जब भी हम न्याय, समानता और अधिकारों की बात करते हैं, तो हमें लगता है की कानून की आंखों पर जो पट्टी बंधी है, वो इसलिए है ताकि वो अमीर-गरीब या जात-पात का फर्क न कर सके।
लेकिन आज के समय में ज़मीनी हकीकत देखकर ऐसा लगता है की कानून की आंखों से वो पट्टी तो कब की हट चुकी है, और अब हमारा सिस्टम किसी भी इंसान को न्याय देने से पहले उसका ‘जाति प्रमाण पत्र’ (Caste Certificate) मांगता है।
चित्रकूट की जिस पावन धरती पर भगवान राम ने अपने वनवास का समय बिताया था, आज उसी धरती पर हमारे ही सिस्टम ने एक 19 साल के मासूम लड़के को इतना प्रताड़ित कर दिया की उसे मौत को गले लगाना पड़ा।
यह किसी एक लड़के की आत्महत्या नहीं है, यह उस पूरे सिस्टम का पर्दाफाश है, जो SC/ST Act की आड़ में चल रहे खुले ब्लैकमेल और वसूली के धंधे पर चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

न्याय के तराजू में SC/ST Act का खेल और चित्रकूट के 19 वर्षीय मासूम देवा की खामोश चिता
तारीख थी 27 सितंबर 2026 की दरमियानी रात। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले का मानिकपुर थाना क्षेत्र और गांव का नाम लड़चपा (पतेरिया मजरा)।
इस गांव के एक साधारण से परिवार में पलने वाले 19 साल के देवा द्विवेदी ने फांसी का फंदा लगाया और हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं।
ज़रा सोचिए, 19 साल की उम्र होती ही क्या है? अभी तो उसने ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी। अभी तो उसके सपनों ने उड़ान भरनी शुरू ही की थी।
लेकिन ऐसा क्या हुआ की एक हंसते-खेलते नौजवान को अपनी ज़िंदगी इतनी बोझिल लगने लगी कि उसने मौत का रास्ता चुन लिया?
इस दर्दनाक मौत के पीछे की कहानी जुलाई 2026 से शुरू होती है। गांव में अक्सर लड़कों के बीच या पड़ोसियों के बीच छोटी-मोटी कहासुनी हो जाती है।
हमारे देश के गांवों में ये बहुत आम बात है, जिसे अक्सर गांव के बड़े-बुजुर्ग दो डांट लगाकर सुलझा देते हैं। जुलाई में देवा का भी किसी से कोई ऐसा ही मामूली सा विवाद हुआ था।
लेकिन आज के दौर में विवाद सुलझाए नहीं जाते, बल्कि सामने वाले की ज़िंदगी बर्बाद करने का मौका ढूंढा जाता है।
विरोधी पक्ष ने इस मामूली सी बहस को हथियार बनाया और देवा के खिलाफ सीधे SC/ST Act और बीएनएस (BNS) की संगीन धाराओं में मुकदमा (मुकदमा संख्या 108/2026) ठोक दिया।
यहीं से शुरू हुआ देवा की मानसिक प्रताड़ना का वो खौफनाक दौर, जिसने उसकी जान ले ली। देवा कोई क्रिमिनल या हिस्ट्रीशीटर नहीं था जो पुलिस और कचहरी के चक्करों का आदी हो। वो एक सीधा-साधा लड़का था।
उसके दिमाग में पुलिस की वर्दी का खौफ, रातों-रात बिना जांच के गिरफ्तारी का डर, और समाज में एक झूठे मुकदमे की वजह से होने वाली बदनामी इस कदर बैठ गई की वो गहरे डिप्रेशन में चला गया।
और आखिरकार तंग आकर उसने फांसी लगा ली।
परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। वे चीख-चीख कर कह रहे हैं की उनका बच्चा बिल्कुल बेकसूर था, उसे सिर्फ आपसी रंजिश में इस खौफनाक कानून का इस्तेमाल करके फंसाया गया था।
लेकिन पुलिस का रवैया देखिए। जब एक 19 साल के मासूम की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई है, तब चित्रकूट पुलिस के अधिकारी कैमरे पर आकर बड़े रूखेपन से रटा-रटाया बयान दे रहे हैं की “परिजनों की तहरीर पर मामले की जांच की जा रही है।”
अरे भाई, जब वो बच्चा फ़र्ज़ी SC/ST केस से डिप्रेशन में घुट रहा था, तब आपकी ‘निष्पक्ष जांच’ कहां सो रही थी? क्या सिस्टम को अपनी नींद से जागने के लिए किसी बेगुनाह की लाश का ही इंतज़ार रहता है?
A 19-year-old in Chitrakoot, Uttar Pradesh, died by suicide after an SC/ST Act case was registered against him, with his family saying he had been under severe mental stress.
The family wants authorities to investigate whether the pressure he faced following the case had any… pic.twitter.com/FZ87RaUH5k
— OpIndia.com (@OpIndia_com) September 29, 2026
IIT Bombay के साहिल वाकोडे पर सर पीटने वाले मोमबत्ती गैंग को देवा द्विवेदी क्यों नहीं दिखा
अब ज़रा इस देश के उन तथाकथित ‘मानवाधिकार के ठेकेदारों’ का दोगलापन देखिए। इनकी आंखों में लगा हुआ रडार सिर्फ खास जातियों के मामलों पर ही बीप करता है।
आपको याद होगा, अभी हाल ही में आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) में साहिल वाकोडे नाम के छात्र का एक मामला सामने आया था।
साहिल ने परीक्षा में चीटिंग करते समय पकड़े जाने पर आत्महत्या कर ली थी, और फिर जिस प्रोफेसर ने उसको पकड़ा था, उन पर साहिल के घर वालों ने झूठा SC/ST मुकदमा डाल दिया था
जैसे ही वो मामला मीडिया में आया, रातों-रात पूरे देश में एक भूचाल सा ला दिया गया। रातों-रात सोशल मीडिया पर “All Eyes on IIT Bombay” के बड़े-बड़े हैशटैग ट्रेंड होने लगे।
देश के तमाम विपक्षी नेता अपनी-अपनी गाड़ियां लेकर पीड़ित परिवार के दरवाज़े पर फोटो खिंचवाने पहुंच गए। मोमबत्तियां जल उठीं और पूरा इकोसिस्टम एक्टिव हो गया।
लेकिन… चित्रकूट के देवा द्विवेदी के मामले में क्या हुआ? चारों तरफ शमशान जैसा सन्नाटा!
किसी वामपंथी के मुंह से एक उफ तक नहीं निकली। किसी राजनेता ने देवा की रोती हुई मां के आंसू पोछने की ज़हमत नहीं उठाई। कोई कैंडल मार्च नहीं निकला, ट्विटर पर कोई हैशटैग ट्रेंड नहीं हुआ। आखिर क्यों?
क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि देवा एक ख़ास दलित जाती से नहीं था? क्या इस देश में एक 19 साल के गैर-दलित लड़के की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं है?
क्या उसकी मां के आंसुओं में खारापन नहीं था? जब न्याय और सहानुभूति भी जातियों का चश्मा पहनकर बांटी जाने लगे, तो समझ लीजिए की समाज समानता की तरफ नहीं, बल्कि एक नए किस्म के जातिवाद की तरफ बढ़ रहा है।
एक साल के दूधमुंहे बच्चे से लेकर चोरी पकड़ने वाले मकान मालिक तक को जेल भेजने वाला SC/ST Act टूलकिट
जिस SC/ST Act को समाज के दबे-कुचले लोगों को समानता और सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, आज उसका ग्राउंड रियलिटी पर क्या हश्र हो रहा है, ये किसी से छिपा नहीं है।
हकीकत तो ये है की आज यह कानून सुरक्षा का ढाल कम, और आपसी रंजिश निकालने, ब्लैकमेलिंग करने और वसूली करने का सबसे खतरनाक हथियार (टूलकिट) ज्यादा बन चुका है।
आप ज़रा इसके दुरुपयोग के इन तीन खौफनाक हाल ही के ग्राउंड फैक्ट्स को देखिए!
पहला मामला – एक साल का दूधमुंहा बच्चा बना मुजरिम!
अभी हाल ही की घटना है। आपसी रंजिश के चलते एक ही परिवार के 26 लोगों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत गंभीर मुकदमा दर्ज करा दिया गया। लेकिन हद तो तब पार हो गई जब एफआईआर की कॉपी सामने आई।
उन 26 लोगों के नाम में एक नाम उस छोटे से मासूम बच्चे का भी था, जिसका महज़ 2 दिन पहले ही नामकरण हुआ था!
ज़रा सोचिए, एक साल का बच्चा, जो अभी ठीक से अपनी मां को पहचानना नहीं सीखा, वो पुलिस की फाइलों में किसी के साथ ‘जातिगत भेदभाव’ कर रहा है!
और हमारी पुलिस को देखिए, कानून में ‘तत्काल एफआईआर’ का ऐसा खौफ है की जांच अधिकारी ने यह देखने की भी ज़हमत नहीं उठाई की आरोपी की उम्र क्या है। बस आंख बंद करके एफआईआर दर्ज कर ली।
दूसरा मामला – लोन न चुकाने का नया जुगाड़, बैंक वालों पर ही ठोक दो SC/ST केस
सिस्टम का इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा की जब बैंक के कर्मचारी किसी डिफाल्टर से सरकारी नियमों के तहत लोन के पैसे की रिकवरी करने जाते हैं, तो सामने वाला पैसे लौटाने के बजाय सीधे थाने जाकर पूरे के पूरे बैंक स्टाफ पर ही SC/ST एक्ट ठोक देता है!
मतलब आपने लोन लिया, पैसा खा गए, और जब बैंक ने पैसा मांगा तो आपने कानून का चाबुक चलाकर बैंक वालों को ही जेल की सलाखों के पीछे धकेलने की धमकी दे डाली। यह देश का सबसे नया और अचूक ‘लोन माफी योजना’ बन चुका है।
तीसरा मामला – हरियाणा में चोरी ऊपर से सीनाज़ोरी
हरियाणा का यह कांड तो पूरी दुनिया में कानून के अंधेपन का सबसे क्लासिक उदाहरण बन गया है। रात के अंधेरे में एक चोर घर में चोरी करने घुसता है।
मकान मालिक की नींद खुल जाती है और वो अपनी जान पर खेलकर उस चोर को रंगे हाथों पकड़ लेता है। आम तौर पर चोर को जेल जाना चाहिए था, है ना?
लेकिन यहां गेम पलट गया। पकड़े जाने के बाद उस चोर ने उल्टा मकान मालिक पर ही एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा लिखवा दिया की “इन्होंने मुझे पीटा है और मेरी जाति को लेकर गालियां दी हैं।”
और फिर क्या हुआ? जिस इंसान के घर में चोरी हुई थी, वही बेचारा मकान मालिक हथकड़ी पहनकर जेल चला गया और चोर सीना तानकर बाहर घूम रहा है!
ज़रा सोचिए, जब देश में ऐसे बेतुके और डरावने मामले रोज़ सामने आ रहे हों, तो चित्रकूट के देवा द्विवेदी जैसे 19 साल के बच्चे का पुलिस और कानून के नाम से खौफज़दा होना और डिप्रेशन में जाना क्या कोई अचरज की बात है?
90 फीसदी झूठे मुकदमों का काला बाज़ार और सरकारी मुआवजे की मलाई से खड़ी हुई ब्लैकमेलिंग इंडस्ट्री
अगर आपको लगता है की एससी-एसटी एक्ट का यह खौफनाक दुरुपयोग सिर्फ गांव की आपसी रंजिश, नाली के विवाद या ईर्ष्या तक सीमित है, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं।
ज़मीनी हकीकत तो ये है की आज यह कानून बकायदा एक ‘बिजनेस मॉडल’ (Business Model) और ‘स्टार्टअप’ बन चुका है। जी हां, एक ऐसा धंधा जहां न कोई इन्वेस्टमेंट है और न कोई मेहनत, बस थाने जाकर एक झूठी एप्लीकेशन देनी है और लाखों की मलाई आपकी जेब में।
ज़रा अदालतों और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के उन आंकड़ों पर नज़र डालिए जिन्हें देखकर खुद सुप्रीम कोर्ट के जज कई बार अपना माथा पकड़ चुके हैं।
जब ये एससी-एसटी एक्ट के मामले थानों से निकलकर कोर्ट के ट्रायल (Trial) तक पहुंचते हैं, तो आपको पता है क्या होता है? लगभग 90 फीसदी केस या तो पूरी तरह से झूठे पाए जाते हैं, या फिर सबूतों के अभाव में औंधे मुंह गिर जाते हैं।
मतलब 100 में से 90 मामलों में किसी बेगुनाह को सिर्फ ब्लैकमेल करने, ज़मीन हड़पने या पैसे ऐंठने के लिए फंसाया गया होता है।
अब आप सोचेंगे की कोई किसी पर झूठा मुकदमा क्यों करेगा? यहीं से शुरू होता है मुआवजे का असली खेल। दरअसल, एससी-एसटी एक्ट के तहत जैसे ही किसी पर एफआईआर दर्ज होती है, कानूनन पीड़ित पक्ष को सरकार की तरफ से भारी-भरकम आर्थिक मुआवजा मिलता है।
यह रकम हज़ारों से लेकर लाखों रुपये तक होती है। बस इसी ‘सरकारी मलाई’ के लालच ने झूठे मुकदमों की एक पूरी इंडस्ट्री खड़ी कर दी है।
गांव-देहात से लेकर शहरों तक, ऐसे ‘दलालों’ का एक पूरा नेक्सस काम कर रहा है जो लोगों को भड़काता है की “अरे भाई, तुम फलां आदमी पर केस ठोक दो, तुम्हें सरकार से लाखों रुपये मिलेंगे और वो डर के मारे अलग से पैसा देगा।”
और इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं हमारे देश के कुछ राजनीतिक ठेकेदार। चंद्रशेखर आज़ाद (रावण) जैसे नेता खुलेआम मंचों से यह मांग कर रहे हैं की एससी-एसटी एक्ट के तहत मिलने वाले इस मुआवजे की रकम को 8 लाख से बढ़ाकर सीधा 30 लाख रुपये कर दिया जाए!
ज़रा इस बात की क्रोनोलॉजी समझिए। अगर किसी आदमी को महज़ एक एफआईआर लिखाने के बदले सरकार 30 लाख रुपये का चेक थमा देगी, तो फिर इस देश का युवा पढ़ाई-लिखाई, नौकरी या मेहनत-मज़दूरी क्यों करेगा भाई?
वो तो अपना सारा काम-धंधा छोड़कर बस इसी ताक में बैठेगा की कोई उससे ज़रा सी बहस करे और वो सीधा जाकर उस पर एससी-एसटी एक्ट ठोक दे!
फांसी का फंदा नहीं बल्कि कानूनी हथौड़ा है इस सिस्टम का असली इलाज, डरें नहीं डटकर लड़ें
देवा द्विवेदी की मौत ने पूरे समाज को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ और दो-टूक शब्दों में समझ लेनी चाहिए- फांसी का फंदा, ज़हर की पुड़िया या ट्रेन के आगे कूद जाना… ये किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।
देवा की मौत से उस झूठा केस करने वाले का कुछ नहीं बिगड़ा, सिस्टम का एक बाल बांका नहीं हुआ, अगर कुछ उजड़ा है तो सिर्फ देवा की उस अभागी मां का संसार उजड़ा है।
आज देवा जैसे हज़ारों-लाखों युवाओं को यह समझना होगा की डिप्रेशन में आकर ज़िंदगी खत्म करने से आप मुजरिमों को जीतने का मौका दे रहे हैं।
एससी-एसटी एक्ट के मामले में आपको डरना नहीं है, बल्कि इस सिस्टम के मुंह पर कानूनी हथौड़ा मारना है! अगर आपके खिलाफ किसी ने झूठा मुकदमा लिखवा दिया है, तो रोने या घबराने के बजाय इन कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करें!
पहली बात, एससी-एसटी एक्ट की सबसे बड़ी शर्त यह है की जातिसूचक गालियां ‘पब्लिक व्यू’ (सार्वजनिक स्थान) में दी गई हों, जहां बाहरी लोग मौजूद हों।
अगर विवाद किसी बंद कमरे में, खेत की मेड़ पर, या फोन पर हुआ है, तो यह एक्ट लागू ही नहीं होता! अगर झगड़ा किसी पैसे के लेन-देन, ज़मीन या किराए का था और उसे जबरन जातिगत रंग दिया गया है, तो आप क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 482 (और अब नए कानून BNSS की धारा 528) के तहत सीधे अपने राज्य के हाई कोर्ट (High Court) का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।
हाई कोर्ट को अगर ज़रा भी लगेगा की केस आपसी रंजिश का है, तो वो एक झटके में उस FIR को रद्द कर देगा।
और दूसरी, सबसे ज़रूरी बात- जब आप इस झूठे केस से बरी हो जाएं या आपकी FIR रद्द हो जाए, तो घर जाकर चुपचाप भगवान का प्रसाद बांटकर मत बैठ जाइए।
इसी ‘चुप बैठ जाने’ की आदत ने इन ब्लैकमेलरों के हौसले बुलंद किए हैं। छूटते ही सबसे पहला काम कीजिए- उस झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति पर 10 से 20 लाख रुपये का मानहानि (Defamation Suit) का मुकदमा ठोक दीजिए!
साथ ही पुलिस के खिलाफ भी झूठे केस में फंसाने का मुकदमा डालिए। जब उस ब्लैकमेलर को कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे और मानहानि के लाखों रुपये चुकाने के लिए अपने घर-खेत बेचने की नौबत आएगी, तब उसे समझ आएगा की किसी मासूम की ज़िंदगी से खेलने का अंजाम क्या होता है।
समाज में जब तक ऐसे झूठे आरोप लगाने वालों के अंदर मानहानि और जेल जाने का खौफ नहीं पैदा होगा, तब तक ये दुकान ऐसे ही चलती रहेगी।
