सच कहूं तो ये दिन कम्युनिस्ट छात्र संगठनों के नेताओं और उनके समर्थकों के लिए किसी सदमे से कम नहीं हैं। देश के जिस भी कैम्पस में ये लोग हाथ डाल रहे हैं, वहां से इन्हें ऐसी करारी हार मिल रही है की समझ ही नहीं आ रहा मुंह कहां छुपाएं।
अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, दिल्ली यूनिवर्सिटी (DUSU) के छात्र संघ चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने ऐसा तगड़ा डंका बजाया की पूरा लेफ्ट इकोसिस्टम सन्न रह गया।
4 में से 3 सेंट्रल सीटों पर ABVP ने जो बंपर जीत दर्ज़ की थी, उसका शॉक अभी उतरा भी नहीं था.. लेफ्ट वाले और उनके दरबारी अभी दिल्ली की हार का मातम मना ही रहे थे की अचानक दक्षिण भारत से एक ऐसी खबर आ गई, जिसने इनकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया।
ये लोग अक्सर एक डायलॉग मारते थे की “अरे उत्तर भारत में जीत गए तो क्या हुआ, दक्षिण भारत और खासकर केरल तो हमारा अभेद्य किला है! वहां तो कम्युनिस्टों को कोई हिला ही नहीं सकता।”
लेकिन सितंबर की इस ताज़ा खबर ने इनका ये घमंड भी चकनाचूर कर दिया है। केरल, जिसे ये कम्युनिस्ट अपनी बपौती समझते थे, जिसे इन्होंने ‘लाल सलाम’ का सबसे बड़ा गढ़ बना रखा था, वहां अब ‘वन्दे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ की गूंज सुनाई दे रही है।
राष्ट्रवाद की जो आंधी दिल्ली से उठी थी, वो अब सीधे केरल के कैम्पसों में घुस चुकी है और वहां लाल झंडों को ऐसे उखाड़ कर फेंक रही है जैसे आंधी में सूखे पत्ते उड़ जाते हैं।
ये युवाओं का वो बदलता हुआ मूड है, जिसे कम्युनिस्ट इकोसिस्टम अब तक डिकोड ही नहीं कर पाया है।

40 साल पुराना लाल किला ढहा और केरल के संस्कृत कॉलेज यूनियन चुनाव की सभी 12 सीटों पर ABVP की क्लीन स्वीप
चलिए आपको बताता हैं की ये ऐतिहासिक जीत हुई कहां है! केरल के एर्नाकुलम जिले में एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक जगह है त्रिपुनिथुरा (Tripunithura)।
और इसी त्रिपुनिथुरा में स्थित है ‘गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज’ (Government Sanskrit College)। जो लोग केरल की छात्र राजनीति को समझते हैं, वो अच्छे से जानते हैं की यह कॉलेज वामपंथियों यानी SFI (Students’ Federation of India) का कितना बड़ा और मजबूत गढ़ माना जाता था।
ज़रा सोचिए, इस कॉलेज पर पिछले चार दशकों (40 सालों) से कम्युनिस्टों का एकछत्र राज था! 40 साल कोई मज़ाक नहीं होता दोस्त। आज कॉलेज में जो बच्चे पढ़ रहे हैं, जब वो पैदा भी नहीं हुए होंगे, तब से यहां SFI कुंडली मारकर बैठी थी।
ये लोग इस कैम्पस को अपनी प्राइवेट जागीर समझते थे। इन्हें लगता था की कोई भी आ जाए, लेकिन संस्कृत कॉलेज के यूनियन चुनाव में तो SFI का ही परचम लहराएगा।
लेकिन इस बार ABVP के छात्रों ने जो ज़मीनी मेहनत की, उसने इस 40 साल पुराने तिलिस्म को हमेशा-हमेशा के लिए तोड़ कर रख दिया।
आंकड़े सुनेंगे तो आप भी दंग रह जायेंगे । संस्कृत कॉलेज यूनियन चुनाव में कुल 12 सीटें थीं। और ABVP ने कितनी जीतीं? 12 की 12!
जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। 12/12 का परफ़ेक्ट स्कोर! ABVP ने ऐसा ‘क्लीन स्वीप’ मारा है की लेफ्ट वालों का सूपड़ा ही साफ हो गया। एक सिंगल सीट भी वामपंथियों के नसीब में नहीं आई।
Kerala joins the victory club. ABVP Keralam achieved a historic clean sweep by winning all 12 seats in union elections at Government Sanskrit College in Tripunithura and ended the SFI dominance of 40 years. Hindutva surging in the South 🔥 https://t.co/xJ7VxAPxlH pic.twitter.com/f5upI1xQZh
— Alpakanya (@Alpakanya) September 20, 2026
पूरे कैम्पस में भगवा गुलाल उड़ रहा है और राष्ट्रवादी युवा जश्न मना रहे हैं। अगर हम चेहरों की बात करें, तो इस बार युवाओं ने जिन होनहार छात्रों के हाथों में कैम्पस की कमान सौंपी है, वो नाम भी इतिहास में दर्ज़ हो गए हैं।
कॉलेज की चेयरपर्सन (Chairperson) के पद पर ‘स्निग्धा एम. हरि’ ने शानदार कब्ज़ा जमाया है। वहीं वाइस-चेयरपर्सन (Vice-Chairperson) की कुर्सी ‘आदित्य टी. ए.’ के खाते में गई है, और जनरल सेक्रेटरी (General Secretary) के सबसे अहम पद पर ‘विघ्नेश भट्ट’ ने अपना परचम लहराया है।
इसके अलावा यूनिवर्सिटी यूनियन काउंसलर, मैगज़ीन एडिटर और आर्ट्स क्लब सेक्रेटरी जैसी तमाम 12 सीटों पर ABVP के ही शेर और शेरनियों ने धाकड़ जीत दर्ज़ की है।
इस क्लीन स्वीप ने केरल के पूरे वामपंथी कैडर में ऐसा हड़कंप मचा दिया है की इनके बड़े-बड़े नेताओं को समझ नहीं आ रहा की वो प्रेस वालों को क्या जवाब दें।
कल तक जो लोग कैम्पस में लाल झंडे लेकर क्रांति की बातें करते थे, वो आज दूर-दूर तक कैम्पस में दिखाई नहीं दे रहे हैं।
कम्युनिस्टों की उड़ रही खिल्ली, जब 4 दशकों तक राज करने वालों को चुनाव लड़ने के लिए एक कैंडिडेट तक नहीं मिला
चलिए, हार-जीत तो राजनीति का हिस्सा है। चुनाव में कोई जीतता है, कोई हारता है। लेकिन SFI के साथ त्रिपुनिथुरा संस्कृत कॉलेज में जो हुआ है, वो महज़ एक ‘हार’ नहीं है… वो छात्र राजनीति के इतिहास की सबसे बड़ी बेइज्जती है!
अगर आप सामने वाले से लड़कर हारते हैं, तो कम से कम आपकी थोड़ी बहुत इज़्ज़त बच जाती है की चलो भाई, लड़कर तो हारे। लेकिन क्या आप यकीन करेंगे की 40 साल तक इस कैम्पस पर राज करने वाले कम्युनिस्टों को इस बार चुनाव लड़ने के लिए एक कैंडिडेट तक नसीब नहीं हुआ?
जी हां, आपने एकदम सही सुना! 18 सितंबर 2026 नॉमिनेशन फाइल करने की आख़िरी तारीख थी। ABVP के छात्रों ने पूरी तैयारी और जोश के साथ अपने 12 के 12 उम्मीदवारों का पर्चा भर दिया।
लेकिन दूसरी तरफ SFI के खेमे में सन्नाटा पसरा था। जो लोग दुनिया भर की क्रांति लाने का दावा करते हैं, वो पूरे कॉलेज में 12 ऐसे छात्र नहीं ढूंढ पाए जो उनके लाल झंडे के नीचे चुनाव लड़ने को तैयार हों!
THE 5 YEARS LEGACY OF ABVP🔥#ABVPKeralam pic.twitter.com/Dr1iAEd2uE
— ABVP KERALAM (@KeralaABVP) September 18, 2026
नतीजा ये हुआ की ABVP की ये ऐतिहासिक जीत पूरी तरह से ‘निर्विरोध’ (Unopposed) हुई है। सामने कोई लड़ने वाला ही नहीं था! बिना एक भी वोट पड़े SFI वालों ने घुटने टेक दिए और ABVP का क्लीन स्वीप हो गया।
अब ज़रा वामपंथियों की बहानेबाज़ी सुनिए। जब मीडिया और लोगों ने SFI वालों से पूछा की भाई तुम्हारी ये दुर्गति कैसे हो गई, तो SFI के एर्नाकुलम ज़िला सचिव ‘आशीष एस आनंद’ ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर कोई भी अपनी हंसी नहीं रोक पाएगा।
उन्होंने बड़ा ही मासूम सा बहाना बनाया की “दरअसल कोविड-19 के बाद से संस्कृत कॉलेज में एडमिशन बहुत कम हो गए हैं। कैम्पस में छात्रों की संख्या 100 से भी कम रह गई है, इसी वजह से हमें चुनाव लड़ने के लिए कैंडिडेट नहीं मिले।”
अरे भाई, ये कैसा हास्यास्पद तर्क है? अगर पूरे कॉलेज में सिर्फ 100 बच्चे भी बचे हैं, तो क्या उन 100 में से तुम्हें 12 ऐसे युवा नहीं मिले जो तुम्हारी वामपंथी विचारधारा पर भरोसा करते हों?
मतलब तुम्हारा स्ट्राइक रेट इतना गिर चुका है की कैम्पस का एक भी छात्र तुम्हारे नाम पर फॉर्म भरने को तैयार नहीं है? सच्चाई तो ये है आशीष बाबू, की छात्रों की संख्या कम नहीं हुई है, बल्कि तुम्हारी उस सड़ी-गली और टॉक्सिक राजनीति का असर कम हो गया है।
युवाओं ने तुम्हारी विचारधारा को सिरे से नकार दिया है। जब 40 साल सत्ता में रहकर तुम 12 कैंडिडेट खड़े करने लायक नहीं बचे, तो तुम्हें तो वैसे भी छात्र राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए।
छात्रों के फंड का गोलमाल और संस्कृत से ही चिढ़, आख़िर क्यों युवाओं ने SFI को दिखाया बाहर का रास्ता
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की आख़िर ऐसा क्या हो गया की केरल के युवाओं ने रातों-रात कम्युनिस्टों को बाहर का रास्ता दिखा दिया? ये कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि सालों से कैम्पस में उबल रहे गुस्से का नतीजा है।
आप ज़रा इस कॉलेज का नाम ध्यान से पढ़िए- ‘गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज’। नाम में संस्कृत है, यहां के मूल में भारतीय संस्कृति है।
लेकिन SFI वालों ने सालों से यहां क्या किया? इन्होंने एक ‘संस्कृत कॉलेज’ में रहकर हमेशा संस्कृत भाषा और हमारी सनातन सभ्यता का ही विरोध किया।
इनका पूरा फोकस बस अपनी वो विदेशी कम्युनिस्ट विचारधारा छात्रों के गले के नीचे उतारने पर था। ये लोग भारत की जड़ों की बात करने वालों को हमेशा दबाते थे।
कॉलेज के अंदर कोई भी राष्ट्रवादी या सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था, तो ये लाल झंडे वाले उसमें अड़ंगा लगाते थे।
लेकिन युवा अब बेवकूफ नहीं है। युवाओं को अब इन खोखले ‘इंकलाब’ और दुनिया भर के फालतू प्रपंचों से चिढ़ होने लगी है।
इसके अलावा, ABVP के छात्रों ने कैम्पस में जो सबसे बड़ा मुद्दा उठाया, वो था छात्रों के हक़ और उनके फंड का।
पिछले कई सालों से SFI वालों ने यूनियन पर कब्ज़ा तो कर रखा था, लेकिन छात्रों के कल्याण के लिए कभी कोई ढंग का काम नहीं किया।
आरोप है की छात्रों के विकास के लिए जो यूनियन फंड आता था, उसका जमकर गोलमाल किया गया। ना कैम्पस में कोई प्लेसमेंट सेल ढंग से काम कर रहा था, ना ही कोई रचनात्मक माहौल था।
बस दिन-रात हड़ताल, विरोध प्रदर्शन और कैम्पस की शांति भंग करना ही इनका रूटीन बन गया था।
आज का युवा अपने करियर, अपने देश के विकास और अपनी सभ्यता पर गर्व करना चाहता है। वो किसी विदेशी विचारधारा का झंडा ढोने वाला मज़दूर नहीं बनना चाहता।
ABVP ने छात्रों की इसी नब्ज़ को पकड़ा। उन्होंने कैम्पस में राष्ट्रवाद की अलख जगाई, भारतीय संस्कृति के सम्मान की बात की और छात्रों के असल मुद्दों के लिए संघर्ष किया।
यही वजह है की युवाओं ने तय कर लिया की अब इस ‘रेड ब्रिगेड’ का बोरिया-बिस्तर गोल करने का वक़्त आ गया है।
सिर्फ कॉलेज ही नहीं बल्कि पूरे त्रिपुनिथुरा से हो रही है लेफ्ट और कम्युनिस्ट राजनीति की परमानेंट विदाई
ज़रा इस बात को गहराई से समझिए दोस्त। त्रिपुनिथुरा के गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज में ABVP की ये 12/12 वाली बंपर जीत कोई अलग-थलग घटना नहीं है।
अगर आप ‘बड़ी पिक्चर’ देखेंगे, तो आपको समझ आएगा की केरल की ज़मीन पर असल में चल क्या रहा है। ये हार सिर्फ एक कैम्पस तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पूरे त्रिपुनिथुरा इलाके से लेफ्ट और कम्युनिस्ट राजनीति की ‘परमानेंट विदाई’ का अलार्म है।
ज़रा त्रिपुनिथुरा नगर पालिका (Municipality) चुनावों का ताज़ा रिकॉर्ड चेक कर लीजिए। हाल ही में वहां जो नगर पालिका के चुनाव हुए, उसमें भी बिल्कुल यही खेल हुआ था।
वहां भी 45 सालों से कम्युनिस्टों ने अपना अभेद्य किला बना रखा था, लेकिन जनता ने ऐसा वोट का हथौड़ा मारा की 45 साल बाद बीजेपी (BJP) ने वहां की सत्ता से कम्युनिस्टों को उखाड़ फेंका और अपना भगवा झंडा गाड़ दिया!
ज़रा सोचिए, पहले नगर पालिका के चुनाव में 45 साल का इनका जादू टूटता है, जनता इन्हें नकारती है।
और अब उसी त्रिपुनिथुरा के सबसे अहम कॉलेज यूनियन चुनाव में 40 साल पुराना घमंड टूट जाता है, युवा इन्हें नकार देते हैं।
कैम्पस की राजनीति से लेकर लोकल शहर की राजनीति तक, हर जगह से इनका सूपड़ा साफ हो रहा है।
यह इस बात का सुबूत दे रहा है की केरल का आम नागरिक, वहां का किसान और वहां का युवा अब इस ‘रेड ब्रिगेड’ के वैचारिक चंगुल से आज़ाद हो रहा है।
लोग अब विकास, राष्ट्रवाद और अपनी मूल संस्कृति की ओर लौट रहे हैं। कम्युनिस्टों की वो पुरानी कैसेट, जिसमें सिर्फ ‘विरोध, हड़ताल और बंद’ के गाने बजते थे, वो अब केरल की जनता के टेप-रिकॉर्डर में फंस कर टूट चुकी है।
दक्षिण भारत में राष्ट्रवाद का नया सूर्योदय और विरोध के नाम पर बहाने बनाने वाले इकोसिस्टम के लिए एक कड़ा संदेश
अब बात करते हैं दिल्ली में बैठे उन ‘नाराज़ फूफाओं’ की, जिनके कीबोर्ड पर इन दिनों अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है।
जब ABVP ने दिल्ली यूनिवर्सिटी (DUSU) में बंपर जीत दर्ज़ की थी, तो ये लोग कह रहे थे की “अरे उत्तर भारत का तो माइंडसेट ही खराब हो गया है।”
चलो भाई, मान लिया! लेकिन अब केरल में क्या हुआ? दक्षिण भारत का वो कोना जिसे तुम अपनी ‘वैचारिक राजधानी’ बताते थे, वहां तुम्हारे पास चुनाव लड़ने के लिए 12 युवा तक नहीं बचे? अब किस पर दोष मढ़ोगे?
सच्चाई ये है की ये संस्कृत कॉलेज की जीत कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है। यह दक्षिण भारत में राष्ट्रवाद के एक नए सूर्योदय की शुरुआत है।
केरल के कैम्पस अब कम्युनिस्टों की ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ नहीं रहे, जहाँ ये अपनी मर्जी से जब चाहें विदेशी विचारधारा का ज़हर घोल सकें।
संस्कृत कॉलेज के उन जीतने वाले होनहार छात्रों स्निग्धा, आदित्य, विघ्नेश और उनकी पूरी टीम ने 40 साल के वैचारिक आतंक से कैम्पस को आज़ाद कराया है।
कम्युनिस्टों को अब अपने ये लाल झंडे समेट कर बक्से में रख लेने चाहिए।
