पिछड़ों की सुरक्षा के लिए बना था SC/ST Act, लेकिन अब निर्दोषों को फंसाकर भारी सरकारी मुआवजा डकारने का बन गया ‘सिंडिकेट’, न्याय की आड़ में पनप रहा एक नया ‘लीगल धंधा’

अगर मैं आपसे पूछूँ की आज के टाइम में लखपति बनने का सबसे आसान और सेफ शॉर्टकट क्या है? आप कहेंगे की भाई या तो कोई तगड़ा बिजनेस कर लो, या फिर किस्मत अच्छी हो तो शेयर मार्केट में पैसा लगा दो।

लेकिन नहीं दोस्त, आप बिल्कुल गलत ट्रैक पर हैं। आजकल बाजार में एक नया और एकदम “ज़ीरो रिस्क” वाला बिजनेस मॉडल आ चुका है। और इस खौफनाक मॉडल का नाम है- ‘SC/ST Act वसूली धंधा’।

आपको कोई इन्वेस्टमेंट नहीं करना, कोई दुकान नहीं खोलनी, कोई पसीना नहीं बहाना।

बस किसी से खुन्नस निकालनी है, किसी की पुश्तैनी ज़मीन हथियानी है, या अपना ही लिया हुआ उधार पैसा डकारना है, तो सीधे थाने का रुख करो और सामने वाले पर एक फर्जी SC/ST एक्ट का केस ठोक दो।

यकीन मानिए, जो कानून बाबा साहेब अंबेडकर ने समाज के सबसे आखिरी, शोषित और वंचित तबके की सुरक्षा के लिए बनाया था, आज उसी कानून को इन ‘प्रोफेशनल ब्लैकमेलरों’ और उनके दलालों ने एक ईज़ी-मनी का ATM मशीन बना दिया है।

न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी का इससे भयंकर मज़ाक शायद ही देश के इतिहास में कभी उड़ाया गया हो।

आज के समय में हालात इतने बदतर हो चुके हैं की ये फर्जी मुकदमे किसी एक-आध सिरफिरे का काम नहीं रह गए हैं। बाकायदा इसके ‘सिंडिकेट’ बन चुके हैं।

गांव-कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक एक ऐसा नेक्सस तैयार हो गया है, जिनका काम ही सुबह उठकर शिकार खोजना है।

ये देखते हैं की कौन सा भोला-भाला आम इंसान या नौकरीपेशा आदमी है जिसे फंसाकर मोटी रकम ऐंठी जा सकती है। और एक बार आप इनके रडार पर आ गए, तो फिर आपकी आधी ज़िंदगी कोर्ट-कचहरी की धूल फांकते और समाज में अपनी बेगुनाही साबित करते हुए ही गुज़र जाएगी।

इस लीगल टेररिज़्म ने आज समाज के उस ताने-बाने को तार-तार कर दिया है जहाँ कभी लोग एक-दूसरे की मदद करने के लिए आधी रात को भी खड़े हो जाते थे।

आज कोई किसी की मदद करने से पहले सौ बार सोचता है की कहीं कल को मुझ पर ही कोई झूठा SC/ST केस न ठोक दिया जाए।

मुआवजे के लालच में लगा दिए जाते फ़र्ज़ी SC/ST Act, कोर्ट जाने से पहले ही 75% पैसा आ जाता हाथ में

अब ज़रा इस पूरे खेल की जड़ और इसके गणित को गहराई से समझिए। आखिर लोग इतनी आसानी से और इतनी बेशर्मी के साथ झूठे केस ठोकने की हिम्मत जुटा कैसे लेते हैं? कोई तो मोटिवेशन होगा ना?

जवाब है- मुआवजे का अंधा लालच और हमारे सरकारी सिस्टम का सबसे भयंकर लूपहोल।

SC/ST (PoA) रूल्स के तहत सरकार कथित ‘पीड़ित’ को जो लाखों रुपये का सरकारी मुआवजा बांटती है, उसे देने का तरीका इतना बेतुका और अजीब है की सुनकर आप यकीन नहीं कर पाएंगे।

यहाँ चलता है ’25-50-25′ का एक ऐसा रूल, जो दुनिया के किसी भी न्याय सिस्टम में आपको देखने को नहीं मिलेगा।

ज़रा गौर से सुनिएगा और इस प्रोसेस को समझिएगा। किसी निर्दोष इंसान के खिलाफ थाने में सिर्फ एक कोरे कागज़ पर एफआईआर (FIR) दर्ज होती है।

पुलिस ने अभी तक कोई ग्राउंड जांच नहीं की है, कोई गवाह नहीं बुलाया है, कोर्ट में कोई सबूत पेश नहीं हुआ है। सिर्फ एक दलित ने जाकर दूसरे पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगा दिया और थानेदार ने एफआईआर लिख दी।

लेकिन एफआईआर दर्ज़ होते ही, शिकायत करने वाले के बैंक खाते में सरकारी खजाने से (यानी आपके और हमारे टैक्स के पैसे से) मुआवजे का सीधा 25% हिस्सा सीधा टपक जाता है।

ये 25 प्रतिशत कोई छोटी रकम नहीं होती भाई, ये केस की गंभीरता के हिसाब से लाखों रुपये तक होती है। बिना कुछ साबित किए, सिर्फ आरोप लगाने के पैसे मिल रहे हैं!

लेकिन पिक्चर अभी बाकी है दोस्त! इस धंधे का दूसरा पड़ाव और भी खौफनाक है। इसके बाद पुलिस वाले जांच के नाम पर खानापूर्ति करते हैं।

वो जैसे-तैसे, बिना कोई पुख्ता सबूत देखे, बस कोर्ट में एक चार्जशीट दाखिल कर देते हैं। और जैसे ही कोर्ट के बाबू के टेबल पर वो चार्जशीट फाइल होती है, वैसे ही शिकायतकर्ता के खाते में 50% पैसा और ट्रांसफर हो जाता है।

अब ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए यार! कोर्ट का ट्रायल तो अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ है। जिस आम इंसान पर ये भयंकर आरोप लगा है, उसे कटघरे में खड़ा होकर अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं मिला है।

जज साहब ने उसे दोषी माना ही नहीं है। लेकिन इस बीच, शिकायत करने वाले की जेब में पूरे 75% सरकारी पैसे (यानी कई लाख रुपये) जा चुके हैं!

दुनिया के किस लीगल सिस्टम में ऐसा होता है भाई? कानून का सीधा सा रूल है “इनोसेंट अंटिल प्रूवन गिल्टी” (जब तक दोष साबित न हो, तब तक निर्दोष)।

लेकिन यहाँ तो कोर्ट का अंतिम फैसला आने से सालों पहले ही, सिर्फ एक इल्ज़ाम के बेस पर लाखों रुपये की मलाई खिला दी जाती है।

बाक़ी बचा हुआ 25% पैसा कोर्ट का फैसला आने के बाद मिलता है, लेकिन इन प्रोफेशनल ब्लैकमेलरों को उस 25% की परवाह होती भी कहाँ है? उनका काम तो उन 75% पैसों (लाखों रुपयों) से ही हो जाता है।

अब आप ही बताइए, जब सिस्टम खुद बिना सबूतों के इतनी मोटी रकम दोनों हाथों से लुटाएगा, तो झूठे मुकदमों की बाढ़ नहीं आएगी तो और क्या होगा?

ये लोग जानबूझकर जातिगत भेदभाव की झूठी कहानियां बनाते हैं, और कई बार तो महिलाओं को आगे करके छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसी भयंकर धाराएं भी जुड़वा देते हैं ताकि मुआवजे का स्लैब और बढ़ जाए और रकम मोटी मिले।

ये कोई न्याय की प्रक्रिया नहीं है, ये बाकायदा एक ‘बिजनेस प्लान’ है। आप एक केस करो, 75% मलाई काटो। फिर किसी दूसरे गाँव या शहर में जाकर किसी और को फंसाओ।

सिस्टम की इसी बेवकूफी ने आज हज़ारों-लाखों निर्दोष परिवारों की ज़िंदगियां बर्बाद करके रख दी हैं।

अगर सालों बाद SC/ST केस निकला फ़र्ज़ी, तब भी नहीं होती मुआवज़े में दी गयी पैसों की वसूली

अब ज़रा इस लीगल धंधे के उस सबसे काले सच को समझिए, जो इसे दुनिया का सबसे ‘सुरक्षित’ और ‘ज़ीरो रिस्क’ वाला धंधा बनाता है।

आम ज़िंदगी में क्या होता है? आप अमेज़न या फ्लिपकार्ट से कोई दो-ढाई सौ रुपये की टी-शर्ट भी मंगाते हैं और अगर वो फटी हुई निकल जाए, तो कंपनी वाले दस सवाल पूछते हैं।

सामान वापस लेते हैं और तब जाकर आपका रिफंड आता है। मतलब एक प्राइवेट कंपनी भी बिना वेरिफिकेशन के एक रुपया नहीं छोड़ती।

लेकिन हमारे इस महान सरकारी सिस्टम को देखिए! मान लीजिए की किसी बेगुनाह आदमी पर एक झूठा SC/ST का केस ठोक दिया गया।

शिकायतकर्ता ने एफआईआर और चार्जशीट के दम पर लाखों रुपये का सरकारी मुआवजा डकार लिया। फिर वो केस सालों-साल कोर्ट में चला।

5 या 10 साल बाद जब कोर्ट में गवाहियां हुईं, जिरह हुई, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। जज साहब ने साफ-साफ कह दिया की “यह केस 100% फर्जी है, शिकायतकर्ता ने रंजिश निकालने के लिए सरासर झूठ बोला था,” और उस बेगुनाह आदमी को बाइज्जत बरी कर दिया।

अब यहाँ सवाल ये उठता है की वो जो लाखों रुपये का सरकारी फंड उस झूठे शिकायतकर्ता ने डकारा था, क्या सरकार वो पैसा वापस वसूल पाती है? जवाब है- बिल्कुल नहीं! ना के बराबर!

जैसे ही कोर्ट से केस फर्जी साबित होता है, प्रशासन की तरफ से पैसा रिकवरी (Recovery) का नोटिस तो निकलता है, लेकिन इन प्रोफेशनल ब्लैकमेलरों को पता होता है की इससे बचना कैसे है।

ये सीधा हाथ खड़े कर देते हैं की “साहब, मेरे पास तो कुछ नहीं है, मैं तो गरीब हूँ, पैसा तो खर्च हो गया!” और हमारा महान सिस्टम बेबस होकर बैठ जाता है।

ना उनकी कोई संपत्ति कुर्क होती है, ना उनसे ब्याज समेत वसूली होती है। वो फाइल किसी ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है और सरकार उस पैसे को ‘बट्टे खाते’ (Write-off) में डाल देती है।

अब आप खुद सोचिए यार! शेयर मार्केट में भी पैसा लगाने पर डूबने का रिस्क होता है, लेकिन इस ‘फेक SC/ST केस’ वाले लीगल धंधे में कोई रिस्क ही नहीं है।

झूठा मुकदमा ठोको, लाखों का मुआवजा डकारो, सामने वाले की ज़िंदगी नर्क बनाओ, और अगर दस साल बाद कोर्ट में पकड़े भी गए… तो भी सरकार को पैसा वापस नहीं करना।

मतलब चित भी मेरी, पट्ट भी मेरी और अंटा मेरे बाप का! जब सिस्टम खुद इतनी बड़ी लीगल गुंडागर्दी को स्पॉन्सर करेगा, तो फिर समाज में झूठे केसों की फैक्ट्री क्यों नहीं खुलेगी?

आंकड़े गवाह हैं की झूठे मुकदमों की फैक्ट्री बन चुका है ये SC/ST कानून

आइए ज़रा सरकारी रिकॉर्ड और पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों (2020-2023 Data) पर एक नज़र डाल लेते हैं।

राजस्थान का ही उदाहरण ले लीजिए। कुछ समय पहले खुद राजस्थान पुलिस के तत्कालीन डीजीपी (DGP) एम.एल. लाठर साहब ने मीडिया के सामने एक ऐसा भयंकर कबूलनामा किया था, जिसने पूरे देश के लीगल सिस्टम में भूचाल ला दिया था।

उन्होंने बकायदा ऑन-रिकॉर्ड माना था की राजस्थान में दर्ज होने वाले SC/ST मामलों में से लगभग 40% से 50% केस पुलिस की शुरुआती जांच में ही पूरी तरह से झूठे (Fake) और फर्जी पाए गए। पुलिस को मजबूर होकर उनमें ‘फाइनल रिपोर्ट’ (FR – Adam Vaku) लगानी पड़ी।

ज़रा इस आंकड़े की गंभीरता को समझिए भाई! आधे से ज़्यादा मामले सीधे तौर पर फर्जी निकल रहे हैं! ये कोई छोटी-मोटी गलती नहीं है। ये एक सोची-समझी साज़िश है।

यूपी, एमपी और बिहार के थानों का भी यही हाल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के डाटा के मुताबिक इस कानून के तहत कन्विक्शन रेट (सज़ा होने की दर) बहुत ही कम है, क्योंकि ज़्यादातर केस सिर्फ और सिर्फ पैसा ऐंठने, ब्लैकमेल करने या किसी पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए दर्ज कराए जाते हैं।

आप कल्पना कीजिए की पुलिस की मशीनरी का कितना समय, कोर्ट का कितना पैसा और कितने हज़ारों बेगुनाहों की ज़िंदगियां इस झूठ की चक्की में पीस दी जाती हैं।

जिन पुलिसवालों को असल क्रिमिनल्स, चोर-उचक्कों और मर्डरर्स को पकड़ना चाहिए था, वो अपना आधा समय इन फर्जी केसों की जांच करने और झूठी चार्जशीट बनाने में बर्बाद कर रहे हैं। ये सरकारी संसाधनों की खुलेआम बर्बादी नहीं तो और क्या है?

बेगुनाहों की ज़िंदगी खाने वाले इन झूठे SC/ST और ‘हनी ट्रैप’ सिंडिकेट्स का असली चेहरा

आइए मैं आपको देश के कुछ ऐसे खौफनाक और एकदम असली केस बताता हूँ, जिन्हें सुनकर आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी।

ये केस बता रहे हैं की कैसे इंसानियत और न्याय का गला घोंटकर इन सिंडिकेट्स ने बेगुनाहों की ज़िंदगियों को नर्क बना दिया है।

अब ज़रा इन नए ‘ऑर्गेनाइज्ड सिंडिकेट्स’ का हाल देखिए। यूपी का ‘पूजा रावत और वकील परमानंद’ वाला गैंग तो पूरे लीगल सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा था।

इस गैंग ने बकायदा एक ‘हनी ट्रैप’ और वसूली का धंधा खोल रखा था। ये लोग मिलकर अमीर या नौकरीपेशा लोगों को फंसाते थे और फिर उन पर एक ही पैटर्न में दुष्कर्म और SC/ST एक्ट का फर्जी मुकदमा दर्ज करवा देते थे।

फिर शुरू होती थी लाखों की रंगदारी। ये मामला इतना भयंकर था की हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट को खुद इस गैंग की CBI जांच के आदेश देने पड़े।

सोचिए, एक गैंग खुलेआम पुलिस और कोर्ट का इस्तेमाल अपनी प्राइवेट वसूली कंपनी की तरह कर रहा था!

और चंद्रावती का वो 46 लाख वाला केस तो आपको याद ही होगा! उस महिला ने इसे बकायदा अपना ‘स्टार्टअप’ बना लिया था।

उसने एक-दो नहीं, बल्कि अलग-अलग थानों में कई बेगुनाह लोगों पर SC/ST एक्ट के फर्जी मुकदमे लगाए और सरकार से मुआवजे के नाम पर कुल 46 लाख रुपये ऐंठ लिए।

एक आदमी ज़िंदगी भर खून-पसीना बहाकर इतना पैसा नहीं कमा पाता, जितना इसने चंद झूठे कागज़ों पर साइन करके डकार लिया।

हालांकि, कभी-कभी कोर्ट से कोई ऐसी किरण भी निकलती है जो दिल को तसल्ली देती है। जैसे हाल ही में लखनऊ कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया।

वहां एक 29 साल की महिला ने दो निर्दोष आदमियों पर झूठा दुष्कर्म और SC/ST एक्ट का मुकदमा ठोककर उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी।

लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ गया। जांच में झूठ पकड़ा गया और कोर्ट ने सीधा उस महिला को साढ़े 7 साल की जेल और 2 लाख रुपये जुर्माने की सज़ा सुना दी!

जज साहब ने साफ कहा की कानून का दुरुपयोग करके बेगुनाहों की ज़िंदगी बर्बाद करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

लेकिन कड़वा सच ये है यार, की ऐसे फैसले सौ में से किसी एक केस में आते हैं, बाकी 99 मामलों में तो वो झूठे ब्लैकमेलर पैसा लेकर आराम से अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं।

और अब बात करते हैं उस दर्दनाक केस की जिसने पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था- विष्णु तिवारी का केस।

यूपी के ललितपुर के रहने वाले विष्णु तिवारी पर आपसी रंजिश के चलते एक फर्जी दुष्कर्म और SC/ST एक्ट का केस ठोक दिया गया था।

पुलिस ने बिना ढंग से जांच किए उसे जेल में डाल दिया। ट्रायल कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सज़ा सुना दी। भाईसाहब, उस बेगुनाह आदमी ने अपनी ज़िंदगी के पूरे 20 साल जेल की कालकोठरी में काट दिए!

जब वो जेल गया था, तो एक जवान लड़का था और जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसे 100% निर्दोष मानते हुए बाइज्जत बरी किया, तो वो 40 पार कर चुका एक टूटा हुआ, बीमार और बूढ़ा इंसान बन चुका था।

जेल में रहते हुए उसके माता-पिता और भाई तड़प-तड़प कर मर गए, वो उनके अंतिम संस्कार तक में नहीं जा सका।

हाई कोर्ट ने पुलिस और ट्रायल कोर्ट को कड़ी फटकार लगाई, लेकिन मेरा सवाल ये है की विष्णु तिवारी की वो 20 साल की जवानी, उसका परिवार और उसकी बर्बाद हुई ज़िंदगी कौन लौटाएगा? क्या उस झूठे शिकायतकर्ता को 20 साल की जेल हुई? बिल्कुल नहीं!

जब तक इन ‘लीगल लुटेरों’ पर भयंकर कार्यवाही नहीं होगी, तब तक रोते रहेंगे बेगुनाह परिवार

इन फर्जी सिंडिकेट्स ने झूठे मुकदमों की ऐसी बाढ़ ला दी है की इस कानून की पूरी गंभीरता ही खत्म हो गई है।

सवाल ये है की इस लीगल टेररिज़्म (Legal Terrorism) को रोका कैसे जाए? इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही अचूक इलाज है- “जैसे को तैसा” (Tit for Tat)।

सिस्टम को ये नियम बनाना ही पड़ेगा की अगर किसी ने रंजिश, ब्लैकमेलिंग या पैसे ऐंठने के लिए SC/ST एक्ट और दुष्कर्म जैसी धाराओं का झूठा इस्तेमाल किया है, तो उस शिकायतकर्ता को ठीक वही सज़ा मिलनी चाहिए जो उसने उस बेगुनाह के लिए सोची थी।

अगर उसने किसी को 10 साल जेल में सड़ाने की साज़िश रची थी, तो उसे खुद 10 साल के लिए उसी कालकोठरी में डाल देना चाहिए।

और सबसे ज़रूरी बात! वो जो 75% पैसा (लाखों रुपये) उसने बिना ट्रायल के सरकारी खजाने से डकार लिया था ना? उसकी रिकवरी के लिए प्रशासन को इन ‘लीगल लुटेरों’ की सीधे संपत्ति कुर्क करनी चाहिए।

इनके घर का फ्रिज, टीवी, बाइक और पुश्तैनी ज़मीन नीलाम करके, ब्याज समेत वो पैसा सरकारी खजाने में वापस आना चाहिए।

जब एक-दो ऐसे झूठे ब्लैकमेलरों के घर पर बुलडोज़र चलेगा और वो खुद जेल की चक्की पीसेंगे, तब जाकर समाज में ये मेसेज जाएगा की कानून कोई खिलवाड़ नहीं है जिसे तुम अपनी कमाई का धंधा बना लो।

न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी इसलिए बंधी होती है ताकि वो किसी के साथ भेदभाव न करे, इसलिए नहीं की कोई भी ब्लैकमेलर आकर उसकी आँखों में धूल झोंक दे और खज़ाना लूट कर ले जाए।

अगर इस ‘लीगल वसूली धंधे’ को यहीं, इसी वक्त नहीं कुचला गया, तो वो दिन दूर नहीं जब समाज में इंसानियत पूरी तरह दम तोड़ देगी।

कोई भी आदमी सड़क पर किसी अनजान की मदद करने से पहले सौ बार सोचेगा.. सिर्फ इस डर से की कल को कहीं यही व्यक्ति उसपर फ़र्ज़ी SC/ST केस न ठोक दे !

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