे राज्यसभा में पेश करने गए। हंगामा। कुरियन ने रोक दिया। बिल कूड़ेदान में। |
| मई 2014 | लोकसभा चुनाव। कांग्रेस की ऐतिहासिक हार। बीजेपी को पूर्ण बहुमत। |
8. कानून वापस हो गया, तीर वापस नहीं आया
कांग्रेस ने ये बिल वापस तो ले लिया, लेकिन तब तक इस बिल का ड्राफ्ट पूरे देश के गांव-गांव और आम आदमी के व्हाट्सऐप तक पहुंच चुका था।
और यहीं से शुरू हुआ भारतीय राजनीति का वो ऐतिहासिक बदलाव, जिसने बीजेपी को एक अजेय ताकत बना दिया।
विश्व हिन्दू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और तमाम राष्ट्रवादी संगठनों ने इस काले कानून के खिलाफ जो जमीनी जन-जागरण अभियान चलाया, उसने पूरे देश के हिन्दुओं को झकझोर कर रख दिया।
हिन्दुओं को समझ आ गया कि कांग्रेस उन्हें सिर्फ चुनाव के दिन हिन्दू मानती है, लेकिन कानून बनाते वक्त उन्हें दंगाई साबित कर देती है।
आम जनता के मन में यह खौफ बैठ गया कि अगर ये यूपीए सरकार दोबारा 2014 में सत्ता में आ गई, तो ये लोग किसी न किसी चोर दरवाजे से इस बिल को पास करा लेंगे और फिर हिन्दुओं का इस देश में रहना मुहाल हो जाएगा।
इस भयंकर डर और कांग्रेस के प्रति नफरत ने पूरे देश के बहुसंख्यक समाज को एकमुश्त हिन्दू वोटबैंक में तब्दील कर दिया।
उसने तय कर लिया कि जो पार्टी उसके धर्म और उसके वजूद की ही दुश्मन बन बैठी है, उसे तो सत्ता से उखाड़ कर फेंकना ही होगा।
और इस पूरे गुस्से का सबसे बड़ा और सीधा फायदा किसे मिला? नरेंद्र मोदी और बीजेपी को। मोदी जी उस वक्त इकलौते ऐसे नेता बनकर उभरे जो बिना किसी डर के इस तुष्टिकरण के खिलाफ सीना तान कर खड़े थे।
2014 के लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए, तो कांग्रेस बुरी तरह हार गयी। दशकों बाद किसी एक पार्टी (बीजेपी) ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया।
बाद में जब कांग्रेस ने अपनी इस ऐतिहासिक हार की समीक्षा के लिए ए.के. एंटनी कमेटी बनाई, तो उस कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में यही बात मानी।
“जनता के मन में यह बात बैठ गई है कि कांग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकों की पार्टी है और बहुसंख्यकों के खिलाफ है।”
– ए.के. एंटनी कमेटी की समीक्षा का सार, जैसा लेख में दर्ज
और जनता के मन में यह बात बैठाने वाला सबसे बड़ा सुबूत यही कम्युनल वायलेंस बिल था।
9. थाली में सजकर बीजेपी के पास पहुंच गया हिन्दू वोटबैंक
अब आप ही बताइए, क्या बीजेपी कोई चमत्कारी पार्टी है? बिल्कुल नहीं। बीजेपी के रणनीतिकार सिर्फ शांति से किनारे पर बैठे थे।
उन्होंने देखा कि कांग्रेस अपने ही हाथों से अपना घर जला रही है। कांग्रेस ने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के लालच में एक ऐसा ड्राफ्ट तैयार किया, जिसने इस देश के 100 करोड़ हिन्दुओं के स्वाभिमान को ललकार दिया।
बीजेपी ने बस उस गुस्से को, उस अपमान को एक सही दिशा दी, और डरे हुए हिन्दू समाज ने खुद-ब-खुद सत्ता की चाबी हमेशा के लिए बीजेपी के हाथों में सौंप दी।
इस पूरे ड्रामे का सबसे बड़ा और कड़वा सच – राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है।
लेकिन जब कोई विपक्ष अपने ही देश के बहुसंख्यक समाज से नफरत करने लगे और उन्हें कानूनी रूप से खत्म करने का टूलकिट बनाने लगे, तो वो सामने वाले (बीजेपी) के लिए जीत की दावत खुद ही तैयार कर देता है!
अगले एपिसोड से पहले एक सवाल जेब में रख लीजिए
अगर 2011 का यह बिल पास हो गया होता, तो आज आपके राज्य की पुलिस, आपके मुख्यमंत्री और आपके वोट की कीमत क्या रह जाती?

