जिनके एक इशारे पर पूरे हिंदुस्तान ने छोड़ दिया था एक वक़्त का खाना, श्वेत और हरित क्रांति से देश की तकदीर बदलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री ‘लाल बहादुर शास्त्री’ जी को 122वीं जयंती पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि

आज 2 अक्टूबर है… और आज मिट्टी के उस लाल की 122वीं जयंती है, जिसके एहसानों का कर्ज़ ये देश शायद सात जन्मों तक नहीं चुका सकता।

हम बात कर रहे हैं हमारे पूर्व प्रधानमंत्री ‘लाल बहादुर शास्त्री’ जी की। एक ऐसा इंसान जो दिल्ली के एलीट (Elite) घराने से निकलकर पीएम की कुर्सी पर नहीं बैठा था।

वो तो खेतों की पगडंडियों, गांव की धूल और गरीबी की भट्ठी में तपकर निकला हुआ वो फौलाद था, जिसकी रगों में विशुद्ध हिंदुस्तान बहता था।

आजकल के नेताओं को देखिए, ज़रा सी पावर आते ही उनके तेवर बदल जाते हैं, आस-पास ब्लैक कैट कमांडो घूमने लगते हैं और वो आम जनता से कोसों दूर हो जाते हैं।

लेकिन शास्त्री जी? वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर भी ठेंठ देहाती और सच्चे हिंदुस्तानी ही रहे। कद भले ही उनका छोटा था, लेकिन उनका सीना हिमालय से भी चौड़ा था।

नदी तैरकर स्कूल जाने वाले उस गरीब लड़के की कहानी जिसने अपनी जाति त्याग कर सिर्फ शास्त्री कहलाना पसंद किया

2 अक्टूबर 1904 को मुग़लसराय के एक बेहद साधारण परिवार में इस गुदड़ी के लाल का जन्म हुआ था। किस्मत की मार देखिए, बच्चा अभी डेढ़ साल का ही था कि सिर से पिता (शारदा प्रसाद श्रीवास्तव) का साया हमेशा के लिए उठ गया।

घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा। मां रामदुलारी देवी ने जैसे-तैसे अपने इस लाल को पाला।

शास्त्री जी के बचपन का वो किस्सा सुनकर तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बात उन दिनों की है जब वो स्कूल में पढ़ते थे। स्कूल जाने के लिए उन्हें रोज़ उफनती हुई गंगा नदी पार करनी पड़ती थी।

एक दिन ऐसा आया जब उनके पास नाव वाले को किराया देने के लिए एक ‘आना’ (पैसे) भी नहीं था। उस उम्र का कोई और बच्चा होता तो शायद किसी दोस्त से मांग लेता या नाव वाले के आगे हाथ जोड़ लेता।

लेकिन नहीं! उस दुबले-पतले लड़के के अंदर का स्वाभिमान इतना बड़ा था की उसने किसी के आगे हाथ फैलाना गवारा नहीं किया।

उस छोटे से बच्चे ने अपने कपड़े उतारे, उन्हें अपने सिर पर कसकर बांधा, और सीधे गंगा की तेज़ धार में छलांग लगा दी! सोचिए ज़रा, मीलों चौड़ी गंगा नदी, तेज़ बहाव…

और एक नन्हा सा लड़का सिर्फ अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए उस नदी को तैरकर पार कर रहा है! जो इंसान बचपन में ही गंगा की लहरों से टकराना सीख गया हो, वो बड़ा होकर अमेरिका या पाकिस्तान की धमकियों से क्या खाक डरेगा?

और तो और, इस बंदे की सोच देखिए। बचपन में उनका असली नाम ‘लाल बहादुर श्रीवास्तव’ था। लेकिन जब वो बड़े हुए और उन्होंने काशी विद्यापीठ से अपनी पढ़ाई पूरी की, तो उन्होंने समाज में फैले इस जाति-पाति के ज़हर पर एक बहुत गहरी चोट की।

उन्होंने हमेशा के लिए अपने नाम के आगे से ‘श्रीवास्तव’ हटा दिया! उन्होंने विद्यापीठ से मिली ‘शास्त्री’ की उपाधि को ही अपनी पहचान बना लिया।

आजकल के छोटे-मोटे नेता जहां वोट बैंक के लिए दिन-रात जाति का कार्ड खेलते हैं, वहां इस इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ एक पहचान के साथ गुज़ार दी- ‘एक सच्चा हिंदुस्तानी’।

एक फकीर इंसान जो पहुँच गया सीधा देश की सबसे बड़ी प्रधानमंत्री की गद्दी पर

ज़रा ये जान लीजिए की ये फकीर इंसान आखिर देश की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचा कैसे? शास्त्री जी का नाम आसमान से नहीं टपका था, बल्कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई से लेकर आज़ाद भारत की सियासत तक खुद को भट्ठी में तपाया था।

आज़ादी के आंदोलनों में करीब 9 साल जेल की काल-कोठरी में काटने वाले शास्त्री जी को राजनीति और प्रशासन का ज़बरदस्त तजुर्बा था।

वो जवाहरलाल नेहरू के कैबिनेट में सबसे भरोसेमंद ‘ट्रबलशूटर’ (Troubleshooter) माने जाते थे।मई 1964 में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू का अचानक निधन हुआ, तो पूरे देश में एक सन्नाटा छा गया था।

सबके मन में एक ही सवाल था की “अब देश कौन चलाएगा?”

उस समय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के. कामराज (K. Kamaraj) ने ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाई। जब उन्होंने पार्टी और पूरे देश का मूड भांपा, तो सबकी सुई एक ही बेदाग, ईमानदार और सर्वमान्य नेता पर आकर रुक गई।

9 जून 1964 को बिना किसी तिकड़म, बिना किसी गुटबाज़ी के, इस गुदड़ी के लाल ने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

वो प्रधानमंत्री जिसने कार खरीदने के लिए बैंक से कर्ज़ा लिया और फटे कुर्ते को कोट के नीचे छिपाकर देश चलाया

वो देश के प्रधानमंत्री जरूर बने, लेकिन मरते दम तक उनके पास अपना खुद का एक अदद मकान तक नहीं था!

जब वो प्रधानमंत्री थे, तो घर में बच्चों ने ज़िद पकड़ ली की “बाबूजी, अब तो हम पीएम हाउस में रहते हैं, हमारे पास भी अपनी एक कार होनी चाहिए।”

बच्चों की ज़िद के आगे पिता पिघल गए। पता किया गया तो उस ज़माने में एक फिएट (Fiat) कार की कीमत लगभग 12,000 रुपये थी। देश के प्रधानमंत्री ने अपना बैंक खाता चेक किया, तो उसमें सिर्फ 7,000 रुपये निकले!

क्या आप इमेजिन कर सकते हैं? एक देश का सबसे ताकतवर आदमी, जिसके इशारे पर अरबों का बजट पास होता हो, वो अपने बच्चों के लिए एक 12 हज़ार की कार नहीं खरीद पा रहा था।

फिर क्या हुआ? देश के प्रधानमंत्री ने बाकायदा पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में आम आदमी की तरह अर्ज़ी लगाई और 5,000 रुपये का कार लोन लिया!

और सबसे रुला देने वाली बात तो ये है की वो लोन चुकाने से पहले ही शास्त्री जी ताशकंद में हमेशा के लिए आंखें मूंद गए। उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी, माता ललिता शास्त्री जी ने अपनी पेंशन के पैसों से बैंक का वो कर्ज़ा पाई-पाई करके चुकाया था।

उनकी सादगी का एक और वाकया सुनेंगे तो सच में आंखें भर आएंगी। शास्त्री जी अक्सर फटे हुए कुर्ते पहना करते थे। जब उनके आस-पास के लोग या परिवार वाले टोकते की “बाबूजी, आप देश के प्रधानमंत्री हैं, ये फटे कपड़े पहनकर बाहर जाएंगे तो लोग क्या कहेंगे?”

तो वो बड़ी मासूमियत से मुस्कुराते हुए जवाब देते- “अरे भाई, इसे मैं कोट के नीचे पहन लूंगा, कौन देखने वाला है? ये खादी देश के गरीब किसानों की मेहनत से बनती है, इसका एक धागा भी बर्बाद नहीं होना चाहिए।”

जब उनका कोई कुर्ता कॉलर या कफ से पूरी तरह फट जाता था, तो ललिता जी उस बचे हुए कपड़े को काटकर उनके लिए रुमाल बना दिया करती थीं।

उनके पास कोई भारी-भरकम सिक्योरिटी का तामझाम नहीं था। वो दिल्ली की सड़कों पर अक्सर एक खुली जीप में ही निकल जाया करते थे।

वो वाक़ई में इस देश के सबसे बड़े ‘फकीर’ थे, जिन्होंने खुद को निचोड़ कर सिर्फ और सिर्फ इस भारत माता की सेवा में लगा दिया।

अमेरिका की धौंस और सड़ा हुआ गेंहू ठुकरा कर उस 56 इंच के सीने वाले नेता ने पूरे देश को उपवास करना सिखाया

 

भाई साहब, एक नेता वो होता है जो कुर्सी बचाने के लिए किसी भी विदेशी ताकत के आगे घुटने टेक देता है, और एक नेता वो होता है जो भूखा मर जाना पसंद करता है लेकिन देश का सिर कभी झुकने नहीं देता।

1965 का वो दौर हिंदुस्तान के इतिहास का सबसे मुश्किल दौर था। एक तरफ हम सीमाओं पर युद्ध के मुहाने पर खड़े थे, और दूसरी तरफ देश के अंदर भयंकर सूखा पड़ा हुआ था।

बारिश नहीं हुई थी और खेतों में अनाज का एक दाना तक पैदा नहीं हुआ था। देश के सामने भुखमरी का सबसे बड़ा संकट खड़ा था।

उस वक्त भारत अपने अनाज के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर था। अमेरिका हमें ‘पीएल-480’ (PL-480) स्कीम के तहत गेंहू भेजता था।

आपको जानकर हैरानी होगी और शायद गुस्सा भी आएगा की वो कोई बढ़िया गेंहू नहीं था। वो लाल रंग का एकदम सड़ा हुआ गेंहू हुआ करता था, जिसे अमेरिका में लोग खुद नहीं खाते थे बल्कि अपने सुअरों को खिलाते थे!

लेकिन मजबूरी इतनी थी की हमारे देश की जनता को वही गेंहू खाकर अपना पेट भरना पड़ रहा था।

उसी दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन (Lyndon B. Johnson) को लगा की भारत तो अब पूरी तरह से हमारे टुकड़ों पर पल रहा है।

उसने शास्त्री जी को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। अमेरिका चाहता था की भारत उसकी विदेश नीतियों के हिसाब से चले। लिंडन जॉनसन ने सीधे-सीधे धमकी दे दी कि अगर भारत ने हमारी बात नहीं मानी, तो हम जो गेंहू के जहाज़ भेज रहे हैं, उन्हें समंदर में ही रोक देंगे।

सोचिए, एक महाशक्ति हमारे देश के प्रधानमंत्री को भूख का डर दिखाकर झुकाना चाह रही थी!

लेकिन लिंडन जॉनसन ये भूल गया था की सामने कोई कमज़ोर नेता नहीं, बल्कि गंगा की लहरों को चीरकर बड़ा हुआ लाल बहादुर शास्त्री खड़ा है!

उस 56 इंच के असली सीने वाले प्रधानमंत्री ने अमेरिका की उस धौंस को उसके मुंह पर दे मारा। उन्होंने साफ कह दिया की “हम हिंदुस्तानी भूखे रह लेंगे, घास की रोटी खा लेंगे, लेकिन किसी विदेशी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे और ना ही अपने देश का स्वाभिमान बेचेंगे।”

शास्त्री जी ने तय किया की वो पूरे देश से अपील करेंगे कि हफ्ते में एक दिन (सोमवार की शाम) कोई भी अपने घर में खाना नहीं खाएगा।

लेकिन ज़रा इस इंसान का जज़्बा और ईमानदारी देखिए यार! दिल्ली के रामलीला मैदान से पूरे देश को उपवास का संदेश देने से पहले, उन्होंने सोचा की “क्या मैं जो देश से मांगने जा रहा हूँ, वो मेरा खुद का परिवार कर सकता है?”

उन्होंने एक दिन अपनी पत्नी ललिता शास्त्री जी को बुलाया और कहा- “सुनो, आज शाम को घर में चूल्हा मत जलाना। मैं देखना चाहता हूँ की क्या मेरे अपने बच्चे एक दिन की भूख सह सकते हैं या नहीं? अगर मेरे बच्चे भूखे रह सकते हैं, तभी मुझे हक़ है की मैं पूरे देश के बच्चों को भूखा रहने के लिए कहूँ।”

सच कहूं तो, आज के इस दौर में ऐसा नेता ढूंढे से भी नहीं मिलेगा, जो देश की जनता से कुछ मांगने से पहले अपने ही बच्चों को आज़माइश की भट्ठी में झोंक दे।

जब उनके बच्चों ने वो उपवास सफलतापूर्वक पूरा कर लिया, तब जाकर शास्त्री जी ने रेडियो और रामलीला मैदान से पूरे देश से अपील की।

और यकीन मानिए दोस्त, उस एक आवाज़ का ऐसा भयंकर असर हुआ की कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, पूरे हिंदुस्तान ने एक साथ सोमवार की शाम का खाना छोड़ दिया।

होटलों और ढाबों ने सोमवार शाम को अपने शटर गिराने शुरू कर दिए। देश की जनता ने साबित कर दिया की जब नेता सच्चा हो, तो ये देश उसके एक इशारे पर अपनी जान भी निकाल कर रख सकता है।

भुखमरी के मुहाने पर खड़े हिंदुस्तान की तकदीर बदलने वाली हरित और श्वेत क्रांति की वो ऐतिहासिक नींव

उपवास और भूख सहना तो सिर्फ एक फौरी इलाज था। शास्त्री जी की दूरदृष्टि बहुत गहरी थी। उन्हें समझ आ गया था की अगर हिंदुस्तान को सच में एक आज़ाद और ताकतवर मुल्क बनकर खड़ा होना है, तो हमें अनाज और दूध के मामले में किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना होगा।

हमें खुद आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा।

यहीं से शुरुआत हुई देश की तकदीर बदलने वाली ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) की। शास्त्री जी ने महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan) को अपने ऑफिस में बुलाया और उन्हें पूरी छूट दे दी की “आप जो चाहे करें, जितना बजट चाहिए लें, लेकिन मुझे मेरे देश के खेतों में अनाज चाहिए।”

शास्त्री जी का वो नारा- “जय जवान, जय किसान” कोई खोखला चुनावी जुमला नहीं था। उन्होंने वाकई में किसानों के लिए नई नीतियों की झड़ी लगा दी।

किसानों को नए किस्म के हाइब्रिड बीज दिए गए, सिंचाई की व्यवस्था की गई और एमएसपी (MSP) का कॉन्सेप्ट भी उसी दौर में मज़बूत किया गया।

उसी का नतीजा है की जो भारत कभी सड़े हुए अमेरिकी गेंहू का मोहताज था, वो आज पूरी दुनिया को अपना अनाज एक्सपोर्ट कर रहा है।

और बात सिर्फ खेतों तक ही सीमित नहीं रही। 1964 का वो वाकया सुनिए, जिसने देश में ‘श्वेत क्रांति’ (White Revolution) की नींव रखी।

शास्त्री जी गुजरात के कैरा ज़िले (आणंद) के दौरे पर गए थे। आज का कोई VIP नेता होता तो सर्किट हाउस में रुकता, AC कमरे में सोता और शानदार दावत उड़ाता।

लेकिन शास्त्री जी ने सारे वीआईपी प्रोटोकॉल तोड़ दिए। उन्होंने कहा की “मैं किसानों के बीच उन्हीं के गांव में रुकूंगा।”

वो रात के दो-दो बजे तक किसानों के बीच बैठते, उनकी समस्याएं सुनते। वहीं उनकी मुलाकात वर्गीज़ कुरियन (Verghese Kurien) से हुई।

देश के प्रधानमंत्री ने ज़मीन पर बैठकर किसानों के साथ बाजरे की रोटी और लहसुन की चटनी खाई। उसी आणंद के दौरे के बाद शास्त्री जी ने ‘राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड’ (NDDB) की स्थापना की।

उन्होंने कुरियन को ज़िम्मेदारी दी की जो मॉडल यहाँ आणंद में चल रहा है, उसे पूरे देश में लागू करो।

दोस्त, उसी दिन ‘अमूल’ (Amul) की वो ऐतिहासिक नींव रखी गई थी, जिसने भारत को दूध की कमी वाले देश से निकालकर आज दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक (Milk Producer) देश बना दिया है।

जो अमूल का दूध आज आप और हम पीते हैं ना, वो उसी 5 फुट के प्रधानमंत्री की उस दूरदृष्टि का नतीजा है, जिसने ज़मीन पर बैठकर इस देश की रगों को पहचाना था।

जब 1965 की जंग में पाकिस्तान को दिन में तारे दिखाए और भारतीय सेना को लाहौर तक तिरंगा फहराने की खुली छूट दी

साल 1962 में चीन से मिले धोखे और हार के बाद पूरे देश का मोरल डाउन था। भारतीय सेना के हौसले पस्त थे और देश अभी उस सदमे से उबर भी नहीं पाया था।

इसी बात का फायदा उठाने की सोची पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने। अयूब खान को लगा की जवाहरलाल नेहरू के बाद जो ये नया प्रधानमंत्री (लाल बहादुर शास्त्री) आया है, इसका कद तो बहुत छोटा है, ये बहुत सीधा-साधा है, ये क्या ही लड़ेगा!

उसी घमंड में चूर होकर 1965 में पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ लॉन्च कर दिया। पाकिस्तानी सेना और आतंकियों ने गुपचुप तरीके से कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी।

लेकिन अयूब खान ये भूल गया था की अब दिल्ली की कुर्सी पर कोई शांति का कबूतर उड़ाने वाला नेता नहीं बैठा है, बल्कि मुग़लसराय की भट्ठी में तपा हुआ वो फौलाद बैठा है, जो ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, बल्कि सीधे बम से देना जानता है!

जब कश्मीर में हालात बिगड़ने लगे, तो शास्त्री जी ने तुरंत रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण और आर्मी चीफ जनरल जयंतो नाथ चौधरी को अपने ऑफिस में बुलाया।

आर्मी चीफ ने हालात बताए। उस 5 फुट के प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी से उठकर जो आदेश दिया, उसने भारतीय सेना के अंदर जैसे बारूद भर दिया।

शास्त्री जी ने जनरल चौधरी की आँखों में आँखें डालकर सीधे कहा- “जनरल साहब, आप सिर्फ कश्मीर में क्यों लड़ रहे हैं? अगर पाकिस्तान कश्मीर की तरफ बढ़ रहा है, तो आप अपनी फौज लेकर इंटरनेशनल बॉर्डर पार कीजिए और सीधे लाहौर की तरफ कूच कर जाइए! अब जवाब गोली से दिया जाएगा।”

ज़रा सोचिए उस पल को! आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी राजनेता ने भारतीय सेना को दुश्मन के घर में घुसकर मारने की इतनी बड़ी ‘फ्री हैंड’ (खुली छूट) दी थी।

शास्त्री जी का इशारा मिलते ही भारतीय सेना के टैंकों ने वो दहाड़ मारी की पाकिस्तान की ज़मीन कांप उठी। हमारे वीर जवानों ने पंजाब के रास्ते सीधा इंटरनेशनल बॉर्डर पार कर दिया और पाकिस्तान के अंदर घुस गए।

अमेरिका के जिन ‘अजेय’ पैटन टैंकों (Patton Tanks) पर पाकिस्तान को बड़ा घमंड था, भारतीय सेना ने असल उत्ताड़ (Asal Uttar) के युद्ध में उन टैंकों का ऐसा कब्रिस्तान बनाया की आज भी पाकिस्तानी जनरलों की रूह कांप जाती है।

हमारी फौज पाकिस्तान को रौंदते हुए लाहौर के बाहरी इलाके यानी ‘इछोगिल नहर’ तक जा पहुंची थी! लाहौर एयरपोर्ट पर भारतीय सेना के तोपखाने आग बरसा रहे थे।

पाकिस्तान की हवा टाइट हो गई और जो अयूब खान कुछ दिन पहले कश्मीर उड़ाने का सपना देख रहा था, वो घुटनों के बल बैठकर दुनिया से सीज़फायर (Ceasefire) की भीख मांगने लगा।

उसी दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान से शास्त्री जी की वो सिंहगर्जना गूंजी थी- “जय जवान, जय किसान!” इस एक नारे ने बॉर्डर पर लड़ रहे जवानों की बंदूकों में आग भर दी थी और खेतों में काम कर रहे किसानों की कुदालों में जान फूंक दी थी।

दुनिया ने देख लिया था की भारत का ये ‘छोटा सा’ प्रधानमंत्री दरअसल कितने बड़े जिगरे वाला इंसान है।

ताशकंद की वो मनहूस सर्द रात और मौत का वो सबसे गहरा रहस्य जिसने भारत माता से उसका सबसे अनमोल रत्न छीन लिया

जंग तो हमने जीत ली थी, लेकिन असली साज़िश तो जंग के बाद रची जानी थी। 1965 के उस युद्ध के बाद सोवियत संघ (आज का रूस) के भारी दबाव में शांति वार्ता के लिए शास्त्री जी को जनवरी 1966 में उज़्बेकिस्तान के ‘ताशकंद’ जाना पड़ा।

वहां रूस के प्रधानमंत्री कोसिगिन और पाकिस्तान के अयूब खान मौजूद थे।

शास्त्री जी ताशकंद समझौते की मेज़ पर बैठे तो ज़रूर थे, लेकिन उनका दिल गवाही नहीं दे रहा था। वो किसी भी कीमत पर कश्मीर का जीता हुआ ‘हाजी पीर पास’ (Haji Pir Pass) पाकिस्तान को वापस नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वो ज़मीन हमारे जवानों ने अपना खून बहाकर जीती थी।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भारी विदेशी दबाव के आगे उन्हें बहुत ही भारी मन से 10 जनवरी 1966 को उस समझौते पर साइन करने पड़े।

और फिर आई 11 जनवरी 1966 की वो मनहूस और काली सर्द रात… जिसने पूरे हिंदुस्तान की धड़कनें रोक दीं। अचानक खबर आई की भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का ताशकंद में ‘हार्ट अटैक’ से निधन हो गया है।

लेकिन क्या वो सच में हार्ट अटैक था? जब शास्त्री जी का पार्थिव शरीर दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उतारा गया, तो वहां मौजूद उनके परिवार और करीबियों की चीखें निकल गईं।

शास्त्री जी का शरीर पूरा नीला पड़ चुका था! उनके चेहरे और शरीर पर सफ़ेद धब्बे थे। सबसे हैरान करने वाली बात ये थी की उनके पेट और गर्दन के पीछे कट के गहरे निशान थे, जिनसे खून रिस रहा था।

कोई भी मेडिकल साइंस का जानकार बता देगा की हार्ट अटैक से मरने वाले इंसान का शरीर कभी नीला नहीं पड़ता। उनकी धर्मपत्नी माता ललिता शास्त्री जी रो-रोकर चीख रही थीं की “मेरे पति को ज़हर (Poison) देकर मारा गया है!” उनके शरीर पर वो कट के निशान कैसे आए?

लेकिन उस समय के ‘सिस्टम’ की बेशर्मी और गद्दारी देखिए यार! एक देश का प्रधानमंत्री विदेश की धरती पर संदिग्ध हालत में मारा जाता है, उसका पूरा शरीर नीला पड़ा हुआ है, परिवार चीख-चीख कर हत्या की जांच की मांग कर रहा है…

लेकिन फिर भी सरकार ने उनका ‘पोस्टमॉर्टम’ (Post-mortem) तक नहीं कराया! क्यों? आखिर ऐसा क्या राज़ था जो पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में सामने आ जाता? आखिर वो कौन लोग थे जिन्हें शास्त्री जी की मौत का सबसे ज्यादा फायदा मिलने वाला था?

बाद में राज नारायण समिति भी बनी, लेकिन उस जांच समिति की रिपोर्ट आज तक रहस्यमय तरीके से गायब है।

खैर… भले ही आज वो हमारे बीच नहीं हैं, भले ही इस सिस्टम ने उन्हें भुलाने की कितनी भी कोशिश की हो, लेकिन सच्चाई ये है की जब तक गंगा की धार बहती रहेगी, जब तक हिंदुस्तान के खेत लहलहाते रहेंगे, और जब तक हमारी सेना की रगों में खून दौड़ता रहेगा… लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम इस देश के चप्पे-चप्पे में गूंजता रहेगा।

उन्हें हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

जय जवान! जय किसान! जय हिन्द!

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