हमारे हिंदुस्तान में बचपन से ही हर बच्चे को एक बात समझायी जाती है की “गुरु का दर्जा तो भगवान से भी ऊपर होता है।” लेकिन ज़रा सोचिए, क्या हो जब उसी गुरु को सरेआम मुजरिम बनाकर खड़ा कर दिया जाए?
क्या हो जब एक टीचर की ईमानदारी, उसकी ड्यूटी और उसका उसूल ही उसके गले का फंदा बन जाए? आज हमारे देश का शिक्षा तंत्र एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है, जहाँ टीचर इस डर में जीने को मजबूर है की कहीं उसका कोई छात्र उसपर झूठा SC/ST Act न लगा दे!।
हम बात कर रहे हैं इसी हफ्ते, 18-19 सितंबर 2026 को देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान- IIT बॉम्बे (Indian Institute of Technology, Bombay) में घटी उस घटना की, जिसने पूरे देश में SC/ST Act के दुरूपयोग पर एक बार फिर चिंगारी लगा दी है।
एक जवान छात्र की आत्महत्या का पूरा का पूरा ठीकरा एक ऐसे बेकसूर और ईमानदार गुरु के सिर पर फोड़ दिया गया, जिसका इकलौता कसूर सिर्फ इतना था की वो OBC वर्ग से था और अपनी ड्यूटी कर रहा था।
हम बात कर रहे हैं प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला (Prof. Suryanarayana Doolla) की। एक ऐसा टीचर, जिसे अपनी ईमानदारी के इनाम में बर्बादी मिलने वाली है।
सिस्टम ने एक ऐसे गुरु को मुजरिम बना दिया, जिसने सिर्फ एक छात्र को गलत रास्ते पर जाने से रोकने की कोशिश की थी।

एग्जाम हॉल में छात्र कर रहा था ChatGPT से चीटिंग, और एक गुरु ने निभाई अपनी असली ड्यूटी
आखिर उस दिन एग्जाम हॉल में ऐसा क्या हुआ था जिसने इस पूरे बखेड़े की नींव रखी?
तारीख थी 18 सितंबर 2026। IIT बॉम्बे के कैंपस में मिड-सेमेस्टर (Mid-Semester) के एग्जाम चल रहे थे। हर कोई जानता है की आईआईटी में एग्जाम का प्रेशर कितना तगड़ा होता है, वहां का अकैडमिक माहौल बेहद सख्त होता है।
इसी एग्जाम में इन्विजिलेटर (Invigilator) के तौर पर ड्यूटी पर तैनात थे प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला। क्लासरूम में सब कुछ नॉर्मल चल रहा था, तभी प्रोफेसर की नज़र 22 साल के ‘साहिल वाकोडे’ पर पड़ती है।
हैरानी की बात ये थी की साहिल परीक्षा के बीच में मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहा था। आईआईटी जैसे संस्थान के एग्जाम हॉल में फोन ले जाना ही अपने आप में एक बहुत बड़ा अपराध (अकैडमिक रूल के खिलाफ) है।
लेकिन कहानी सिर्फ फोन तक सीमित नहीं थी। जब प्रोफेसर डूला ने पास जाकर उसे रंगे हाथों पकड़ा, तो उन्होंने देखा की साहिल अपने फोन में AI टूल ‘ChatGPT’ का इस्तेमाल कर रहा था!
वह बाकायदा एग्जाम का पेपर उस टूल पर अपलोड करके वहां से जवाब छाप रहा था। मतलब, ये कोई छोटी-मोटी पर्ची वाली नकल नहीं थी, ये चीटिंग का एकदम एडवांस और हाई-टेक लेवल था।
अब आप ही अपने दिल पर हाथ रखकर बताइए यार… अगर आप किसी क्लास में ड्यूटी कर रहे हैं और कोई बच्चा आपके सामने मोबाइल पर इंटरनेट खोलकर चीटिंग कर रहा हो, तो आप क्या करेंगे? क्या आप उसे पीठ थपथपा कर कहेंगे की “शाबाश बेटा, लगे रहो”? बिल्कुल नहीं!
प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला ने वही किया जो इस देश के किसी भी सच्चे, ईमानदार और अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार टीचर को करना चाहिए था। उन्होंने तुरंत एक्शन लिया और नियम के मुताबिक़ साहिल का फोन और आंसर शीट ज़ब्त कर ली।
सबसे अहम बात जो IIT प्रशासन की अंदरूनी जांच में सामने आई है, वो ये है की प्रोफेसर डूला ने साहिल को कोई सरेआम बेइज़्ज़त नहीं किया था, ना ही उसे कोई भद्दी या जातिसूचक गाली दी थी।
उन्होंने एक सख्त गुरु की तरह उसे बाकायदा ‘काउंसल’ (Counsel) किया था। उन्होंने उसे समझाया था की “ये तुमने बहुत बड़ी गलती की है, लेकिन ये ज़िंदगी का अंत नहीं है। इससे तुम्हारा पूरा अकैडमिक करियर बर्बाद नहीं होगा।”
प्रोफेसर ने उसे अपनी गलती मानने और आगे से ऐसा न करने की नसीहत दी थी। उन्होंने कोई पुलिस नहीं बुलाई थी, कोई गुंडागर्दी नहीं की थी। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ एग्जाम हॉल की पवित्रता को बचाने के लिए अपनी ‘ड्यूटी’ निभाई थी।
चीटिंग पकड़ी गयी तो कर दी आत्महत्या, और फिर शुरू हुआ एक ईंमानदार OBC शिक्षक पर झूठे SC/ST Act का खेल

लेकिन उस बेचारे टीचर को क्या पता था की जिस लड़के को वो सही रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहा है, वही लड़का अकैडमिक अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) के खौफ और बदनामी के डर से हॉस्टल की 14वीं मंजिल से छलांग लगा देगा।
बदनामी और अकैडमिक करियर पर लगने वाले दाग के खौफ से उसने हॉस्टल से छलांग लगा दी। साहिल की मौत एक बहुत बड़ा सदमा थी। एक पल के लिए हर किसी की आंखें नम थीं।
साहिल का डरना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन एक टीचर द्वारा चीटिंग पकड़ना उसे ‘मरने के लिए उकसाना’ कैसे हो गया? यही वो सवाल है जो आज देश के हर उस आम टीचर के दिमाग बज रहा है, जो रोज़ सुबह उठकर पूरी ईमानदारी से स्कूल या कॉलेज पढ़ाने जाता है।
और ये सब के बाद कैंपस में जो गंदा और घिनौना खेल शुरू हुआ, उसने इंसानियत और न्याय दोनों को शर्मसार कर दिया।
साहिल की मौत के बाद उसके परिवार (पिता रविंद्र वाकोडे) और कैंपस में बैठे कुछ राजनीतिक छात्र संगठनों ने रातों-रात इस पूरी अकैडमिक घटना पर ‘जातिगत भेदभाव’ (Caste Discrimination) का पर्दा डाल दिया।
जो मामला साफ-साफ एग्जाम हॉल में ChatGPT से चीटिंग करने और रंगे हाथों पकड़े जाने का था, उसे बड़ी ही चालाकी से दलित उत्पीड़न का मामला बना दिया गया।
बिना किसी जांच के, बिना एग्जाम हॉल में मौजूद बाकी छात्रों की गवाही लिए, पुलिस ने दबाव में आकर OBC प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला पर SC/ST एक्ट (Prevention of Atrocities Act) और ‘आत्महत्या के लिए उकसाने’ (Abetment to suicide) जैसी खौफनाक धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज़ कर ली।
ज़रा रुकिए और अपने दिमाग पर ज़ोर डालकर एक सीधा सवाल पूछिए यार! अगर एक दलित छात्र क्लास में मोबाइल पर ChatGPT खोलकर चीटिंग करते हुए पकड़ा जाता है, तो क्या उसे डांटना या उस पर संस्थान के नियम के तहत कार्रवाई करना SC/ST एक्ट का अपराध है?
क्या संविधान में कहीं लिखा है की अगर कोई SC/ST वर्ग का बच्चा नकल कर रहा हो, तो OBC टीचर को अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए?
ये जो FIR का चाबुक प्रोफेसर डूला पर चलाया गया है, ये सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि देश के पूरे शिक्षा तंत्र को डराने की एक साज़िश है।
जिस कानून को सदियों से दबे-कुचले लोगों को हक़ दिलाने और उनके असली उत्पीड़न को रोकने के लिए बनाया गया था, आज उसे चीटिंग और अपनी गलतियों को छुपाने के लिए एक ‘ब्लैकमेलिंग के हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
अगर ऐसा ही चलता रहा, तो कल को कोई भी टीचर किसी SC/ST वर्ग के बच्चे की कॉपी चेक करते हुए भी कांपेगा। वो सोचेगा की यार अगर मैंने इसे फेल कर दिया या नकल करते पकड़ लिया, तो कल को मुझ पर ही SC/ST एक्ट लग जाएगा और मुझे सीधे जेल जाना पड़ेगा।
क्या ऐसे खौफ के साये में कोई गुरु अपने शिष्य का भविष्य गढ़ सकता है?
बिना जांच पड़ताल के सस्पेंशन का चाबुक आखिर क्यों, IIT प्रशासन ने टेक दिए हड़ताली भीड़ के आगे घुटने
जब किसी टीचर पर झूठा इल्जाम लगता है, तो उसकी आखिरी उम्मीद उसका मैनेजमेंट या प्रशासन होता है।
प्रोफेसर डूला को भी लगा होगा की जिस IIT बॉम्बे को उन्होंने अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती साल दिए हैं, वो इस मुश्किल वक्त में उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ा रहेगा। लेकिन अफ़सोस, ऐसा कुछ नहीं हुआ।
19 और 20 सितंबर को IIT बॉम्बे कैंपस में उग्र प्रदर्शन शुरू हो गए। छात्र संगठनों ने भीड़तंत्र का ऐसा भौकाल बनाया की प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए।
बाकायदा 18-पॉइंट का एक ‘डिमांड चार्टर’ मैनेजमेंट के मुंह पर दे मारा गया। अब ऐसे वक्त में किसी भी रीढ़ की हड्डी वाले प्रशासन को कहना चाहिए था की “ठहरो! पहले एक निष्पक्ष जांच कमेटी बैठेगी। एग्जाम हॉल के सीसीटीवी फुटेज देखे जाएंगे। अगर टीचर की गलती होगी, तब एक्शन लेंगे।”
लेकिन IIT प्रशासन की कायरता तो देखिए! इस मैनेजमेंट ने भीड़तंत्र के दबाव में आकर तुरंत घुटने टेक दिए।
उन्होंने बिना कोई आंतरिक जांच पूरी किए, आनन-फानन में प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला को ‘डीन ऑफ़ स्टूडेंट अफेयर्स’ (Dean of Student Affairs) के पद से हटा दिया। उन्हें सस्पेंड करके उस दंगाई भीड़ के आगे अकेला छोड़ दिया गया।
ये हमारे सिस्टम का सबसे बड़ा दोगलापन है भाई! जब एक टीचर सिस्टम के बनाए हुए नियमों को क्लासरूम में लागू करता है, जब वो संस्थान की अकैडमिक इज़्ज़त बचाने के लिए चीटिंग पकड़ता है, तो वही सिस्टम उसे बचाने के बजाय, खुद को पाक-साफ़ दिखाने के लिए उसकी बलि चढ़ा देता है।
IIT बॉम्बे के प्रशासन का यह रवैया देश के हर टीचर को हमेशा याद रहेगा। ये सस्पेंशन साफ़ मैसेज दे रहा है की “टीचरो, अपना काम ईमानदारी से मत करना, क्योंकि अगर दलित समाज की भीड़ भड़की, तो हम तुम्हें बचाने नहीं आएंगे।”
एक गुरु, जिसने सिर्फ अपना फर्ज़ निभाया, उसे बिना किसी सुबूत के, बिना किसी ट्रायल के पहले ही दिन से मुजरिम मान लिया गया।
ना पहले कभी हुई कोई शिकायत ना कोई सुबूत, फिर कैसे अचानक IIT बॉम्बे में पैदा हो गया ये झूठा जातिवाद
कहते हैं की झूठ के पांव नहीं होते, वो ज्यादा दूर तक दौड़ नहीं सकता। इस केस में भी जब ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने की कोशिश की गई, तो बहुत ही जल्द इसके दावों की धज्जियां उड़नी शुरू हो गईं।
अगर आप हवा-हवाई सोशल मीडिया की बातों से बाहर निकलकर पक्के सुबूतों की तरफ देखेंगे, तो आपको पता चलेगा की इस पूरी घटना में जातिवाद का तो दूर-दूर तक कोई नाम-ओ-निशान ही नहीं था।
IIT बॉम्बे प्रशासन के भीतर ही एक स्पेशल ‘SC/ST सेल’ बना हुआ है, जिसका काम ही इन बच्चों की शिकायतें सुनना है। इस सेल के हेड प्रोफेसर राजकुमार पंत ने खुद मीडिया के सामने आकर एक ऐसा बयान दिया है, जिसने इस झूठे ‘जातिवाद’ के गुब्बारे की पूरी हवा निकाल दी है।
प्रोफेसर पंत ने बाकायदा ऑन-रिकॉर्ड कहा है की साहिल वाकोडे पिछले डेढ़-दो साल से कैंपस में था, लेकिन उसने अपने पूरे कार्यकाल में आज तक कभी भी SC/ST सेल में जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की एक सिंगल शिकायत दर्ज़ नहीं कराई थी!
अब आप ही बताइए यार, जो लड़का डेढ़ साल से वहां पढ़ रहा हो, जिसे कभी कोई दिक्कत नहीं आई, वो अचानक से एग्जाम वाले दिन, वो भी तब जब वो ChatGPT से चीटिंग करते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाता है… तभी अचानक से ये ‘जातिवाद’ कहाँ से पैदा हो गया?
सच तो ये है की खुद IIT बॉम्बे के प्रोफेसरों का संगठन (Faculty Forum) अब डंके की चोट पर प्रोफेसर डूला के सपोर्ट में आ गया है। 21 सितंबर 2026 को फैकल्टी फोरम ने साफ कहा है की प्रोफेसर डूला सिर्फ और सिर्फ अपनी ड्यूटी कर रहे थे।
🚨 BIG: A PEACEFUL MARCH WAS ORGANISED IN SUPPORT OF IIT BOMBAY PROF. SURYANARAYANA DOOLLA 🔥 pic.twitter.com/4xppQMWpxV
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) September 22, 2026
वो अपनी ड्यूटी करने गए थे, किसी का मर्डर करने नहीं! कैंपस के आम छात्रों से भी अगर आप बात करेंगे, तो वो भी यही गवाही दे रहे हैं की प्रोफेसर डूला थोड़े सख्त (Strict) ज़रूर हैं, लेकिन वो कभी भी ‘अनफेयर’ या जातिवादी नहीं रहे।
जब कोई सुबूत ही नहीं, जब कोई गवाह ही नहीं, तो फिर चीटिंग के केस को जातिवाद का लिबास पहनाकर एक ईमानदार टीचर की बलि क्यों चढ़ाई जा रही है?
अपनी मेहनत से डीन की कुर्सी तक पहुंचने वाले एक होनहार OBC प्रोफेसर की जिंदगी कैसे कर दी गई तबाह
सबसे ज़्यादा दर्द तो तब होता है जब आप इस बेकसूर टीचर, प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला का असली बैकग्राउंड जानेंगे।
सोशल मीडिया पर बैठे जातियों के ठेकेदार और लिबरल लोग एक नैरेटिव बना रहे हैं की जैसे प्रोफेसर डूला कोई बहुत बड़े सवर्ण या प्रिविलेज्ड (Privileged) घराने से आते हैं जो दलितों को दबा रहे थे।
अरे भाई, सच्चाई तो ये है की प्रोफेसर डूला खुद एक OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) बैकग्राउंड से आते हैं! वो कोई ऐसे वर्ग से नहीं हैं जिन्हें सब कुछ मुंह में चांदी का चम्मच लेकर मिला हो। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में खून-पसीना एक करके, रातों की नींदें उड़ाकर यहाँ तक का सफर तय किया है।
ज़रा उनकी दशकों की तपस्या का कच्चा-चिट्ठा देखिए। उनकी प्रोफाइल बताती है की साल 2000 में उन्होंने नागार्जुन यूनिवर्सिटी से BTech किया।
फिर अपनी मेहनत के दम पर वो IIT बॉम्बे से MTech करने पहुंचे, और फिर 2007 में उन्होंने देश के टॉप संस्थान IIT दिल्ली से अपनी PhD पूरी की। इस इंसान ने अपनी ज़िंदगी के पूरे 25 साल सिर्फ और सिर्फ इस देश की शिक्षा और विज्ञान को दिए हैं।
एक OBC प्रोफेसर, जो गांव-कस्बों की धूल फांकता हुआ, अपनी दिन-रात की मेहनत और लगन से IIT बॉम्बे में ‘डीन’ की कुर्सी तक पहुंचा हो… सोचिए उस पर क्या बीत रही होगी?
जिस अकैडमिक इज़्ज़त को कमाने में उन्हें 25 साल लग गए, सिस्टम ने महज़ एक ‘चीटिंग के केस’ को छुपाने के लिए, झूठे SC/ST मुक़दमे में फंसाकर उस पूरी इज़्ज़त को 25 मिनट में मटियामेट कर दिया।
आज उस प्रोफेसर की फैमिली, उनके बच्चे जब अख़बारों में अपने पिता को ‘मुजरिम’ लिखा हुआ देखते होंगे, तो वो किस दर्द से गुज़र रहे होंगे? क्या एक OBC की मेहनत और इज़्ज़त की इस देश में कोई कीमत नहीं है?
अगर क्लासरूम में नकल पकड़ना ले आये SC/ST Act की मुसीबत, तो फिर डर के साये में कैसे देश का भविष्य गढ़ेंगे हमारे शिक्षक
दोस्त, ये मामला सिर्फ IIT बॉम्बे या किसी एक प्रोफेसर डूला का नहीं है। ये हमारे पूरे हिंदुस्तान के शिक्षा तंत्र के लिए एक बहुत भयंकर अलार्म है।
अगर आज हमने प्रोफेसर डूला के साथ हुए इस सरेआम अन्याय को चुपचाप सह लिया, तो कल से हिंदुस्तान का कोई भी टीचर अपनी क्लास में किसी छात्र को डांटने या नकल पकड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।
ज़रा उस मंज़र के बारे में सोचिए जो इस घटना के बाद पैदा होने वाला है। जब एक टीचर एग्जाम हॉल में ड्यूटी कर रहा होगा और वो किसी दलित वर्ग के बच्चे को खुलेआम चीटिंग करते हुए देखेगा, तो वो क्या करेगा?
वो डर के मारे अपनी आंखें फेर लेगा! वो सोचेगा की अगर मैंने इसे टोका, अगर मैंने इसकी कॉपी छीनी, तो कल को ये जाकर मुझ पर SC/ST एक्ट की FIR ठोक देगा और मेरी सालों की मेहनत, मेरी इज़्ज़त और मेरी नौकरी सब बर्बाद हो जाएगी।
SC/ST एक्ट जो इस देश में दलितों के हक़ और सुरक्षा के लिए बनाया गया था, आज उसका सबसे गंदा और घिनौना इस्तेमाल हो रहा है।
इसे अब अपनी चोरियां, अपनी चीटिंग, अपना निकम्मापन और अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए एक ‘ब्लैकमेलिंग टूल’ बना लिया गया है।
अगर क्लासरूम में चीटिंग पकड़ना SC/ST एक्ट का अपराध बन जाएगा, तो फिर आप भूल जाइए की इस देश में कभी कोई अच्छी शिक्षा या अच्छे इंजीनियर पैदा हो पाएंगे।
सरकार, प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में तुरंत दखल देना चाहिए। प्रोफेसर डूला पर लगी वो फर्जी और मनगढ़ंत FIR तुरंत रद्द होनी चाहिए।
