ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो, लेकिन पूरे 4 साल बीत चुके हैं। इन 4 सालों में देश और राज्य में बहुत कुछ बदल गया।
कई चुनाव हो गए, नेताओं ने जीत के जश्न मना लिए, नई-नई योजनाओं के बड़े-बड़े फीते कट गए, और सत्ता के गलियारों में खूब ठहाके भी गूंज लिए।
लेकिन उत्तराखंड के एक छोटे से गांव डोभ श्रीकोट में एक चौखट आज भी वहीं 2022 में अटकी हुई है। अंकिता भंडारी की मां की पथराई आंखें आज भी दरवाज़े की तरफ ही देखती हैं, इस उम्मीद में की शायद आज कोई आकर कह दे की उनकी बेटी के असली हत्यारे का नाम दुनिया के सामने आ गया है।
अंकिता का गुनाह सिर्फ इतना था की वो एक मिडिल क्लास परिवार से थी और उसने उस गंदे सिस्टम के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया था, जहाँ एक रिसॉर्ट के मालिक और सत्ताधारी पार्टी से जुड़े रसूखदार लोग उसे एक ‘VIP गेस्ट’ को ‘स्पेशल सर्विस’ देने के लिए मजबूर कर रहे थे।
आज 4 साल बाद भी देवभूमि की हवाओं में एक ही सवाल तैर रहा है की आखिर वो ऐसा कौन सा भगवान था, जिसे बचाने के लिए पूरा का पूरा सिस्टम, पुलिस और BJP सरकार आज भी एक अभेद्य ढाल बनकर खड़ी है?
अंकिता भंडारी की निर्मम हत्या की चौथी बरसी पर सड़कों पर उबला गुस्सा और BJP की सुविधाजनक चुप्पी
Four Years On, Dehradun Takes to the Streets for Ankita Bhandari
On the fourth anniversary of Ankita Bhandari’s death, people took to the streets of Dehradun once again, demanding justice and faster progress in the investigation.
Several social organisations gathered at Gandhi… pic.twitter.com/38t5h4qxs7
— Kumaon Jagran (@KumaonJagran) September 18, 2026
सरकारें अक्सर सोचती हैं की पब्लिक की मेमोरी बहुत छोटी होती है। दो-चार महीने हल्ला मचेगा, फिर कोई नया मुद्दा आएगा और लोग सब भूल जाएंगे।
लेकिन जब बात पहाड़ की बेटी की इज़्ज़त की हो, तो वहां का खून इतनी जल्दी ठंडा नहीं होता। कल 18 सितंबर 2026 को अंकिता की चौथी बरसी थी।
सरकार ने सोचा होगा की शांति से दिन निकल जाएगा, लेकिन कल पूरे उत्तराखंड की सड़कों पर जो गुस्सा उबला है, उसने देहरादून से लेकर दिल्ली तक बैठे सिस्टम की नींद उड़ा कर रख दी है।
कल देहरादून के गांधी पार्क से लेकर घंटाघर तक युवाओं, महिलाओं और छात्रों का ऐसा हुजूम उमड़ा की पांव रखने की जगह नहीं थी।
लोगों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक विशाल ‘मानव श्रृंखला’ (Human Chain) बनाई। ये कोई राजनीतिक भीड़ नहीं थी जिसे पैसे देकर बुलाया गया हो; ये वो आम लोग थे जिनके सीने में आज भी अंकिता के लिए आग जल रही है।
उधर ऋषिकेश का हाल तो और भी भयंकर था। चीला बैराज… याद है ना आपको? ये वही मनहूस जगह है जहाँ हमारी अंकिता को नहर में धक्का देकर मार डाला गया था और कई दिनों बाद उसका शव पानी पर तैरता हुआ मिला था।
कल उसी चीला बैराज तक पूर्व सैनिकों, महिलाओं और विपक्षी दलों (कांग्रेस आदि) के हज़ारों लोगों ने एक ‘न्याय मार्च’ निकाला। वहां पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोकने की कोशिश की, तीखी झड़पें हुईं, धक्के-मुक्की हुई, लेकिन लोगों का गुस्सा रुकने वाला नहीं था।
The protests for justice for Ankita Bhandari were not limited to Dehradun.
On Ankita’s fourth death anniversary, Uttarakhand Congress workers gathered outside Vanantara Resort, the resort owned by Pulkit Arya, the main accused in the case and son of former BJP leader Vinod Arya.… https://t.co/VrkcmAzTxj pic.twitter.com/w7Bead1Rby
— Kumaon Jagran (@KumaonJagran) September 18, 2026
हज़ारों हाथों में बैनर थे और उन सारे बैनरों पर सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल छपा था जिसने BJP सरकार को सबसे ज्यादा असहज कर रखा है- “4 साल बीत गए, तुमने तीन प्यादों को जेल में डाल दिया, लेकिन वो असली ‘VIP’ कौन था?”
पब्लिक सरेआम पूछ रही है की आखिर वो कौन सा ऐसा सफेदपोश नेता या अधिकारी है जिसको ‘सर्विस’ देने के लिए अंकिता पर दबाव डाला गया था? जब तक उस वीआईपी का नाम सामने नहीं आता, ये गुस्सा शांत होने वाला नहीं है भाई।
कुछ पैसों की नौकरी और ‘स्पेशल सर्विस’ का दबाव, आखिर उस काली रात अंकिता के साथ हुआ क्या था
अगर किसी के दिमाग से धुंधला गया हो, तो ज़रा याद कर लीजिए की आखिर पौड़ी गढ़वाल की उस 19 साल की मासूम सी लड़की का असल गुनाह क्या था।
अंकिता एक बेहद साधारण और गरीब परिवार से थी, जो अपने परिवार का सहारा बनने के लिए ऋषिकेश के उसी मनहूस ‘वनंतरा रिज़ॉर्ट’ में बतौर रिसेप्शनिस्ट नौकरी करने आई थी।
लेकिन उसे क्या पता था की जिस जगह को वो अपनी रोज़ी-रोटी समझ रही है, वो दरअसल सत्ता के नशे में चूर रसूखदारों की अय्याशी और गंदे शौक पूरे करने का एक अड्डा है।
रिज़ॉर्ट का मालिक पुलकित आर्य (जो BJP के एक बड़े नेता और पूर्व राज्य मंत्री विनोद आर्य का बेटा था) और उसके दोनों मैनेजर (सौरभ और अंकित) उस 19 साल की बच्ची पर लगातार एक ‘VIP गेस्ट’ को ‘स्पेशल सर्विस’ (जिस्मफरोशी) देने का भयंकर दबाव बना रहे थे।
लेकिन देवभूमि की उस बेटी के खून में स्वाभिमान था। उसने पैसे और रसूख के आगे घुटने टेकने से साफ मना कर दिया और धमकी दी की वो इस रिज़ॉर्ट के सारे गंदे राज़ दुनिया के सामने खोल देगी।
बस यही बात इन दरिंदों को खटक गई। 18 सितंबर 2022 की उस काली रात, ये तीनों उसे सुलह करने के बहाने चीला बैराज की तरफ ले गए। वहां हाथापाई हुई, उसे पीटा गया और फिर बिना किसी रहम के, ज़िंदा अंकिता को उस गहरी और अंधेरी नहर में धक्का दे दिया गया।
चीखती हुई वो मासूम पानी में डूब गई और कई दिनों बाद उसका शव तैरता हुआ मिला।
सबूत मिटाने वाला वो चमत्कारी बुलडोज़र जिस पर न्याय का चोला पहना कर खूब लूटी गई वाहवाही
अब ज़रा बात कर लेते हैं इस पूरे केस के सबसे बड़े ‘मास्टरस्ट्रोक’ की। आजकल हमारे देश में ‘बुलडोज़र मॉडल’ का बड़ा क्रेज़ है।
लोग मानते हैं की जब किसी अपराधी के घर पर बुलडोज़र चलता है, तो वो न्याय की सबसे बड़ी जीत होती है। लेकिन भाई साहब, अंकिता भंडारी केस में जिस तरह से बुलडोज़र का इस्तेमाल हुआ, वो देखकर तो दुनिया के बड़े-बड़े क्रिमिनल लॉयर भी अपना अपना काला सूट उतार के फेंक दें!
जैसे ही पुलकित आर्य और उसके रिसॉर्ट का नाम सामने आया, 24 सितंबर को रात 1 बजे ऋषिकेश के उस Vanantara Resort पर बुलडोज़र चला दिया गया।
उस वक़्त मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसे सरकार का बहुत बड़ा और सख्त एक्शन बताकर खूब वाहवाही लूटी। टीवी पर ढिंढोरा पीटा गया की “देखिए, सरकार ने अपराधी का रिज़ॉर्ट तोड़ दिया!”
लेकिन रुकिए… ज़रा दिमाग लगाइए। कोई पुलिस या जांच एजेंसी क्राइम सीन (Crime Scene) पर बुलडोज़र कैसे चला सकती है? वो वनंतरा रिज़ॉर्ट कोई मामूली ईंट-पत्थर की इमारत नहीं थी, वो एक ‘सबूतों का खज़ाना’ था!
उसी रिज़ॉर्ट के उस ‘प्रेसीडेंशियल सुइट’ में अंकिता को रखा गया था। उसी कमरे में वो वीआईपी आने वाला था। वहां फिंगरप्रिंट्स मिल सकते थे, DNA सैंपल मिल सकते थे, डायरी मिल सकती थी, सीसीटीवी के तार मिल सकते थे।
लेकिन कमाल की फुर्ती दिखाई गई! फोरेंसिक टीम के वहां पहुँचने और ढंग से बाल की खाल निकालने से पहले ही, सरकार और स्थानीय प्रशासन के आदेश पर एक भारी-भरकम बुलडोज़र ने उस पूरे कमरे को मलबे में तब्दील कर दिया।
लोग आज भी सड़कों पर चीख-चीख कर पूछ रहे हैं की क्या वो बुलडोज़र वाकई अपराधियों के लिए चला था? या फिर उस रहस्यमयी ‘VIP’ के पैरों के निशान और फिंगरप्रिंट्स को हमेशा-हमेशा के लिए मलबे के नीचे दफन करने के लिए चला था?
ये एक ऐसा सवाल है जिसका कोई भी सीधा जवाब आज तक किसी भी पुलिस वाले या सरकार के मंत्री ने नहीं दिया है। बस जांच-जांच का खेल खेल रहे हैं और पब्लिक को बेवकूफ समझ रखा है।
जनवरी वाला वो ‘ऑडियो लीक’ जिसने BJP के गलियारों में ला दिया था भूचाल
कहते हैं ना की आप किसी सच को चाहे मलबे के नीचे कितना भी गहरा दफना दो, वो कभी न कभी बाहर आ ही जाता है।
अंकिता केस में भी यही हुआ। सरकार और प्रशासन सोच रहे थे की सब कुछ सेटल हो गया है, तभी इसी साल यानी जनवरी 2026 में एक ऐसा बम फूटा जिसने देहरादून से लेकर दिल्ली तक BJP के गलियारों में भयंकर भूचाल ला दिया।
उर्मिला सनावर नाम की एक लोकल अभिनेत्री ने सोशल मीडिया पर एक कॉल रिकॉर्डिंग (ऑडियो) लीक कर दी। भाईसाहब, इस एक ऑडियो ने पूरी की पूरी थ्योरी पलट कर रख दी!
इस रिकॉर्डिंग में कथित तौर पर सत्ताधारी पार्टी (BJP) के ही एक पूर्व विधायक की पत्नी बात कर रही थी। और सबसे बड़ा धमाका ये था की इस ऑडियो में पहली बार खुलकर उस ‘VIP’ का नाम लिया गया।
नाम भी कोई छोटा-मोटा नहीं था! इस लीक ऑडियो में सीधे तौर पर बीजेपी के एक बहुत बड़े राष्ट्रीय महासचिव (दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ़ ‘गट्टू’) का नाम उस ‘वीआईपी’ के तौर पर लिया गया जिसके लिए अंकिता पर वो तथाकथित ‘स्पेशल सर्विस’ देने का भयंकर दबाव डाला जा रहा था।
जैसे ही ये ऑडियो इंटरनेट पर वायरल हुआ, पूरे उत्तराखंड में जैसे आग लग गई। 11 जनवरी 2026 को भयंकर ‘उत्तराखंड बंद’ बुलाया गया।
सड़कों पर ऐसा सैलाब उतरा की प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। पहाड़ की बेटियों ने अपने खून से देश के राष्ट्रपति को खत लिखे।
हालात इतने आउट ऑफ कंट्रोल हो गए थे की कई स्थानीय बीजेपी नेताओं ने तो नैतिकता और शर्म के मारे अपने पदों से इस्तीफे तक दे दिए थे।
पब्लिक चीख-चीख कर कह रही थी की “लो, अब तो नाम भी आ गया, अब क्यों नहीं कर रहे गिरफ्तारी?” लेकिन फिर सिस्टम ने अपना वो पुराना और आज़माया हुआ ‘डैमेज कंट्रोल’ वाला कार्ड खेल दिया।
CBI जांच का वो सुनहरा झुनझुना जिसे थमा कर सिस्टम ने जनता को खामोश करने का खेला गजब खेल

इस केस में SIT (Special Investigation Team) और पुलिस के बड़े अधिकारियों की बेशर्मी तो देखिए!
हरिद्वार के एक SP साहब ने बाकायदा मीडिया के सामने आकर कह दिया की, “अरे कोई VIP-वीआईपी नहीं था जी, वो तो महज़ नोएडा का रहने वाला पुलकित का एक दोस्त था।”
पब्लिक भी हंस रही थी इनकी इस बात पर! अरे भाई, अगर वो सिर्फ नोएडा का कोई मामूली दोस्त था, तो उसके आने से पहले वो कमरा रातों-रात बुलडोज़र से क्यों तुड़वा दिया गया? एक मामूली दोस्त को बचाने के लिए पूरी की पूरी मशीनरी अपना पसीना क्यों बहा रही है?
जब पुलिस की इस भद्दी लीपापोती से जनता का गुस्सा और भड़का (खासकर जनवरी के उस ऑडियो लीक के बाद), तो सीएम पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने रातों-रात ‘CBI जांच’ की सिफारिश कर दी।
मीडिया में खूब ढिंढोरा पीटा गया की “देखिये हमारी सरकार कितनी पारदर्शी है, हमने केस सीबीआई को दे दिया।”
फरवरी 2026 में CBI ने आकर एक ‘अज्ञात वीआईपी’ (Unknown VIP) के खिलाफ एफआईआर भी लिख ली। जनता को लगा की चलो अब तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
लेकिन रुकिए… आज हम सितंबर 2026 में खड़े हैं। पूरे 8 महीने बीत चुके हैं! वो सीबीआई जांच कहाँ है? उसका अता-पता क्या है? किसी बड़े नेता से कोई पूछताछ हुई? कोई रेड पड़ी? कुछ नहीं!
ये हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है यार। सीबीआई जैसी बड़ी एजेंसियां, जिन्हें हम ‘पिंजरे का तोता’ कहते हैं, वो अक्सर केंद्र और सत्ता के इशारे पर बस फाइलों को अलमारियों में सड़ाने का काम करती हैं।
ये जांच कभी इंसाफ के लिए नहीं बिठाई गई थी, ये सिर्फ उस वक्त सड़कों पर उबले हुए जनता के गुस्से पर पानी डालने के लिए फेंका गया एक सुनहरा झुनझुना था, जो आज भी फाइलों में धूल फांक रहा है।
मोहरों को उम्रकैद और असली मगरमच्छ को अभयदान, आखिर कब तक BJP की छत्रछाया में महफूज रहेगा वो VIP
हाँ, ये सच है की पिछले साल मई 2025 में कोटद्वार की कोर्ट ने मुख्य आरोपी पुलकित आर्य और उसके दो गुर्गों को उम्रकैद की सज़ा सुना दी।
और अभी पिछले ही महीने (अगस्त 2026 में) नैनीताल हाईकोर्ट ने भी इनकी ज़मानत की अर्ज़ी रद्द कर दी।
इस सज़ा के पीछे सबसे बड़ा फैक्ट ये है की पुलकित आर्य खुद सत्ताधारी पार्टी (BJP) के ही एक रसूखदार पूर्व नेता (विनोद आर्य) का बेटा है। सरकार इसी बात का क्रेडिट लेने की कोशिश कर रही है की देखो, हमने अपनी ही पार्टी के नेता के बेटे को अंदर करवा दिया!
लेकिन देवभूमि का आम आदमी इतना भी बेवकूफ नहीं है बॉस! हर कोई जानता है की पुलकित आर्य और उसके वो दोनों गुर्गे तो महज़ मोहरे थे।
वो तो सिर्फ ‘सप्लायर’ थे! असली गुनहगार, असली मगरमच्छ तो वो है जिसने उस ‘स्पेशल सर्विस’ की डिमांड की थी।
प्यादों को जेल भेज दिया गया ताकि राजा को बचाया जा सके। और वो राजा, वो ‘VIP’, आज भी सफेद कुर्ते में बेखौफ घूम रहा है। शायद वो किसी बड़े मंच से महिला सशक्तिकरण और ‘बेटी बचाओ’ पर भाषण भी दे रहा हो।
आज अंकिता की चौथी बरसी पर पूरा उत्तराखंड सिर्फ एक ही जवाब मांग रहा है। क्या हमारी देवभूमि को कभी उस असली ‘VIP’ का चेहरा देखने को मिलेगा?
या फिर सत्ता के इस गठजोड़ में अंकिता की चीखें, वो ऑडियो टेप और वो सीबीआई की फाइलें हमेशा-हमेशा के लिए दीमक की खुराक बन जाएंगी?
