“तुम लोग मत आना मैं संभाल लूंगा” बोलकर अकेले आतंकियों से भरे ताज होटल में कूदे, खुद की जान देकर दर्जनों मासूमों को सुरक्षित बहार निकालने वाले ‘अशोक चक्र’ कमांडो ‘मेजर संदीप उन्नीकृष्णन’

दोस्तों अगर आपको किसी असली सुपरहीरो का जिगरा देखना हो, तो एक बार 26/11 के ताज होटल का वो मंज़र याद कर लेना।

जब अंदर हर तरफ खून बिखरा था, गोलियों की अनगिनत तड़तड़ाहट आ रही थी और मौत सामने खड़ी थी… तब वहां एक ऐसा शेर उतरा था जिसने मौत की आँखों में आँखें डालकर उससे दो-टूक किया था।

ये सिर्फ एक फौजी की नहीं, ये एक ऐसे शेर की दास्तान है जिसने इस मिट्टी और यहां के लोगों के लिए अपनी ज़िंदगी को हंसते-हंसते दांव पर लगा दिया।

जब मौत सामने खड़ी थी, तो उन्होंने अपने साथियों को पीछे धकेल दिया और खुद आगे खड़े होकर बोल पड़े की “तुम लोग वहीं रुको, मैं इन्हें अकेले ही संभाल लूंगा।”

आज के इस दौर में, जहां लोग अपनी छोटी-छोटी तकलीफों पर रोते हैं, मेजर संदीप की कहानी हमें बताती है की असली हीरो कैसे होते हैं और वो किस मिट्टी के बने होते हैं।

चलिए, आज उसी मिट्टी की खुशबू को महसूस करते हैं और उस महानायक के सफर को करीब से जानते हैं।

26/11 की वो खौफनाक रात और जलते हुए ताज होटल में हिंदुस्तानियों की ढाल बनने वाला वो फरिश्ता

26 नवंबर 2008… ये वो तारीख है जिसे कोई भी हिंदुस्तानी कभी भूल नहीं सकता। मुंबई की सड़कें उस रात खून से लाल हो गई थीं। हर तरफ सिर्फ चीख-पुकार, गोलियों की तड़तड़ाहट और एक खौफनाक सन्नाटा था।

समंदर के रास्ते घुसे पाकिस्तानी आतंकियों ने शहर के सबसे आलीशान और मशहूर ‘ताज पैलेस होटल’ को हाईजैक कर लिया था।

होटल के अंदर का नज़ारा किसी नर्क से कम नहीं था। देश-विदेश के सैकड़ों मासूम मेहमान और होटल का स्टाफ कमरों में फंसा हुआ था।

बाहर पुलिस बेबस थी, क्योंकि आतंकी भारी हथियारों और ग्रेनेड से लैस थे। अंदर फंसे लोग बस अपनी आखिरी सांसें गिन रहे थे, उन्हें लग रहा था की अब उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है।

तभी, जब सारी उम्मीदें दम तोड़ रही थीं, आसमान से ब्लैक हॉक की तरह उतरे हमारे NSG के ‘ब्लैक कैट कमांडो’। और इस पूरी टीम को आगे से लीड कर रहे थे भारत मां के सबसे वीर सपूत मेजर संदीप उन्नीकृष्णन।

होटल में घुसते ही संदीप के चेहरे पर कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक ऐसी आग थी जो उन आतंकियों को खाक करने के लिए बेताब थी।

वो अंदर फंसे लोगों के लिए सिर्फ एक फौजी नहीं, बल्कि वो फरिश्ता बनकर गए थे जिसने सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों की ढाल बनकर उन आतंकियों के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया।

बचपन से ही सिर पर सवार था फौजी बनने का पागलपन, स्कूल में ही अपने बालों को आर्मी कट रखने वाला बेंगलुरु का वो लड़का

 

मेजर संदीप की ये बहादुरी कोई रातों-रात पैदा हुआ जज़्बा नहीं था। उनके खून में बचपन से ही तिरंगे का नशा दौड़ता था। 15 मार्च 1977 को केरल के कोझिकोड में उनका जन्म हुआ था।

लेकिन उनके पिता के. उन्नीकृष्णन, जो की इसरो (ISRO) में एक सीनियर अधिकारी थे, उनका ट्रांसफर बेंगलुरु हो गया। इसलिए संदीप की पूरी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश बेंगलुरु की गलियों में ही हुई।

संदीप बचपन से ही बाकी बच्चों से एकदम अलग थे। बेंगलुरु के मशहूर ‘द फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल’ में जब उनके साथ पढ़ने वाले लड़के फिल्मों के हीरो-हीरोइन की तरह बाल बढ़ाते थे, स्टाइल मारते थे, तब हमारा ये लड़का हमेशा ‘क्रू कट’ (Crew Cut) यानी एकदम छोटे-छोटे फौजी बालों में स्कूल जाता था।

स्कूल का कोई भी फंक्शन हो, संदीप हमेशा आर्मी वालों की तरह सीना तान कर चलते थे।

इनके फौजी बनने के पागलपन का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की जब वो बहुत छोटे थे, तो एक बार नेवी डे (Navy Day) के मौके पर एक स्कूल डायरी में उन्होंने साफ-साफ लिख दिया था की उनका जन्म सिर्फ और सिर्फ देश की रक्षा के लिए हुआ है और वो आर्मी जॉइन करने के अलावा अपनी ज़िंदगी में कुछ और सोच ही नहीं सकते।

उनके पिता अक्सर बताते हैं की संदीप कभी खिलौनों से नहीं खेलते थे, उन्हें सिर्फ बंदूकों, फौजी गाड़ियों और तिरंगे से प्यार था।

NDA के ‘ऑस्कर स्क्वाड्रन’ से लेकर 7 बिहार रेजिमेंट के अफसर तक, जिसने कारगिल में भी दिखाई थी अपनी बहादुरी

संदीप ने जो बचपन में कसम खाई थी, उसे उन्होंने पूरा करके दिखाया। 1995 में उन्होंने नेशनल डिफेंस अकैडमी (NDA, पुणे) का बहुत ही कठिन एग्जाम क्लियर किया और वहां एंट्री ली।

एनडीए में उन्हें ‘ऑस्कर स्क्वाड्रन’ (Oscar Squadron) का हिस्सा बनाया गया। वहां के उनके साथी बताते हैं की संदीप बहुत शांत रहते थे, फालतू की बात नहीं करते थे, लेकिन जब बात किसी टास्क की आती थी, तो उनका ‘नेवर गिव अप’ (Never give up) वाला एटीट्यूड सबको हैरान कर देता था।

कितनी भी मुश्किल ट्रेनिंग हो, संदीप कभी पीछे नहीं हटते थे।

चार साल की कड़ी रगड़ाई और ट्रेनिंग के बाद, 12 जुलाई 1999 को वो दिन आ ही गया जिसका संदीप को बेसब्री से इंतज़ार था। उन्हें भारतीय सेना की सबसे लड़ाकू और खूंखार मानी जाने वाली ‘7 बिहार रेजीमेंट’ (7 Bihar Regiment) में लेफ्टिनेंट के तौर पर कमीशन मिला।

ये वो वक्त था जब कारगिल में भारत और पाकिस्तान के बीच ‘ऑपरेशन विजय’ चल रहा था।

कमीशन मिलते ही इस युवा अफसर को सीधे फॉरवर्ड एरिया में डिप्लॉय कर दिया गया। कारगिल की उन बर्फीली चोटियों से लेकर ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के दौरान बॉर्डर पर मोर्चेबंदी तक, संदीप ने हर जगह अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया।

सिर्फ कश्मीर की ठंड ही नहीं, बल्कि राजस्थान के तपते रेगिस्तान में 50 डिग्री के भयंकर तापमान में भी उन्होंने अपनी रेजीमेंट का झंडा हमेशा बुलंद रखा।

आर्मी के सबसे खतरनाक ‘घातक कोर्स’ का टॉपर जिसे आतंकियों को मिट्टी में मिलाने के लिए NSG के 51 SAG में चुना गया

अब तक संदीप सेना में अपनी एक अलग ही धाक जमा चुके थे। लेकिन उन्हें तो कुछ और ही बड़ा करना था। इंडियन आर्मी की पैदल सेना (Infantry) में एक कोर्स होता है- ‘घातक कोर्स’ (Ghatak Course)।

भाई ये कोर्स इतना खतरनाक और जानलेवा होता है की अच्छे-अच्छे जवानों के पसीने छूट जाते हैं, हड्डियां टूट जाती हैं। लेकिन मेजर संदीप ने सिर्फ इस कोर्स को पास ही नहीं किया, बल्कि इसमें ‘टॉपर’ (Topper) बनकर निकले।

उनका निशाना अचूक था, उनका स्टेमिना मशीनों जैसा था और उनकी दिमागी तेज़ी बेमिसाल थी। उनके इसी खतरनाक हुनर को देखकर 2006 में उन्हें सीधा ‘नेशनल सिक्योरिटी गार्ड’ (NSG) यानी ब्लैक कैट कमांडोज़ के लिए चुन लिया गया।

एनएसजी (NSG) में भी कोई आम यूनिट नहीं, बल्कि उन्हें सीधे ’51 स्पेशल एक्शन ग्रुप’ (51 SAG) में शामिल किया गया। ये वो एलीट यूनिट है जिसका इकलौता काम आतंकियों को ढूंढकर, उनके बिल में घुसकर उनका खात्मा करना होता है।

किसी भी विमान हाईजैकिंग या बड़े आतंकी हमले में यही टीम सबसे पहले मोर्चा संभालती है।

संदीप अब एक पूरी तरह से तैयार मशीन बन चुके थे- एक ऐसे घातक कमांडो जिन्हें सिर्फ एक ही भाषा समझ आती थी, और वो थी देश के दुश्मनों को उनके अंजाम तक पहुंचाना।

जब ताज होटल में ऑपरेशन ब्लैक टॉरनेडो शुरू हुआ और एक-एक कमरे की तलाशी लेकर मेजर संदीप ने बचाई दर्जनों बंधकों की जान

27 नवंबर 2008 की वो खौफनाक सुबह। मुंबई जाग चुकी थी, लेकिन ताज होटल के अंदर मौत का तांडव जारी था।

NSG ने अपने सबसे बड़े और खतरनाक मिशन को हरी झंडी दे दी थी, जिसे नाम दिया गया- ‘ऑपरेशन ब्लैक टॉरनेडो’ (Operation Black Tornado)।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन अपनी 10 ब्लैक कैट कमांडोज़ की टीम के साथ सीधे मौत के मुहाने पर, यानी ताज होटल के अंदर दाखिल हुए।

अंदर का नज़ारा किसी भूलभुलैया जैसा था। होटल की बिजली काट दी गई थी, चारों तरफ घुप्प अंधेरा था, और हर कोने से आतंकियों की AK-47 की गोलियां सनसनाती हुई आ रही थीं।

लेकिन संदीप के कदम एक इंच भी नहीं डगमगाए। उन्होंने अपनी टीम को बहुत ही शानदार तरीके से लीड किया।

संदीप और उनकी टीम ने होटल की छठी मंजिल से अपना सर्च ऑपरेशन शुरू किया। वो हर एक कमरे के दरवाज़े को लात मारकर खोलते, गन तानते और चेक करते की अंदर कोई आतंकी तो नहीं छिपा है।

छठी मंजिल क्लियर करने के बाद वो पांचवीं मंजिल पर आए। वहां दर्जनों लोग, औरतें और छोटे-छोटे बच्चे खौफ से कांप रहे थे। संदीप ने फरिश्ते की तरह उन्हें ढांढस बंधाया।

जब वो बंधकों को बाहर निकाल रहे थे, तो उन्होंने अपने शरीर को उन मासूमों के लिए ढाल बना लिया ताकि अगर कोई गोली आए, तो वो उनके सीने पर लगे, किसी नागरिक को खरोंच तक न आए।

लगातार 14 घंटे के भयंकर कॉम्बैट के बावजूद इस जवान के चेहरे पर ना तो थकान थी और ना ही खौफ। उन्हें बस एक ही धुन सवार थी की इस होटल से एक-एक आतंकी को चुन-चुन कर मारना है।

घायल साथी सुनील जोधा को बचाने के लिए खुद सीने पर खाई गोलियां और दहाड़ कर कहा “तुम लोग ऊपर मत आना”

होटल के अंदर मौत हर कदम पर घात लगाए बैठी थी। 27 नवंबर की आधी रात बीत चुकी थी। जब मेजर संदीप की टीम एक फ्लोर से दूसरे फ्लोर की तरफ बढ़ रही थी, तभी आतंकियों ने छुपकर कमांडोज़ पर भयंकर एम्बुश (Ambush) लगा दिया।

चारों तरफ से अंधाधुंध गोलियों की बौछार होने लगी। इसी अफरा-तफरी में संदीप की टीम के एक जांबाज साथी, कमांडो सुनील कुमार जोधा को आतंकियों की गोलियां लग गईं।

सुनील जोधा खून से लथपथ होकर ज़मीन पर गिर पड़े। एक-दो नहीं, उन्हें करीब 7 गोलियां लगी थीं। अपने साथी और भाई जैसे जवान को खून में सना देखकर मेजर संदीप अपना आपा खो बैठे।

उनके अंदर का वो ‘7 बिहार रेजीमेंट’ का शेर दहाड़ उठा। संदीप ने अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकियों की तरफ इतना भयंकर कवर फायर झोंका की आतंकियों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।

और फिर गोलियों की बौछार के बीच, मौत को चकमा देते हुए संदीप आगे बढ़े और अपने घायल साथी सुनील जोधा को घसीट कर सुरक्षित जगह पर ले आए। उनकी इस फुर्ती ने सुनील जोधा की जान बचा ली।

लेकिन संदीप जानते थे की आतंकी ऊपर की मंजिलों की तरफ भाग रहे हैं। एक सच्चा लीडर वही होता है जो अपनी टीम को खतरे में डालने के बजाय खुद सीना तानकर आगे खड़ा हो जाए।

संदीप ने अपनी टीम के बाकी कमांडोज़ को पीछे रुकने का आदेश दिया, क्योंकि वो नहीं चाहते थे की उनके किसी और साथी की जान जाए।

उन्होंने अपने वायरलेस रेडियो पर अपनी टीम से जो आखिरी शब्द कहे, वो आज भी हिंदुस्तान के फौजी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज़ हैं।

उन्होंने दहाड़ कर कहा था- “Do not come up, I will handle them” (तुम लोग ऊपर मत आना, मैं उन्हें अकेले ही संभाल लूंगा)।

ये कोई फिल्मी डायलॉग नहीं था यार, ये एक कमांडो का वो वचन था जिसने अपने साथियों की जान बचाने के लिए मौत से सीधा सौदा कर लिया था।

अकेले ही सीढ़ियां चढ़कर भिड़ गए आतंकियों से, अशोक चक्र विजेता मेजर संदीप की वो शहादत जो हमेशा रुलाएगी

“ऊपर मत आना” का वो आदेश देकर मेजर संदीप अकेले ही पाम लाउंज (Palm Lounge) के पास वाली सीढ़ियों से आतंकियों के पीछे ऊपर भागे।

वो एक ‘लोन वुल्फ’ (Lone Wolf) की तरह आतंकियों पर टूट पड़े थे। सीढ़ियों पर आमने-सामने की भयंकर और खौफनाक गोलीबारी हुई।

संदीप ने अपनी अचूक निशानेबाज़ी से आतंकियों को भारी नुकसान पहुंचाया और उन्हें एक ही जगह पर घेर कर पंगु कर दिया।

लेकिन इसी आमने-सामने की लड़ाई में, आतंकियों ने मेजर संदीप पर गोलियां बरसा दीं। कई गोलियां सीधे उनके सीने और शरीर को छलनी कर गईं।

खून से लथपथ होने के बावजूद इस महानायक ने तब तक अपनी बंदूक नहीं छोड़ी जब तक उनकी सांसें नहीं थम गईं। 28 नवंबर 2008 को, भारत मां का ये लाल, जिसने दर्जनों मासूमों की जान बचाई, हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गया।

जब तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर बेंगलुरु उनके घर पहुंचा, तो पूरे हिंदुस्तान की आँखें रो रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो हर घर से एक बेटा चला गया हो।

2009 में भारत सरकार ने मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की इस अदम्य वीरता, अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें शांति काल के सबसे बड़े वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ (Ashoka Chakra) से मरणोपरांत सम्मानित किया।

आज भी जब उनके पिता के. उन्नीकृष्णन का वो बयान याद आता है, तो गला भर आता है। उन्होंने रोते हुए लेकिन सीना तानकर कहा था की “संदीप सिर्फ मेरा बेटा नहीं है, वो पूरे हिंदुस्तान का बेटा है।”

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन हमारे बीच शरीर रूप में नहीं हैं, लेकिन जब भी इस देश में बहादुरी, त्याग और लीडरशिप की बात होगी, तो सबसे पहला नाम उसी ‘फौजी कट’ बालों वाले लड़के का लिया जाएगा, जो अकेले ही मौत के जबड़े में हाथ डालकर अपने साथियों और देशवासियों को खींच लाया था।

जो लोग कहते हैं की सुपरहीरो सिर्फ फिल्मों में होते हैं, उन्हें 26/11 के ताज होटल का इतिहास पढ़ा देना, जहां एक असली सुपरहीरो ने अपने खून से इस देश का स्वाभिमान लिखा था।

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