जिस ‘कांग्रेस’ को तोड़कर ममता दीदी ने बनाई ‘तृणमूल कांग्रेस’, आज उसी ‘तृणमूल कांग्रेस’ को तोड़कर ऋतब्रत बनर्जी ने बना दी ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’, कुर्सी के खेल में दीदी को मिल गया उनके ही तीर का जवाब

सियासत भी क्या गज़ब की चीज़ है ना! यहां कोई भी कहानी कभी खत्म नहीं होती, बस कुछ सालों बाद अपना किरदार बदल लेती है।

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग हमेशा से कहते आए हैं की ज़िंदगी एक गोल पहिया है और राजनीति में तो ये पहिया कुछ ज्यादा ही तेज़ घूमता है।

आजकल की मॉडर्न भाषा में इसे ही ‘कर्मा’ (Karma) कहते हैं।

और सच कहूं तो, राजनीति के इस ‘कर्मा’ का इससे बेहतरीन, सटीक और सार्कास्टिक उदाहरण आज तक किसी ने नहीं देखा होगा जो इन दिनों बंगाल में चल रहा है।

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके एक डायलॉग ने पूरे देश में मशहूर कर दिया था- “खेला होबे” (यानी खेल होगा)।

दीदी जब मंच से माइक पकड़कर ये डायलॉग मारती थीं, तो सामने खड़ी हज़ारों की भीड़ जोश से पागल हो जाती थी। सत्ता के उस गुरूर में दीदी को शायद ये लग रहा था की बंगाल के इस सियासी मैदान में हमेशा वही खिलाड़ी रहेंगी और बाकी सब सिर्फ मोहरे।

लेकिन वो कहते हैं ना की जब वक़्त अपना ‘खेला’ करता है, तो अच्छे-अच्छे खिलाड़ियों को मैदान छोड़ना पड़ जाता है।

आज दीदी उसी चौराहे पर आकर खड़ी हो गई हैं, जहां से 28 साल पहले उन्होंने अपना सफर शुरू किया था। आज ममता बनर्जी को उसी दर्द का अहसास हो रहा होगा जो दर्द उन्होंने कभी अपनी पुरानी पार्टी यानी ‘कांग्रेस’ को दिया था।

जिस रास्ते से गुज़रकर दीदी ने कभी अपना साम्राज्य खड़ा किया था, आज उसी रास्ते से ऋतब्रत बनर्जी आ गए हैं और उन्होंने दीदी के साथ ऐसा गज़ब का ‘खेला’ कर दिया है की पूरी तृणमूल कांग्रेस ही उनके हाथों से फिसल गई है।

इसे समझने के लिए इतिहास के उस पन्ने को पलटना होगा, जब दीदी ने खुद अपनी सियासी ज़मीन तैयार करने के लिए अपना पहला ‘खेला’ किया था।

90 का वो दशक जब ममता बनर्जी बंगाल में थी ‘कांग्रेस’ की फायरब्रांड नेता

अब बात करते हैं उस इतिहास की, जिसे आज बंगाल की राजनीति में हर कोई याद कर रहा है। किस्सा कुछ यूं है की अगर आज आप बंगाल में किसी से पूछेंगे की ममता बनर्जी की सियासी पैदाइश कहां की है, तो जवाब मिलेगा- कांग्रेस पार्टी।

जी हां, एक वक्त था जब ममता बनर्जी बंगाल में ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ का सबसे तेज़-तर्रार और फायरब्रांड युवा चेहरा हुआ करती थीं।

बात 90 के दशक की है। उस समय बंगाल पर वामपंथियों (Left Front / CPM) का एकछत्र राज हुआ करता था। लाल झंडे की ऐसी आंधी थी की उसके सामने कोई टिक नहीं पाता था।

ममता बनर्जी तब कांग्रेस की नेता थीं और सड़कों पर उतरकर वामपंथियों से सीधा पंगा लेती थीं। दीदी का वो जुझारू अंदाज़ ही था जिसने उन्हें बंगाल की जनता के बीच एक ‘स्ट्रीट फाइटर’ की पहचान दी।

लेकिन दीदी की असली परेशानी वामपंथी नहीं, बल्कि खुद उनकी अपनी पार्टी यानी ‘कांग्रेस’ का दिल्ली वाला आलाकमान था।

उस दौर में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे सीताराम केसरी। ममता बनर्जी को हमेशा से ये शिकायत थी की दिल्ली में बैठे कांग्रेस के बड़े नेता बंगाल में वामपंथियों के साथ फिक्सिंग करके चलते हैं।

दीदी का मानना था की कांग्रेस आलाकमान बंगाल में CPM के खिलाफ वो आक्रामकता नहीं दिखा रहा है, जो दिखानी चाहिए। वे लोग दिल्ली में बैठकर दोस्ती निभा रहे थे और बंगाल में ममता बनर्जी सड़कों पर वामपंथियों के डंडे खा रही थीं।

इसी बात को लेकर 1997 के अंत तक आते-आते ममता बनर्जी और कांग्रेस आलाकमान के बीच की दरार इतनी गहरी हो गई की उसे भरना नामुमकिन हो गया।

दीदी समझ चुकी थीं की अगर वो इस ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ के झंडे के नीचे रहीं, तो बंगाल में कभी वामपंथियों को उखाड़ कर नहीं फेंक पाएंगी। उन्होंने बगावत का बिगुल फूंक दिया। और फिर आया वो ऐतिहासिक साल-1998।

जब ममता बनर्जी ने तय किया अपना अलग सियासी रास्ता और कांग्रेस के नाम में ‘तृणमूल’ जोड़कर किया था पहला ‘खेला’

1998 में ममता बनर्जी ने तय कर लिया की वो अब अपना अलग सियासी रास्ता चुनेंगी। लेकिन यहीं पर दीदी ने सियासत का अपना सबसे बड़ा और सबसे मास्टरमाइंड दांव खेला।

जब कोई नेता अपनी पुरानी पार्टी छोड़ता है, तो वो आमतौर पर कोई एकदम नया नाम सोचता है।

जैसे शरद पवार ने ‘नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी’ (NCP) बनाई, लेकिन उसमें भी कांग्रेस था। ममता बनर्जी जानती थीं की बंगाल के जो वोटर्स उन्हें पसंद करते हैं, वो मूल रूप से ‘कांग्रेस’ के ही वोटर हैं।

अगर उन्होंने कोई बिल्कुल नया नाम रख लिया, तो गांव-देहात के उस वोटर को अपनी तरफ खींचना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

तो दीदी ने क्या किया? उन्होंने कोई बहुत भारी-भरकम माथापच्ची नहीं की। उन्होंने बहुत ही चालाकी से ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ से ‘कांग्रेस’ शब्द को चुराया।

अब चूंकि उन्हें जनता को ये दिखाना था की वो दिल्ली के महलों वाली राजनीति नहीं करतीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ी नेता हैं, इसलिए उन्होंने इस ‘कांग्रेस’ शब्द के ठीक आगे एक बंगाली शब्द चिपका दिया- ‘तृणमूल’ (Trinamool)।

तृणमूल का मतलब होता है ग्रासरूट्स (Grassroots) यानी ज़मीनी स्तर। और इस तरह 1 जनवरी 1998 को बंगाल की राजनीति में जन्म हुआ ‘तृणमूल कांग्रेस’ का।

ज़रा इस खेल की गहराई को समझिए! दीदी ने अपनी पुरानी पार्टी (इंडियन नेशनल कांग्रेस) की पूरी पहचान को हाईजैक कर लिया था।

उन्होंने जनता को मैसेज दिया की दिल्ली वाली कांग्रेस तो अब वीआईपी हो गई है, मैं तुम्हारी ज़मीनी कांग्रेस यानी ‘तृणमूल कांग्रेस’ हूँ। कांग्रेस वाले तब दिल्ली में बैठकर अपना सिर पीटते रह गए थे की ये क्या हो गया।

और सिर्फ नाम ही नहीं, दीदी ने अपना सिंबल (चुनाव चिह्न) भी बिल्कुल अपनी इस नई पहचान के हिसाब से चुना। उन्होंने चुनाव आयोग से ‘जोड़ा फूल’ (घास और दो फूल) का सिंबल लिया। घास यानी ज़मीन (तृणमूल), जो इस बात का प्रतीक था की ये पार्टी ज़मीन से जुड़ी है।

यही वो बगावत थी, यही वो सियासी ‘खेला’ था, जिसके दम पर दीदी ने पहले कांग्रेस का वोटबैंक काटा, फिर 2011 में 34 साल पुराने वामपंथी किले को ध्वस्त कर दिया, और बंगाल की निर्विवाद महारानी बन गईं।

1998 में दीदी ने कांग्रेस से उसकी पहचान छीनी थी और अपना साम्राज्य खड़ा किया था। तब दीदी को लगा था की ये जो पॉलिटिकल फॉर्मूला उन्होंने ईजाद किया है, वो सिर्फ उन्हीं का ‘पेटेंट’ है।

लेकिन दीदी ये भूल गईं की राजनीति में कोई भी पेटेंट हमेशा के लिए नहीं होता। जो तीर उन्होंने 1998 में कांग्रेस के सीने में उतारा था, आज 28 साल बाद ठीक वही तीर, बिल्कुल उसी अंदाज़ में पलटकर उनके खुद के सीने में आ लगा है।

2026 का वो भूचाल जब ऋतब्रत बनर्जी ने 58 विधायकों के साथ छीन ली ममता दीदी की ‘तृणमूल’ विरासत

चलिए अब 1998 से सीधे आज यानी 2026 में आ जाते हैं। बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे और जिस ‘खेला होबे’ के नारे पर दीदी को इतना गुमान था, इस बार वही नारा उन्हें उल्टे मुंह मुंह चिढ़ा रहा था।

चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का वो पुराना जादू नहीं चला और दीदी का विशाल साम्राज्य सिमटकर महज़ 80 सीटों के आस-पास आ गिरा।

जो पार्टी कल तक पूरे बंगाल पर एकछत्र राज कर रही थी, उसे अब विपक्ष की कुर्सियों पर बैठने की नौबत आ गई थी। लेकिन दीदी को लगा की चलो कोई बात नहीं, सत्ता गई तो क्या, पार्टी तो अपनी ही है।

मैं विपक्ष की नेता (Leader of Opposition) बनकर विधानसभा में फिर से दहाड़ूंगी।

लेकिन दीदी को अंदाज़ा ही नहीं था की उनके घर के भीतर ही एक ऐसा तूफान पक रहा है, जो उनसे उनकी सत्ता तो क्या, पूरी की पूरी पार्टी ही छीनने वाला है।

और इस तूफान का नाम था- ऋतब्रत बनर्जी।

जब दीदी चुनाव की हार का विश्लेषण करने में लगी थीं, तब ऋतब्रत बनर्जी ने वो काम कर दिया जो बंगाल की राजनीति में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।

उन्होंने बहुत ही खामोशी से, बिना किसी शोर-शराबे के, एक साइलेंट ऑपरेशन चलाया। राजनीति में कहावत है की जिसके पास नंबर हैं, वही सिकंदर है। और ऋतब्रत ने इसी नंबर गेम में दीदी को चारो खाने चित कर दिया।

टीएमसी के पास जो 80 विधायक बचे थे, उनमें से ऋतब्रत ने 58-59 विधायकों को अपने पाले में कर लिया। ज़रा सोचिए इस बगावत के लेवल को!

80 में से 58 विधायक! ये कोई छोटी-मोटी टूट नहीं थी, ये पार्टी पर किया गया एक फुल-प्रूफ सर्जिकल स्ट्राइक था। दीदी की ख़ुफ़िया एजेंसियों और उनके सलाहकारों को इसकी भनक तक नहीं लगी।

जब तक दीदी कुछ समझ पातीं, ऋतब्रत बनर्जी अपने 58 विधायकों के समर्थन वाली चिट्ठी लेकर सीधे विधानसभा स्पीकर के कमरे में पहुंच गए।

स्पीकर को चिट्ठी सौंपी गई और रातों-रात खेला हो गया। जिस कुर्सी (नेता प्रतिपक्ष) पर बैठकर ममता बनर्जी फिर से अपना सियासी रुतबा कायम करने के सपने देख रही थीं, उस कुर्सी पर ऋतब्रत बनर्जी आकर बैठ गए।

ऋतब्रत सीधे ‘नेता प्रतिपक्ष’ बन गए और ममता बनर्जी, जो कल तक पार्टी की सुप्रीम लीडर थीं, वो अपने ही घर में बेगानी हो गईं।

दीदी के हाथ से 58 विधायक फिसल गए, लेकिन दोस्त, असली धमाका तो अभी बाकी था। ऋतब्रत को सिर्फ विधायक नहीं चाहिए थे, उन्हें तो दीदी का वो पूरा ‘पेटेंट’ ही हाईजैक करना था।

इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना देखिए… कांग्रेस से तृणमूल और अब तृणमूल से बन गई ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल’

बंगाल की सियासत का सबसे बड़ा ‘खेला’ यहीं पर है। ये वो हिस्सा है जिसे देखकर हर राजनीतिक विश्लेषक दांतों तले उंगली दबा रहा है और कह रहा है की “वाह रे सियासत! तू वाकई गोल है।”

जब ऋतब्रत ने 58 विधायक तोड़ लिए, तो उनके सामने भी वही चुनौती थी जो 1998 में ममता बनर्जी के सामने थी- अपनी नई पार्टी का नाम क्या रखा जाए?

अगर ऋतब्रत चाहते तो कोई भी नया और फैंसी सा नाम रख सकते थे, जैसे ‘बंगाल विकास पार्टी’ या ‘नव निर्माण दल’ वगैरह। लेकिन ऋतब्रत को पता था की बंगाल का जो आम वोटर है, गांव-देहात का जो किसान और मज़दूर है, उसके दिमाग में ‘तृणमूल कांग्रेस’ का नाम फेवीकोल की तरह चिपका हुआ है।

नया नाम लेकर जाएंगे तो वोटर कन्फ्यूज़ हो जाएगा।

तो ऋतब्रत ने क्या किया? उन्होंने दीदी के उस 1998 वाले मास्टरमाइंड फॉर्मूले की फाइल निकाली, धूल झाड़ी और उसी फॉर्मूले को दीदी के ही ऊपर अप्लाई कर दिया!

याद कीजिए, दीदी ने क्या किया था? ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ से ‘कांग्रेस’ लिया, आगे ‘तृणमूल’ जोड़ा और बन गई ‘तृणमूल कांग्रेस’।

अब 2026 में ऋतब्रत ने क्या किया? उन्होंने ममता दीदी की ‘तृणमूल कांग्रेस’ का पूरा का पूरा नाम उठाया, उसके ठीक आगे एक भारी-भरकम शब्द चिपका दिया- ‘डेमोक्रेटिक’ (Democratic यानी लोकतांत्रिक)।

और बूम! बंगाल की सियासत में अवतरित हो गई ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’।

इसे कहते हैं नहले पर दहला! ऋतब्रत ने दीदी को मैसेज दे दिया की आपने कांग्रेस से उनका नाम चुराकर उन्हें अनाथ किया था, आज मैंने आपसे आपकी ‘तृणमूल कांग्रेस’ छीन ली है।

दीदी का ही तीर, दीदी के ही सीने में। जो पार्टी कभी ‘कांग्रेस’ से टूटकर ‘तृणमूल कांग्रेस’ बनी थी, आज वही पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ से टूटकर ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ में बदल गई।

ममता बनर्जी के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था। वो जिस ‘तृणमूल कांग्रेस’ को अपने खून-पसीने से सींचने का दावा करती थीं, जिस नाम को उन्होंने एक ब्रांड बना दिया था, आज कोई दूसरा नेता आकर उस ब्रांड के आगे बस एक शब्द (डेमोक्रेटिक) जोड़कर पूरा का पूरा शोरूम ही हाईजैक कर चुका था।

दीदी को समझ ही नहीं आ रहा था की वो इस चोट पर गुस्सा करें या अपने उस पुराने दांव को याद करके अफसोस जताएं, जो आज खुद उन्हीं के गले की फांस बन चुका था।

लेकिन राजनीति का ये ड्रामा सिर्फ विधानसभा के गलियारों तक सीमित नहीं रहने वाला था। असली लड़ाई तो अब दिल्ली में होनी थी- उस चुनाव आयोग (ECI) के दफ्तर में, जिसके एक फैसले ने दीदी की बची-खुची उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया।

चुनाव आयोग का सबसे बड़ा प्रहार और छिन गया दीदी का 28 साल पुराना ‘जोड़ा फूल’

ऋतब्रत बनर्जी ने विधानसभा में तो दीदी को गच्चा दे दिया था, लेकिन असली लड़ाई तो अब ‘ब्रांड’ और ‘सिंबल’ की थी। 6 अक्टूबर को नंदीग्राम जैसी बेहद अहम सीटों पर विधानसभा के उपचुनाव (By-Elections) होने वाले हैं।

अब दोनों गुट (दीदी और ऋतब्रत) चुनाव आयोग (ECI) के दरवाज़े पर पहुंच गए। दोनों ही हाथ में कागज़ लहराकर कह रहे थे की “साहब, असली टीएमसी (TMC) तो मेरी है!”

ऋतब्रत के पास 58 विधायकों का भारी-भरकम बहुमत था, जबकि दीदी के पास ‘पार्टी की संस्थापक’ होने का पुराना दावा।

जब ऐसी लड़ाई चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंचती है, तो आयोग सबसे पहले क्या करता है? वो पार्टी के असली नाम और सिंबल को ‘फ्रीज़’ (ज़ब्त) कर देता है, ताकि जब तक असली दावेदार का फैसला न हो जाए, तब तक कोई भी उसका फायदा न उठा सके।

17 सितंबर 2026 की शाम चुनाव आयोग ने भी वही किया!

चुनाव आयोग ने फैसला सुनाते हुए ममता बनर्जी की असली ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ का नाम और उनका वो 28 साल पुराना ‘जोड़ा फूल’ (घास और दो फूल) सिंबल फ्रीज़ कर दिया।

अब 6 अक्टूबर के उपचुनाव के लिए न तो ऋतब्रत और न ही दीदी, उस ‘जोड़ा फूल’ का इस्तेमाल कर सकते थे।

ऋतब्रत को मिला लिफाफा और दीदी बनीं फुटबॉल खिलाड़ी… उपचुनावों से पहले सिंबल का ये गज़ब खेल

अब क्योंकि 6 अक्टूबर के उपचुनाव सिर पर थे, तो चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अस्थाई (Temporary) रूप से नए नाम और नए चुनाव चिह्न बांट दिए।

सबसे पहले बात करते हैं ऋतब्रत बनर्जी की। चुनाव आयोग ने उनके गुट को वही नाम दे दिया जो उन्होंने मांगा था- ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’। और इसके साथ उन्हें जो चुनाव चिह्न मिला, वो है- ‘लिफाफा’ (Envelope)।

लेकिन असली मज़ा तो तब आया जब चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी को उनका नया नाम और सिंबल दिया। दीदी के गुट को नाम मिला- ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’। (यानी अब दीदी को अपनी ही पार्टी को पहचानने के लिए उसमें अपना नाम लगाना पड़ रहा है)।

और उन्हें चुनाव चिह्न क्या मिला पता है? ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ (Football Player)!

वाह रे किस्मत! जो ममता बनर्जी कल तक मंच से दहाड़कर कहती थीं- “खेला होबे, भयंकर खेला होबे!”… चुनाव आयोग ने मानो उन्हें सच में एक फुटबॉल थमा दी और कह दिया की “दीदी, राजनीति का असली ‘खेला’ तो अब आपके साथ हो गया है, अब जाइए और जाकर असली फील्ड पर फुटबॉल के साथ खेला कीजिए!”

अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर ममता बनर्जी, और बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत

दीदी का गुस्सा इस वक़्त सातवें आसमान पर है। चुनाव आयोग के इस फैसले से तिलमिलाई हुई ममता बनर्जी ने बिना एक पल की देरी किए सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा दिया है।

उन्हें उम्मीद है की शायद देश की सबसे बड़ी अदालत उनके उस 28 साल पुराने ‘जोड़ा फूल’ को बचा लेगी।

लेकिन सवाल सिर्फ कोर्ट या सिंबल का नहीं है। सवाल उस परसेप्शन और ज़मीनी हकीकत का है जो बंगाल में पूरी तरह बदल चुकी है।

आज टीएमसी का वो आम कार्यकर्ता चौराहों पर खड़ा असमंजस में है। वो समझ नहीं पा रहा की उसकी ‘असली दीदी’ कौन है और उसकी ‘असली पार्टी’ कौन सी है?

एक तरफ वो पार्टी है जिसके पास दीदी का चेहरा है लेकिन नाम में ‘ममता’ और सिंबल में ‘फुटबॉल’ जुड़ गया है। और दूसरी तरफ वो पार्टी है जिसके पास दीदी वाली ‘तृणमूल कांग्रेस’ (डेमोक्रेटिक तृणमूल) है, दीदी के ही 58 विधायक हैं, लेकिन वहां दीदी खुद नहीं हैं।

ऋतब्रत बनर्जी ने जो सियासी दांव चला है, उसने बंगाल की राजनीति में एक नए युग का आग़ाज़ कर दिया है।

अब ये देखना वाकई दिलचस्प होगा की क्या दीदी सुप्रीम कोर्ट से अपनी पुरानी पहचान वापस ला पाती हैं, या फिर बंगाल की जनता इस ‘फुटबॉल’ और ‘लिफाफे’ के खेल में किसी नए ही बादशाह को चुनती है।

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