एक तरफ अंग्रेजों का वफादार पति, दूसरी तरफ खून में उबलती आजादी की बगावत, विदेशी धरती पर पहली बार भारत का झंडा गाड़ने वाली भारतीय क्रांति की माँ ‘मादाम भीकाजी कामा’ को जयंती पर कोटि-कोटि प्रणाम

जब भी आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र आता है, तो हमारे दिमाग में अक्सर लाठियां खाते, जेल की चक्की पीसते या फांसी पर झूलते नौजवान क्रांतिकारियों की तस्वीर उभरती है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की आज़ादी की इस आग में कुछ ऐसे भी दीवाने थे, जिनके पास अरबों की दौलत थी?

जो चाहते तो लंदन और पेरिस के आलीशान महलों में किसी महारानी की तरह अपनी पूरी जिंदगी ऐश-ओ-आराम से काट सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने अपनी रेशमी चादरों को लात मार दी और मुल्क के लिए कांटों भरा वो रास्ता चुना जहाँ मौत हर कदम पर खड़ी थी।

हम बात कर रहे हैं मादाम भीकाजी कामा की… आज 24 सितंबर है, वही ऐतिहासिक दिन जब 1861 में इस धरती पर एक ऐसी पारसी शेरनी ने जन्म लिया था, जिसने सात समंदर पार बैठकर ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं।

आज वक्त आ गया है उस शौर्य से भरे सच को सामने लाने का, जिसने उन्हें ‘भारतीय क्रांति की जननी’ (Mother of the Indian Revolution) बना दिया।

सोने के चम्मच के साथ हुआ जन्म, लेकिन पति की अंग्रेज़ भक्ति ने बगावत करने पर कर दिया मजबूर

24 सितंबर 1861 को बंबई के एक बेहद रसूखदार और रईस पारसी परिवार में एक बच्ची ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया भीकाजी।

पिता सोहराबजी फ्रामजी पटेल शहर के बहुत बड़े और नामी व्यापारी थे। मतलब समझ लो की वो मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुई थीं।

उनकी पढ़ाई-लिखाई शहर के सबसे टॉप और एलीट स्कूल ‘एलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन’ में हुई।

बचपन से ही उनके अंदर विदेशी और देसी भाषाओं को सीखने का ऐसा गज़ब का टैलेंट था जो आगे चलकर यूरोप में आज़ादी का खुफिया नेटवर्क बिछाने और अंग्रेजों की जासूसी से बचने में सबसे बड़ा हथियार बना।

लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तो 1885 में आया। 1885 में भीकाजी की शादी रुस्तम के. आर. कामा नाम के एक रईस और नामी वकील से कर दी गई। दोनों के पास बेशुमार दौलत थी, लेकिन विचारों में ज़मीन-आसमान का नहीं, बल्कि आग और पानी का अंतर था।

रुस्तम बाबू पूरी तरह से ‘प्रो-ब्रिटिश’ थे। आसान और ठेठ भाषा में कहें तो उन्हें अंग्रेजों के तलवे चाटने में और उनकी चापलूसी करने में बड़ा मज़ा आता था।

उन्हें लगता था की गोरे लोग भारत का बहुत बड़ा भला कर रहे हैं और हमें उनका गुलाम बनकर ही रहना चाहिए। दूसरी तरफ भीकाजी कामा के खून में राष्ट्रवाद का ऐसा खौलता हुआ लावा उबल रहा था जो अंग्रेजों को इस देश से उखाड़ फेंकने के लिए बेचैन था।

अब आप ही बताओ यार, एक ही छत के नीचे एक आज़ादी का दीवाना और एक अंग्रेज़ों का वफादार गुलाम कैसे रह सकते हैं?

पति-पत्नी के बीच हर दिन इसी बात को लेकर भयंकर बहस होती थी। रुस्तम उन्हें आज़ादी की बातों से दूर रहने की हिदायत देते, लेकिन जिसके दिल में भारत माँ बसती हो वो किसी की क्या सुनेगी!

आखिरकार एक दिन इस वीरांगना ने अपने उस अंग्रेज़-भक्त पति, उस आलीशान महल और उस अरबों की दौलत को एक ही झटके में ठोकर मार दी।

उन्होंने साफ कर दिया की मेरी ज़िंदगी अब मेरे मुल्क के लिए है, तुम्हारे अंग्रेज़ आकाओं के लिए नहीं।

बंबई की वो खौफनाक प्लेग महामारी जिसने इस पारसी महिला को बना दिया भारत माँ का सबसे खूंखार सिपाही

आज़ादी की आग तो उनके सीने में जल ही रही थी, लेकिन 1896 के साल ने उन्हें पूरी तरह से बदल कर रख दिया और उन्हें ग्राउंड की हकीकत से रूबरू कराया।

ये वो वक्त था जब बंबई में भयंकर ‘बुबोनिक प्लेग’ (महामारी) ने दस्तक दी थी। सड़कों पर लाशें बिछी थीं। खौफ इतना भयंकर था की लोग अपने सगे-संबंधियों को मरने के लिए बेसहारा छोड़कर भाग रहे थे।

अंग्रेज़ अफसर तो डर के मारे अपने सुरक्षित बंगलों में दुबके बैठे थे। लेकिन मौत के उस तांडव के बीच इस रईस परिवार की बेटी ने अपनी जान की कोई परवाह नहीं की।

भीकाजी कामा खुद अस्पतालों और बस्तियों की गंदी गलियों में जाकर मरीजों की दिन-रात सेवा करने लगीं।

मरीजों को बचाते-बचाते 1897 आते-आते वो खुद इस जानलेवा प्लेग का शिकार हो गईं। उनकी हालत इतनी बिगड़ गई की सबको लगा अब शायद ही ये बच पाएंगी।

इलाज हुआ और किसी तरह वो मौत के मुंह से तो बाहर आ गईं, लेकिन उनका शरीर अंदर से पूरी तरह टूट चुका था। कमज़ोरी इतनी की खड़ा होना भी मुश्किल था।

डॉक्टरों ने साफ कह दिया की अगर जिंदा रहना है तो आराम करना पड़ेगा और इलाज के लिए किसी अच्छे मौसम वाली जगह (विदेश) जाना होगा। आख़िरकार 1902 में उन्हें मजबूरन अपना वतन छोड़कर इलाज के लिए लंदन जाना पड़ा।

लंदन पहुंचते ही जैसे उनके अंदर एक नई जान आ गई। वहाँ जाकर वो चुपचाप किसी अस्पताल के बिस्तर पर आराम फरमाने नहीं लेटी रहीं।

उनका इलाज तो चल ही रहा था, पर उनके दिमाग में असल में अंग्रेजों का परमानेंट इलाज करने की प्लानिंग चल रही थी।

लंदन में उनकी मुलाकात ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाले दिग्गज नेता दादाभाई नौरोजी से हुई। मादाम कामा ने उनके प्राइवेट सेक्रेटरी के तौर पर काम करना शुरू कर दिया।

इसी दौरान वो श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे कट्टर और गरम दल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं। उस समय लंदन में कृष्ण वर्मा का ‘इंडिया हाउस’ भारतीय क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा और खुफिया अड्डा हुआ करता था।

मादाम कामा इसी इंडिया हाउस से जुड़ गईं। और बस यहीं से शुरू हुआ विदेशी धरती से भारत की आज़ादी का वो खेल, जिसने गोरी हुकूमत की रातों की नींदें हराम कर दीं।

सात समंदर पार जर्मनी में जब पहली बार फहराया गया अपना तिरंगा और गूंजा वन्दे मातरम

तारीख थी 22 अगस्त 1907। जगह थी जर्मनी का स्टटगार्ट (Stuttgart) शहर। वहाँ ‘इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस’ का एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन चल रहा था।

वहाँ पूरी दुनिया के 1000 से ज़्यादा बड़े-बड़े और दिग्गज नेता बैठे थे, यहाँ तक की रूस की क्रांति के नायक ‘लेनिन’ भी वहीं मौजूद थे।

इस भरी सभा में ब्रिटिश हुकूमत के नुमाइंदे भी सीना तानकर बैठे थे और भारत की आज़ादी की बात को दबाने की पूरी कोशिश कर रहे थे।

लेकिन उन्हें क्या पता था की बंबई की इस पारसी शेरनी के आगे उनकी एक नहीं चलने वाली! ब्रिटिश हुकूमत के भारी विरोध और धमकियों के बावजूद, मादाम कामा उस ऐतिहासिक मंच पर सीना तानकर चढ़ गईं।

और फिर उन्होंने वो किया जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। उन्होंने अपने कोट के अंदर से एक झंडा निकाला और सात समंदर पार, उस विदेशी धरती पर डंके की चोट पर भारत की आज़ादी का पहला झंडा फहरा दिया!

झंडा फहराने के बाद उन्होंने उस विदेशी मंच से जो दहाड़ लगाई, उसने अंग्रेज़ों को अंदर तक हिला कर रख दिया।

उन्होंने गरजते हुए पूरी दुनिया की आँखों में आँखें डालकर कहा-

“यह भारत की आज़ादी का झंडा है! इसे देखो! यह हिन्दुस्तान के युवा क्रांतिकारियों के खून से सींचा गया है। मैं इस सभा में मौजूद पूरी दुनिया के लोगों से अपील करती हूँ कि खड़े हो जाओ और भारत की आज़ादी के इस झंडे को सलाम करो!”

और आपको जानकर हैरानी होगी की उनकी इस दहाड़ को सुनकर वहाँ मौजूद सैकड़ों विदेशी नेता सच में अपनी जगह पर खड़े हो गए और उन्होंने हमारे उस पहले झंडे को सलामी दी।

सोचिए, एक अकेली हिंदुस्तानी औरत ने कैसे पूरी दुनिया के सामने गोरी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी!

बंदूकों की सप्लाई और सावरकर की ढाल, पेरिस में ऐसे चलता था मादाम कामा का खुफिया नेटवर्क

जर्मनी के इस कांड के बाद अंग्रेज़ों ने मादाम कामा को ‘सबसे खतरनाक क्रांतिकारी’ घोषित कर दिया।

1909 के आस-पास जब ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने लंदन में ‘इंडिया हाउस’ के क्रांतिकारियों का जीना हराम कर दिया, तो मादाम कामा समझ गईं की अब बेस बदलना पड़ेगा। वो चुपचाप फ्रांस की राजधानी पेरिस शिफ्ट हो गईं।

पेरिस जाकर उन्होंने ‘पेरिस इंडियन सोसाइटी’ की स्थापना की। और भाई, पेरिस में उनका जो घर था ना, वो कोई रहने की जगह नहीं, बल्कि दुनिया भर से आने वाले भारतीय क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा ‘सेफ हाउस’ बन गया था।

हमारे इतिहास के सबसे कट्टर क्रांतिकारी जैसे वीर सावरकर, मदनलाल ढींगरा और लाला हरदयाल जब अंग्रेज़ों से छिपते-छिपाते यूरोप पहुँचते थे, तो उन्हें पैसा, छिपने की जगह, इंटरनेशनल सपोर्ट और खाना… सब कुछ मादाम भीकाजी कामा ही मुहैया कराती थीं।

वो इन नौजवानों के लिए एक माँ की तरह थीं। जब मदनलाल ढींगरा ने लंदन में अंग्रेज़ अफसर कर्ज़न वायली को बीच बाज़ार में गोलियों से भून दिया और उन्हें फांसी हुई, तो अंग्रेज़ों ने ‘वन्दे मातरम’ गाने पर ही बैन लगा दिया।

लेकिन शेरनी को कौन रोक सकता था? मादाम कामा ने यूरोप की अंडरग्राउंड प्रेसों में छुप-छुपकर ‘बन्दे मातरम’ और मदनलाल ढींगरा की याद में ‘मदन की तलवार’ नाम की क्रांतिकारी पत्रिकाएं छापनी शुरू कर दीं।

और सबसे धाकड़ बात तो अब सुनिए! ये पत्रिकाएं भारत कैसे पहुँचती थीं? उन्होंने एक स्मगलिंग नेटवर्क बनाया था।

वो बच्चों के खिलौनों के अंदर और बड़ी-बड़ी मशीनों के लोहे के पुर्जों के बीच छिपाकर इन पत्रिकाओं को भारत भेजती थीं।

और सिर्फ पत्रिकाएं नहीं दोस्त, वो इन्हीं खिलौनों और पुर्जों के अंदर छिपाकर आधुनिक पिस्तौलें, गोलियां और बम बनाने के फॉर्मूले भारत के गरम दल वाले नौजवानों तक पहुंचाती थीं।

जीते जी मुल्क की आज़ादी के लिए लुटा दी अरबों की दौलत और 74 साल की उम्र में विदा हो गयी ये भारतपुत्री

लेकिन फिर 1914 में पहला विश्व युद्ध (World War I) शुरू हो गया। विश्व युद्ध में फ्रांस और ब्रिटेन दोस्त बन गए। अब अंग्रेज़ों ने फ्रांस की सरकार पर दबाव डाला की इस ‘खतरनाक औरत’ को रोको।

फ्रांस की सरकार ने अपने ही देश के दबाव में आकर मादाम कामा को गिरफ्तार कर लिया और 1915 से 1917 तक उन्हें फ्रांस के ‘Vichy’ शहर की एक जेल में नजरबंद कर दिया।

जेल की काल कोठरी, भयंकर ठंड और लगातार पुलिस टॉर्चर ने आख़िरकार इस शेरनी के शरीर को तोड़ना शुरू कर दिया।

35 साल तक विदेशी धरती से अंग्रेज़ों की नींद उड़ाने वाली ये वीरांगना बुढ़ापे में गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उन्हें लकवा (Paralysis) मार गया।

जब 1935 में वो मौत के कगार पर पहुँच गईं, तब जाकर गोरी हुकूमत ने उन्हें इस शर्त पर भारत लौटने की इज़ाज़त दी कि वो अब किसी भी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगी।

नवंबर 1935 में वो अपने वतन, अपनी जन्मभूमि बंबई लौटीं। लेकिन वो अब वो रईस भीकाजी नहीं थीं। उनकी सारी दौलत, उनकी जवानी, उनका सुख-चैन… सब मुल्क की आज़ादी के हवन कुंड में स्वाहा हो चुका था।

आख़िरकार 13 अगस्त 1936 को पारसी जनरल अस्पताल के एक बिस्तर पर 74 साल की उम्र में इस महान वीरांगना ने अपनी आख़िरी साँस ली।

उस औरत ने अपना घर, अपना पति, अपनी अरबों की दौलत और अपनी पूरी ज़िंदगी देश की आज़ादी के लिए लुटा दी।

Scroll to Top