देश विभाजन और हिन्दुओं के कत्ल पर खामोशी बनी गोडसे के सीने की आग, लेकिन एक वध के बदले 5000 ब्राह्मणों का हुआ भीषण नरसंहार, शांति का उपदेश देने वालों ने दफना दिया अपना ये खूनी पाप

आज 2 अक्टूबर है। सुबह से ही आपके टीवी पर बापू का चश्मा, सूत की माला और चरखे की तस्वीरें घूम रही होंगी।

राजघाट पर वीआईपी गाड़ियों का काफिला पहुंचा होगा, सफेद खादी पहने नेताओं ने फूल चढ़ाए होंगे और बड़ी-बड़ी डिबेट्स में शांति के सफेद कबूतर उड़ाए जा रहे होंगे।

हर साल की तरह आज भी आपको ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ का वही पुराना कैसेट सुनाया जाएगा। लेकिन आज हम उस इतिहास की बात करेंगे जो इन भजनों के शोर में बड़ी ही सफाई से दफना दिया गया।

सच कहूं तो आज का दिन सिर्फ एकतरफा ‘अहिंसा’ का महिमामंडन करने का नहीं है, बल्कि बापू की उन भारी गलतियों के छिलके उतारने का दिन है जिसने इस देश के दो टुकड़े करवा दिए और एक आम नागरिक को ‘गोडसे’ बनने पर मजबूर कर दिया।

एक तरफ वो इंसान था जिसके एक अनशन के आगे पूरा सिस्टम घुटने टेक देता था, लेकिन जब हिन्दुओं को बेरहमी से काटा जा रहा था, तब वही सिस्टम और वो इंसान आंखें मूँद कर बैठ गया।

और दूसरी तरफ उस इंसान की हत्या के बाद उसी ‘शांतिप्रिय’ और ‘अहिंसावादी’ ईकोसिस्टम ने वो खूनी तांडव किया, जिसमें 5000 से ज़्यादा ब्राह्मणों को ज़िंदा जला दिया गया।

‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’ वाले उस वादे का क्या हुआ जब भारत माता के टुकड़े किए जा रहे थे

गोडसे कोई गली का गुंडा या भाड़े का हत्यारा नहीं था। वो एक पढ़ा-लिखा पत्रकार था।

गोडसे के सीने में वो आग रातों-रात नहीं भड़की थी। यह आग सालों के उस मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुओं की लाशों पर की जा रही राजनीति को देखकर सुलग रही थी।

ज़रा 1940 के दशक वाले उस दौर में चलिए। जब मुस्लिम लीग ने देश के बंटवारे की मांग तेज की थी, तो पूरे देश के सामने एक बहुत ही भावुक और बड़ा डायलॉग मारा गया था।

खुद गांधी जी ने डंके की चोट पर कहा था- “Vivisect me before you vivisect India” (अगर भारत का विभाजन करना है, तो पहले मेरे टुकड़े करने होंगे। पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा)।

लेकिन फिर क्या हुआ? जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की धमकी दी। सड़कों पर कत्लेआम शुरू हुआ। और जैसे ही दबाव बढ़ा, वो ‘लाश वाली कसम’ हवा में कहीं गायब हो गई।

गांधी ने माउंटबेटन और नेहरू के उस प्लान को लागू होने दिया जिसमें 1947 में भारत माता के दो टुकड़े होने तय हो चुके थे।

लाखों हिन्दू और सिख रातों-रात अपने ही देश में अनाथ और शरणार्थी बन गए। रावलपिंडी और लाहौर से जो ट्रेनें आ रही थीं, वो लाशों से पटी पड़ी थीं। महिलाओं की इज़्ज़त सरेआम लूटी जा रही थी।

लेकिन कसम खाने वाले बापू ने बंटवारे को रोकने के लिए कोई ‘आमरण अनशन’ नहीं किया! उन्होंने बस शांति का उपदेश दिया और हिन्दुओं को उनकी बर्बादी के भरोसे छोड़ दिया।

नोआखली में हिन्दुओं का कत्लेआम और गांधी का हिन्दुओं को ही जिहादियों के सामने अपनी गर्दन झुकाने का फरमान

विभाजन तो बहुत बाद की बात है, उससे पहले भारत में जो हुआ, उसमे मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी इंतेहाँ पर हो गयी थी।

1946 में बंगाल के नोआखली में सुहरावर्दी की मुस्लिम लीग सरकार के संरक्षण में हिन्दुओं का वीभत्स नरसंहार हुआ।

गुंडों की भीड़ ने चुन-चुनकर हिन्दुओं को मारा, उनके घर जलाए और महिलाओं को सड़कों पर घसीटा गया। गांधी जी नोआखली गए ज़रूर, लेकिन उन्होंने वहां जाकर क्या किया?

उन्होंने हिन्दुओं से ही कहा की वे ‘मुस्लिम भाइयों’ की हिंसा को शांति से सह लें। उन्हें पलटवार करने से रोका गया।

गोडसे ने अपने बयानों में साफ़ कहा था की “गांधी की अहिंसा सिर्फ हिन्दुओं के लिए थी। जब मुसलमानों ने दंगे किए, तो गांधी ने उन्हें रोकने के बजाय हिन्दुओं को ही अपनी गर्दन झुकाने के लिए कह दिया।”

कश्मीर युद्ध के बीच पाक को 55 करोड़ दिलाने का बापू का अनशन जिसने गोडसे को पिस्तौल उठाने पर किया मजबूर

लेकिन गोडसे के सब्र का बांध तब टूटा, जब आज़ादी के तुरंत बाद पाकिस्तान ने भारत की पीठ में छुरा घोंपा। आज़ादी के वक्त एग्रीमेंट हुआ था की भारत सरकार पाकिस्तान को खज़ाने के हिस्से के रूप में 75 करोड़ रुपये देगी।

20 करोड़ दिए जा चुके थे। लेकिन अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबाइलियों के भेस में हमला कर दिया। हमारे सैनिक वहां अपनी जान की बाज़ी लगा रहे थे।

ऐसे नाज़ुक वक्त में सरदार वल्लभभाई पटेल और नेहरू ने बहुत ही होशियारी और सूझबूझ दिखाते हुए पाकिस्तान को दिए जाने वाले बाकी के 55 करोड़ रुपये रोक लिए।

लॉजिक बिल्कुल सीधा था भाई- अगर हम पाकिस्तान को अभी 55 करोड़ देंगे, तो वो उसी पैसे से हथियार खरीदेगा और हमारे ही जवानों को मारेगा।

लेकिन यहाँ एंट्री होती है गांधी की उस ज़िद की, जिसने पूरे देश को सन्न कर दिया। 13 जनवरी 1948 को गांधी जी अचानक अनशन पर बैठ गए।

उनकी मांग क्या थी? “पाकिस्तान को उसके 55 करोड़ रुपये तुरंत दिए जाएं!” सोचिए ज़रा! सीमा पर हमारे जवान कट रहे थे, और दिल्ली में बैठकर भारत सरकार को ब्लैकमेल किया जा रहा था की दुश्मन देश को पैसा दो।

आख़िरकार दबाव इतना बढ़ा की भारत सरकार को अपने ही राष्ट्रहित के खिलाफ जाकर घुटने टेकने पड़े और पाकिस्तान को वो 55 करोड़ रुपये दे दिए गए।

अपने ही जवानों की जान की कीमत पर एक पड़ोसी दुश्मन मुल्क का ऐसा खौफनाक तुष्टिकरण इतिहास में शायद ही कहीं हुआ हो।

नाथूराम गोडसे के लिए यह आख़िरी ट्रिगर था। गोडसे को यह बात पूरी तरह समझ आ चुकी थी की जब तक गांधी ज़िंदा हैं, वो ऐसे ही अनशन करके और सरकार को ब्लैकमेल करके हिन्दुओं और राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ाते रहेंगे।

गोडसे ने अदालत में साफ कहा था की यही वो 55 करोड़ का धोखा था, जिसने उसके मन से सारे संकोच खत्म कर दिए और उसे वो पिस्तौल उठाने पर मजबूर कर दिया। उसे लगा की एक व्यक्ति के ज़िंदा रहने की कीमत पूरे देश के वजूद से बड़ी नहीं हो सकती।

गाँधी वध के बाद नाथूराम गोडसे के अदालत में दिए गए वो ऐतिहासिक तर्क जिन्हें कांग्रेस ने 60 सालों तक बैन रखा

30 जनवरी 1948 को जब बापू पर बिड़ला हाउस के अहाते में गोलियां चलीं, तो नाथूराम गोडसे वहां से भागा नहीं। उसने बाकायदा अपने हाथ ऊपर किए, ‘पुलिस-पुलिस’ चिल्लाया और खुद को कानून के हवाले कर दिया।

जब गोडसे को अदालत में पेश किया गया, तो उसने अपनी जान बख्शने की कोई भीख नहीं मांगी। इसके बजाय उसने अदालत में अपना वो ऐतिहासिक बयान पढ़ा।

सरकार गोडसे के उन तर्कों से इतना डर गई थी की उस बयान पर, और बाद में छपी किताब ‘मैंने गांधी को क्यों मारा’ (Why I Killed Gandhi) पर कांग्रेस ने पूरे 60 सालों तक बैन लगाए रखा।

आखिर उस बयान में ऐसा क्या था जिससे सत्ता इतनी खौफ खा रही थी? गोडसे ने कोर्ट में पूरी बेबाकी से कहा था की वह गांधी के शुरुआती कामों और उनके त्याग का सम्मान करता है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को ‘राष्ट्र के ऊपर’ नहीं रखा जा सकता।

गोडसे का सीधा सवाल था की अगर ‘अहिंसा’ ही आपका परम धर्म है, तो यह नियम सिर्फ हिन्दुओं पर ही क्यों थोपा गया?

केरल के मोपला में जब खिलाफत आंदोलन के नाम पर मुसलमानों ने हज़ारों हिन्दुओं को काटा, औरतों के साथ दुष्कर्म किया, तो गांधी ने उन हत्यारों को ‘भटके हुए देशभक्त’ क्यों कहा?

गोडसे को इस बात की गहरी पीड़ा थी की गांधी ने तुष्टिकरण को एक ऐसी बीमारी बना दिया था जिसका इलाज मुमकिन नहीं लग रहा था।

गोडसे ने जज की आँखों में आँखें डालकर कहा,

“मुझे लगा की अगर गांधी जी ज़िंदा रहे, तो वो इसी तरह अनशन कर-करके हिन्दुओं के अधिकारों और भारत की सुरक्षा को ब्लैकमेल करते रहेंगे। देश को इस ब्लैकमेल से बचाने के लिए, और तुष्टिकरण के इस अंतहीन सिलसिले को तोड़ने के लिए मैंने अपनी जान और नाम की परवाह किए बिना यह कदम उठाया।”

गोडसे जानता था की इस हत्या के बाद उसे इतिहास में एक ‘खलनायक’ और शैतान की तरह पेश किया जाएगा। लेकिन उसके लिए भारत माता का वजूद उस एक व्यक्ति की जान से कहीं बड़ा था, जो लगातार देश के दुश्मनों को फायदा पहुंचा रहा था।

एक हत्या के बदले आठ हज़ार चिताएं और ‘अहिंसावादियों’ ने महाराष्ट्र में शुरू किया ब्राह्मणों का भीषण नरसंहार

अब ज़रा इस देश के सबसे बड़े पाखंड को देखिए। जो लोग आज कहते हैं की “गांधी जी ने हमें बिना खड्ग, बिना ढाल के आज़ादी दिलाई”, जो लोग 2 अक्टूबर को कबूतर उड़ाकर शांति का मेडल पहनते हैं… ज़रा पूछिए उनसे की 30 जनवरी 1948 की शाम के बाद उन्होंने क्या किया था?

जैसे ही रेडियो पर यह खबर फैली की नाथूराम गोडसे ने गांधी को गोली मार दी है, तो ‘अहिंसा’ का चोला ओढ़ने वालों का असली और खौफनाक चेहरा दुनिया के सामने आ गया।

खबर फैलते ही पता चला की गोडसे महाराष्ट्र के ‘चितपावन ब्राह्मण’ (Chitpavan Brahmin) समुदाय से आता है। फिर क्या था? इन तथाकथित शान्तिप्रियों, कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और गांधीवादियों ने रातों-रात पूरे महाराष्ट्र को एक सुलगते हुए नर्क में तब्दील कर दिया।

गोडसे की एक गोली का बदला इन लोगों ने पूरे ब्राह्मण समाज से लेना शुरू कर दिया।

पुणे, सतारा, सांगली, नागपुर और कोल्हापुर में ब्राह्मणों के घरों की पहचान कर-करके उन पर हमले किए गए। मॉरीन पैटरसन (Maureen Patterson) जैसी विदेशी लेखिकाओं और उस दौर के तमाम स्वतंत्र पत्रकारों की रिसर्च बताती है की यह कोई अचानक भड़का हुआ गुस्सा नहीं था।

इनके पास बाकायदा लिस्ट थी की कौन सा ब्राह्मण कहाँ रहता है। जो लोग कल तक सूत कात रहे थे और चरखा चला रहे थे, उनके हाथों में रातों-रात पेट्रोल के डिब्बे, मशालें और तलवारें आ गई थीं।

गोडसे के नाम पर इन गुंडों ने 5000 से लेकर 8000 तक निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को घरों से खींच-खींच कर ज़िंदा जला दिया। बच्चों को नहीं बख्शा गया।

ब्राह्मण महिलाओं की सरेआम आबरू लूटी गई। हज़ारों की संख्या में ब्राह्मणों की दुकानें, उनकी फैक्ट्रियां और उनके पुस्तैनी घर राख के ढेर में बदल दिए गए।

पुणे की सड़कों पर ब्राह्मणों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जा रहा था। कई ब्राह्मण परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए रातों-रात अपना शहर, अपना सब कुछ छोड़कर वहां से भागना पड़ा।

सोचिए ज़रा! एक तरफ गोडसे था, जिसने अपने कृत्य की पूरी ज़िम्मेदारी ली, सरेंडर किया और फांसी के फंदे को चूम लिया।

और दूसरी तरफ ये अहिंसा के स्वयंभू ठेकेदार थे, जिन्होंने एक अकेले गोडसे के कृत्य की सज़ा उन 8000 मासूम ब्राह्मणों को दी, जिनका इस पूरी घटना से दूर-दूर तक कोई लेना-देना ही नहीं था।

क्या यही वो अहिंसा थी जिसका डंका आज तक पूरी दुनिया में पीटा जाता है? क्या इसी खून-खराबे के लिए इन कांग्रेसी नेताओं को ‘अहिंसावादी’ कहा जाता है?

गोडसे को तो फांसी मिल गई, लेकिन 8000 ब्राह्मणों का खून पीने वाले इन ‘खादीधारी’ हत्यारों को आज तक किसी अदालत ने सज़ा क्यों नहीं दी?

स्वातंत्र्यवीर सावरकर के परिवार पर कातिलाना हमला और पुलिस प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी

गोडसे की उस एक गोली को बहाना बनाकर जिस तरह से महाराष्ट्र में खून की नदियां बहाई जा रही थीं, उसका एक बहुत ही खौफनाक और शर्मनाक अध्याय वीर सावरकर के परिवार के साथ जुड़ा है।

इन ‘शांतिप्रियों’ का मकसद सिर्फ गोडसे के समाज (चितपावन ब्राह्मणों) को मारना ही नहीं था, बल्कि हर उस व्यक्ति और विचारधारा को कुचलना था जो डंके की चोट पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ की बात करता था।

गोडसे कभी हिन्दू महासभा से जुड़े रहे थे, बस इसी बात को आधार बनाकर कांग्रेस समर्थित इस दंगाई भीड़ ने अपना अगला निशाना स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को बनाया।

वो वीर सावरकर, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए सेल्युलर जेल (काला पानी) की काल कोठरी में कोल्हू चलाया था, उनके मुंबई (दादर) स्थित घर ‘सावरकर सदन’ पर इस अहिंसक भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया।

इसी भीड़ ने सावरकर जी के सगे भाई, डॉ. नारायणराव सावरकर पर कातिलाना हमला किया।

ज़रा सोचिए, एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का परिवार जिसने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया हो, उन पर इन्हीं खादी पहनने वाले गुंडों ने पत्थरों और लाठियों से इतनी बेरहमी से वार किया की डॉ. नारायणराव बुरी तरह लहूलुहान हो गए।

बाद में इसी सदमे और चोटों की वजह से तड़प-तड़प कर उनकी दर्दनाक मौत हो गई। नाथूराम गोडसे ने तो एक ऐसे इंसान को मारा था जो उसकी नज़र में देश के टुकड़े करवाने का ज़िम्मेदार था, लेकिन डॉ. नारायणराव सावरकर का क्या कसूर था? उनका कसूर सिर्फ इतना था की वे सावरकर के भाई थे और एक ब्राह्मण थे!

और इस पूरे कत्लेआम के दौरान उस वक्त का पुलिस प्रशासन क्या कर रहा था? वो अपनी आंखें मूँद कर तमाशा देख रहा था।

मध्य प्रदेश के तत्कालीन कद्दावर कांग्रेसी नेता द्वारका प्रसाद मिश्रा (D.P. Mishra) ने खुद अपने संस्मरणों में इस बात को स्वीकारा है की महाराष्ट्र में ब्राह्मणों के खिलाफ हुई इस हिंसा में कांग्रेसी कार्यकर्ता सीधे तौर पर शामिल थे।

जब सत्ताधारी पार्टी के लोग ही सड़कों पर आग लगा रहे हों, तो पुलिस किसकी FIR लिखेगी और किसे गिरफ्तार करेगी? पुलिस ने जानबूझकर इस नरसंहार को होने दिया।

आज जब आप इतिहास की किताबें खोलते हैं, तो आपको 1984 के सिख दंगों के बारे में सब कुछ मिल जाएगा। 2002 के गुजरात दंगों पर ये लोग छाती पीट-पीट कर पूरी दुनिया में सेमिनार करते हैं।

लेकिन ज़रा किसी से पूछिए की क्या उसने 1948 में हुए ‘8000 ब्राह्मणों के नरसंहार’ (Chitpavan Brahmin Genocide) के बारे में कभी एक लाइन भी पढ़ी है?

नहीं पढ़ी होगी! क्योंकि आज़ाद भारत के इस पहले और सबसे खौफनाक राजनीतिक नरसंहार को तत्कालीन नेहरू सरकार और उनके दरबारी इतिहासकारों ने बड़ी ही सफाई से इतिहास के पन्नों से ही गायब कर दिया।

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