दोस्तों आज 23 सितंबर है। आज ही के दिन पूरे हरियाणा में ‘वीर एवं शहीदी दिवस’ मनाया जाता है।
ये दिन उस शूरवीर की याद में मनाया जाता है जिसने अपनी जवानी के दिनों में ही अंग्रेजों पर ऐसा पांव रखा था की पूरी ब्रिटिश हुकूमत की सांसें अटक गई थीं।
उस शूरवीर का नाम था ‘राव तुलाराम’! उन्हें प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महा-नायक भी कहा जाता है।
ज़रा सोचिए! एक लड़का जो एक बड़े राजघराने में पैदा हुआ हो, जिसके पास अकूत दौलत और बड़ी रियासत हो… उस उम्र में जब नौजवान ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीना पसंद करते हैं, उस उम्र में अहीरवाल के इस यदुवंशी शेर ने अपने हाथों से आज़ादी का कफ़न ओढ़ लिया था।
वो चाहते तो अंग्रेजों से हाथ मिलाकर, उनकी जी-हुज़ूरी करके अपनी पूरी ज़िंदगी अय्याशी में काट सकते थे। कई राजाओं ने ऐसा किया भी था। लेकिन उनके खून में यदुवंश की वो आग थी जो किसी के आगे झुकना जानती ही नहीं थी।
आज़ादी की जंग लड़ते-लड़ते हरियाणा के रेवाड़ी का ये शेर आख़िरकार अफगानिस्तान के काबुल कैसे पहुँच गया, ये कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कहीं ज्यादा खौफनाक और सच्ची है।
आईए आज उनके बलिदान दिवस पर हम उनके शौर्य से भरे इतिहास के पन्ने खोलते हैं।

1857 का वो बगावती दौर जब रेवाड़ी के इस नौजवान ने रातों-रात उखाड़ फेंका था ब्रिटिश हुकूमत का तंबू
थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं और इस शेर की असली जन्मकुंडली खंगालते हैं। 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी के रामपुरा में एक बहुत ही प्रतिष्ठित यदुवंशी (अहीर) राजघराने में राव पूर्ण सिंह के घर एक बेटे ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया ‘तुलाराम’।
शुरू से ही इस लड़के के तेवर अलग थे। जब तुलाराम जवान हो रहे थे, तो वो अपनी आँखों से देख रहे थे की कैसे गोरे अफ़सर छल-कपट से एक-एक करके हिंदुस्तानी रियासतों को हड़पते जा रहे हैं। तभी से उनके खून में वो बगावत उबलने लगी थी।
फिर आया 1857 का वो बगावती साल! 10 मई 1857 को मेरठ की छावनी में मंगल पांडे की शहादत के बाद जो चिंगारी भड़की, उसकी गूंज कुछ ही दिनों में अहीरवाल तक पहुँच गई।
अब राव तुलाराम कहाँ चुप बैठने वाले थे। मौका भी था और दस्तूर भी! 17 मई 1857 को, महज़ 31-32 साल के इस नौजवान ने अपने चचेरे भाई राव गोपाल देव के साथ मिलकर सीधे रेवाड़ी तहसील पर ऐसा भयंकर धावा बोला की अंग्रेजों के होश फाख्ता हो गए।
कोई हवा-हवाई बात नहीं है, बकायदा रिकॉर्ड्स में दर्ज़ है की राव तुलाराम का रौद्र रूप और उनके लड़ाकों की दहशत देखकर रेवाड़ी का तत्कालीन ब्रिटिश मजिस्ट्रेट ‘जॉन फोर्ड’ (John Ford) अपनी जान बचाकर दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ।
जो अंग्रेज अफसर कल तक रेवाड़ी की जनता पर कोड़े बरसाते थे, वो अपनी हवेलियां छोड़-छोड़ कर ऐसे भागे जैसे कोई शिकारी कुत्ता पीछे पड़ गया हो।
कुछ ही घंटों के अंदर रेवाड़ी से ब्रिटिश हुकूमत का पूरा का पूरा तंबू उखड़ चुका था और रेवाड़ी पूरी तरह से आज़ाद हो गया था!
अपनी खुद की आज़ाद सरकार और 5000 शूरवीरों की फौज बनाकर अंग्रेजों की नींद हराम करने वाले राव तुलाराम
राव तुलाराम सिर्फ एक लड़ाके नहीं थे भाई, वो एक गज़ब के विज़नरी (दूरदर्शी) और रणनीतिकार थे।
रेवाड़ी को अंग्रेजों से छीनने के बाद उन्होंने कोई लूटपाट या हंगामा नहीं किया, बल्कि बाकायदा अपनी एक स्वतंत्र सरकार (Independent Government) का ऐलान कर दिया।
उन्होंने रेवाड़ी, भोरा और शाहजहांपुर की पूरी सत्ता अपने हाथ में ले ली। मतलब अंग्रेजों के सीने पर बैठकर अपना खुद का राज कायम कर दिया!
इसके बाद उन्होंने जो किया, वो आज के किसी टॉप मिलिट्री जनरल के दिमाग को भी चकरा दे। उन्होंने रेवाड़ी के ‘रामपुरा किले’ को अपना हेडक्वार्टर (मिलिट्री बेस) बना लिया।
इस किले के अंदर रातों-रात एक तोपखाना (Gun Foundry) खड़ा कर दिया गया। ये कोई मामूली बात नहीं थी! इस देसी फैक्ट्री में दिन-रात तोपें, बंदूकें, गोलियां और बारूद बनाया जाने लगा।
कारीगरों ने दिन-रात एक करके अंग्रेजों से लड़ने के लिए हथियार तैयार करने शुरू कर दिए।
सरकार चलाने और फौज बनाने के लिए पैसा चाहिए होता है। राव तुलाराम ने अपने इलाके के जमींदारों और व्यापारियों से अपील की और देखते ही देखते आज़ादी के इस महायज्ञ में करीब 15 लाख रुपये का टैक्स और चंदा इकट्ठा हो गया।
1857 में 15 लाख रुपये की क्या कीमत थी, इसका आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।
इस पैसे और अपने हौसले के दम पर उन्होंने महज़ कुछ ही हफ्तों के अंदर 5000 वीर अहीर और राजपूत नौजवानों की एक ऐसी फौलादी फौज खड़ी कर दी, जो अपने राजा के एक इशारे पर अंग्रेजों का खून पीने को तैयार थी।
दिल्ली में बैठे ब्रिटिश हुक्मरानों की रातों की नींद उड़ गई थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था की अहीरवाल के इस शेर को रोकें तो रोकें कैसे।
जब तक दिल्ली से अंग्रेजों की टुकड़ियां कुछ समझ पातीं, राव तुलाराम ने पूरे इलाके की नाकेबंदी कर दी थी और अपनी फौज को बिल्कुल प्रोफेशनल तरीके से जंग के लिए तैयार कर लिया था।
नसीबपुर का वो खूनी रणक्षेत्र जहाँ तोपों के सामने तलवारें लेकर दौड़े थे राव तुलाराम और मार गिराया था ब्रिटिश कमांडर
जब अंग्रेजों को दिल्ली में बैठे-बैठे ये समझ आ गया की अहीरवाल का ये शेर अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका है और अगर इसे नहीं रोका गया तो दिल्ली भी हाथ से निकल जाएगी, तब उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
राव तुलाराम को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने पहले ब्रिगेडियर जनरल शोवर्स को भेजा और उसके बाद कर्नल जेरार्ड (Colonel Gerrard) के नेतृत्व में एक विशाल और हथियारों से लैस फौज नारनौल की तरफ रवाना कर दी।
तारीख थी 16 नवंबर 1857। जगह थी नारनौल के पास नसीबपुर का मैदान। भाईसाहब, 1857 की क्रांति का ये वो खूनी युद्ध था जिसे याद करके आज भी अंग्रेजों की रूह कांप जाती होगी।
मैदान के एक तरफ खड़ी थी अंग्रेजों की वो खूंखार फौज जिसके पास उस ज़माने की सबसे आधुनिक तोपें, एनफील्ड राइफलें और खूंखार ‘मुल्तान हॉर्स कैवेलरी’ (Multan Horse Cavalry) थी।
और दूसरी तरफ खड़े थे राव तुलाराम और उनके दीवाने यदुवंशी सैनिक, जिनके हाथों में भालें, देसी तलवारें और रामपुरा के किले में बनी कुछ देसी बंदूकें थीं।
ज़रा उस खौफनाक मंज़र की कल्पना कीजिए। जैसे ही अंग्रेजों ने अपनी तोपों के मुंह खोले और गोलों की बारिश शुरू की, राव तुलाराम के वीर अहीर सैनिकों ने पीछे हटने के बजाय एक ऐसा आत्मघाती हमला (Suicide Charge) किया जिसने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए।
ये सैनिक अपनी जान की परवाह किए बिना, तोपों के गोलों के बीच से चीरते हुए सीधे अंग्रेजों पर चढ़ दौड़े। नंगी तलवारों से वो कत्लेआम मचाया की गोरे सैनिकों की लाशों के ढेर लग गए।
इस भयंकर और खूनी झड़प में राव तुलाराम की फौज ने अंग्रेजों के सबसे बड़े अफसर, ब्रिटिश कमांडर कर्नल जेरार्ड को ही बीच मैदान में मौत के घाट उतार दिया!
कमांडर के मरते ही ब्रिटिश फौज में ऐसी भगदड़ मची की उनके पैर उखड़ गए। कुछ देर के लिए तो ऐसा लगा जैसे अहीरवाल के इन शूरवीरों ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने का काम लगभग पूरा ही कर दिया है।
हालांकि, बाद में अंग्रेजों की बैकअप फोर्स आ गई और आधुनिक तोपखाने के सामने तलवारें कब तक टिकतीं।
भारी नुकसान उठाने के बाद राव तुलाराम की सेना को पीछे हटना पड़ा, लेकिन इस एक युद्ध ने पूरी दुनिया को दिखा दिया था की भारत का किसान और जवान जब अपनी पर आता है, तो वो तोपों का मुंह भी अपनी तलवारों से मोड़ सकता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस से दशकों पहले आज़ादी के लिए विदेशी धरती पर फौज खड़ी करने का वो रोंगटे खड़े कर देने वाला सफर
हमें लगता है की आज़ाद हिन्द फौज बनाकर विदेश से भारत पर हमला करने का दिमाग सिर्फ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पास था। लेकिन जो काम नेताजी ने 1940 के दशक में किया, वो काम राव तुलाराम 1857 में ही कर रहे थे!
नसीबपुर युद्ध के बाद 1858 में अंग्रेजों ने एक ‘माफ़ीनामा’ (Amnesty) का ऐलान किया। कई राजा-महाराजा जो कल तक बगावत कर रहे थे, उन्होंने अपनी जान और रियासत बचाने के लिए अंग्रेजों के बूट चाट लिए और सरेंडर कर दिया।
लेकिन राव तुलाराम मिट्टी के नहीं, फौलाद के बने थे। उन्होंने अंग्रेजों के उस प्रस्ताव को अपने जूतों की नोक पर रखकर ठोकर मार दी।
वो छुपते-छुपाते राजस्थान निकल गए। वहां जाकर वो तात्या टोपे और अन्य बचे हुए क्रांतिकारियों की सेनाओं से मिले।
लेकिन जब राव तुलाराम को लगा की देश के अंदर गद्दारों की वजह से अब अंग्रेजों को उखाड़ फेंकना मुश्किल हो गया है, तो उन्होंने एक ऐसा मास्टरप्लान बनाया जो उस समय के किसी भी राजा की सोच से परे था। वो भारत से बाहर निकल गए!
वो कालपी से होते हुए भेष बदलकर सबसे पहले बसरा (इराक) पहुंचे, फिर वहां से ईरान गए और आख़िरकार अफगानिस्तान के काबुल पहुँच गए।
ये कोई टूरिस्ट ट्रिप नहीं थी यार! उनका असली प्लान था काबुल के अमीर ‘दोस्त मोहम्मद खान’ (Dost Mohammad Khan) और रूस के ‘ज़ार’ (Tsar) से संपर्क करके एक बहुत बड़ा विदेशी गठबंधन (Foreign Alliance) बनाना।
वो चाहते थे की एक विशाल फौज खड़ी की जाए और अफगानिस्तान के रास्ते भारत पर हमला करके अंग्रेजों को हमेशा-हमेशा के लिए अरब सागर में फेंक दिया जाए।
ज़रा उनकी विज़न और उनके हौसले को देखिए… एक अकेला इंसान पराई धरती पर जाकर पूरे ब्रिटिश एम्पायर से टक्कर लेने की तैयारी कर रहा था!
काबुल में बैठकर वो रूस और अफगान शासकों के साथ मिलकर इसी फौज की रणनीति बुन रहे थे। लेकिन अफ़सोस, भारत माँ के इस शेर को अंग्रेजों की गोलियां तो नहीं मार सकीं, पर काबुल की पराई मिट्टी और एक भयंकर बीमारी ने हमसे छीन लिया।
फौज खड़ी करने के इसी मिशन के दौरान राव तुलाराम को पेचिश (Dysentery) का एक भयंकर इन्फेक्शन हो गया। फिर आया 23 सितंबर 1863 का वो काला दिन।
मात्र 38 साल की उम्र में मातृभूमि का यह यदुवंशी शेर काबुल की ज़मीन पर हमेशा के लिए शांत हो गया।
