अमेरिका की दादागिरी के आगे झुके बिना भारत के परमाणु कार्यक्रम को अभेद्य ढाल देने वाला वो रणनीतिकार, अपनी कूटनीति से ‘पोखरण’ परिक्षण का रास्ता साफ करने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री ‘इंद्र कुमार गुजराल’

जब भी हम भारत के प्रधानमंत्रियों की बात करते हैं ना, तो हमारे ज़हन में अक्सर कुछ बहुत आक्रामक या बेहद करिश्माई चेहरे आते हैं।

लेकिन आज हम जिस शख्सियत की बात करने जा रहे हैं, उनका मिज़ाज बिल्कुल अलग था। फ्रेंच दाढ़ी, चेहरे पर एक गज़ब की सौम्यता, हमेशा सलीके से पहने हुए कपड़े और बात करने का वो धीमा, एकदम शायराना अंदाज़…

दूर से देखने पर वो आपको किसी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर या कोई बड़े साहित्यकार लग सकते थे। लेकिन यकीन मानिए, इस बेहद शांत और सौम्य चेहरे के पीछे एक ऐसा फौलादी इरादा छिपा था, जिसने अपने दौर में अमेरिका जैसी महाशक्ति के भी पसीने छुड़ा दिए थे।

बात 90 के दशक की है। सोवियत संघ बिखर चुका था और अमेरिका खुद को दुनिया का इकलौता बॉस समझने लगा था। वाशिंगटन में बैठकर दुनिया के फैसले लिए जा रहे थे।

लेकिन उसी दौर में भारत की कूटनीति की कमान एक ऐसे रणनीतिकार के हाथ में थी, जिसने अपनी बुद्धिमत्ता और शांत स्वभाव से अमेरिका का सारा गुरूर चकनाचूर कर दिया।

दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश को सर्वोपरि रखने वाले भारत के 12वें प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की कहानी महज़ एक राजनेता की कहानी नहीं है।

ये उस देशभक्त की दास्तान है जिसने हमारे परमाणु कार्यक्रम को वो अभेद्य ढाल दी, जिसकी बदौलत आज हम दुनिया की आँखों में आँखें डालकर बात करते हैं।

झेलम की गलियों से लेकर जेल की सलाखों तक, एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के संघर्ष की अनसुनी दास्तान

गुजराल साहब सिर्फ सियासत के कोई पक्के खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि उनके तो खून में ही आज़ादी की बगावत दौड़ती थी।

4 दिसंबर 1919 को भारत के झेलम में उनका जन्म हुआ था। माता-पिता दोनों पक्के स्वतंत्रता सेनानी थे, तो ज़ाहिर सी बात है देशभक्ति का जज़्बा तो उन्हें घुट्टी में ही मिल गया था।

ज़रा उस दौर की कल्पना कीजिए! 1942 का वो वक्त जब महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का बिगुल फूंका था।

उस वक्त गुजराल साहब कोई बहुत बड़े नेता नहीं थे, बल्कि एक युवा छात्र थे। लेकिन देश की आज़ादी का जुनून ऐसा सवार था की वो अंग्रेजों की लाठियों और जेल की सलाखों से बिल्कुल नहीं डरे।

अंग्रेज़ों ने उन्हें पकड़कर भारी यातनाएं दीं और जेल की कालकोठरी में डाल दिया। लेकिन वो टूटे नहीं।

फिर 1947 का वो दौर आया। मुल्क का बंटवारा हो गया और रातों-रात अपना पुश्तैनी घर, ज़मीन, यादें… सब कुछ पाकिस्तान में छोड़कर उन्हें एक रिफ्यूजी के तौर पर भारत आना पड़ा।

सोचिए यार, जिस इंसान ने बंटवारे का वो खौफनाक दर्द झेला हो, जो अपनी जान बचाकर खाली हाथ एक नए देश में आया हो, उसने शून्य से शुरुआत करके देश के सबसे बड़े पद यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया।

ये सफर खुद गवाही देता है की वो इंसान अंदर से कितना मज़बूत और जुझारू था।

जब इमरजेंसी में मीडिया का गला घोंटने की कोशिश हुई तो उसूलों के इस सिपाही ने कुर्सी को मार दी थी ठोकर

राजनीति में कुर्सी का लालच अच्छे-अच्छों का ईमान डगमगा देता है। हमने देखा है की कैसे बड़े-बड़े नेता सत्ता के लिए अपने उसूलों को ताक पर रख देते हैं।

लेकिन गुजराल साहब इस मिट्टी के बने ही नहीं थे। 1975 का वो डरावना दौर जब देश में इमरजेंसी (आपातकाल) थोपी गई थी, उस वक्त वो इंदिरा गांधी की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री (I&B Minister) हुआ करते थे।

अब आप ही बताइए, इमरजेंसी में सरकार का सबसे पहला काम क्या होता है? प्रेस और मीडिया की आवाज़ दबाना। उस वक्त संजय गांधी और उनके करीबियों का पूरे सिस्टम पर बहुत भयंकर खौफ था।

ऊपर से सीधा फरमान आया की दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर सिर्फ वही खबरें चलेंगी जो सरकार चाहेगी। गुजराल साहब पर पूरी तरह से अघोषित सेंसरशिप थोपने और मीडिया को कंट्रोल करने का भारी दबाव बनाया गया।

लेकिन उसूलों के इस पक्के सिपाही ने साफ कह दिया, “सॉरी, मैं ये सब नहीं कर सकता।” उन्होंने मीडिया का गला घोंटने और इस असंवैधानिक काम का हिस्सा बनने से सीधा इंकार कर दिया।

अब ज़ाहिर सी बात है, उस दौर में संजय गांधी की बात टालने का सीधा सा मतलब था कुर्सी से हाथ धोना। गुजराल साहब से उनका मंत्रालय तुरंत छीन लिया गया।

सज़ा के तौर पर उन्हें राजनीति के मुख्य पटल से हटाकर मॉस्को (रूस) का राजदूत बनाकर भेज दिया गया।

पर वो कहते हैं ना की हीरा जहां भी जाता है, अपनी चमक बिखेर ही देता है! उन्होंने इस ‘सज़ा’ को भी देश के बहुत बड़े फायदे में बदल दिया।

रूस में रहकर उन्होंने भारत और सोवियत संघ के रिश्तों की डोर को इतनी मज़बूती दी की वो आने वाले दशकों तक भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ।

कुर्सी गई तो गई, लेकिन उसूलों से कोई समझौता नहीं किया!

अमेरिका और महाशक्तियों के भारी दबाव के बीच सीना तानकर खड़े रहे गुजराल और नहीं आने दी भारत के परमाणु प्रोजेक्ट पर आंच

ज़रा 1996 के उस दौर की कल्पना कीजिए। दुनिया में सिर्फ एक ही बॉस बचा था, और वो था अमेरिका। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पूरी दुनिया के देशों की बांह मरोड़ कर उनसे ‘व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि’ (CTBT) पर दस्तखत करवा रहे थे।

अमेरिका का सीधा सा फंडा था- जो इस संधि पर साइन करेगा वो हमारा दोस्त, और जो नहीं करेगा उसे हम दुनिया से अलग-थलग कर देंगे, उस पर भारी आर्थिक पाबंदियां (Sanctions) लगा देंगे।

उस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था कोई बहुत मज़बूत स्थिति में नहीं थी। हम अभी-अभी 1991 के आर्थिक संकट से उबर कर उठ ही रहे थे। अमेरिका को लगा की भारत को डराना-धमकाना बहुत आसान है।

वॉशिंगटन से लेकर जेनेवा तक, भारत पर इतना भयंकर दबाव बनाया जा रहा था की कोई आम नेता होता तो डर के मारे कबका कागज़ों पर साइन कर चुका होता।

लेकिन उस वक्त भारत के विदेश मंत्री (और फिर बाद में प्रधानमंत्री) की कुर्सी पर इंद्र कुमार गुजराल बैठे थे। वो बाहर से जितने सौम्य दिखते थे, अंदर से कूटनीति के उतने ही बड़े और पक्के खिलाड़ी थे।

जेनेवा के अंतरराष्ट्रीय मंच पर जब दुनिया भर के कैमरे गुजराल साहब पर टिके थे, तब उन्होंने सीना तानकर अमेरिका की आँखों में आँखें डालीं और बिल्कुल दो-टूक शब्दों में कह दिया- “हम सीटीबीटी पर साइन नहीं करेंगे।”

उनका तर्क इतना ज़बरदस्त और तार्किक था की अमेरिका के पास कोई जवाब नहीं बचा। गुजराल साहब ने साफ कहा की आपकी ये जो संधि है ना, ये पूरी तरह से ‘भेदभावपूर्ण’ (Discriminatory) है।

मतलब, अमेरिका, रूस, चीन जैसे जो ‘परमाणु संपन्न’ देश (P5) हैं, वो तो अपने खूंखार परमाणु हथियारों का जखीरा सीने से लगाकर बैठे रहेंगे, और भारत जैसे शांतिप्रिय देशों से आप कह रहे हैं की हम अपने हाथ-पैर बांध लें?

ये तो वही बात हो गई की आप खुद तो घी-मलाई खाएं और हमसे कहें की सूखी रोटी भी मत चबाओ!

गुजराल साहब ने पूरी दुनिया को संदेश दे दिया की भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई भी समझौता नहीं करेगा, चाहे इसके लिए अमेरिका हम पर कितने भी प्रतिबंध क्यों न लगा दे।

अगर गुजराल ने वो कड़क फैसला ना लिया होता तो शायद कभी नहीं हो पाता अटल जी का ऐतिहासिक पोखरण परमाणु परीक्षण

ये वो हिस्सा है जो हर सच्चे हिंदुस्तानी को ज़रूर पढ़ना और समझना चाहिए। हम सब 1998 के उस ऐतिहासिक दिन पर बहुत गर्व करते हैं जब अटल बिहारी वाजपेयी जी ने राजस्थान के पोखरण में परमाणु बम का परीक्षण (Pokhran-II) करके पूरी दुनिया के सामने भारत का डंका बजा दिया था।

लेकिन ज़रा एक पल के लिए सोचिए… अगर 1996 में आई. के. गुजराल अमेरिकी दबाव में टूट गए होते? अगर उन्होंने डरकर सीटीबीटी (CTBT) के कागज़ों पर साइन कर दिए होते, तो क्या होता?

अगर ऐसा हो गया होता, तो भारत के परमाणु परीक्षण के सारे दरवाज़े हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाते। हम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाते की अटल जी चाहकर भी 1998 में वो ब्रह्मास्त्र नहीं चला पाते।

गुजराल साहब की उसी ऐतिहासिक और अडिग ‘ना’ का नतीजा था की भारत का परमाणु विकल्प (Nuclear Option) एकदम खुला और सुरक्षित रहा।

उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम के इर्द-गिर्द ऐसी अभेद्य कूटनीतिक ढाल बना दी थी, जिसे अमेरिका चाहकर भी नहीं भेद पाया।

उन्होंने अटल जी के लिए इतिहास के कैनवास को बिल्कुल साफ छोड़ दिया था, ताकि सही वक्त आने पर वो पोखरण का धमाका कर सकें।

ज़रा इस बात की गहराई को महसूस कीजिए! गुजराल साहब एक अलग राजनीतिक विचारधारा (संयुक्त मोर्चा/जनता दल) से आते थे और अटल जी बिल्कुल अलग विचारधारा (बीजेपी) से।

आज के दौर में जहां नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए देश का नुकसान तक करने से नहीं हिचकिचाते, वहां गुजराल साहब ने ‘देश पहले, राजनीति बाद में’ की ऐसी शानदार मिसाल पेश की, जिसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।

जब 1998 में अटल जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो उन्हें पता था की गुजराल साहब ने देश की सुरक्षा की जो विरासत उन्हें सौंपी है, वो कितनी अनमोल है।

ये कोई छोटी बात नहीं है की दो अलग-अलग ध्रुवों के नेताओं ने देश को महाशक्ति बनाने के लिए एक-दूसरे के काम को चुपचाप आगे बढ़ाया। यही वो असली देशभक्ति है जो कागज़ों पर नहीं, बल्कि नेताओं के फैसलों में छलकती है।

बड़ा भाई बनकर पड़ोसियों का जीता दिल और ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ से दुनिया को सिखाया कूटनीति का असली मतलब

बात जब विदेश नीति (Foreign Policy) की आती है ना, तो पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में भारत के इस सपूत का नाम आज भी बहुत अदब से लिया जाता है।

गुजराल साहब का मानना था की अगर आपको दुनिया में महाशक्ति बनना है, तो सबसे पहले आपके अपने पड़ोसियों के साथ रिश्ते मज़बूत होने चाहिए।

इसी सोच से जन्म हुआ इतिहास के उस सबसे मशहूर मास्टरप्लान का, जिसे पूरी दुनिया आज ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ (Gujral Doctrine) के नाम से जानती है।

अब आप सोचेंगे की ये डॉक्ट्रिन आखिर था क्या? दरसअल, इसका सीधा सा उसूल था- ‘बड़े भाई की भूमिका’ (Non-reciprocity)।

गुजराल साहब ने तय किया की भारत दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा, सबसे ताकतवर और सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश है। इसलिए, हम अपने छोटे पड़ोसियों (जैसे- नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका) की बिना किसी स्वार्थ के मदद करेंगे।

हम उन्हें जो देंगे, उसके बदले में तुरंत उनसे किसी फायदे की उम्मीद नहीं रखेंगे। एक बड़े भाई की तरह हम उनका हाथ पकड़ेंगे।

ये कोई हवा-हवाई बात नहीं थी, उन्होंने इसे ज़मीन पर उतार कर दिखाया। ज़रा याद कीजिए, बांग्लादेश के साथ गंगा नदी के पानी के बंटवारे का विवाद कई दशकों से नासूर बना हुआ था।

दोनों देशों के बीच कड़वाहट बढ़ती जा रही थी। लेकिन 1996 में जब गुजराल साहब ने अपनी कूटनीति का जादू चलाया, तो दशकों पुराना वो विवाद महज़ 3 महीने के भीतर सुलझ गया!

भारत और बांग्लादेश के बीच ’30 वर्षीय ऐतिहासिक गंगा जल समझौता’ साइन हो गया, जिसने दोनों देशों के रिश्तों में एक नई जान फूंक दी।

नेपाल के साथ भी पानी को लेकर काफी मनमुटाव रहता था। गुजराल साहब ने वहां भी अपना ‘बड़ा भाई’ वाला रवैया अपनाया और नेपाल के साथ महाकाली नदी पर पानी और पनबिजली (Hydel Power) का एक बेहद शानदार समझौता कर डाला।

उन्होंने श्रीलंका, भूटान और मालदीव को ये भरोसा दिलाया की भारत उनकी संप्रभुता (Sovereignty) का पूरा सम्मान करता है और उनके आंतरिक मामलों में कभी दखल नहीं देगा।

उन्होंने दुनिया को सिखा दिया की छोटे पड़ोसियों को डरा-धमका कर नहीं, बल्कि प्यार, भरोसे और सम्मान से अपना बनाया जाता है।

सियासत के सिकंदर जिनकी दूरदर्शिता और देशभक्ति का कर्जदार हमेशा रहेगा हिंदुस्तान

आज के इस दौर में, जहाँ राजनीति का मतलब सिर्फ एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना, गाली-गलौज करना और निजी दुश्मनी निकालना रह गया है, वहां गुजराल साहब एक ताज़ी हवा के झोंके की तरह थे।

वो एक ऐसे इंसान थे जिनका पूरी सियासत में कोई दुश्मन न था।

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, हर विचारधारा का नेता उनके सामने सिर झुकाकर और पूरे सम्मान से बात करता था।

वो ‘जेंटलमैन पॉलिटिक्स’ (Gentleman Politics) के आखिरी स्तंभों में से एक थे।

30 नवंबर 2012 को इस महान शख्सियत ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। वो खामोशी से आए, खामोशी से अपना काम किया और एक ऐसी सुनहरी और मज़बूत विदेश नीति भारत को सौंप गए, जिस पर आज भी हमारा देश शान से चल रहा है।

गुजराल साहब की ज़िंदगी हमें सिखाती है की देश चलाने के लिए हमेशा ऊंची आवाज़ या आक्रामक तेवर की ज़रूरत नहीं होती।

कभी-कभी एक शांत, सौम्य और दूरदर्शी इंसान भी अपने फैसलों से वो लकीर खींच देता है, जिसे दुनिया की कोई भी महाशक्ति मिटा नहीं सकती।

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